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02. विद्येश्वरसंहिता || 15. देश, काल, पात्र और दान आदिका विचार

02. विद्येश्वरसंहिता || 15. देश, काल, पात्र और दान आदिका विचार ऋषियोंने कहा- -समस्त पदार्थोंके ज्ञाताओंमें श्रेष्ठ सूतजी ! अब आप क्रमशः देश, काल आदिका वर्णन करें। सूतजी बोले- महर्षियो ! देवयज्ञ आदि कर्मोंमें अपना शुद्ध गृह समान फल देनेवाला होता है अर्थात् अपने घरमें किये हुए देवयज्ञ आदि शास्त्रोक्त फलको सममात्रामें देनेवाले होते हैं। गोशालाका स्थान घरकी अपेक्षा दसगुना फल देता है । जलाशयका तट उससे भी दसगुना महत्त्व रखता है तथा जहाँ बेल, तुलसी एवं पीपलवृक्षका मूल निकट हो, वह स्थान जलाशयके तटसे भी दसगुना फल देनेवाला होता है । देवालयको उससे भी दसगुने महत्त्वका स्थान जानना चाहिये। देवालयसे भी दसगुना महत्त्व रखता है तीर्थभूमिका तट । उससे दसगुना श्रेष्ठ है नदीका किनारा । उससे दसगुना उत्कृष्ट है तीर्थनदीका तट और उससे भी दसगुना महत्त्व रखता है सप्तगङ्गा नामक नदियोंका तीर्थ । गङ्गा, गोदावरी, कावेरी, ताम्रपर्णी, सिन्धु, सरयू और नर्मदा - इन सात नदियोंको सप्तगङ्गा कहा गया है । समुद्रके तटका स्थान इनसे भी दसगुना पवित्र माना गया है और पर्वतके शिखरका प्रदेश समुद्रतटसे भी दसगुना पावन है। सबसे अधिक महत्...