02. विद्येश्वरसंहिता || 17. षड्लिङ्गस्वरूप प्रणवका माहात्म्य, उसके सूक्ष्म रूप (ॐकार) और स्थूल रूप (पञ्चाक्षर मन्त्र) का विवेचन, उसके जपकी विधि एवं महिमा, कार्यब्रह्मके लोकोंसे लेकर कारणरुद्रके लोकोंतकका विवेचन करके कालातीत, पञ्चावरणविशिष्ट शिवलोकके अनिर्वचनीयवैभवका निरूपण तथा शिवभक्तोंके सत्कारकी महत्ता
02. विद्येश्वरसंहिता || 17. षड्लिङ्गस्वरूप प्रणवका माहात्म्य, उसके सूक्ष्म रूप (ॐकार) और स्थूल रूप (पञ्चाक्षर मन्त्र) का विवेचन, उसके जपकी विधि एवं महिमा, कार्यब्रह्मके लोकोंसे लेकर कारणरुद्रके लोकोंतकका विवेचन करके कालातीत, पञ्चावरणविशिष्ट शिवलोकके अनिर्वचनीय वैभवका निरूपण तथा शिवभक्तोंके सत्कारकी महत्ता। ऋषि बोले- प्रभो ! महामुने ! आप हमारे लिये क्रमशः षड्लिङ्गस्वरूप प्रणवका माहात्म्य तथा शिवभक्तके पूजनका प्रकार बताइये । सूतजीने कहा – महर्षियो ! आपलोग तपस्याके धनी हैं, आपने यह बड़ा सुन्दर प्रश्न उपस्थित किया है। किंतु इसका ठीक-ठीक उत्तर महादेवजी ही जानते हैं, दूसरा कोई नहीं । तथापि भगवान् शिवकी कृपासे ही मैं इस विषयका वर्णन करूँगा । वे भगवान् शिव हमारी और आपलोगोंकी रक्षाका भारी भार बारंबार स्वयं ही ग्रहण करें । 'प्र' नाम है प्रकृतिसे उत्पन्न संसाररूपी महासागरका । प्रणव इससे पार करनेके लिये दूसरी (नव) नाव है। इसलिये इस ओंकारको 'प्रणव' की संज्ञा देते हैं। ॐकार • अपने जप करनेवाले साधकोंसे कहता है- 'प्र-प्रपञ्च, न- — नहीं है, वः - तुमलोगोंके लिये ।' अतः इस भावको ल...