02. विद्येश्वरसंहिता || 21-22. पार्थिवपूजा की महिमा, शिवनैवेद्यभक्षण के विषयमें निर्णय तथा बिल्व का माहात्म्य
02. विद्येश्वरसंहिता || 21-22. पार्थिवपूजा की महिमा, शिवनैवेद्यभक्षण के विषयमें निर्णय तथा बिल्व का माहात्म्य (तदन्तर ऋषियों के पूछने पर किस कामना की पूर्ती के लिए कितने पार्थिवलिंगों की पूजा करनी चाहिए, इस विषय का वर्णन करके) सूतजी बोले - महर्षियो! पार्थिवलिंगों की पूजा कोटि-कोटि यज्ञों का फल देने वाली है। कलियुग में लोगों के लिए शिवलिंग-पूजन जैसा श्रेष्ठ दिखायी देता है वैसा दूसरा कोई साधन नहीं है यह समस्त शास्त्रों का निश्चित सिद्धांत है। शिवलिंग भोग और मोक्ष देने वाला है। लिंग तीन प्रकार के कहे गये हैं- उत्तम, मध्यम और अधम। जो चार अंगुल ऊँचा और देखने में सुन्दर हो तथा वेदीसे युक्त हो, उस शिवलिंग को शास्त्रज्ञ महर्षियो ने 'उत्तम' कहा है। उससे आधा 'मध्यम' और उससे आधा 'अधम' माना गया है। इस तरह तीन प्रकार के शिवलिंग कहे गये हैं, जो उत्तरोत्तर श्रेष्ठ हैं। ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यः शूद्रो वा प्रतिलोमजः । पूजयेत् सततं लिङ्ग तत्तन्मन्त्रेण सादरम् ॥ किं बहूक्तेन मुनयः स्त्रीणामपि तथान्यतः। अधिकारोऽस्ति सर्वेषां शिवलिङ्गार्चने द्विजाः ।। (शि० पु० वि० २१। ३९-४०) ब्...