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01. शिवपुराण माहात्म्य || 05. चञ्चलाके प्रयत्नसे पार्वतीजीकी आज्ञा पाकर तुम्बुरुका विन्ध्यपर्वतपर शिवपुराणकी कथा सुनाकर बिन्दुगका पिशाचयोनिसे उद्धार करना तथा उन दोनों दम्पतिका शिवधाममें सुखी होना

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01. शिवपुराण माहात्म्य || 05. चञ्चुलाके प्रयत्नसे पार्वतीजीकी आज्ञा पाकर तुम्बुरुका विन्ध्यपर्वतपर शिवपुराणकी कथा सुनाकर बिन्दुगका पिशाचयोनिसे उद्धार करना तथा उन दोनों दम्पतिका शिवधाममें सुखी होना सूतजी बोले   शौनक ! एक दिन परमानन्दमें निमग्न हुई चञ्चुलाने उमादेवीके पास जाकर प्रणाम किया और दोनों हाथ जोड़कर वह उनकी स्तुति करने लगी।  चञ्चुला बोली  गिरिराजनन्दिनी! स्कन्दमाता उमे ! मनुष्योंने सदा आपका सेवन किया है। समस्त सुखोंको देनेवाली शम्भुप्रिये ! आप ब्रह्मस्वरूपिणी हैं। विष्णु और ब्रह्मा आदि देवताओंद्वारा सेव्य हैं। आप ही सगुणा और निर्गुणा हैं तथा आप ही सूक्ष्मा सच्चिदानन्द-स्वरूपिणी आद्या प्रकृति हैं। आप ही संसारकी सृष्टि, पालन और संहार करनेवाली हैं। तीनों गुणोंका आश्रय भी आप ही हैं। ब्रह्मा, विष्णु और‍ महेश्वर- इन तीनों देवताओंका आवास स्थान तथा उनकी उत्तम प्रतिष्ठा करनेवाली पराशक्ति आप ही हैं। सूतजी कहते हैं शौनक ! जिसे सदगति प्राप्त हो चुकी थी, वह चञ्चुला इस प्रकार महेश्वरपत्नी उमाकी स्तुति करके सिर झुकाये चुप हो गयी। उसके नेत्रोंमें प्रेमके आँसू उमड़...