02. विद्येश्वरसंहिता || 03 - 04 साध्य साधन आदिका विचार तथा श्रवण, कीर्तन और मनन - इन तीन साधनोंकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन
02. विद्येश्वरसंहिता || 03 - 04 साध्य साधन आदिका विचार तथा श्रवण, कीर्तन और मनन - इन तीन साधनोंकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन व्यासजी कहते हैं सूतजीका यह वचन सुनकर वे सब महर्षि बोले- 'अब आप हमें वेदान्तसार- सर्वस्वरूप अद्भुत शिवपुराणकी कथा सुनाइये।' सूतजीने कहा आप सब महर्षिगण रोग-शोकसे रहित कल्याणमय भगवान् शिवका स्मरण करके पुराणप्रवर शिवपुराणकी, जो वेदके सार तत्त्वसे प्रकट हुआ है, कथा सुनिये शिवपुराणमें भक्ति, ज्ञान और वैराग्य- इन तीनोंका प्रीतिपूर्वक गान किया गया है और वेदान्तवेद्य सहस्तुका विशेषरूपसे वर्णन है। इस वर्तमान कल्पमें जब सृष्टिकर्म आरम्भ हुआ था, उन दिनों छः कुलोंके महर्षि परस्पर वाद-विवाद करते हुए कहने लगे- 'अमुक वस्तु सबसे उत्कृष्ट है और अमुक नहीं है।' उनके इस विवादने अत्यन्त महान् रूप धारण कर लिया। तब वे सब-के-सब अपनी शङ्काके समाधानके लिये सृष्टिकर्ता अविनाशी ब्रह्माजीके पास गये और हाथ जोड़कर विनयभरी वाणीमें बोले- 'प्रभो! आप सम्पूर्ण जगत्को धारण-पोषण करनेवाले तथा समस्त कारणोंके भी कारण हैं। हम यह जानना चाहते हैं कि सम्पूर्ण तत्वोंसे परे परात्पर पुराणपुरु...