05. कोटिरुद्रसंहिता | 01. द्वादश ज्योतिर्लिङ्गों तथा उनके उपलिङ्गोंका वर्णन एवं उनके दर्शन-पूजनकी महिमा
05. कोटिरुद्रसंहिता | 01. द्वादश ज्योतिर्लिङ्गों तथा उनके उपलिङ्गोंका वर्णन एवं उनके दर्शन-पूजनकी महिमा यो धत्ते निजमाययैव भुवनाकारं विकारोज्झितो यस्याहु: करुणाकटाक्षविभवी स्वर्गापवर्गाभिधौ । प्रत्यग्बोधसुखाद्वयं हदि सदा पश्यन्ति यं योगिन- स्तस्मै शैलसुताञ्चितार्द्धवपुषे शश्वन्नमस्तेजसे ॥ १॥ जो निर्विकार होते हुए भी अपनी मायासे ही विराट् विश्वका आकार धारण कर लेते हैं, स्वर्ग और अपवर्ग (मोक्ष) जिनके कृपा कटाक्षके ही वैभव बताये जाते हैं तथा योगीजन जिन्हें सदा अपने हृदयके भीतर अद्वितीय आत्मज्ञानानन्दस्वरूपमें ही देखते हैं, उन तेजोमय भगवान् शंकरको, जिनका आधा शरीर शैलराजकुमारी पार्वतीसे सुशोभित है, निरन्तर मेरा नमस्कार है ॥ १ ॥ कृपाललितवीक्षणं स्मितमनोज्ञवक्त्राम्बुजं शशाङ्ककलयोज्ज्वलं शमितघोरतापत्रयम् । करोतु किमपि स्फुरत्परमसौख्यसच्चिद्वपु- र्धराधरसुताभुजोद्वलयितं महो मङ्गलम् ॥ २ ॥ जिसकी कृपापूर्ण चितवन बड़ी ही सुन्दर है, जिसका मुखारविन्द मन्द मुस्कानकी छटासे अत्यन्त मनोहर दिखायी देता है, जो चन्द्रमाकी कलासे परम उज्ज्वल है, जो आध्यात्मिक आदि तीनों ...