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05. कोटिरुद्रसंहिता | 13. वैद्यनाथेश्वर ज्योतिर्लिङ्गके प्राकट्यकी कथा तथा महिमा

05. कोटिरुद्रसंहिता | 13. वैद्यनाथेश्वर ज्योतिर्लिङ्गके प्राकट्यकी कथा तथा महिमा सूतजी कहते हैं- अब मैं वैद्यनाथेश्वर ज्योतिर्लिङ्गका पापहारी माहात्म्य बताऊँगा। सुनो ! राक्षसराज रावण जो बड़ा अभिमानी और अपने अहंकारको प्रकट करनेवाला था, उत्तम पर्वत कैलासपर भक्तिभावसे भगवान् शिवकी आराधना कर रहा था। कुछ कालतक आराधना करनेपर जब महादेवजी प्रसन्न नहीं हुए, तब वह शिवकी प्रसन्नताके लिये दूसरा तप करने लगा। पुलस्त्यकुलनन्दन श्रीमान् रावणने सिद्धिके स्थानभूत हिमालय पर्वतसे दक्षिण वृक्षोंसे भरे हुए वनमें पृथ्वीपर एक बहुत बड़ा गड्डा खोदकर उसमें अग्निकी स्थापना की और उसके पास ही भगवान् शिवको स्थापित करके हवन आरम्भ किया। ग्रीष्म ऋतुमें वह पाँच अग्नियोंके बीचमें बैठता, वर्षा ऋतुमें खुले मैदानमें चबूतरेपर सोता और शीतकालमें जलके भीतर खड़ा रहता। इस तरह तीन प्रकारसे उसकी तपस्या चलती थी। इस रीतिसे रावणने बहुत तप किया तो भी दुरात्माओंके लिये जिनको रिझाना कठिन है, वे परमात्मा महेश्वर उसपर प्रसन्न नहीं हुए। तब महामनस्वी दैत्यराज रावणने अपना मस्तक काटकर शंकरजीका पूजन आरम्भ किया। विधिपूर्वक शिवकी पूजा करके वह अपन...