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05. कोटिरुद्रसंहिता | 02. काशी आदिके विभिन्न लिङ्गोंका वर्णन तथा अत्रीश्वरकी उत्पत्तिके प्रसङ्गये गङ्गा और शिवके अत्रिके तपोवनमें नित्य निवास करनेकी कथा

05. कोटिरुद्रसंहिता | 02. काशी आदिके विभिन्न लिङ्गोंका वर्णन तथा अत्रीश्वरकी उत्पत्तिके प्रसङ्गये गङ्गा और शिवके अत्रिके तपोवनमें नित्य निवास करनेकी कथा सूतजी कहते हैं- मुनीश्वरो ! गङ्गाजीके तटपर मुक्तिदायिनी काशीपुरी सुप्रसिद्ध है। वह भगवान् शिवकी निवासस्थली मानी गयी है। उसे शिवलिङ्ग- मयी ही समझना चाहिये। इतना कहकर सूतजीने काशीके अविमुक्त कृत्तिवासेश्वर, तिलभाण्डेश्वर, दशाश्वमेध आदि और गङ्गासागर आदिके संगमेश्वर, भूतेश्वर, नारीश्वर, वटुकेश्वर, पूरेश्वर, सिद्धनाथेश्वर, दूरेश्वर, शृङ्गेश्वर, वैद्यनाथ, जप्येश्वर, गोपेश्वर, रंगेश्वर, वामेश्वर, नागेश, कामेश, विमलेश्वर; प्रयागके ब्रह्मेश्वर, सोमेश्वर, भारद्वाजेश्वर, शूलटङ्केश्वर, माधवेश तथा अयोध्याके नागेश आदि अनेक प्रसिद्ध शिवलिङ्गोंका वर्णन करके अत्रीश्वरकी कथाके प्रसङ्गमें यह बतलाया कि अत्रिपत्नी अनसूयापर कृपा करके गङ्गाजी वहाँ पधारीं। अनसूयाने गङ्गाजीसे सदा वहाँ निवास करनेके लिये प्रार्थना की। तब गङ्गाजीने कहा- अनसूये ! यदि तुम एक वर्षतक की हुई शंकरजीकी पूजा और पतिसेवाका फल मुझे दे दो तो मैं देवताओंका उपकार करनेके लिये यहाँ सदा ही स्...