05. कोटिरुद्रसंहिता | 09. विश्वेश्वर ज्योतिर्लिङ्ग और उनकी महिमाके प्रसङ्गमें पञ्चकोशीकी महत्ताका प्रतिपादन
05. कोटिरुद्रसंहिता | 09. विश्वेश्वर ज्योतिर्लिङ्ग और उनकी महिमाके प्रसङ्गमें पञ्चकोशीकी महत्ताका प्रतिपादन सूतजी कहते हैं- मुनिवरो ! अब मैं काशीके विश्वेश्वर नामक ज्योतिर्लिङ्गका माहात्य बताऊँगा, जो महापातकोंका भी नाश करनेवाला है। तुमलोग सुनो, इस भूतलपर जो कोई भी वस्तु दृष्टिगोचर होती है, वह सच्चिदानन्दस्वरूप, निर्विकार एवं सनातन ब्रह्मरूप है। अपने कैवल्य (अद्वैत) भावमें ही रमनेवाले उन अद्वितीय परमात्मामें कभी एकसे दो हो जानेकी इच्छा जाग्रत् हुई। स द्वितीयमैच्छत्' (बृहदारण्यक उ०-१।४।३) इस श्रुतिसे भी यही बात सिद्ध होती है। फिर वे ही परमात्मा सगुणरूपमें प्रकट हो शिव कहलाये। वे शिव ही पुरुष और स्त्री दो रूपोंमें प्रकट हो गये। उनमें जो पुरुष था, उसका 'शिव' नाम हुआ और जो स्त्री हुई, उसे 'शक्ति' कहते हैं। उन चिदानन्दस्वरूप शिव और शक्तिने स्वयं अदृष्ट रहकर स्वभावसे ही दो चेतनों (प्रकृति और पुरुष) की सृष्टि की। मुनिवरो ! उन दोनों माता-पिताओंको उस समय सामने न देखकर वे दोनों प्रकृति और पुरुष महान् संशयमें पड़ गये। उस समय निर्गुण परमात्मासे आकाशवाणी प्रकट हुई - 'तुम दोन...