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कामाख्या और दशमहाविद्या सभा का दिव्य वृत्तांत

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कामाख्या और दशमहाविद्या सभा का दिव्य वृत्तांत ॐ ऐं ह्रीं श्रीं कामाख्यायै नमः। दशमहाविद्या सभा का दिव्य वृत्तांत नीलाचल पर्वत के गर्भगृह में धूप-दीप, शंख-ध्वनि और कमल पुष्पों की सुगंध के बीच माँ कामाख्या रत्नजड़ित सिंहासन पर विराजमान हैं। उनके चारों ओर दसों महाविद्याएं अर्धचंद्राकार में बैठी हैं, जैसे दस दिशाएं स्वयं सभा कर रही हों। यह कोई साधारण सभा नहीं, यह सृष्टि के संचालन की मंत्रणा है। माँ कामाख्या ने कहा - "हे मेरी ही दश रूपा शक्तियों! कालचक्र तेज़ हो रहा है। मनुष्य भौतिकता में भटक रहा है, भय, दरिद्रता और अहंकार में डूब रहा है। बताओ, इस कलियुग के जीव का कल्याण कैसे हो?" तब एक-एक कर सभी देवियों ने उत्तर दिया - 1. माँ काली बोलीं - "हे जननी! मैं काल हूँ, मैं ही काल से मुक्ति भी हूँ। जो जीव 'मैं' के अहंकार को मेरे खड्ग से काट देगा, मैं उसके भय को खा जाऊंगी। मेरे भक्त को कोई शत्रु छू नहीं सकता।" 2. माँ तारा बोलीं - "मैं तारिणी हूँ। जब प्राणी संसार-सागर में डूबता है, मैं उसे नीलवर्ण आकाश की तरह अपनी गोद में ले लेती हूँ। जो शरणागत होकर 'ॐ...
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गुरुदेव दत्तात्रेय और नवनाथ योग, गुरु-तत्त्व और आत्मज्ञान की दिव्य परंपरा ॥ श्री गुरुदेव दत्त ॥ भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में गुरुदेव दत्तात्रेय केवल एक देवस्वरूप ही नहीं, बल्कि गुरु-तत्त्व, योग, अवधूत जीवन, वैराग्य और आत्मज्ञान के महान प्रतीक माने जाते हैं। गुरुदेव दत्तात्रेय से संबंधित साधना-परंपराओं का संबंध अनेक योग, सिद्ध और गुरु-परंपराओं से जुड़ा हुआ है। इनमें नाथ परंपरा का भी विशेष महत्व है। नाथ संप्रदाय ने भारतीय योग-साधना, हठयोग, तप, वैराग्य तथा गुरु-शिष्य परंपरा को अत्यंत प्रभावशाली रूप से आगे बढ़ाया। नाथ परंपरा में भगवान शिव को आदिनाथ माना जाता है। दूसरी ओर, अनेक दत्त एवं नाथ परंपराओं में गुरुदेव दत्तात्रेय को महान योगी, अवधूत और गुरु-तत्त्व के दिव्य स्वरूप के रूप में श्रद्धापूर्वक स्मरण किया जाता है। इसी कारण गुरुदेव दत्तात्रेय और नवनाथों के संबंध को केवल एक निश्चित ऐतिहासिक गुरु-शिष्य संबंध के रूप में नहीं, बल्कि योग, साधना, वैराग्य, गुरु-कृपा और आत्मसाक्षात्कार की व्यापक आध्यात्मिक धारा के रूप में समझना अधिक उचित है। --- 🌺 गुरुदेव दत्तात्रेय — गुरु-तत्त्व का द...

पञ्च मकार रहस्य ?

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🌹पञ्च मकार रहस्य ?🌹 प्रायः हम-आप और साधारण जन तांत्रिक साधना प्रसंग चलने पर कुछ अलग ही अनुभव करने लगते हैं। तंत्र का नाम सुनते ही जादू-टोना, काला जादू, झाड़-फूँक, खोपड़ी, मुर्दा, श्मशान, बलि, आदि के विचार स्वतः ही मस्तिष्क में आने लगते हैं और मन अजीब-सी अरुचि से भर जाता है। दर असल यह सब विचार या धारणा तन्त्र के बारे में समाज में फैले हुए हुए नाना प्रकार के भ्रम के परिणाम स्वरुप है।तंत्र के कौलमत के आरम्भ काल से ही प्रायः ‘पञ्चमकार’, ‘कुमारी-पूजन’ और ‘योनिपूजा’ का वर्णन और प्रचलन चर्चा का विषय रहा है जिस कारण तंत्र के विषय में तरह-तरह की भ्रांतियां समाज में फ़ैल गईं और तभी से जन-साधारण के मन में तंत्र के प्रति घृणा और नफ़रत की भावना घर कर गयी।वास्तव में यदि देखा जाय तो ऐसा नहीं है। तंत्र एक उच्चकोटि की विद्या है , एक प्रकृष्ट विज्ञान है जिसे कुछ भ्रष्ट और स्वार्थी तांत्रिकों ने अपने निहित स्वार्थ के चलते बदनाम कर दिया है।हमें तंत्र की वास्तविकता और उसमें आये हुए ‘पञ्च मकार'(मद्य, मांस, मत्स्य, मुद्रा और मैथुन) का वास्तविक आशय समझने का प्रयास करना  चाहिए । तंत्र के बारे में...

भगवान शिव की पाँच नाग पुत्रियों

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🐍✨ क्या आप जानते हैं भगवान शिव की पाँच नाग पुत्रियों का रहस्य? ✨🐍 हम सभी भगवान गणेश और कार्तिकेय को महादेव के पुत्रों के रूप में पूजते हैं, लेकिन क्या आपको पता है कि शिव जी की पाँच दिव्य नाग पुत्रियां भी थीं? आइए जानते हैं सावन और नाग पंचमी से जुड़ी यह अद्भुत और अनसुनी कथा! 👇 🌺 एक रहस्यमयी जन्म: प्राचीन लोककथा के अनुसार, एक बार महादेव और माता पार्वती एक दिव्य सरोवर में जलक्रीड़ा कर रहे थे। उसी समय भगवान शिव के दिव्य तेज से एक पत्ते पर पाँच नाग कन्याओं का जन्म हुआ। माता पार्वती इस घटना से पूरी तरह अनजान थीं, लेकिन महादेव अपनी इन पुत्रियों से भी उतना ही स्नेह करते थे जितना वे गणेश और कार्तिकेय से करते थे। वे प्रतिदिन सुबह चुपचाप सरोवर पर जाते और अपनी पुत्रियों के साथ समय बिताते। 🤔 माता पार्वती का संदेह और क्रोध: रोज़ सुबह महादेव को बिना बताए जाते देख माता पार्वती को आश्चर्य हुआ। एक दिन उन्होंने छुपकर शिव जी का पीछा किया। सरोवर पर महादेव को पाँच नाग कन्याओं के साथ स्नेहपूर्वक खेलते देख माता पार्वती को क्रोध आ गया। अनजान होने के कारण, उन्होंने उन कन्याओं को दंड देने का प्र...

रुद्राक्ष और बेलपत्र का प्रयोग

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श्री शिवायः नमस्तुभ्यम । रुद्राक्ष का उपयोग * रुद्राक्ष को जल से भरे तांबे के लोटे में डालकर रखे । सुबह तांबे के लोटे का जल, भगवान शिव के शिवलिंग पर चढ़ाये तथा जलहरी से गिरते हुए जल को दूसरे बर्तन में लेकर घर आऐ तथा बीमार या रोगी व्यक्ति को पिलाएँ। जल चढाते हुए बाबा कुंदकेश्वर से बीमारी दूर करने की कामना करते हुए जल चढाए। और इस जल को औषधि बनाने को प्रार्थना करें। * जल चढ़ाते वक्त ध्यान दें कि इसमें दूध नहीं मिला होना चाहिए । यदि कोई दूसरा दूध चढा रहा है तो शिव लिंग को पुन: धोकर दूसरे बर्तन में यह जल लेना चाहिए। यदि वह व्यक्ति मान जाए तो वह आपकी प्रार्थना करने पर आपके जल चढ़ने के समय कुछ देर के लिए रुक भी सकता है। बेलपत्र * यदि संभव हो तो भोले बाबा पर एक कोमल सा बेलपत्र चढाएं तथा उसे बाबा कुंदेकेश्वर (Kund Keswar) से प्रार्थना कर कि बाबा इसे ओषधि बना दो। कह कर और मांग कर ले ले । फिर इसे अशोक सुन्दरी व नन्दी को छुआ कर बीमार या रोगी व्यक्ति को खाने को दे। यदि बीमार / रोगी व्यक्ति मंदिर नहीं जा सकता तो घर का कोई भी व्यक्ति यह काम कर सकता है। अर्थात जल व बेलपत्र ला स...