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05. कोटिरुद्रसंहिता | 06. महाकालके माहात्म्यके प्रसङ्गमें शिवभक्त राजा चन्द्रसेन तथा गोप-बालक श्रीकरकी कथा

05. कोटिरुद्रसंहिता | 06. महाकालके माहात्म्यके प्रसङ्गमें शिवभक्त राजा चन्द्रसेन तथा गोप-बालक श्रीकरकी कथा सूतजी कहते हैं- ब्राह्मणो ! भक्तोंकी रक्षा करनेवाले महाकाल नामक ज्योतिर्लिङ्गका माहात्म्य भक्तिभावको बढ़ानेवाला है। उसे आदरपूर्वक सुनो। उज्जयिनीमें चन्द्रसेन नामक एक महान् राजा थे, जो सम्पूर्ण शास्त्रोंके तत्त्वज्ञ, शिवभक्त और जितेन्द्रिय थे। शिवके पार्षदोंमें प्रधान तथा सर्वलोकवन्दित मणिभद्रजी राजा चन्द्रसेनके सखा हो गये थे। एक समय उन्होंने राजापर प्रसन्न होकर उन्हें चिन्तामणि नामक महामणि प्रदान की, जो कौस्तुभ- मणि तथा सूर्यके समान देदीप्यमान थी। वह देखने, सुनने अथवा ध्यान करनेपर भी मनुष्योको निश्चय ही मङ्गल प्रदान करती थी । भगवान् शिवके आश्रित रहनेवाले राजा चन्द्रसेन उस चिन्तामणिको कण्ठमें धारण करके जब सिंहासनपर बैठते, तब देवताओंमें सूर्य नारायणकी भाँति उनकी शोभा होती थी । नृपश्रेष्ठ चन्द्रसेनके कण्ठमें चिन्तामणि शोभा देती है, यह सुनकर समस्त राजाओंके मनमें उस मणिके प्रति लोभकी मात्रा बढ़ गयी और वे क्षुब्ध रहने लगे। तदनन्तर वे सब राजा चतुरङ्गिणी सेनाके साथ आकर युद्धमें चन्द्रसेनक...