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05. कोटिरुद्रसंहिता | 03. ऋषिकापर भगवान् शिवकी कृपा, एक असुरसे उसके धर्मकी रक्षा करके उसके आश्रममें 'नन्दिकेश' नामसे निवास करना और वर्षमें एक दिन गङ्गाका भी वहाँ आना

05. कोटिरुद्रसंहिता | 03. ऋषिकापर भगवान् शिवकी कृपा, एक असुरसे उसके धर्मकी रक्षा करके उसके आश्रममें 'नन्दिकेश' नामसे निवास करना और वर्षमें एक दिन गङ्गाका भी वहाँ आना तदनन्तर श्रीसूतजीने जब बहुत-से शिवलिङ्गोंके कथाप्रसङ्ग सुना दिये, तब ऋषियोंने पूछा- 'महामते सूतजी ! वैशाख शुक्ला सप्तमीके दिन गङ्गाजी नर्मदामें कैसे आयीं ? इसका विशेषरूपसे वर्णन कीजिये। वहाँ महादेवजीका नाम नन्दिकेश्वर कैसे हुआ ? इस बातको भी प्रसन्नतापूर्वक बताइये ।' सूतजीने कहा- महर्षियो ! एक ब्राह्मणी थी, जिसका नाम ऋषिका था। वह किसी ब्राह्मणकी पुत्री थी और एक ब्राह्मणको ही विधिपूर्वक व्याही गयी थी। विप्रवरो ! यद्यपि वह द्विजपत्नी उत्तम व्रतका पालन करनेवाली थी, तथापि अपने पूर्वजन्मके किसी अशुभ कर्मके प्रभावसे 'बालवैधव्य' को प्राप्त हो गयी। तब वह ब्राह्मणपत्नी ब्रह्मचर्यव्रतके पालनमें तत्पर हो पार्थिवपूजनपूर्वक अत्यन्त कठोर तपस्या करने लगी। उस समय अवसर पाकर मूढ़ नामसे प्रसिद्ध एक दुष्ट और बलवान् असुर, जो बड़ा मायावी था, कामबाणसे पीड़ित होकर वहाँ गया। उस अत्यन्त सुन्दरी कामिनीको तपस्या करती देख वह असु...