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03. रुद्रसंहिता | प्रथम (सृष्टि) खण्ड | 13. शिवपूजनकी सर्वोत्तम विधिका वर्णन

03. रुद्रसंहिता | प्रथम (सृष्टि) खण्ड | 13. शिवपूजनकी सर्वोत्तम विधिका वर्णन ब्रह्माजी कहते हैं- अब मैं पूजाकी सर्वोत्तम विधि बता रहा हूँ, जो समस्त अभीष्ट तथा सुखोंको सुलभ करानेवाली है। देवताओ तथा ऋषियो ! तुम ध्यान देकर सुनो। उपासकको चाहिये कि वह ब्राह्म मुहूर्तमें शयनसे उठकर जगदम्बा पार्वती- सहित भगवान् शिवका स्मरण करे तथा हाथ जोड़ मस्तक झुकाकर भक्तिपूर्वक उनसे प्रार्थना करे- 'देवेश्वर ! उठिये, उठिये ! मेरे हृदय-मन्दिरमें शयन करनेवाले देवता ! उठिये ! उमाकान्त ! उठिये और ब्रह्माण्डमें सबका मङ्गल कीजिये। मैं धर्मको जानता हूँ, किंतु मेरी उसमें प्रवृत्ति नहीं होती। मैं अधर्मको जानता हूँ, परंतु मैं उससे दूर नहीं हो पाता। महादेव ! आप मेरे हृदयमें स्थित होकर मुझे जैसी प्रेरणा देते हैं, वैसा ही मैं करता हूँ।' इस प्रकार भक्तिपूर्वक कहकर और गुरुदेवकी चरणपादुकाओंका स्मरण करके गाँवसे बाहर दक्षिण दिशामें मल-मूत्रका त्याग करनेके लिये जाय। मलत्याग करनेके बाद मिट्टी और जलसे धोनेके द्वारा शरीरकी शुद्धि करके दोनों हाथों और पैरोंको धोकर दतुअन करे, सूर्योदय होनेसे पहले ही दतुअन करके मुँहको सोलह ब...