05. कोटिरुद्रसंहिता | 07. विन्ध्यकी तपस्या, ओंकारमें परमेश्वरलिङ्गके प्रादुर्भाव और उसकी महिमाका वर्णन
05. कोटिरुद्रसंहिता | 07. विन्ध्यकी तपस्या, ओंकारमें परमेश्वरलिङ्गके प्रादुर्भाव और उसकी महिमाका वर्णन ऋषियोंने कहा- महाभाग सूतजी ! आपने अपने भक्तकी रक्षा करनेवाले महाकाल नामक शिवलिङ्गकी बड़ी अद्भुत कथा सुनायी है। अब कृपा करके चौथे ज्योतिर्लिङ्गका परिचय दीजिये - ओंकार तीर्थमें सर्वपातकहारी परमेश्वरका जो ज्योतिर्लिङ्ग है, उसके आविर्भावकी कथा सुनाइये । सूतजी बोले-महर्षियो ! ओंकार तीर्थमें परमेशसंज्ञक ज्योतिर्लिङ्ग जिस प्रकार प्रकट हुआ, वह बताता हूँ; प्रेमसे सुनो। एक समयकी बात है, भगवान् नारद मुनि गोकर्ण नामक शिवके समीप जा बड़ी भक्तिके साथ उनकी सेवा करने लगे। कुछ कालके बाद वे मुनिश्रेष्ठ वहाँसे गिरिराज विन्ध्यपर आये और विन्ध्यने वहाँ बड़े आदरके साथ उनका पूजन किया। मेरे यहाँ सब कुछ है, कभी किसी बातकी कमी नहीं होती है, इस भावको मनमें लेकर विन्ध्याचल नारदजीके सामने खड़ा हो गया। उसकी वह अभिमानभरी बात सुनकर अहंकारनाशक नारद मुनि लंबी साँस खींचकर चुपचाप खड़े रह गये। यह देख विन्ध्य पर्वतने पूछा- 'आपने मेरे यहाँ कौन-सी कमी देखी है ? आपके इस तरह लंबी साँस खींचनेका क्या कारण है ?' नारदजीने क...