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Showing posts from November, 2024

रामायण 108 मनका

रामायण 108 मनका रघुपति राघव राजाराम । पतितपावन सीताराम ।।  जय रघुनन्दन जय घनश्याम । पतितपावन सीताराम ।। भीड़ पड़ी जब भक्त पुकारे । दूर करो प्रभु दुःख हमारे ।। दशरथ के घर जन्मे राम । पतितपावन सीताराम ।। 1 ।। विश्वामित्र मुनीश्वर आये । दशरथ भूप से वचन सुनाये ।।  संग में भेजे लक्ष्मण राम । पतितपावन सीताराम ।। 2 ।। वन में जाए ताड़का मारी । चरण छुआए अहिल्या तारी ।। ऋषियों के दुःख हरते राम । पतितपावन सीताराम ।। 3 ।। जनक पुरी रघुनन्दन आए । नगर निवासी दर्शन पाए ।।  सीता के मन भाए राम । पतितपावन सीताराम ।। 4।। रघुनन्दन ने धनुष चढ़ाया । सब राजो का मान घटाया ।।  सीता ने वर पाए राम । पतितपावन सीताराम ।।5।। परशुराम क्रोधित हो आये । दुष्ट भूप मन में हरषाये ।।  जनक राय ने किया प्रणाम। पतितपावन सीताराम ।।6।। बोले लखन सुनो मुनि ग्यानी। संत नहीं होते अभिमानी ।।  मीठी वाणी बोले राम । पतितपावन सीताराम ।।7।। लक्ष्मण वचन ध्यान मत दीजो। जो कुछ दण्ड दास को दीजो। धनुष तोडय्या हूँ मै राम । पतितपावन सीताराम ।।8।। लेकर के यह धनुष चढ़ाओ। अपनी शक्ति मुझे दिखलाओ।। छूवत चाप चढ़ाये राम । प...

नीति शतक (भरथरी द्वारा रचित)

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नीति शतक (भरथरी द्वारा रचित) नीति शतक मंगलाचरण दिक्कालाद्यनवच्छिन्नानन्तचिन्मात्लमूर्तये ।  स्वानुभूत्येकसाराय नमः शान्ताय तेजसे ।।१।। सभी दिशाओं और भूत भविष्यत्, वर्तमानादि कालों में अनवच्छिन्न, अनन्त, चैतन्यमात्र मूति बाले, अपने अनुभव से जानने योग्य, शान्त स्वरूप एवं तेजोमय परमात्मा को नमस्कार है ।१। यां चिन्तयामि सततं मयि सा विरक्ता साप्यन्यमिच्छति जनं स जनोऽन्यसक्तः । अस्मत्कृते च परितुष्यति काचिदन्या धिक् तां च तं च मदनं च इमां च मां च ॥२॥ मैं सदा जिसका विन्तन करता रहता हूँ, वह मुझसे विरक्त होकर अन्य पुरुष की कामना करती है, और वह अन्य पुरुष किसी अन्य स्त्री की कामना करता है तथा वह अन्य स्त्री मुझसे प्रीति करती है। अतएव मेरी स्त्री को, उस अन्य पुरुष को. मुझे चाहने वाली उस अन्य स्त्री को, मुझे और उस कामदेव को भी धिक्कार है ॥२॥ अज्ञः सुखमाराध्यः सुखतरमाराध्यते विशेषज्ञः । ज्ञानलवदूविदग्धं ब्रह्मापि तं नरं न रञ्जयति ।।३।। अज्ञानी पुरुष सरलता से प्रसन्न किया जा सकता है. ज्ञानी पुरुष का प्रसन्न करना उससे भो सुखसाध्य है। परन्तु जो न ज्ञानी है, न अज्ञानी, उसे ब्रह्मा भी सत...

वेदों में प्रचलित कुछ खास मंत्र

वेदों में प्रचलित कुछ खास मंत्र।। भोग लगाने का मन्त्र ।। 🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺 त्वदीयं वस्तु गोविन्द तुभ्यमेव समर्पये । गृहाण सम्मुखो भूत्वा प्रसीद परमेश्वर ।। || अग्नि जिमाने का मन्त्र ।। ॐ भूपतये स्वाहा, ॐ भुवनप, ॐ भुवनपतये स्वाहा । ॐ भूतानां पतये स्वाहा ।। कहकर तीन आहूतियाँ बने हुए भोजन को डालें । या ।। ॐ नमो नारायणाय ।। कहकर नमक रहित अन्न को अग्नि में डालें । ।। भोजन से पूर्व बोलने का मन्त्र ।। ब्रह्मार्पणं ब्रह्महविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् ।  ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्म समाधिना ।। ।। भोजन के बाद का मन्त्र ।। अन्नाद् भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसंभवः ।  यज्ञाद भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्म समुद् भवः ।। ।। सायं दीप स्तुति मन्त्र ।। सायं ज्योतिः परं ब्रह्म दीपो ज्योतिर्जनार्दनः ।  दीपो हरतु मे पापं सन्ध्यादीप नमोऽस्तु ते ।। शुभं करोतु कल्याणं आरोग्यं सुखसम्पदाम् । मम बुद्धिप्रकाशं च दीपज्योतिर्नऽस्तु ते ।। ।। शयन का मन्त्र ।। जले रक्षतु वाराहः स्थले रक्षतु वामनः । अटव्यां नारसिंहश्च सर्वतः पातु केशवः ।। ।। सूर्य दर्शन मन्त्र ।। कनकवर्णमहातेजं रत्नमालाविभूषि...