नीति शतक (भरथरी द्वारा रचित)

नीति शतक (भरथरी द्वारा रचित)

नीति शतक

मंगलाचरण

दिक्कालाद्यनवच्छिन्नानन्तचिन्मात्लमूर्तये । 
स्वानुभूत्येकसाराय नमः शान्ताय तेजसे ।।१।।

सभी दिशाओं और भूत भविष्यत्, वर्तमानादि कालों में अनवच्छिन्न, अनन्त, चैतन्यमात्र मूति बाले, अपने अनुभव से जानने योग्य, शान्त स्वरूप एवं तेजोमय परमात्मा को नमस्कार है ।१।

यां चिन्तयामि सततं मयि सा विरक्ता साप्यन्यमिच्छति जनं स जनोऽन्यसक्तः । अस्मत्कृते च परितुष्यति काचिदन्या धिक् तां च तं च मदनं च इमां च मां च ॥२॥

मैं सदा जिसका विन्तन करता रहता हूँ, वह मुझसे विरक्त होकर अन्य पुरुष की कामना करती है, और वह अन्य पुरुष किसी अन्य स्त्री की कामना करता है तथा वह अन्य स्त्री मुझसे प्रीति करती है। अतएव मेरी स्त्री को, उस अन्य पुरुष को. मुझे चाहने वाली उस अन्य स्त्री को, मुझे और उस कामदेव को भी धिक्कार है ॥२॥

अज्ञः सुखमाराध्यः सुखतरमाराध्यते विशेषज्ञः । ज्ञानलवदूविदग्धं ब्रह्मापि तं नरं न रञ्जयति ।।३।।

अज्ञानी पुरुष सरलता से प्रसन्न किया जा सकता है. ज्ञानी पुरुष का प्रसन्न करना उससे भो सुखसाध्य है। परन्तु जो न ज्ञानी है, न अज्ञानी, उसे ब्रह्मा भी सत्त्तुष्ट नहीं कर सकता ।।३।।

प्रसह्य मणिमुद्धरेन्मकरेवक्त्रदंष्ट तिरात् समुद्रमपि सन्तरेत्प्रचलदूमिमालाकुलम् । भुजङ्गमपि कोपितं शिरसि पुष्पवद् धारयेत् न तु प्रतिनिविष्टमूर्खजनचित्तमाराधयेत् ॥४॥

मगर के दाड़ों में बची हुई मणि चाहे निकाली जा सके, चाहे उन्नत लहों से उलझते हुए गहन समुद्र को तैर कर पार किया जा सके और चाहे क्रूद्ध हुए सर्प को पकड़ कर शिर पर धारण किया जा सके, परन्तु मूर्ख पुरुष के किसी वस्तु १२ जमे हुए मन को वहाँ से हटाना कठिन ही है ।४।

लभेत सिकतासु तैलमपि यत्नतः पीडयन् पिवेच्च मृगतृष्णिकासु सलिलं पिपासादितः । कदाचिदपि पर्यटञ्छशविषाणमासादयेत् न तु प्रतिनिविष्टमूर्खजनचित्तमाराधयेत् ।।५।।

यत्न करने पर चाहे चालू से. तेल निकाल लिया जाय, चाहे प्यासा मनुष्य मृगतृष्णा के जल से अपनी प्यास को बुझा ले और चाहे हूंढने पर खरगोश का सींग भी मिल जाय, परन्तु किसी वस्तु पर टिके हुए सूखे मनुष्य के मन को उस बस्तु से हटाना असंभव है ।५।

व्यालं बालमृणाजतन्तुभिरसौ रोङ्घ समुज्जृम्भते छेत् वज्रमणीञ्छिरीषकुसुमप्रान्तेन सन्नह्यते । माधुर्य मधुविन्दुना रचयितु क्षाराम्बुवेरीहते नेतु वाञ्छत्तियःखांपचिसतां सूक्तः सुधास्यन्दिभिः।।६।।

जो पुरुष अपने सुधामय वचनों के उपदेश से दुष्टों को सन्मार्ग में प्रवृत्त करता चाहता है, वह मानों कमल की बाल मृणाल से हाथी को बाँधना, सरसों की पुष्य-पंखुड़ी से हीरे में छेद करना और खारी समुद्र के जल को मधु की बूंदों से मीठा करना चाहता है ।६।

स्वायत्तमेकांतगुणं विधात्त्रा विनिमितंछादनमज्ञतायाः । विशेषतः सर्वविदांसमाजे विभूषणंमौनमपण्डितानाम् ।।७।।

विधाता द्वारा निर्मित मीन में अनेक गुण हैं। इसे किसी से माँगने की आवश्यकता नहीं होती, जो चाहे इस स्वाधीन रहने वाली वस्तु को कार्य में ला सकता है। मूर्खता के लिए ढक्कन स्वरूप यह मीन विद्वत्समाज में मूों के लिए आभूषण स्वरूप ही होता है ।७।

यदा किञ्चिज्ज्ञोऽहं द्विप इव मदान्धः समभवम् तदा सर्वज्ञोऽस्मीत्यभवदवलिप्तं मम मनः । यदा किञ्चित्किञ्चिद् बुधजनसकाशादवगतम् तदा मूखोंऽस्मीति ज्वर इव मदो में व्यपगतः ॥८।।

जब मुझे किचित् ज्ञान होने लगा तब मैं हाथी के समान मदोन्मत्त होकर अपने मन में सोचने लगा कि में सर्वज्ञ हूं। परन्तु जब ज्ञानीजनों के संग से कुछ यथार्थ ज्ञान हुआ, तब मेरा वह गर्व ऐसे उतर गया, जैसे रोगी का ज्वर उतर जाता है, तभी मुझे अपने मूर्ख होने की प्रतीति हुई ।८।

कृमिकुलचितं लालाक्लिन्नं विगन्धि जुगुप्सितं निरुपमरसं प्रीत्या खादन्नरास्थि निरामिवम् । सुरपतिमपि श्वा पार्श्वस्थं विलोक्य न शङ्खते न हि गणपति क्षुद्रो जन्तुः परिग्रहफल्गुताम् ।।९।।

जब कृमियों से युक्त, लार से विलन्न, दुर्गन्धित, घृणित, रसहीन तथा माँसहीन मानव-अस्थि को कुत्ता प्रीतिपूर्वक चवाता हुआ पाश्वं में स्थित इन्द्र की भी शंका नहीं मानता तो इससे यही प्रकट होता है कि शुद्र जीव जिस वस्तु को ग्रहण कर लेता है उसके अवगुण को नहीं देखता ।।

शिरः शार्वं स्वर्गात्पशुपपिशिरस्कः क्षितिघरं महीधादुत्तुङ्गादवनिंमवनेश्वापि जलधिम् । अधोऽधो गङ्गयं पदमुपगता स्तोकमथवा विवेकभ्रष्टानां भवति विनिपातः शतमुखः ।।१०।।

गंगा भी स्वर्ग से पहले शिवजी के शिर पर, फिर वहाँ से हिमगिरि पर और वहाँ से पृथिवी पर गिर कर समुद्र में चली गई। इस प्रकार उसके नीचे गिरते चले जाने से यह सिद्ध होता है कि विवेक से भ्रष्ट हुए पुरुष भी ऐसी ही सैकड़ों अधोगतियों को प्राप्त होते हैं ।१०।

शक्यो वारयितु जलेन हुतभुक् छत्रेण सूर्यातपो नागेन्द्रो निशितांकुशेन समदा दण्डेन गोगर्दभी । व्याधिर्भेषजसंग्रहेश्च विविधैर्मन्त्रप्रयोगैविषम् सर्वस्यौषधमस्तिशास्त्रविहित मूर्खस्यनास्त्यौषधम् ।।११।।

अग्नि का निवारण जल से होता है। धूप का छत्र से, सदमत्त हाथी अंकुश से, बैल और गधा डंडे से तथा रोग का अनेक प्रकार की औषधियों से और विष का विविध मन्त्रादि के प्रयोगों से निवारण होता है। इस प्रकार शास्त्रों में सभी की औषधि बताई है, परन्तु मूर्खता के लिए कोई औषधि नहीं हो सकती ।११।

साहित्यसङ्गीतकलाविहीनःसाक्षात्पशुःपुच्छविषाणहीनः। तृणन्नखादन्नपि जीवमानस्तद्भागधेयं परमंपशूनाम् ।।१२।।

जो मनुष्य साहित्य, संगीत और कला से विहीन हैं वे पूछ और सींग से रहित साक्षात् पशु ही हैं। परन्तु यह घास न बाकर जीवित रहते हैं, इसे पशुओं का परम सौभाग्य ही सम- झना चाहिए ।१२।

येषां न विद्या न तपो न दानं ज्ञानं न शील न गुणो न धर्मः। ते मर्त्यलोके भुविभारभुतामनुष्यरूपेणमृगाश्चरन्ति ॥१३॥ 

जिनमें विद्या, तप, दान, ज्ञान, शील और गुण का अभाव है, वे मृत्युलोक में पृथिवी पर भाररूप होकर मनुष्य रूप में मृग के समान विचरण करते हैं।१३।

वरं पर्वतदुर्गेषु भ्रान्तं वनचरैः सह । 
न मूर्खजनसम्पर्कः सुरेन्द्रभवनेष्वपि ।।१४।। 
निर्जन पर्वतों पर वनचरों के साथ विचरण करना अच्छा है, परन्तु मूर्षों के साथ इन्द्र के भवन में रहता भी ठीक नहीं है।१४।

         विद्वत्प्रशसा
शास्त्रोपस्कृत शब्द सुन्दरगिरः शिष्यप्रदेयागमा विख्याताः कवयो वसन्ति विषये यस्य प्रभोनिर्धनाः।
तज्जाडच वसुधाधिपस्य सुधियस्त्वर्थ विनापीश्वराः। कुत्स्याः स्युः कुपरीक्षकाहिह्मणयो यैरर्षतः पातिताः ॥१५।।
शास्त्रों के श्रेष्ठ शब्दों से विभूषित वाणी एवं शिष्यों के उप- देश में उपयोगी वाक्यों वाले विख्यात कवियों का निर्धन रहकर जिस राज्य में निवास हो, वह उस राजा की अयोग्यता का सूचक है। क्योंकि विद्वान् कवि तो निर्धन होते हुए भी सर्वत्र पूजनीय और सर्व समर्थ होते हैं। रत्नों के मूल्य को यथार्थ से कम पररखने वाला पारखी ही निन्दनीय हो सकता है, रत्न नहीं हो सकते ।१५।

हतुर्याति न गोचरं किमपि शं पुष्णाति यत्सर्वदा ह्यथिभ्यः प्रतिपाद्यमानमनिशं प्राप्नोति वृद्धि पराम् । कल्पान्तेष्वपि न प्रयाति निधन विद्याख्यमन्तर्धनम् येषां तान्प्रति मानुमुज्झत नृपाः कस्तैः सहस्पर्धते ।।१६।॥

विद्या रूप गुप्त धन को चोर नहीं देख सकता और यह धन सदा श्रेय की ही वृद्धि करता है। याचकों को देने पर भी बढ़ता और प्रलय होने पर भी नष्ट नहीं होता। हे नृपगण! उन महा कवियों के प्रति अभिमान न करो, उनसे स्पर्धा करने वाला ही कौन है ? ।१६।

अधिगतपरमार्थान्पण्डितान्मावमस्था- स्तृणमिव लघुलक्ष्मीनेंव तान्संरुणद्धि । अभिनवमदलेखाश्यामगण्डस्थलानां

न भवति विसनन्तुर्वारणं वारणानाम् ॥१७।। परमार्थ के ज्ञाता पंडितों का अपमान न करो, क्योंकि तृण के समान तुच्छ लक्ष्मी द्वारा उनका वशीभूत होना वैसे ही संभव 
तज्जाडच वसुधाधिपस्य सुधियस्त्वर्थ विनापीश्वराः। कुत्स्याः स्युः कुपरीक्षकाहिह्मणयो यैरर्षतः पातिताः ॥१५।।

शास्त्रों के श्रेष्ठ शब्दों से विभूषित वाणी एवं शिष्यों के उप- देश में उपयोगी वाक्यों वाले विख्यात कवियों का निर्धन रहकर जिस राज्य में निवास हो, वह उस राजा की अयोग्यता का सूचक है। क्योंकि विद्वान् कवि तो निर्धन होते हुए भी सर्वत्र पूजनीय और सर्व समर्थ होते हैं। रत्नों के मूल्य को यथार्थ से कम पररखने वाला पारखी ही निन्दनीय हो सकता है, रत्न नहीं हो सकते ।१५।

हतुर्याति न गोचरं किमपि शं पुष्णाति यत्सर्वदा ह्यथिभ्यः प्रतिपाद्यमानमनिशं प्राप्नोति वृद्धि पराम् । कल्पान्तेष्वपि न प्रयाति निधन विद्याख्यमन्तर्धनम् येषां तान्प्रति मानुमुज्झत नृपाः कस्तैः सहस्पर्धते ।।१६।॥

विद्या रूप गुप्त धन को चोर नहीं देख सकता और यह धन सदा श्रेय की ही वृद्धि करता है। याचकों को देने पर भी बढ़ता और प्रलय होने पर भी नष्ट नहीं होता। हे नृपगण! उन महा कवियों के प्रति अभिमान न करो, उनसे स्पर्धा करने वाला ही कौन है ? ।१६।

अधिगतपरमार्थान्पण्डितान्मावमस्था- स्तृणमिव लघुलक्ष्मीनेंव तान्संरुणद्धि । अभिनवमदलेखाश्यामगण्डस्थलानां

न भवति विसनन्तुर्वारणं वारणानाम् ॥१७।। परमार्थ के ज्ञाता पंडितों का अपमान न करो, क्योंकि तृण के समान तुच्छ लक्ष्मी द्वारा उनका वशीभूत होना वैसे ही संभव 

नहीं है, जैसे कि कमलनाल के तस्तु द्वारा नवीन मद के स्राव वाले और श्याम गण्डस्थल वाले हाथी को रोकना असम्भव है ।१७।

अम्भोजिनीवनविहारविलासमेव हंसस्य हन्ति नितरां कुपितो विधाता । न त्वस्य दुग्ध-जलभेदविधीप्रसिद्धां वैदग्ध्यकीर्तिमपहर्तु मसौसमर्थः ॥१८॥

यदि विधाता क्रुद्ध होजाय तो वह कमलिनी वन में विलास करते हुए हंस को भले ही रोक दे, परन्तु उसके दूध और जल को पृथक् पृथक् कर देने वाले चतराई युक्त गुण को कौन छीन सकता है ? ।१८।

केयूराणि न भूषयन्ति पुरुषं हारा न चन्द्रोज्ज्वला न स्नानं न विलेपनं न कुसुमं नालङ्कृता मूद्ध जा वाण्येका समलङ्करोति पुरुषं या संस्कृता धार्यते क्षीयन्ते खलु भूषणानि सतत वाग्भूषणं भूषणम् ।।१६।।

केयूर और चन्द्रमा के समान उज्वल मोतियों के हार धारण करने, स्नान और उबटन करने तथा केशों में पुष्प धारण करने से भी ऐसी शोभा नहीं हो सकती, जैसी कि सस्कार युक्त अलं कृत वाणी से होती है। क्योंकि अलंकारों का तो नाश होजाता है, परन्तु वाणी रूपी अलंकार का जीवन पर्यन्त नाश नहीं होता ।१८।

विद्या नाम नरस्य रूपमधिक प्रच्छन्नगुप्तं धनं विद्या भोगकरी यशःसुखकरी विद्या गुरूणां गुरुः ।
विद्या बन्धजनो विदेशगमने विद्या परा देवता विद्या राजसु पूज्यते न हि धनं विद्याविहीनःपशुः ।॥२०॥

विद्या ही मनुष्य का सुन्दर रूप और गुप्त बघन है, विद्या ही भोग, यश और सुख को प्राप्त कराने वाली है, विद्या ही गुरुओं की मी गुरु है, विद्या ही विदेश गमन में बन्धु स्वरूप होती है, विद्या ही परा देवता है और विद्या ही राजाओं के द्वारा भी पूजी जाती है, घन नहीं पूजा जाता। इसलिए विद्याविहीन मनुष्य पशु ही है।२०।

क्षान्तिश्चेत्कवचेनकि किमरिभिः क्रोधोऽस्ति चेद्देहिनां ज्ञातिश्चेदनलेन कि यदि सुहृद्दिव्योपधैः किं फलम् । कि सर्पर्यदि दुर्जनाः किमु धनैविद्याऽनवद्य यत्रि ब्रीडा चेत्किमु भूषणैःसुकविता यद्यपि राज्येन किम् ।।२१।।

यदि क्षमा है तो कवच का क्या प्रयोजन ? यदि कोध है तो शत्रु की क्या आवश्यकता ? यदि जाति है तो अग्नि की क्या अपेक्षा ? यदि सुहृद् हैं तो दिव्य औषधियों का क्या लाभ ? यदि साब में दुर्जन हो तो सर्प भी क्या है? यदि विद्या धन है तो बन्य घन किस काम का ? यदि लज्जा है तो आभूषणों से क्या होना है ? और यदि श्रेष्ठ कविता है तो राज्य भी क्या है ? ।२११

दाक्षिण्यं स्वजने दया परिजने शाठ्घ सदा दुर्जने प्रीतिः साधुजने नयो नृपजने विद्वज्जने चार्जवम् । शौर्य शत्रुजने क्षमा गुरुजने नारीजने वृष्टता ये चचैवं पुरुषाः कलासु कुशलास्तेष्वेव लोके स्थितिः ।। २२।।

स्वजनों पर उदारता, परिजनों पर दया, दुर्जनों से शठता, साधुओं से प्रीति, राजपुरुषों से नीति, विद्वानों से सरलता,

शत्रुओं से शूरता, गुरुजनों से सहनशीलता, स्त्रियों से घुष्टता आदि लौकिक व्यवहार में कुशल पुरुषों से ही लोक की स्थिति है ।२२।

जाड्यं धियो हरति सिञ्चति वाचि सत्यं मानोन्नति दिशति पापमपाकरोति । चेतः प्रसादयति दिक्षु तनोति कीर्ति सत्सङ्गतिः कथय किन्न करोति पुंसाम् ।।२३।।

सज्जनों की संगति जड़ता को दूर करती, वाणी को सत्य से भरती, मान की वृद्धि करतो, पापों को नष्ट करती, चित्त को प्रसन्न करती और सब दिशाओं में कोति को फैलाती है। कहो, वह मनुष्य के हितार्थ क्या नहीं करती ? ।२३।

जयन्ति ते सुकृतिनो रससिद्धाः कवीश्वराः । नास्ति तेषां यशः काये जर। मरणजं भयम् ।।२४।। श्रेष्ठ कर्म वाले और सभी रसों में सिद्ध वे कवीश्वर ही सर्व- जेता हैं, जिन्हें यश, काया, वृद्धावस्था और मृत्यु का भी भय नहीं है ।२४।

सूनुःसच्चरितः सती प्रियतमा स्वामी प्रसादोन्मुखः स्निग्धं मित्रमवञ्चकः परिजनो निः क्लेशलेशंमनः । आकारो रुचिरःस्थिरश्च विभवो विद्यावदातं मुखं तुष्ट विष्टपहारिणीष्टदहौ सम्प्राप्यते देहिनाम् ।।२५।।

सच्चरित्र पुत्र, पतिव्रता पत्नी, प्रसन्नमुख स्वामी, स्नेही मित्र, अबंचक परिजन, बलेश-रहित मन, रुचिर आकृति, स्थिर वैभव, विद्या से सुशोभित मुख यह सब परमात्मा की प्रसन्नता से ही शरीरधारियों को प्राप्त होते हैं। २५।

प्राणाघातान्निवृत्तिः परधनहरणे संयमः सत्यवाक्य काले शक्त्या प्रदानं युवतिजनकथा मूकभावः परेवाम्। तृष्णास्रोतोविभङ्गो गुरुषु च विनयःसर्व भूत्तानुकम्पा सामान्य सर्वशास्त्रष्वनुपहतविधिःश्र यसामेष पन्था।।२६।।

जीवों की हिंसा न करना, पराये धन को न हरना, सत्य बोलना, पर्वकाल में यथाशक्ति दान करना, युवतियों की कथा में मौन रहना, तृष्णा को तोड़ना, गुरुजनों के प्रांत विनय भाव रखना, सब जीवों पर दया करना आदि सर्वशास्त्रों द्वारा बताया हुआ कल्याण का मार्ग है।२६।

प्रारभ्यते न खलु विघ्नभयेन नीचैः प्रारभ्य विघ्नविहता विरन्तिम मध्याः। विघ्नं पुनः पुनरपि पुतिहन्यमानाः पारभ्य चोत्तमजना न परित्यजन्ति ।। २७।।

निम्न श्रेणी के पुरुष विघ्न-भय से कार्यारम्भ नहीं करते, मध्यम श्रेणी के पुरुष कार्यारम्भ कर देते और विघ्न होने पर मध्य में ही उसे छोड़ देते हैं, परन्तु उत्तम श्रेणी के पुरुष विश्नों के कारण बार-बार संतप्त होने पर भी उसे नहीं छोड़ते, वरन् पूर्ण करके ही रहते हैं।२७७

पिया न्याय्या वृत्तिमंलिनमसुभङ्ग ऽप्यसुकरं त्वसन्तो नाभ्यर्थ्याः सुहृदपि न याच्यः कृशधनः। विपणुच्चेः स्थेयं पदमनुविधेयं च महतां

सतां केनोद्दिष्ट विषममसिधाराव्रतमिद्म् ॥२८॥ थे ४ पुरुष न्याय-प्रिय होते हैं, वे घोर विपत्ति में भी अनु- चित कार्य नहीं करते। दृष्ट पुरुष से या अल्पधन वाले सुहृद से 

धन की याचना नहीं करते। प्राण भले ही चले जाँय परन्तु वे अपने गौरव का ह्रास नहीं होने देते, यह समझ में नहीं आता कि तलवार की धार पर चलने के समान यह कठोर व्रत उन्हें किसने सिखाया है ? ।२८।

मानशौर्य प्रशंसा

क्षत्क्षामोऽपि जराकृशोऽपि शिथिलप्रायोऽपिकष्टां दशा- मापन्नोऽपि विपन्नदीधितिरपि प्राणेषु नश्यत्स्वपि । मत्त भेन्द्र विभिन्नकुम्भपिशितग्रासैक किंजीर्णतृणमत्तिमान महतामग्र सरः केसरी बद्धस्पृहः ॥२९॥

क्षुवा से कृश शरीर, शिथिलप्रायः जरावस्था के कारण बलहीन और कष्टमय दशा को प्राप्त हुआ सिंह तेज-रहित होने पर भी मत्त गजेन्द्र के मस्तक का भक्षण करने की इच्छा रख फर कभी शुष्क और जीर्ण घास को खा सकता है?।२६।

स्वल्पस्नायुवसावशेषमलिनं निर्मा समप्यस्थिकं श्वालब्ध्वा परितोषमेति न च तत्तस्य क्षुधाशान्तये । सिहो जम्बुकमङ्कमागतमपि त्यक्त्वा निहन्ति द्विपं सर्वः कृच्छ्रगतोपि वाञ्छतिजन सत्वाप्ररूपंफलम् ।। ३०।।

स्वल्प स्नायु, चर्बी आदि तथा मांस-रहित अस्वि को प्राप्त करके प्रसन्न तो होता है, परन्तु उससे उसकी भूख शान्त नहीं हो सकती। सिह भी पास आये हुए स्यार को छोड़ कर हाथी का ही वध करता है। इस प्रकार कष्टमय दशा को प्राप्त होकर भी सब जीव अपनी शक्ति के अनुसार ही फन प्राप्त करने की इच्छा रखते हैं ।३०।

लांगूलचालनमधश्वरणावपातं भूमी निपत्य बदनोदरदर्शनञ्च ।
श्वा पिण्डदस्य कुरुते गजपुङ्गवस्तु धीरं विलोकयति चाटुशतैश्च भक्त ॥३१।।

कुत्ता भोजनदाता के आगे पूछ हिलाकर और भूमि पर लोट-पोट होकर अपनी दीनता प्रशित करता है, परन्तु हाथी अपने भोजनदाता को गंभीरता से देख कर सैकड़ों बार मनाने पर ही भोजन करता है । ३१।

परिवर्तिनि संसारे मृतः को वा न जायते । स जातो येन जातेन याति वंशः समुन्नतिम् ॥३२॥ इस परिवर्तनशील संसार में मरण को कौन नहीं प्राप्त होता और कौन नहीं जन्म लेता ? परन्तु जिसके द्वारा वंश की वृद्धि हो, उसी का जन्म लेना सार्थक है। ३२।

कुसुमस्तवकस्येव द्वयी वृत्तिर्मनस्विनः । 
मूध्नि वा सर्वलोकस्य विशार्येत बनेऽथवा ।॥३३॥

पुष्पों के गुच्छे के समान मनस्त्री पुरुषों की दो गतियाँ ही है- सब के शिर पर प्रतिष्ठित होना अथवा वन में ही मुर्झा कर नष्ट होजाना है । ३३।

भास्वरी द्वावेव ग्रसते दिनेश्वरनिशाप्राणेश्वरी भ्रातः पर्वणि पश्य दानवपतिः शीर्षावशेषाकृतिः ।। ३४।।
सन्त्यन्येऽपि बृहस्पतिप्रभूतयः सम्भाविताः पञ्चषा- स्तान्प्रत्येष विशेषविक्रमरुची राहुर्न वैरायते ।

आकाश में बृहस्पति और उसके समान तेजस्वी पाँच, छः ग्रह और भी हैं, परन्तु अपने विशेष पराक्रम में रुचि रखने वाला 
शिरमात्र शेष राहु उनसे बैरन करके परम तेजस्वी सूर्य चन्द्र को हो (क्रमशः) पूर्णिमा और अमावस के समय ग्रास करता है।३४।

वहति भुवनथणि शेषः फणाफलकस्थितां ।।३५।। कमठपतिना मध्येपृष्ठ सदा स विधार्यते । तमपि कुरुते कोडाधीनं पयोधिरनादरा- दहह महतां निःसोमानश्चरित्रविभूतयः

शेष नाग अपने फण पर ही चौदह भुवनों को धारण किये रहते हैं, परन्तु कच्छप ने उन दशेष नाग को भी अपनी पीठ पर धारण कर रखा है। वह कच्छप भी समुद्र की गोद में अनादर पूर्वक धारण किया हुआ है। अहो ! महान् पुरुयों के चरित्र की महिमा भो असीमित होती है । ३५।

1 वरं प्राणोच्छेदः समदमघवन्मुक्तकुलिश- प्रहारैरुद्ङ्गच्छद्बहुल दहनोद्‌गार गुरुभिः तुषाराद्र सूनोरहह पितरि क्लेशविवशे न चासी सम्पातः पयसि पयसां पत्युरुचितः ।।३६।।

अग्नि की असह्य ज्वाला वाले वच्छ के इन्द्र द्वारा प्रहार करने से हिमालय के पुत्र मैनाक के परों का काटना अच्छा था, परन्तु यह अच्छा नहीं था कि उसने अपने पिता को संकट ग्रस्त छोड़ कर समुद्र के आश्रय में अपनी प्राण-रक्षा की ।३६।

यदचेतनोऽपिपादैस्पृष्टःप्रज्वलति सवितुरिनकान्तः । 
तत्त जस्वी पुरुषः परकृतनिकृति कथं सहते ॥३७॥

सूर्यकान्त मणि अचेतन होने पर सूर्य की रश्मियों के ताप से प्रज्वलित होजाती है तो सचेतन तेजस्वी पुरुष दूसरों के द्वारा किये जाने वाले निरादर को कैसे सहन कर सकता है ? । ३७७

सिंहःशिशुरपिनिपततिमदमलिनकपोलभित्तिषुगजेषु प्रकृतिरियं सत्ववतां न खलु वयस्ते जसां हेतुः ॥३८॥

सिह का शिशु भी मदोन्मत्त हाथी पर आक्रमण कर देता है, क्योंकि शक्तिशालियों का स्वभाव ही ऐसा होता है। तेजस्विता को प्रदर्शित करने में वय बाधा का कारण कदापि नहीं बन सकती । ३०।

द्रव्य प्रशंसा

जातिर्यातु रसातलं गुष गणस्तत्राप्यवो गच्छतात् शालं शैलतटात्पतत्वभिजनः संदह्यतां वह्निना । शौर्य वैरिणि वज्रमाशु निपतत्वर्थोऽस्तु नः केवलं येनैकेन बिनागुणास्तृणलवप्रायाः समस्ताइमे ।॥३९॥

जाति चाहे रसातल में क्यों न चली जाय, श्रेष्ठ गुणगण भी अधोगामी क्यों न होजाँय, शीलता पर्वत से शिला के पतित होने के समान क्यों न गिर जाय, परिवारीजन अग्नि में क्यों न भस्म होजाँय, शत्रुरूपी शूरता पर वज्रपात क्यों न होजाय, परन्तु हमें तो घन से ही प्रयोजन है, क्योंकि धन के बिना सभी गुण तृण के तुल्य ही हैं।३६।

तानोन्द्रियाण्यविकलानि तदेव नाम सा बुद्धिरप्रतिहता वचनं तदेव अर्थोष्मणा विरहितः पुरुषः स एव त्वन्यः क्षणेन भवतीति विचित्रमेतत् ।।४०।।

वही इन्द्रियाँ हैं, वही नाम है, वही अकुंठित बुद्धि है, वही वाणी है, फिर भी केसी अद्भुत बात है कि धन के बिना मनुष्य क्षणभर में ही कुछ का कुछ होजाता है । ४०।
यस्यास्ति वित्त स नरः कुलीनः स पण्डितः स श्रुतवान्गुणज्ञः ।

स एवं वक्ता सच दर्शनीयः सर्वे गुणाः काञ्चनमाश्रयन्ते ॥४१॥

[ १६

जिसके पास धन है, वही पुरुष कुलीन है, बही पण्डित है, वही विद्वान् और गुणज्ञ है, वही वक्ता और वही दर्शनीय है।

अभिप्राय यह है कि सभी गुण स्वर्णरूपी धन के आधित हैं ।४१।

दौर्यन्त्र्यान्नूप तिविनश्यतियतिः सङ्गात्सुतोलालनाद् विप्रोऽनध्ययनात्कुलं कुतनयाच्छीलं खलोपासनात् ।

हीर्मद्यादानवेक्षणादपिकृषि : स्नेहः प्रवासाश्रया- त्मैत्री चाप्रणयात्समृद्धिरनयात्त्यागात्प्रमादाद्धनम् ।।४२।।

बुरे मन्त्रियों से राजा का, कुसंगति से योगी पुरुष का, लाड़ से पुत्र का, अध्ययन न करने से ब्राह्मण का, कुपुत्र से कुल का और खलों की सेवा से शील का नाश होजाता है।४२।

दानं भोगो नाशस्तिस्रो गतयो भवन्ति वित्तस्य । यो न ददाति न भुङ्क्त तस्य तृतीया गतिर्भवति ।४३।

धन की तीन गति हैं- दान, भोग और नाश । घन का दान या भोग न किया जाय तो उसकी तीसरी गति ही हुआ करती है ।४३१

मणिः शाणोल्लीढः समरविजयी हेतिनिहतो मदक्षीणो नागः शरदि सरितः श्यानपुलिनाः ।

कलाशेषश्चन्द्रः सुरतमृदिता बालवनिता तनिम्ना शोभन्ते गलितविभवाश्चाथिषुजना ॥४४॥
शान पर खराद किया हुआ मणि, शस्त्रों से आहत समर विजयी, मद का स्राव करता हुआ हाथी, शरद ऋतु में किचित् सूखी हुई नदी, कला से शेष चन्द्रमा, कामकेलि में मदिता वालवनिता और शुभकर्म में व्यय करके निर्धन हुआ राजा, इनकी शोभा कृशता में भी होती है ।४४।

परिक्षीणः करिचत्स्पृहयति यवांना प्रसृत्तये स पश्चात्सम्पूर्णो गणयति धरित्रीं तृणसमाम्। अतश्चानैकान्त्याद् गुरुलघुतयार्थेषु धनिना-- मवस्था वस्तूनिप्रथयतिचसङ्कोचयति च ।।४५।।

दरिद्र रहने पर जो मनुष्य एक अंजुली मात्र जो की कामना करता है, वही धनवान होने पर सम्पूर्ण पृथिवी को तृण के समान समझता है। इस प्रकार यह दोनों अवस्थाए मनुष्यों को छोटा या बड़ा बना देतीं और वस्तुओं का विस्तार और संकोच किया करती हैं ।।४५।।

राजन्दुधुक्षसि यदि क्षितिषेनुमेतां

तेनाद्य वत्समिव लोकममुम्पुषाण । तस्मिश्च सम्यगनिशं परिपुष्यमाणे नानाफलं फलति कल्पलतेव भूमिः ॥४६।।

हे राजन् ! यदि पृथिवी रूपी गाय का दोहन करना हो तो प्रजा का पालन बछड़ के समान करो। क्योंकि भले प्रकार पालन की हुई पृथिवी कल्पवृक्ष के समान फल देने बानी होती है ।४६।

सत्याऽनृता च परुषा प्रियवादिनी व हिंस्रा दयालुरपि चार्थपरा वदान्या ।
नित्यब्यया प्रचुरनित्यधनागमा च 
वाराङ्गनेव नृपनीतिरनेकरूपा ।।४७।। 

कहीं सत्य, कहीं झूठ, कहीं कठोर, कहीं मधुर बोलने वाली, कहीं घातक, कहीं दयालु, कहीं कृपण, कही उदार, कहीं प्रचुर घन का व्यय करने वाली और कहीं अधिक धन संचय करने वाली यह राजनीति वेश्या के समान अनेक रूप वाली होती है ।४७७

विद्या कीतिः पालनं ब्राह्मणानां दानं भोगो मित्रसंरक्षणञ्च । येषामेते षड्गुणा न प्रवृत्ताः कोऽर्थस्तेषां पाथिवोपाश्रयेण ।।४८11

विद्या, कीति, ब्राह्मणों का पालन, दान देना, भोग करना और मित्र की रक्षा, जिसमें यह छः गुण नहीं, उस राजा के आश्रय से क्या लाभ है ? १४८।

यद्धात्ला निजभालपट्टलिखितं स्तोकं महद्वा धनं तत्प्राप्नोतिमरुस्थलेऽपिनितरां मेरोततोनाधिकम् । 
तद्धीरो भव वित्तवत्सु कृपणां वृत्ति वृथामाकृथा कृपेपश्य पयोनिधीवविघटो गृह्णात्ति तुल्य जलम् ।।४१।।

विधाता ने भाग्य में अल्प या अधिक जितना भी धन लिखा है, वह तो उसे मरुस्थल में भी प्राप्त होता ही है और उससे अधिक सुमेरु पर्वत पर जाने से भी नहीं मिल सकता। इसलिए धैर्य पूर्वक जो है उसी पर सन्तोय करो और किसी धनवान के समक्ष दीनता व्यक्त न करो। देखो, घड़े को कूप में डालो या समुद्र में, जल तो एक समान ही भरेगा ।४१।
त्वमेव चायकाघारोऽसीति केषां न गोचरः । किमभ्भोदयरास्माकं कार्पण्योक्ति पृतीक्षसे ।। ५०।।

हे मेघवर ! यह किसे ज्ञात नहीं कि हम पपीहों के आधार तुम्हीं हो, तो फिर तुम हमारे दीनता भरे शब्दों की ही प्रतीक्षा क्यों करते हो ? १५-

रे रे चातक सावधानमनसा मित्र क्षणं श्रूयता- मम्भोदा बहवोहि सन्ति गगने सर्वेऽपि नैतादृशाः । केचिदृदृष्टिभिराद्रयन्ति वसुधांगर्जन्तिकचिद् वृथा यं यं पश्यसि तस्य तस्य पुरतो मा ब्रूहि दीनंवचः ।।११।।

अरे पपीहा ! मावधान मन से मेरा वचन सुन। आकाश में अनेक मेघ हैं. परन्तु सभी समान नहीं हैं। उनमें से कुछ तो जल की वर्षा करके पृथिवी की तृप्ति करते हैं और कुछ वृथा ही गर्जन करते रहते हैं। इसलिए तू जिस-जिस को देखे उस-उस के समक्ष ही दीन वचनों को न बोला कर ।३१।

अकरुणत्वमकारणविग्रहः परधने परयोषिति च स्पृहा । सुजनबन्धुजनेष्वसहिष्णुता प्रकृतिसिद्धमिद हि दुरात्मनाम् ॥५२॥

करुणाहीनता, अकारण विग्रह, परधन और परनारी की कामना, स्वजनों और मित्रों के प्रति असहिष्णुता, दुरात्माओं के यह स्वभाव सिद्ध लक्षण हैं ।५२१

दुर्जनः परिहर्तव्यो विद्ययाऽलङ्‌कृतोऽपि सन् । मणिना भूषितः सर्पः किमसौ न भयंकरः ॥५३॥

दुर्जन विद्यावान है तो भी त्याग देने योग्य है। क्या कोई मणि से अलंकृत हुए सर्प में भयंकरता नहीं होती ११३१

जाडचं ह्रीमति गण्यते व्रतरुचौदम्भः शुचौ कैतवं शूरे निवृणता मुती विमतितादैन्यं प्रियालापिनि। तेजस्विन्यवलिप्तता मुखरता वक्तव्यशक्तिः स्थिरे तत्को नाम गुणो भवेत्स गुणिनां यो दुर्जनैर्ताङ्कितः।।१४।।

लज्जावानों में जड़ता, व्रत करने वालों में दम्भ पवित्र चित्त बालों में कपट वीरों में दयाहीनता. मुनियों में बुद्धि राहित्य, मधुर भाषियों में दैन्य, तेजस्वियों में अवलिप्तता, वक्ताओं में मुखरता और स्विर चित्त वालों में आलस्य का होना कह कर दुर्जन पुरुष गुणियों में ऐसा कौन-सा गुण है जिसमें दोष न निकालते हों ।५४।

लोभश्चेदगुणेन कि पिशुनता यद्यस्ति कि पातकैः सत्यं चेत्तपसा च कि शुचिमनो यद्यस्ति तीर्थेनकिम्। सौजन्यं यदि कि गुणैः सुमहिमा यद्यस्ति किमण्डनैः सद्विद्यायदिकि धनैरपयशो यद्यस्तिकि मृत्युना ॥५५॥

लोभ है तो किसी अन्य दुर्गुण की क्या आवश्यकता ? यदि पिशुनता है तो पापों का क्या प्रयोजन ? यदि सत्य है तो तप से क्या लाभ ? यदि मन में पवित्रता है तो तीयों में जाने का क्या उद्देश्य ? यदि सौजन्य है तो अन्य गुणों से क्या कार्य ? यदि यश है तो अन्य भूषण से क्या अपेक्षा ? यदि सद्धिया है तो धन का क्या अभिप्राय ? यदि अपयश है तो मृत्यु की क्या कामना ? १५५।
शशी दिवसधूसरो गलित्तयौवना कामिनी सरो विगतवारिजं मुखमनक्षरं स्वाकृतेः । प्रभुर्धनपरायणः सततदुर्गतः सज्जनो नृपाङ्गणगतः खलो मनसि सप्त शल्यानि मे ।।५६।।

दिन वा धूमिल चन्द्र, यौवनहीना नारी, कमलविहीन सरोवर, बुद्धिहीन सुन्दर पुरुष, कृपण स्वामी, दुर्गति-प्रस्त सज्जन और राजभवन में दुष्ट मनुष्य का वास, यह सातों कॉटे के समान हैं ।५६।

न कश्चिच्चण्डकोपानामात्मीयो नाम भ्रभुजाम् । होतारमपि जुह्वानं स्पृष्टो दहति पावकः ।।५७।।

अत्यन्त क्रोधी राजाओं का आत्मीय कोई नहीं होता । क्योंकि अग्नि आहुति देने वाले को भी स्पर्श करने पर दग्ध कर देती है ।५७७

मौनान्मूकः प्रवचनपटुर्वातुलो जल्पको वा घृष्टः पाश्व पसति च सदा परतश्चायुगल्भः । क्षान्त्या भीरुयंदि न सहतेप्रायशो नाभिजातः सेवाधर्मः परमगहनो योगिनामप्यगम्यः ।।५८।।

यदि सेवक मौन रहे तो गूंगा, वाक्पटु हो तो बकवादी, समीप रहे तो हीठ और दूर रहे तो मूर्ख कहलाता है। यदि क्षमाशील हो तो उसे भीरु और असहनशील हो तो कुलहीन कहते हैं। अभिप्राय यह है कि सेवा धर्म अत्यन्त गहन है, जो कि योगियों को भी अगम्य होता है ।५८१
उद्भासिताखिलखलस्यविश्शृङ्खलस्य प्राग्जातविस्मृतनिजाधर्मकर्मवृत्तेः ।

दैवा बाप्तनिभवस्थ गुणद्विषोऽस्य नीचस्य गोचरगतैः सुखमास्यते कैः ॥५६॥

१२५

जिस की दुष्टता का ज्ञान सभी को होगया हो, जिसके पूर्वजन्म के नीचकर्म इस जन्म में प्रकट हो रहे हों, जो देव वशात् धनवान होगया हो और जिसे श्रेष्ठ गुणों से द्वप हो, ऐसे दुष्ट मनुष्य के सामने जाकर कौन सुख प्राप्त कर सकता है ।५६।

आरम्भुगुर्वी क्षयिणी कमेण लध्वीपुरा वृद्धिमती च पश्चात् । दिनस्य पूर्वाद्ध पराद्ध भिन्ना

छायेव मैत्रीखलसज्जनानाम् ।।६०।।

जैसे दिवस के प्रारम्भ में बनी छाया रहती है और धीरे- धोरे घटती जाती है, फिर दिवस के उत्तरार्ष के अन्त में छाया स्वल्प रहती और धीरे-धीरे बढ़ती जाती है, वैसे ही दुष्ट और सज्जन की मित्रता होती है । ६०।

मृगमीनसज्जनानांतृणजलसन्तोषविहितवृत्तीनाम् । लुब्धकधीवरपिशुना निष्कारणमेव वैरिणो जगति।। ६१।।

मृग और मछली क्रमशः घास खाकर और जल पीकर रहते हैं, तो भी शिकारी और मध्छेरे उससे द्वेष रखते हैं। वैसे ही सज्जन पुरुषों से दुर्जन पुरुष अकारण ही वैर रखते हैं। ६१।

वाञ्छा सज्जनसङ्गमे परगुणे प्रीतिगुंरी नम्रता विद्यायां व्यसनं स्वयोषित रतिर्लोकापवादाद्भयम् ।
सज्जन प्रशंसा

[ शतक त्रय

भक्तिः शूलिनि शक्तिरात्मदमने संसर्गमुक्तिः खले एते येषु वसन्ति निर्मलगुणास्तेभ्यो नरेभ्यो नमः ।।६२॥

सज्जतों के संग की इच्छा, पराये गुणों से प्रेम, गुरुजनों के समक्ष नम्रता, विद्या में अनुराग, निज पत्नी से प्रीति, लोक- निन्दा से भय, शिव की भक्ति, इन्द्रियदमन की शक्ति रखना और दुष्टों की संगति का परित्याग करना, यह श्रेष्ठ गुण जिनमें हैं, उन सज्जनों को नमस्कार । ६२।

विपदि धैर्यमथाभ्युदये क्षमा सदसि वाक्पटुता युधि विक्रमः । मसि चाभिरुचिव्र्व्यसनं श्रुतो पुसिद्धमिदं हि महात्मनाम् ।।६३।।

विपत्ति में घर्य, अभ्युदय में क्षमा-भाव, सभा में वाक्पटुता, युद्ध में पराक्रम, यश में अभिरुचि, शास्त्र-श्रवण में चित, महात्मा पुरुषों के यह स्वाभाविक गुण है ।६३।

पृदानं पृच्छन्न गृहमुपगते सम्भ्रमविधिः पूियं कृत्वा मौनं सदसि कयनं चाप्युपकृतेः । अनुत्सेको लक्ष्म्यां निरभिभवसाराः परकथाः सतां केनोद्दिष्ट विषममसिधाराव्रतमिदम् ।।६४।।

दान को गोपनीय रखना, गृह पर आगत का स्वागत सत्कार करना, परोपकार करके चुप रहना, किसी अन्य द्वारा किये हुए उपकार को सभा में कहना, घन प्राप्त होने पर गर्व न करना, दूसरों की चर्चा में निन्दा-भाव न लाना यह हजार की धार पर चलने के समान कठोर व्रत किसने बताया है ? ।६४।

करे श्लाध्यस्त्यागः शिरसि गुरुपादपूणयिता मुखे सत्या वाणी विजवि भुजयोर्वीर्यमतुलम् । हृदि स्वच्छक्ष वृत्तिः श्चुतमधिगतं च श्रवणयो- विनाऽप्यैश्वयें प्रकृतिमहतां मण्डननिदम् ॥६५।।

हाथों की प्रशंसा दान में है, शिर की शोभा गुरुजन के चरणों में प्रणाम करने में है, मुख की शोभा सत्य बोलने में और भुजाओं की शोभा अगर बल प्रदर्शित करने में है। हृदय की श्लाघा स्वच्छता में और कानों की शोभा शास्त्र-श्रवण में है, सज्जनों के लिए यह सब ऐश्वर्य और महान भूषण है ।६५)

सम्पत्सु महतां वित्तं भवेदुत्पलकोमलम् । आपत्सु च महाशैलशिलासंघातकर्कशन् ।।६६।।

महात्माओं का चित्त सम्पत्ति मिलने पर कमल के समान कोमल तथा आपत्ति पड़ने पर पर्वत को शिला के समान अत्यन्त कठोर होता है ।६६।

सन्तप्तायसिसंस्थितस्थपयसोनामाविनाज्ञायले मुक्ताकारतया तदेव नलिनोपलस्थितं राजते । स्वात्यांसागरशुक्तिमध्यपतितंतन्योक्ति कंजायते प्रायेणाधममध्यमोत्तम गुणः संसर्गतो जायते ॥६७॥

तपते हुए लोहे पर पड़ने वाले जल का नाम भी नहीं जाना जाता अर्थात् चिन्ह भी शेष नहीं रहता, परन्तु वही जल कमल के पत्तों पर मोती के आकार का होजाता है। यदि वही जल स्वाति नक्षत्र में समुद्र की शुक्तियों पर पड़ जाय तो मोती बन जाता है। इससे यही विदित होता है कि शरीर-धारियों के अधभ, मध्यन और उत्तम गुण संसर्ग से ही उत्पन्न होते हैं ।६७।
यः प्रीणयेत्सुचरितैः पितरं स पुत्त्रो यद्भूतु रेव हितमिच्छति तत्कललम् ।

तन्मिन्त्रमापदि सुखे च समक्रियं यद् एतत्त्रयं जगति पुण्यकृतो लभन्ते ॥६८।।

जो अपने श्रेष्ठ आचरण से पिता को प्रसन्न रखता है, वहीं पुत्र है, जो अपने पति का हित-चिन्तन करती है, वही पत्नी है और सुख-दुःख दोनों अवस्थाओं में समान रहे, वही सच्चा मित्र है, इन तीनों की प्राप्ति पुण्यात्मा पुरुषों को ही होतो है । ६८।

एको देवः केशवो वा शिवो वा एकं मित्रं भूपतिर्वा यतिर्वा । एको वासः पत्तने वा वने वा एको नारी सुन्दरी वा दरी वा ॥६९॥

आराध्य देव एक हो केशब हो अथवा शिव, मित्र भी एक ही हो- राजा हो अथवा योगी। एक ही निवास स्थान हो- नगर में अथवा वन में और नारी भी एक ही हो सुन्दरी हो अथवा गिरि की गुफा हो अर्थात् असुन्दर हो ।६१।

नम्रत्वेनोन्नमन्तः परगुणकयनैःस्वान्गुणान्ख्यापयन्तः स्वार्थान्सम्पादयन्तोविततपृथुतरारम्भयत्नाः परार्थे । क्षान्त्येवाक्षेय रूक्षाक्षपुमुखरमुखान्दुर्जनान्दूषयन्तः सन्तसाश्चर्यचर्याजगति बहुमताः कस्यनाभ्यर्चनीयाः।।७०।।

जो नम्र रहकर उन्नति करते हैं, जो पराये गुणों का वर्णन करते हुए अपने गुणों को व्यक्त करते हैं, जो परोपकार करते हुए अपना भी कार्य-साधन करते हैं, जो दुर्जनों की निन्दित और 
कठोर बाणी से युक्त मुख को क्षमा से ही दूषित करते हैं। इस प्रकार के उन आश्चर्यजनक दिनचर्या वाले सन्त पुरुषों को संसार में पूजनीय कौन नहीं मानता ? १७०।

परोपकारी प्रशंसा

भवन्ति नम्रास्तरवः फलोद्ङ्गमै नंर्वाम्बुभिर्भू मिविलम्बिनो घना । अनुद्धताः सत्पुरुषाः समृद्धिभिः स्वभाव एवैष परोपकारिणाम् ॥७१ ।।

जैसे फल लग जाने पर वृक्ष भुक जाते हैं, जैसे नवीन जल से भरे हुए मेष पृथिवी पर गिरते है, वैसे ही समृद्धि को प्राप्त हुए सत्पुरुष भी झुक जाते है। क्योंकि परोपकारियों का

स्वभाव ही ऐसा होता है ।७१। श्रोत्र श्र तेनैवन कुण्डलेनदानेनपाणिर्न तु कङ्कणेन ।

विभातिकायः करुणामयानां परोपकारैर्न तु चन्दनेन ।।७२।।

श्रोत्रों की शोभा कुण्डल धारण से नहीं, शास्त्र श्रवण से है, हाथों की शोना कंकण पहनने से नहीं, दान से है और करुणा परायण पुरुषों की शोभा चन्दन-लेपन से नहीं, वरन् परोपकार करने से होती है।७२।

पापान्निवारयति योजयते हिताय गुह्यं निगूहति गुणान्पुकटीकरोति । आपद्मतञ्च न जहाति ददाति काले समित्रलक्षणमिदं पृवदन्ति सन्तः ॥७३॥ अपने मित्र के पाप कर्मों का निवारण करना, हित के कार्यों में युक्त करना, उसकी गुप्त बातों को छिपाये रखना, उसके 
गुणों को प्रकट करना, उसका साथ कभी न छोड़ना और समय उपस्थित होने पर उसे सहायता करना, सत्तजनों ने यह सब लक्षण श्रेष्ठ मित्र के बताये हैं ।७३।

प‌द्माकर दिनकरो विकचं करोति चन्द्रो विकासयति कैरवचक्रवालम् । नाभ्यथितो जलघरोऽपि जलं ददाति सन्तः स्वयं परिहितेषु कृताभियोगाः ।।७४।।

विना याचना किये ही सूय कमलों को खिलाता और चन्द्रमा कुमुदिनी को विकसित करता है। मेघ भी स्वयं ही जल की वर्षा करता है, क्योंकि सत्पुरुष बिना किसी की प्रार्थना के ही परोप- कार में तत्पर रहते हैं ।७४१

एते सत्पुरुषाः परार्थघटकाः स्वार्थान्परित्यज्य ये सामान्यास्तु परार्थमुद्यमभूतः स्वार्थाविरोधेनये । तेऽमी मानुषराक्षसः परहितं स्वार्थाय निघ्नन्ति ये ये निघ्नन्ति निरर्थकं परहितं ते के न जानीमहे ॥७५।।

सज्जन पुरुष अपना कार्य छोड़ कर भी पराये कार्य में तत्पर रहते हैं, इनमें जो सामान्य पुरुष हैं वे अपने कार्य में लगे रह कर पराया हित साधन करते हैं। परत्तु जो अपने लाभ के लिए पराया कार्य विगाड़ देते हैं, वे मनुष्य होते दुए भी राक्षस हैं और जो अकारण ही किसी दूसरे के कार्य को बिगाड़ देते हैं, उन्हें क्या कहना चाहिए, यह में नहीं जानता ।७५।

क्षीरेणात्मगतोदकाय हि गुणा दत्ताः पुरा तेऽखिलाः क्षीरोत्तापमवेक्ष्य तेनपयसा ह्यात्मा कृशानी हुतः ।

गन्तु पावकमुन्मनास्तदभवद् दृष्ट्वा तु मित्रापदं युक्त तेनजलेनशाम्यति सतां मैत्री पुनस्त्वीदृशी ।।७६।।

जल के साथ मिले हुए दुग्ध ने उसे अपने सभी गुग प्रदान करके मैत्री दृढ़ की। फिर जल ने दुग्ध को जलता हुआ देखा तो उसे बचाने के लिए स्वयं को ही अग्नि में होम कर दिया। जल की यह दशा देख कर दूध ने भी अग्नि की ओर प्रयाण कर दिया, तब जल ने अपने शीतल छीटों से मित्र दुग्ध को स्थिर किया और तभी शान्त हो सका। बहो, सज्जन पुरुषों की मित्रता ऐसी ही होतो है ।७५।

इतः स्वपिति केशवःकुलमितस्तदीयद्विषा-

मितश्च शरणाथिनां शिखरिणां गणाः शेरते । इतोऽपि बड़वानलः सह समस्तसंवर्त कै- रहो विततमूजितं भरसहञ्च सिन्वोर्वपुः ॥ ७७৷৷

समुद्र में एक ओर भगवान् विष्णु शयन करते हैं तो दूसरी ओर उनके शत्रु, एक ओर अपनी रक्षा की आकांक्षा से पर्वतों के समूह सोते हैं तो दूसरी ओर प्रलय काल की सम्वर्ताग्नि को साथ लिए हुए बड़वानल वृद्धि पर है। अहो, समुद्र कैसा महान् बलवान और भारसहन में समर्थ है, इसी प्रकार सज्जन भी होते हैं ।७७।

- तृष्णांछिन्धिभजनमांजहि मदं पापे रतिमाकृथाः सत्यं ब्रह्यनुयाहि साधुपदवीं सेवस्व विद्वज्जनम् । मान्यान्मानयविद्विषोऽप्यनुनयप्रच्छादयस्वान्गुणान् कीति पालय दुःखिते कुरु दयामेतत्सतां लक्षणम् ॥७८।।

तृष्णा का त्याग करो, क्षमा को अपनाओ, अहंकार को छोड़ दो, पाप से चित्त हटाओ, सत्य बोलो. सज्जनों के पदानुयायी बनो, विद्वानों की सेवा करो, मान्य पुरुषों का मान करो, विद्व पी को भी प्रसन्न रखो, अपने गुणों को व्यक्त करो, यह सभी लक्षण सत्पुरुयों के हैं ।७८।

मनसि वचसि काये पुण्यपीयूषपूर्णा- स्त्रिभुवनमुपकारर्थ णिभिः प्रीणयन्तः । परगुण परमाणुन्पर्वतीकृत्य नित्यं निजहृदि विकसन्तः सन्ति सन्तः कियन्तः ॥७६।।

जिनके मन, वचन और काया में पुण्यमय पीयूष भरा है, जिन्होंने परोपकार से त्रिभुवन को प्रसन्न किया है और जिन्होंने दूसरे के अल्प से भी अल्प गुण को पर्वत के समान बढ़ा कर प्रसन्नता प्राप्त की है, ऐसे सन्त पुरुष संसार में कितने है। ।।79।।

कि तेन हेमगिरिणा रजताद्रिणा वा यत्राश्रिताश्च तरवस्तरवस्त एव । मन्यामहे मलयमेव यदाश्रयेण कङ्कोलनिम्बकुटजा अपि चन्दनाः स्युः ॥८०॥

स्वर्ण का वह सुमेरु और रजत का वह हिमालय किस काम का, जिसके आश्रय में स्थित वृक्ष सदा वृक्ष ही रहे आते हैं। परन्तु वह मलयाचल ही धन्य है, जहाँ खड़े हुए कंकोल, नीम और फुटज के वृक्ष भी चन्दन बन जाते हैं ।८०।

धैर्य प्रशंसा

रत्नंर्महार्हस्तुतुषुर्न देवा न भेजिरे भीमविषेण भीतिम् । सुधा विना न प्रययुविरामं न निश्चिार्थाद्विरमन्ति धीराः ॥८१॥

समुद्र मन्यन के समय देवगण महान् रत्नों को पाकर भी प्रसन्न नहीं हुए, भयंकर विष की प्राप्ति से भयभीत न हुए और जब तक मन्चन न होगया उस कार्य से नहीं हटे। तात्पर्य यह है कि विद्वान् और धीर पुरुष अभीष्ट की प्राप्ति हुए बिना आरम्म किये हुए कार्य को नहीं छोड़ते ॥८१॥

क्वचिद् घूमौ शय्या क्वचिदपि च पर्यङ्कशयनः क्वचिच्छाकाहारः क्वचिदपिः च शाल्योदनरुचिः । २वचित्कन्थाधारी वर्वाचदपि च दिव्याम्बरधरो मनस्वी कार्यार्थी न गणयति दुखं न च सुखम् ।। ८२।।

कभी भूमि पर सोते हैं तो कभी पलंग पर, कभी शाक का आहार करते हैं तो कभी शालि का ओदन (चावल का भात) भक्षण करते हैं, कभी गुदड़ी पहन कर दिन व्यतीत करते हैं तो कभी दिव्य वस्त्र पहनते हैं, इस प्रकार मनस्वी कार्यार्थी जब कार्य करने लगते हैं तो सुख, दुःख में भेद नहीं मानते ।६२।

ऐश्वर्यस्य विश्वषणं सुजनता शौर्यस्य वाक्संयमो ज्ञानस्योपशमः श्रुतस्य विनयो वित्तस्यपात्रेव्ययः। अक्रोधस्तपसः क्षमा प्रभवितुर्धर्मस्य निर्व्याजता सर्वेपांनपि सर्वकारणमिदं शीलं परं सूषणम् ।। ८३।।

ऐश्वर्य का भूषण सुजनता, शौर्य का भूषण वाक् संयम, ज्ञान की शोभा शान्ति, शास्त्र की शोभा विनय, धन की शोभा सत्पात्र को दान, तप की शोभा अकोष, प्रभुत्व की शोभा क्षमा, धर्म की शोभा कपट-रहितता और अन्य सभी गुणों का कारण- रूप भूषण शील ही है । ८३1

निन्दन्तु नीतिनिपुणा यदि वा स्तुवन्तु लक्ष्माः सगाविशतु गच्छतु वा यथेष्टम् । अद्यव वा मरणमस्तु युगान्तरे वा न्याय्यात्पथः प्रविचलन्ति पदं न धीराः ॥८४॥

नीतिनिपुण मनुष्य निन्दा करे या स्तुति, लक्ष्मी आये या चली जाय, मृत्यु आज ही हो अथवा युगान्तर में, परन्तु धीरज- वान् पुरुष न्याय मार्ग से पीछे कभी नहीं हटते ।८४।

भग्नाशस्य करण्डपीडिततनोम्लनिन्द्रियस्य क्षुधा कृत्वाऽऽखुविवरस्वयंनि पतितो नक्त मुखे भोगिनः। तृप्तस्तत्पिशितेन सत्वरमसी तेनैव यातः पथा लोकाः पश्यत दैवमेव हि नृणां वृद्धौक्षये कारणम् ।।८५।।

जिस पिटारे में बन्द रहने के कारण पीड़ित हुआ सर्प जीवन की आशा का त्याग किये बैठा था, उसकी इन्द्रियाँ क्षुधा से शिथिल होगई थी, तभी रात्रि के समय एक चूहे ने उस पिटारे में छेद कर उसके भीतर प्रवेश किया और स्वयं ही सर्प के मुख में जा पड़ा। तब सर्प ने उसका भक्षण कर लिया और प्रसन्न होता हुआ पिटारे से बाहर निकल आया। अहो, देखो मनुष्यों की वृद्धि और क्षय का कारण चैव ही है।०५।
पतितोऽपि कराघातैरुत्पतत्येव कन्दुकः । प्रायेण साधुवृत्तानामस्थायिन्यो विपत्तयः ॥८६॥

जिस पर हाथ के आधात से नीचे की ओर फेंकी हुई गेंद कुछ देर के लिए ऊपर की ओर ही उछलती है, वैसे ही साधुओं की विपत्ति भी अल्पकालीन होती है ।८६।

आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान्निपुः । नास्त्युद्यमसमो वन्धुर्य कृत्वा नावसीदति ॥८७॥ मनुष्यों के शरीर में आलस्य ही घोर वात्रु है और उद्योग ही उसका ऐसा बन्धु है, जिसके करने पर कभी दुःख नहीं होता। ८७७ छिन्नोऽपि रोहति तरुः क्षोणोऽप्युपचीयते पुनश्चन्द्र । इति विमृशन्तः सन्तः संतप्यन्ते न ते विपदा ।।८८।।

जैसे काटा हुआ वृक्ष काट कर भी पुनः बढ़ने लगता है, वैसे ही क्षीण हुआ चन्द्रमा भी पुनः बढ़ता जाता है। ऐसा जानकर सत्पुरुष संकटकाल में भी कभी दुःखित नहीं होते । ८८ ।

देव प्रशंसा

नेता यस्य वृहस्पतिः प्रहरणं वजू सुराः सैनिकाः स्वर्गो दुर्गमनुग्रहः किलर्ररावतो वारण । इत्यैश्वर्यबलान्वितोऽपि बलभिद्भग्नः परैः सङ्गरे तद् व्यवतं वरमेव दैवशरणंधिग्धिग्वृथा पौरुषम् ।।८६।।

जिसके नेता (मन्त्रदाता) वृहस्पति, वज्र जिसका आयुध, देवगण सैनिक, स्वर्ग दुर्ग और ऐरावत जिसका हाथी है, ऐसे सब प्रकार के ऐश्वर्य और यल से समन्वित होकर भी रण में शत्रु से
हारता रहता है, इससे यही मानना होता है कि देव ही शरण लेने योग्य है और वृथा पौरुष को धिक्कार है ।८६।

कर्मायत्तं फलं पुन्सां बुद्धिः कर्मानुसारिणी । तथापि सुधिया कार्यं कर्तव्यं सुविचारतः ॥६०॥

मनुष्य कर्म के अनुसार फल भोगता है और कर्म के अनुसार ही बुद्धि होजाती है। तो भी समझ सोचकर कार्य करना बुद्धि- मान का कर्तव्य है ।९००

खल्वाटो दिवसेश्वरस्य किरणैः सन्तापिते मस्तके वाञ्छन्देशमनातपं विधिवशात्तालस्य मूलं गतः । तत्त्राप्यस्य महाफलेन पतता भग्न सशब्दं शिरः प्रायोगच्छति यत्त्र भाग्यरहितस्तत्रैव यान्त्यापदः ।।६१।।

गंजा मनुष्य सूर्य के ताप से शिर को बचाने के लिए छापा- मय तालवृक्ष के नीचे आया और वहां उस वृक्ष से एक बड़ा फल गिरने के कारण उसका शिर फट गया। इस प्रकार भाग्यहीन पुरुष जहाँ-जहाँ जाता है, विपत्ति भी वहीं-वहीं (उसके पीछे- पीछे) जाती है ।६१।

शशिदिवाक रयोग्र हपीडनं गजभुजङ्गमयोरपि बन्धनम् । मतिमताञ्चविलोक्यदरिद्रतां विधिरहोवलवानितिमेमतिः ॥९२॥

सूर्य-चन्द्र का राहु के द्वारा ग्रहण, हाथी और सर्प का बन्धन तथा विद्वानों की दरिद्रता को देखकर मैं विधना को ही बलवान् समझता हूँ ।१२।
सृजति तावदशेषगुणाकरं पुरुषरत्नमलङ्करणं तदपि तत्क्षणभङ्गि करोति भुवः । चेदहह कष्टमपण्डितता विषेः ॥९३॥

ब्रह्मा की कैसी मूर्खता है कि वह गुणों के सभी आकार तथा भूमि के अलंकार रूप जिस पुरुष और रत्नादि की रचना करता है उसे क्षणभंगुर ही बनाता है ।६३।

पत्रं नैव यदा करोर विटपे दोषो वसन्तस्य कि नीलूकोऽप्यबलोकते यदिदिबा सूर्यस्य किदूषणम् । बारा नंव पतन्ति चातकमुखे मेघस्य कि दूषण यत्पूर्व विधिना ललाटलिखितं तन्माजितु कःक्षमः ।।९४।।

यदि करील के वृक्ष में पत्ते उत्पन्न न हों तो इसमें बसन्त अऋतु का क्या दोष है ? यदि दिन में उल्लू को दिखाई न दे तो इसमें सूर्य का क्या दोष है? यदि चातक के मुख में जल की घारा न पड़े तो इसमें मेघ का क्या दोष है? जो विधाता ने पहले ही ललाट में लिख दिया है, उसको मिटाने में कौन समर्थ होसकता है ? १६४।

कर्म प्रशंसा

नमस्यामो देवान्ननु हतविधेस्तेऽपि वशगा विधिर्वन्यः सोऽपि प्रतिनियतकर्मकफल्दः । फलं कर्मायत्तं किममरगणैः किञ्च विधिना नमस्तत्कर्मभ्या विधिरपि न येभ्यः प्रभवति ॥९५।।

हम जिन देवयात्रओं को नमस्कार करते हैं, वे देवता भी विधाता के वश में पड़े हुए हैं। इसलिए हम भी विधाता को नम- स्कार करते हैं, जो कि हमारे कर्मों के अनुसार ही फल देता है। जब कर्म के अनुसार ही फल मिलना है, तब हमें देवताओं से और विधाता से ही क्या प्रयोजन? इसलिए उस कर्म को ही नमस्कार करना चाहिए, जिस पर विधाता का भी कोई वश नहीं चल पाता ।६५

ब्रह्म। येन कुलालवन्नियमितो ब्रह्माण्डमाण्डोदरे विष्णुर्येन दशावतारगहने क्षिप्तो महासंकटे । रुद्रो येन कपालपाणिपुटके भिक्षाटनं कारितः सूर्यो भ्राम्यति नित्यमेव गगने तस्मै नमः कर्मणे ।।६६।।

जिसने ब्रह्माण्ड रूपी पात्र के उदर में सृष्टि रचने के लिए ब्रह्मा को कुम्हार के समान नियुक्त किया, जिसने विष्णु को दश अवतार धारण करने रूपी घोर संकट में डाल दिया, जिसने रुद्र को खप्पर हाथ में लेकर भिक्षा मांगने के लिए वाध्य किया और जसने सूर्य को आकाश भ्रमण का कार्य सौंपा, उस कर्म को नम स्कार है ।९६।

नैवाकृतिः फलति नैव कुलं न शीलं विद्याऽपि नैव न च यत्कृतापिसेवा । भाग्यानि पूर्वतपसा खलुसञ्चितानि फाले फलन्ति पुरुषस्य यथैव वृक्षाः ॥६७॥

फत्र देने में न तो सुन्दर आकृति ही उपयोगी है और न फूल, शील, विद्या अथवा परिश्रमपूर्वक की गई सेवा, बरम् पूर्व 
जन्म में किये गये तप से सिचित कर्म ही समय प्राप्त होने पर वृक्ष के समान फल देते हैं ।६७।

बने रणे शत्रजलाग्निमध्ये महार्णवे पर्वतमस्तके वा । सुप्तं प्रमत्तं विषमस्थितं वा रक्षन्ति पुण्यानि पुराकृतानि ॥६८॥

बन, युद्ध, शत्रु, जल, अग्नि और समुद्र में अथवा पर्वत के शिखर पर, सुप्त अवस्था या प्रमत्त और विषम अवस्था में पूर्व जन्म में किये हुए (शुभ) कर्म ही रक्षा किया करते हैं ।९८।

या साधू अखलान्करोतिविदुषोमूर्खान्हितान्द्व विणः प्रत्यक्षकुरुते परोक्षममृतं हालाहलं तत्क्षणात् । तामाराधयसत्क्रियां भगवतीं भोक्तु फलंवाञ्छितं है साधो व्यसनैगु णेषु विपुलेष्वास्थां वृथा माकृथाः ॥६६॥

जो सत्क्रिया दुष्टों को सज्जन, मूर्षों को विद्वान्, शत्रुओं को मित्र, अप्रत्यक्ष को प्रत्यक्ष और विय को अमृत बनाने में समर्थ है, उसी की आराधना करो। हे साघी! अनेक गुणों के साधन में श्रम करना व्यर्थ है ।६६।

गुणवदगुणवद्वा वृर्वता कार्यमादो परिणतिरवधार्या यत्नतः पण्डितेन । अतिरभसकृतानां कर्मणामाविपत्त र्भवति हृदयदाही शल्यतुल्यो विपाकः ।॥१००॥

अच्छे या बुरे कर्म करने से पहले विद्वान् पुरुष का कर्तव्य है कि उसके परिणाम पर भले प्रकार विचार कर ले, क्योंकि 
बिना विचारे शीघ्रता में किये हुए कर्म का फल मरण पर्यन्त काँटे के समान हृदय पें वाह करता रहता है ।१००।

स्थाल्यांवैदूर्यमण्यांपचतितिलकणांश्चान्दनैरिन्धनाद्यः सौवर्णैर्लाङ्गलार्य विलिखति वसुधामर्कमूलस्य हेतोः । छित्वाकर्पू रखण्डान्वृतिमिहकुरुतेकोद्रवाणां समन्तात् प्राप्येमां कर्मभूमिचरतिनमनुजोयस्तपोमन्दभाग्यः ।। १०१।।

जो मन्दभागी पुरुष इस कर्म भूमि में जन्म लेकर तपश्चयों कर्म नहीं करता, बह वैदूयं मणि से निर्मित स्वर्ण पात्र में मानों चन्दन की लकड़ी जला कर दानों को पकाता है और आक के वृक्ष के मूल का पता लगाने के लिए सोने का हल जोतता तथा कपूर के टुकड़ों को काट-काट कर मेड़ लगाता है । १०१।

मज्जत्वम्भसि यातु मेरुशिखरं शत्रुञ्जयत्वाहवे वाणिज्यं कृषिसेवनादिसकला विद्याःकलाःशिक्षतु । आकाशं विपुलं प्रयातु खगवत्कृत्वा प्रयत्नं पर नाभाव्यं भवतीह कर्मवशतो भाव्यस्यनाशः कुतः ।॥१०२॥

चाहे समुद्र में गोता लगावे या सुमेर के शिखर पर चढ़ जाय, चाहे शत्रुओं को जीते और चाहे वाणिज्य, कृषि, सेवा इत्यादि सभी कलाओं में निपुणता प्राप्त करले अथवा पक्षियों के समान आकाश में उड़ने में समर्थ होजाय, तो भी अनहोनी का न होना सम्भव नहीं है ।१०२।

भीमं वनं भवति तस्य पुरं प्रधानं सर्वो जनः सुजनतामुपयाति तस्य । कृत्स्ना च भूर्भवति सन्निधिरत्नपूर्णा यस्यास्ति पूर्वसुकृतं विपुलं नरस्य ॥१०३।।

जिसने पूर्वजन्म में बहुत पुण्य किये हैं, उसके लिए भयंकर वन भी श्रेष्व नगर बन जाता है, सभी मनुष्य उसके लिए संज्जन होजाते हैं और यह सम्पूर्ण पृथिवी विपुल धनरल से सम्पन्न होजाती है ।१०३।

को लाभो गुणिसंगमः किममुखं प्रतिरैः संगतिः का हानिःसमयच्युतिनिपुणता ना धर्मतत्त्वे रतिः । कः शूरो विजितेन्द्रियःप्रियतमा काऽनुव्रता कि धनं विद्याकि सुखमपूणासगमन राज्यंकिमाज्ञाफलम् ।।१०४।।

संसार में उत्पन्न होने का क्या लाभ है? गुणवानों का संग । दुःख क्या है ? मूखों की संगति। हानि क्या है? समय को व्यर्थ व्यतीत करना । निपुणता क्या है ? धर्म में अनुराग रखना । शूर कौन है ? इन्द्रियों को जीतने वाला। प्रियतमा कौन है ? पति- बता भार्या। धन क्या है? विद्या। सत्र क्या है? परदेश में न जाना । राज्य क्या है? आज्ञा का पालन होना ।१०४।

मालतीकुसुमस्येव द्वे गती स्तो मनस्विनः । मूध्नि वा सर्वलोकस्य शीर्यते वन एव वा ॥१०५।।

मालती के पुष्पों के समान मनस्वी पुरुषों की दो ही गति है-या तो वे सब क मुकुट होकर रहते हैं या वन में जाकर ही शरीर छोड़ते है ।।१०५।।

अप्रियवचनदरिद्रः प्रियवचनादर्घः स्वदारपरितुष्टः।

परपरिवादवृत्तं. क्वचित्ववचिन्मण्डिता बसुधा ॥१०६॥

अत्रिय वचन कहने वाले, प्रिय बालने वाले, अपनी पत्नी से सन्तुः और पर निल्दा से दूर रहने वाले पुरुषों से यह पृथिवी कहीं-कहीं हो विभूषित होती है ॥१०६।।

वह्निस्तस्य जलायते जलनिधिःकुल्यायते तत्क्षणा- न्मेरुः स्वल्पशिलायते मृगपतिः सद्यः कुरङ्गायते । व्यालो माल्यगुणायते विषरसः पीयूषवर्षांयते यस्याङ्ग ऽजिललोकवल्लभतमंशीलं समुन्मीलति ॥१०७।।

जिसके शरीर में अखिल विश्व का अत्यन्त प्रिय शील प्रतिष्ठित है, उसके लिए अग्नि जल के समान, समुद्र क्षुद्र नदी के समान, सुमेरु अल्प शिला के समान, सिह मृग के समान, सर्प पुष्पमाला के समान और विष भी पीयूष की वर्षा करने वाला हो जाता है ।१०७।

एकेनापि हि शूरेण पादाकान्तं महीतलम् । क्रियते भास्करेणैव परिस्फुरित तेजसा ॥१०८।।

एक ही शूर सम्पूर्ण पृथिवी को पदाक्रान्त करके इस प्रकार बश में कर लेता है, जिस प्रकार कि सूर्य सम्पूर्ण विवव को अपने प्रकाश से वश में कर लेता है । १०८।

कदथितस्यापि हि धैर्यवृत्त - र्नशक्यते धैर्यगुणाः पृपाष्टुम । अधोमुखस्यापि कृतस्य वने नधिः शिखायाति कदाचिदेव ॥१०९॥

कैसा भी कष्ट क्यों न आ पड़े, धीरजवान पुरुष धैर्य को नहीं छोड़ता । अग्नि की ज्याला कितनी भी नीची करदी जाय, परन्तु बह ऊपर को ही जाती है ।१०२।

लज्जागुणोघजननीं जननीमिव स्वा- मत्यन्त शुद्धहृदयामनु वर्तमानाम् । तेजस्विनः सुखमसूनपि सत्यजन्ति सत्यव्रतव्यसनिनो न पुनः प्रतिज्ञाम् ॥११०।।

सत्य व्रतधारी तेजस्वी मनुष्य लज्जा आदि गुणों को उन्पन्न करने वाली, माता के समान पवित्र हृदया एवं सदैव स्वाधीन रहने वाली अपनी प्रतिज्ञा को कभी नहीं त्यागते, चाहे उन के प्राण ही क्यों नः चल जाँय ।११०।

* नीति शतक समाप्त*

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