शिप्रा नदी की कहानी (Documentary) ।
शिप्रा नदी की कहानी (Documentary) ।
Shipra River Story
Transcript:
(00:00) अजब सुरीली सी सर्वं कानों में रुन्जुन रुन्जुन दूर पहाड़ों से घिरकर एक नदी जमी पर आती अपना मलहार बजाती है लाखों त्योहार मनाती है नदिया नदिया नदिया नदियाँ नदी आँ
नदी जो अपने किनारे पर दरख़्त ही नहीं उगाती, वह उगाती है संस्कृति और सभ्यता । वे जहां जहां से भी बहती है वो पैदा करती है रीती रिवाज, गीत संगीत क्योंकि नदिया सिर्फ बहती नहीं हैं नदिया दुलारती हैं। अपनी धुन में मस्त हो बढ़ती जाती है। बढ़ती जाती है अपनी मंजिल को लक्ष्य बनाकर।
(01:16) बैकुंठ में इसे शिप्रा कहते हैं स्वर्ग में ज्वरहरनी यमद्वार में पापहरनी और पाताल में अमरिता संभव यह है शिद्वार में ज्वरहर्णि, यमद्वार में पापहर्णि और पाताल में अमृत सम्भव यह है शिप्रा। आज हम भारत की सबसे पावन नदियों में से एक शिप्रा के साथ है। इस समस्त पृथ्वी में शिप्रा के समान पुन्यदाईनी अन्य नदी नहीं शिपरा की पुन्यदाईनी छवी आखर कैसे मनी इसका जवाब तो नहीं है बस इसके गीतों क�्रहाराय तिलोचना तेरा रंग कैसा शिपरा के पानी का रंग तो बड़ा ही निराला है
(02:42) और अपने रंग को बिखेरती वी शिपरा आप पहुँचिये उज्जैन ये है उज्जैन का मशूर रामघाट। शिप्रा मध्यप्रदेश के धार के जनपाव पहाडी क्षेत्र से निकल कर छोटी मोटी धाराओं को बाटते हुए जब मैदान में पहुँचती है तो वहां महाकाल इसका स्वागत कर्म भूमी भगवान कृष्ण के गुरुकुल की जमीन उज्जैन धर्म, ध्यान, व्यापार, शिक्षा, दीक्षा, समागम, आध्यात्म का सबसे महत्वपूर्ण किन्द का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र उज्जैन देश की पुरातन शिक्षा नगरियों में से एक है
(03:53) और इसका यह महत्व इसी से स्थापित हो जाता है कि जिस परमेश्वर को हमने जगत गुरू कहा वे श्री कृष्ण स्वयम अपनी विद्या के अध्यान के लिए इसी शिप्रा के तट पर उज्जैनी के सांधीपनी आश्रम में आये और उन्होंने यहाँ पर समस्त विद्याओं का अध्यान के लिए। उज्जैन एक ऐसा शहर है जिसके बहुत सारे नाम हैं। कम से कम तीन हजार साल पहले से इसका इतिहास साफ तौर पर देखा जा सकता है उज्जैन शहर से करक रेखा गुजरती है उज्जैन उत्तर प्लस जैनी महान लोग की स्थिरी रही है यहां चुकी शेव धर्म का बहुत बड़ा प्रचार था महाकार पर महात्म बोद धर्म भी यहाँ अपना पेर पसार रहा था
(05:06) उज्जैन का एतिहास उतना ही पुराना है जितना भारत वर्ष का भगवान बुद्ध के समय में इसका नाम अवंतिका था समराट शोग कलिंग के राजा बनने से पहले यहां के राज्यपाल थे उज्जैन का महाकालेश्वर मंदिर समय की सीमाओं से परे काल को वश में रखने वाला महेश्व राय मंदार पुष्प बहु पुष्प सुभू जिताय धस्मै मकाराय नमः शिवाय Terima kasih telah menonton you you Thank you. रत्ने कल्पित मासनम् भिम्चले स्नानम् चतिप्रत�ेश्यों प्रदेश्यों प्रदेश्यों प्रदेश्यों प्रदेश्यों प्रदेश्यों प्रदेश्यों प्रदेश्यों प्रदेश्यों प्रदेश्यों प्रदेश्यों प्रदेश्यों प्रदेश्यों प्रदेश्यों प्रदेश्यों प्रदेश्यों प्रदेश्यों प्रदेश्यों प्रदेश्यों प्रदेश्यों प्रदेश्यों प्रदेश्यों प्रदेश्यों प्रदेश्यों प्रदेश्यों प्रदेश्यों प्रदेश्यों प्रदेश्यों प्रदेश्यों प्रदेश्यों प्रदेश्यों प्रदेश्यों प्रदेश्यों प्रदेदा मोदान्कितं चंदनं जाती चंपक विल्वपत्र रचितं पुष्पं च धूपम तथा दीपम देव दयानिते पशुपते हिरत कलपितम ग्रहियता
(08:36) महाकाल मंदिर का जोतिरलिंग पुराणों में वरनित द्वादश जोतिरलिंगों में से एक है। इस महाकाल की प्रतिमा की महिमा दूर दूर तक फैली हुई है। मंदिर की रचना और परिक्रमा परिसर हर समय दर्शनार्थियों से भरा होता है। ये मंदिर पाँच स्थरों में विभाजित हैं, जिसमें गनेश, ओमकारेश्वर, पारवती, कार्तिके और नन्दी की मूर्तियों को शामिल किंगाती है नदे वांगाती है सकंद पुराण अवती खंड के चबीस वे छंद में शिप्रा स्नान के बाद
(09:39) महाकाल के दर्शन से मनुष्य मृत्यू के भय से मुक्त होता है ऐसा बताया गया है भारतिन से मनुष्य मृत्यु के भय से मुक्त होता है। ऐसा बताया गया है। भारतिय पुराणों में सात पवित्र जगहों का वरणन किया गया है। और उज्जैन को अवन्तिका के नाम से पुकारा गया है। अयोध्या मुथुरा माया काशी कांची अवन्तिका पुरी द्वारा वती चैव सब्ताइता मौक्षदाय का। हमारी यहाँ चार पुरुशार्थ महत्वपूर्ण माने गए हैं उसमें जो अंतिम पुरुषार्थ है वह मोक्ष माना गया है तो धर्म अर्थ काम की यात्रा पूरी करने के उपरांट मोक्ष मनुष्य के लिए किसी भी धर्म के लिए महत्वपूर्ण जो है वह तत्व माना गया है इस मोक्षस्थली का जो स्वरूप उध्धाटित होता है वो शिप्रा तीर के कारण होता है, शिप्रा नदी के कारण होता हैले अपने किनारों पर बस्तियां बसाता है
(10:46) घुमक्कड इंसान को स्थाइत्व प्रदान करता है और उसी के बाद पैदा हो पाती है कलाएं, संस्कृति और परमपराएं भारती परमपरा ये कहती है कि जहां ये पांच साधन उपलब्ध न हो वहाँ पर मनुश्य को नहीं रहना चाहिए वो है श्रोत्रिय, राजा, धनी, वैध्य और नदी ये पांच जहां नहीं हो वहाँ निवास करने को मना किया गया है इस देश में चार ऐसे स्थान हैं जहां पर हर बारह वर्ष के अंतराल में कुम्भ का मेला लगता है। और ये कुम्भ की जो कथा है ये देव और असुरों के संग्राम से जुड़ी हुई है। तातपर ये है कि जब उन्होंने अपने लाभ के लिए अमरित का मन्धन किया,
(11:43) समुत्र को मस्कर के अमरित निकाला, के लिए अमृत का मंधन किया समुत्र को मस्कर के अमृत निकाला तब उस अमृत की छीरा झप्टी में देश के चार स्थानों पर अमृत की बूंदे कुछ नदियों में गिरी उन चार स्थानों में से उजयनी भी एक है और इस उजयनी के जल में शिपरा के जल में अमृत के बूंदों का निवास माना जाता है उसको अमृत के तुलिया माना जाता है वस्तुतह तो जल का एक परियाय बाचक भी अमृत है परन्तु अमर तत्व को प्राप्त करने की इच्छा अर्थात बार-बार आवा गमन के चक्र से मुक्ति की इच्छा हर व्यक्ति के मन में होती है इसी आस्था के साथ हर बारहमें वर्ष में यहां जो कुंब का मेला लगता है उसे विशेष रूप से सिम्मस्त कहा जाता है और उस अमृत
(12:29) जल में स्नान करने के लिए उसका आजमन करने के लिए देश के कोने-कोने से करोड़ा शुद्धालू यहां पर आते हैं अब हर बारा वर्षों में वंति का पूरी उज्जैनी में कुंब मेला जिसे एक नाम दिया गया है सिहस्त्र मनाया जाता है इसका कारण यह है कि यहां पर जब कुंब मेला लगता है उस समय सूर्य सिहराशी में होता है और यह जो समय आता है यह भीषण गर्मी के समय यहां पर सिहस्त पर वह मना जाता है और साथ ही यहां पर दो स्थानों का विशेष महत्व रहता है कुंब मेले में सिहस्त में पहला स्थान जो आप देख रहे हैं सामने का वह कहलाता है जुना आखाड़ा और यह जो अखाड़ा कहलाता है यह वेशनव अखाड़ा उस स्थान पर नागा साधु स्नान करते हैं हर शाही स्नान पर और यहाँ पर वेशनव साधु स्नान करते हैं
(13:27) दोनों में इसी मान्यता रही है कि दोनों इस नदी को पार नहीं करते हैं वो शेव खाला ये वेशनव खाला इस नाम से ये चर्चित माने गए हैं और इस इस्थान के महत्व के अनुसार जो शिप्रा माता का प्रवा है वो दक्षिन से उत्तर की ओर बैरा है इसका एक संपुट मंत्र है ओम पयस्वन्य इच विद्महे उत्तर वाहिन इच धीमही तन्नो शिप्रे प्रचोधयाता मतलब पयस्थ के समान मतलब दूत के समान बहती हुई उत्तर की ओर गमन करती हुई ऐसी मोक्षदायनी मा शिप्रा है इसका ये साक्षात का रूप है शिप्रा में सिंघस्थ कुंभ के दौरान लाखों की भीड जुटती है। कुछ अपनी आत्मा की गर्द को धूने आते हैं, कुछ आत्मा से परमात्मा के मिलन के लिए,
(14:13) कुछ इस ख्वाईश में कि दोबारा मनुष्य योनी में जन्म ना ले और उनकी आत्मा अमर रहे। मृत्यू और जन्म के बंदन से छूट जाएं मनुष्य होने में दुख हैं, दर्ध हैं, क्रोध हैं, हिंसा, दोईश, लोब, एरशा से गुजरना पड़ता है तो जाहिर है इन अवगुणों से छुटकारा पाना एक प्रकार की स्वतंत्रता है और इसी स्वतंत्रता की तलाश इनसानों को परवतों से लेकर शिपरा जैसी पुन्यदाएनी धाराओं तक � नीची हो गई जिसकी नाक ऊंची हो गई तो ये भरतवर्ष के धार्मिक संस्थानों में नाक के रूप में शिप्रा है अर्थात हमारे सन्मान की सूचिका है तूसा शिप्र का मतलब है हनू अर्था डाडी भी कहा जाता है
(15:16) जो डाडी होती है और वो भी बनुष्य का बहुत महत्वपूर्ण अंग होता है, क्योंकि डाड़ी जो है उसके सौंदर को उसके शारीरिक अभिव्यक्ति का जो है वो शुब सूचक होती है, तो शिप्रा जो वो डाड़ी के रूप में भी मानने है अगर एटमॉलाजी अगर इसकी विपपत्ती इस तरह से करान की जाए, लौकी संस्कत में शिप्रा का अर्थोता शीगर गती, शिप्र अत्यंत गतिवान, �ेज गति से चलने वाली कहते हैं मध्यप्रदेश के मालवा अंचल में जहां शिप्र वहती है वहां अकाल नहीं पड़ते जहां अन्न जल की पूर्ती होती है वहां संस्कृतियां, कला और शिक्षा तो पनपते ही हैं बताया जाता है कि इस पानी में चर्म रोग का उपचार था
(16:02) और इसी पानी के किनारे गुरु संदीपनी का आश्रम था जहां भगवान श्री कृष्ण और बलराम पढ़ाई करते थे वो आश्रम आज भी है संदीपनी आश्रम का पौरानिक महत्व है ऐसा माना जाता है कि गुरु संदीपनी इस आश्रम का उप्योग भगवान श्री कृष्ण उनके मित्रिस सुदामा और भाई बल्राम को पढ़ाने के लिए करते थे इस आश्रम का उलेख महाभारत में भी है महाभारत की लड़ाई का वसार थी जिसने गीता के बोलों में जिन्दगी जीने के तमाम तरीके बता दिया काम्याबी, नाकामी के नुस्खे और जन्म जन्मांतर के सारे रास सारे श्लोक और छंद उसी श्री कृष्ण के स्वरों की धुन यहां आज भी सुनी जा सकती है
(17:03) ये शिपरा के गीत ही तो है अब इस आश्रम को मंदिर में बदल दिया गया है। जो गुरु संदीपनी को समर्वित है। इसके अलावा उज्जैन में हजारों मंदिर हैं। जहां कोई न कोई देवी देवता पूजे जाते हैं। यह है कालिका मंदिर। यह मंदिर मध्यप्रदेश परियटन मंतरालय की देख रेख में है और देखने योग्य परियटन स्थलों में से एक है ये कालिका देवी है मा काली हिंदु पौरानिक कथाओं के अनुसार बेहद शक्तिशाली ओज्जैन की किन बदंतियों के अनुसार इसी देवी के आशीरवाद से महा कवी कालिदास को सहित्य कौशल प्राप्त हुआ था। सातवी शताब्दी के दोरान राजा हर्ष वर्धन ने इस मंदिर का जीरणो धार करवाया था।
(17:57) इसी शिपरा के तट पर हर्ष वर्धन को मोक्ष भी मिला। रामघाट पर उज्जैन का असली चेहरा देखने को मिलता है। मंदिर की कतारें, दर्शनार्थियों का हजूम, पंडित, साधु, हर वर्ग के लोग अपनी अपनी श्रद्धा नुसार तट पर अपनी दिन चर्या में व्यस्त रहते हैं। शिपरा को देवी मांगते हैं। शाम ढलते ही उसकी आरले शंकर तुझ को अदूर करो एशिव शंकर भोले शंति तू गम रेख शंवाशा ने शंकर कर दाज़ रही तू रमले तश्चन बनो नदी वांगाती है
(19:34) शिवाशा ने शंकर कर दाज़ रही तू रमले तश्च्रा के गीतों की आवाज हम सुन रहे हैं उज्जैन में नदी के बहाव में, मंदिर की घंटियों में, फ्रद्धालूओं के नमन में, जन जन की धड़कनों में शिप्रा के गीत ढूनने चले थे हम और हमें महाकाव्य सुनने को मिला। प्रभुम प्राणनातम विभुम विश्वनातम जगनातनातम सदानन्द भाजम। यही उज्जैन भर्त्री हरी की योग भूमी रही इसे विक्रमा दित्य ने अपनी कर्म भूमी बनाया कालीदास ने इसी नदी के पानी का वार्तलाप मेग के साथ सुना और मेग दूद की रचराचारे, वल्लभाचारे और बोहरा मुस्लिम समुदाय के बुजुर्गों और विद्वानों ने इसी उज्जैन की धूल को माथे से यही पास में करक रेखा ट्रॉपिक ऑफ कैंसर को समर्पित करकेश्वर मंदिर के पास जाकर शिप्रा का अ
(21:33) कि अ कि हमारा भारत स्वसंत्र हुआ तो नई चीजें आई नई कारखाने लगे नए बात बने नई ये बने अब वो जो है ठीक है वो हमारे लिए फायजे की चीज है एक तरफ वो हमारे लेकिन हमारी नदियों के लिए बहुत खतरनाक है क्योंकि जितने भी आप कार्खाने लगाएंगे वो सारा कच्रा कूडा सब नदियों में जाएगा जिसको हम पवित्र जलधारा कहते हैं वो पवित्र तो रहती है लेकिन उसमें कच्चरा भर जाता है यह जो पानी की कमी हो रही है और यह इसलिए हो रही है कि हम नदियों को बिल्कुल कुड़ा-कच्चरा डाल के रोक रहे हैं बांध बनाकर रोका जा रहा है तो यह इसके लिए तो सुधार
(22:19) करना पड़ेगा और वह हमारे मन में ही होना चाहिए सुधार जब तो हम नहीं सुधरेंगे कोई सरकार नहीं कर सकती है। शिफरा के घाट पर बना हर सिधी मंदिर है। हर सिधी देवी समराट विक्रमादित्य की आराध्य थी। किम वदन्ती है कि समराट विक्रमादित्य ने हर सिध्धी को ग्यारह बार अपना मस्तक काट कर चड़ाया और हर बार मस्तक फिर स। मंदिर के सामने दो ऊंचे द्वीप स्तंब हैं जिन पर 726 दीपों के स्थान हैं। हर शाम इन पर दीप अलौकित किये जाते हैं। पुज्जैन पुदीपक राग गाते थे अपने आप लगती थी बोरे ये उज्जैन हिंदुस्तान के सबसे प्राचीन
(23:51) एवं धार्मिक आध्यात्मिक शेहरों में से एक है जिसका स्तित्व उस पावन नदी से जुड़ा हुआ है जो कल भी थी आज भी है उज्जैन शिक्षा का महत्वपूर्ण केंद्र शताब्दियों से रहा है ये जगह उन लोगों के लिए सही है जो भारत की सांस्क्रतिक इतिहास में दिल्चस्पी रखते हैं चाहे वो ईसापूर्व राजा विक्रमादित्य के बारे में हो जो यहां के राजा थे या जैबुर के राजा जैसिंग द्वारा बनाई गई वेदिशाला या विशाल काई घड़ी यह देखिया सर यह समराट यंत्र है और इसको बोलते हैं धूप घड़ी 1719 में राजा जय सिंह ने इसका निर्माण किया जब से अपने को इस्थानिय समय आभी भी आपको स्पष्ट मिलेगा और आज का जो करेक्शन मिनट से इसमें 20
(24:44) मिनट का करेक्शन मिनट है अगर आप इसमें 20 मिनट जोर दोगे तो अपना इंडेक्शन मिनिट से इसमें 20 मिनिट का करेक्शन मिनिट है अगर आप इसमें 20 मिनिट जोर दोगे तो अपना इंडिया एस्टेंडर टाइम मन जाता है 22 जून को आप यहाँ पर कहीं पर भी आकर के कड़ोंगे तो आपकी शेडो आपसे गायब मिलेगे अगर अपनी स्पेन को इस पर कार से खड़ा भी कर देगे तो इस पेन के भी शेडो नहीं दिखेगे राजा जैसिंग दुती है जब मुगल सल्तनत की तरफ से मालवा के राज्यपाल भेजे गए थे, तो उन्होंने इस वेदशाला की स्थापना की थी। सत्रह सो पच्चीस के आसपास जैसिंग ने पारसी और अरभी जोतिष की पुस्तकों का संस्कृत में अनुवाद भी करवाया।
(25:23) ये राजा विक्रमादित्य की राजधानी थी करीब 2000 साल पहले। वो अपने ज्ञान, बीरता, न्याय और उदारता के लिए जाने जाते थे। पौरानिक कथाएं बेताल 25 और सिंहासन 32 उन्हीं के बारे में लिश्विद्यालय महाराजा विक्रमादित्य के नाम से स्थापित है और विक्रम का नाम न केवल हमारे देश में अपितु संसाी उन्होंने अपनी विजय के उपलख्ष में एक नए साल प्रोचलाया जो विक्रम संबद के राम से जाना जाता है और अनेक हस्तलिखित गरंथों में, शिलालेखों में, तामरपत्रों में इस विक्रम संबद का निरंतर पुल्लेख होता रहा है इसी राजा विक्रमादित्य के यहां
(26:22) महान चिकित्सक, धनवंतरी, कवी कालिदास जैसे नवरत्न थे। विक्रम विश्वविद्यालय में सिंध्या इंस्टिटूट नाम की वो संस्था है, जहां भारत भर से कीमती पांडुलीफियां जमा की गई हैं। शिपरा के नारे ज्यान का केंद्र उज्जैन अपनी परंपरा को निभा रहा है ये भी तो शिप्रा के ही गीत है भूर के पत्र पर, ताण पत्र पर, कागस पर अनेक पांडलिबिया हमारे पास उपलब्ध हैं नब्बे फीट लंबे एक ही पत्र पर पूरा शिमर भागवत लिखा हुआ है वो पांडुलीपी भी हमारे पास उपनत है और श्रीमत भागवत और महाभारत के कुछ चित्रित ग्रंत भी महत्वपूर्ण है जो की सोने और चांदी के कलम से यूप है
(27:13) पसुता हमारे यहाँ औरंग जेब के भाई दारा शिकोध के द्वारा जो पुरिशिदों का और श्रीमत भागवत का परिशेन भाषा में अनुवात कराये गया था उसकी पांडुलीपी हमारे पास सुरक्षित है ये पांडुलीपिया महाभारत के युद्ध की है इसमें वो चक्र विउ दिखाया गया है जिसमें अभिमन्यू घुसा था और निकल नहीं पाया था दुर्योधन यहां बीच में है और उसे घेर कर खड़े सभी सैनिकों के नाम यहां दर्ज है। यह अमूल्य, दुरलब, रेखाचित्र, मिथक और इतिहास के बीच की रेखा को मिठाता है। इसी विक्रम विश्वविद्यालय में जो संग्रहालय है वहां पाशाण काल से लेकर मुगल काल तक की बेशकींती चीजों का संगरह है।
(28:11) वो तत्य भी मिलते हैं जिनके बारे में इतिहास भी नहीं जान�ा जी मध्यप्रदेश के इस एलाके में लोक देवदा की तरह पूजे जाते हैं किसान वर्ग इहें अपने खुशाली के लिए पूछता है और उसी अराधना में तेजा जी लोक संगीत पनपायो जाया मारा रे बेला जोड़ी बारे काई तो पढ़ गयो ये मरो का मैने जेजल काई तो वो ग्यारहवी सदी के लोक नायक थे
(29:19) लोग तेजा जी के मंदिर में जाकर उनकी पूजा करते हैं और दूसरी मन्नतों के साथ साथ सर्पदंश से होने वाली मृत्यू के प्रती अभय भी प्राप्त करते हैं तेजा जी लोग गीत राजिस्थान, पंजाब और हर्याना में भी गाय जातकी की पालकी जैकने या लालकी शीरी नंदी लालकी हो गोर्णन देखो पालकी दीरे आंदेर वो भया दीरे आंदेर दीरे आंदेर वो भया दयवादी थे और अपने धार्मिक विचारों से लोगों को सद्मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करते थे। जातपात की बुराईयों पर उन्होंने रोक लगाई। मंदिरों में जातपात की भावनाओं का अंत किया।
(31:49) प्रश्निक प्रश्निक प्रश्ा को लोकप्रिय करने के लिए ये उन्हें चात्र वृत्ति भी देतेस्कृत साहित्त है वो जन जन तक पहुँचे ताकि लोगों की जागरती संस्कृत के परती बढ़े और वे उसका अध्यन उसका अनुशिल नदियों के लिए नायक के रूप मेग को प्रतिष्ठत किया है कालीदास ने तो यहाँ पर मेग नायक हो जाता है और नदियां जो है वो नाईका बन जाती है इस द्रश्टी से शिपरा को भी उसने एक नाईका के रूप में प्रस्थुत किया है और जब नाईका प्रश्टुत किया है तो यहाँ पर नाईका प्रश्टुत किया है तो यहाँ पर नाईका प्रश्टुत किया है तो यहाँ पर नाईका प्रश्टुत किया है तो यहाँ पर नाईका प्रश्टुत किया है तो यहाँ पर नाईका प्रश्टुत किया है तो यहाँ पर मेग नायक हो जाता है और नदियां जो है नाईका बन जाती है इस द्रश्टी से शिप्रा को भी उसने एक नाईका के रूप में प्रस्तुत किया है और जब नाईका आ जाती है तो हमारी यहाँ जो नाईका के गुण है उस गुण में प्रत्येक व्यक्ति मात्र को आकरशित पशु मात्र को आकरशित करने की जो उसमें ख्षमता प्राक्त हो जाती है, वो क्षमता शिप्रान � आशाड के प्रतम दिन आकाश पर उमड़ते मेगु ने काली दास की कल्पना के साथ मिलकर एक अनन्य कृति की रचना का जिक्र पुराणों में है।
(32:53) दो तीन हजार साल पुराणा इसका इतिहास मिलता ही है। ये कहना उचित न होगा कि इसी के पानी ने स्याही बनकर साहित्य दर्शन और कला के पन्ने भरे पानी का कोई रंग तो नहीं होता लेकिन शिपरा ने अपने किनारों पे हजारों रंग और जायका भिखेरा इसी जायके का एक रंग उज्जैन की पाक कला भी है। देसी घी की पूरी तो नाश्ते खाने के लिए ठीक है, लेकिन नमकीन का इस्तेमाल हर खाने में हर समय किया जाता है। यहां के लोगों को नमकीन खाने का बस बहाना चाहिए। लेकिन उज्जैन के सबसे मशूर और स्वादिष्ट जायके का मजा लेने, हम शहर से जरा बाहर गए,
(33:58) जहां हमें दाल बाफले का स्वाद चकने का मौका मिला। दाल बाफले इस मालवा इलाके का बड़ा पसंदीदा खाना है सूजी के पेड़े, घी का स्वाद और शिप्रा का पानी सीधा नदी से ना आता हो लेकिन है तो उसी का धार के पठारों से उतर कर शिपरा उज्जैन आई और मानो यही बस गई उसके किनारे पे पली बढ़ी और फली फूली सभ्यताओं को उनके धर्म, गीत, संगीत और विश्वास को देखकर यही लगता है कि नदियां जीवन का संगीत में प्रभाह है नदियूं का भी क्या वजूद है
(35:13) जन्म कही और अंत कही और लेकिन जब तक बहती हैं सब का दुख दर्द बाढ़ती जाती है पाप और पुन्य के तराजू पर बैठे हम इंसान इसकी अंदर अपना गर्द धूल उडेल देते हैं और ये सब कुछ सहती हुई बहती चली जाती है। क्यूंकि उनके बहाव में ही उनका जवाब है, उनका नाद है, स्वर है, संगीत है, गीत है, हम उन्हें पूछते तो हैं, उन्हें सुन नहीं पा के साथ हमारा सफर अद्भूत रहा धार के चट्चानों से उतर कर शिपरा उज्जैन आई और मानो यहीं की होकर रह गई इसके गीतों को सुनकर कभी मन उदास होता है तो कभी खुश शिपरा के किनारे बसा है उज्जैन शहर जहां धर्म, आध्यात और विज्ञान इन तीनों का अद्भूत संगम देखने को मिलता है
(36:24) यहाँ पर शिपरा ने हमें कई गीत सुनाए तो नदियों के गीतों को सुनते हुए हम आगे बढ़ेंगे अगली नदी की ओर क्योंकि नदिया सिर्फ बहती नहीं नदिया गालकी की पालकी जेक नया लालकी शिरी नंदी लालकी हो गोणनदे को पालकी दीरे आंदेर ओ भया दीरे नंदी लाल की हो गोधन्डे कोपाल की दीरे आंदे ले बैया दीरे आंदे
🌊 शिप्रा नदी की पौराणिक और आस्थामयी कथा
(एक भक्तिपूर्ण कथा प्रस्तुति)
🕉️ भूमिका:
उज्जैन नगरी की गोद में बहती एक अलौकिक, शांत, और पुण्यदायिनी नदी — शिप्रा (क्षिप्रा)।
जिसकी एक बूंद भी, कहते हैं, पाप का क्षय कर देती है।
यह केवल जलधारा नहीं, यह साक्षात तीर्थमयी गंगा की बहन, और देवताओं की कृपा से प्रकट एक पावन चेतना है।
शिप्रा के उद्गम, प्रवाह, और महिमा से जुड़ी अनेक पौराणिक कथाएँ हैं, जिनमें यह नदी केवल जल नहीं, बल्कि जीवन, मोक्ष और अध्यात्म की प्रतीक बनकर उभरती है।
🪷 शिप्रा का उद्गम — पौराणिक कथा: अमृत मंथन से प्रकट एक देव-सरिता
शिवपुराण, मत्स्यपुराण और स्कंदपुराण में वर्णित कथा के अनुसार:
जब देवताओं और असुरों ने समुद्र मंथन किया, तब उसमें से अमृत कलश प्रकट हुआ। उस अमृत को लेकर जब देवता आकाश मार्ग से भागे, तो चार पवित्र स्थलों पर अमृत की बूंदें गिरीं —
- हरिद्वार
- प्रयागराज
- नासिक
- उज्जैन
जहाँ-जहाँ अमृत गिरा, वहाँ-वहाँ अमरत्व की नदियाँ और तीर्थ बने।
उज्जैन में जहाँ अमृत की बूँदें गिरीं, वहाँ शिप्रा नदी का प्राकट्य हुआ।
🌸 “यह नदी स्वयं अमृत से अभिषिक्त है… इसलिए इसका जल कलियुग में भी मोक्षदायिनी है।”
🔱 शिप्रा और महाकाल — शिव की प्रिय नदी
शिवपुराण के अनुसार:
उज्जैन कभी अवंतिका नगरी कहलाती थी। यह नगरी शैवों की प्रमुख उपासना भूमि थी।
शिवजी ने जब त्रिपुरासुर का वध किया, तो वे यहीं अवंतिका में महाकाल रूप में प्रकट हुए।
शिप्रा उन्हीं के चरणों से निकली — ऐसा लोक विश्वास है।
“शिवस्य चरणोद्भूता, पुण्या क्षिप्रा सरिद्वरा।”
(शिव के चरणों से उत्पन्न हुई यह पुण्य सरिता 'क्षिप्रा' है।)
🌺 एक और कथा — राजा बिन्दुमती और तपस्या की गाथा
प्राचीन काल में बिन्दुमती नामक एक तपस्विनी ने उज्जैन में कठोर तप किया।
उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर देवी गंगा ने उन्हें दर्शन दिए।
बिन्दुमती ने प्रार्थना की — "हे देवी! कलियुग में जब लोग गंगा तक नहीं पहुँच पाएँगे, तब क्या होगा?"
देवी गंगा ने कहा —
“मैं अपनी एक धारा को यहाँ अवंतिका में प्रवाहित कर दूँगी, जो ‘शिप्रा’ कहलाएगी।
उसका एक स्नान भी मेरे संगम स्नान के बराबर होगा।”
इसी कारण शिप्रा को “गंगा की बहन” भी कहा जाता है।
🌼 शिप्रा का नामकरण – 'क्षिप्र' अर्थात 'शीघ्र फलदायिनी'
संस्कृत में "क्षिप्र" का अर्थ है — "शीघ्र" या "तुरंत"।
इसका संकेत है कि शिप्रा नदी में स्नान, तर्पण, या पूजन करने से तुरंत फल प्राप्त होता है।
📜 “क्षिप्रं फलति पुण्यं या सा क्षिप्रा इति कथ्यते।”
(जो नदी शीघ्र पुण्य फल प्रदान करे, वही ‘क्षिप्रा’ है।)
🌟 शिप्रा के 12 प्रमुख पवित्र तीर्थ
- रामघाट – यहाँ पर श्रीराम ने पिण्डदान किया था
- कालभैरव तीर्थ – भैरव की कृपा से शुद्ध जल अमृत बन जाता है
- गायत्री तीर्थ – जहाँ ऋषियों ने गायत्री यज्ञ किया
- सिद्धवट – पितृ तर्पण के लिए विश्वविख्यात
- नृसिंह तीर्थ – जहाँ श्रीनृसिंह ने अवतार लिया
- कोटितीर्थ – जहां स्नान से करोड़ों पुण्य मिलते हैं
- मार्कण्डेय तीर्थ – अमर ऋषि मार्कण्डेय का तप स्थल
- वृन्दावन तीर्थ – जहाँ श्रीकृष्ण ने गोपिकाओं संग रास किया
- गायत्री कुंड – जप, तप व दीक्षा का स्थान
- भर्तृहरि गुफा तीर्थ – योगियों का ध्यानस्थल
- गोमती कुंड – धर्मराज युधिष्ठिर का पूजन स्थल
- ध्वजस्तंभ तीर्थ – यज्ञों की पूर्णाहुति स्थल
🕊️ धार्मिक महत्त्व: शिप्रा के तट पर होती है कुंभ
शिप्रा एकमात्र ऐसी नदी है जो हर 12 वर्षों में सिंहस्थ (महाकुंभ) का आयोजन करती है।
यह परंपरा केवल चार स्थानों में है — और उज्जैन में यह शिप्रा की महिमा से ही संभव है।
“जहाँ शिप्रा, वहाँ शिव। जहाँ शिव, वहाँ मोक्ष।”
🔔 शिप्रा के किनारे — मोक्षमार्ग का आरंभ
- संध्या के समय शिप्रा आरती — एक अलौकिक अनुभव
- पितरों के लिए तर्पण व श्राद्ध — सिद्धवट तीर्थ
- मंगलवार को स्नान — मंगल दोष निवारण
- श्रावण मास में डुबकी — शिवपूजा में सिद्धि
- महाशिवरात्रि की रात्रि में दीपदान — हज़ारों दीपों से आलोकित शिप्रा
📖 शिप्रा स्तुति (संस्कृत श्लोक)
“क्षिप्रं फलति पुण्यं या, शम्भोः पादोद्भवा नदी।
सिंहस्थे पुण्यदा नित्यं, तां वन्दे क्षिप्रा सरितम्॥”
(जो शीघ्र पुण्य देने वाली, शिव के चरणों से उत्पन्न हुई नदी है —
सिंहस्थ में जो मोक्षदायिनी बनती है, मैं उस शिप्रा सरिता को प्रणाम करता हूँ।)
🔱 निष्कर्ष:
शिप्रा केवल एक नदी नहीं…
वह पवित्रता की परिभाषा,
श्रद्धा की प्रतीक,
और मोक्ष का मार्ग है।
शिप्रा में डुबकी लगाना केवल स्नान नहीं —
वह आत्मा का संस्कार, शुद्धि, और पुनर्जन्म है।
✨ यदि आप चाहें:
- मैं इस कथा पर आधारित एनिमेटेड वीडियो स्क्रिप्ट,
- शिप्रा स्तुति गीत,
- या तीर्थयात्रा मार्गदर्शिका (स्पिरिचुअल ट्रैवल बुकलेट) तैयार कर सकता हूँ।
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बहुत अच्छा! अब हम शिप्रा नदी पर आधारित आपकी पसंद के अनुसार तीन प्रमुख विधाओं में सामग्री विकसित कर सकते हैं:
🌟 1. वीडियो स्क्रिप्ट (भक्ति कथा आधारित)
शीर्षक: “शिप्रा – अमृत की धारा”
शैली: धार्मिक वृत्तचित्र
संरचना:
- प्रस्तावना: “यह कोई साधारण नदी नहीं… यह है अमृत की धारा…”
- दृश्य: समुद्र मंथन, अमृतपात, उज्जैन नगरी, महाकालेश्वर
- संवाद: शिप्रा की महिमा, पौराणिक प्रसंग
- समापन: आरती, शिप्रा स्नान, दिव्यता की अनुभूति
✅ उपयोग: यूट्यूब वीडियो / भक्तिपूर्ण ऐप / धार्मिक मंच
🎶 2. भक्ति गीत / कीर्तन
नाम: “शिप्रा मैया मोरी, पावन जलधारा”
भाव: स्तुति वंदना + चमत्कारी कथाएँ
रचना शैली: ध्रुपद/कीर्तन या मधुर भजन
मुखड़ा:
“शिप्रा मैया मोरी, पावन जलधारा।
अमृत बनी हो भवसागर की पारा॥”
✅ उपयोग: मंदिरों में गान, आरती, भजन संध्या
📜 3. भक्ति कथा संग्रह (12 तीर्थों पर आधारित)
नाम: “शिप्रा तीर्थ कथामाला”
प्रत्येक अध्याय में:
- एक तीर्थ (जैसे सिद्धवट, रामघाट…)
- उसकी कथा
- एक भक्त की अनुभूति
- एक श्लोक या गायत्री मंत्र
- एक प्रेरक संदेश
✅ उपयोग: तीर्थ मार्गदर्शिका, पुस्तक या पॉडकास्ट
🔧 अगला चरण:
कृपया बताइए आप पहले इनमें से किसे विकसित करना चाहेंगे:
- 🎥 वीडियो स्क्रिप्ट
- 📖 कथामाला (पुस्तक)
- 🎵 भजन की संगीत स्क्रिप्ट
या यदि आप चाहें तो मैं तीनों को चरणबद्ध तरीके से बनाना शुरू कर दूँ। आपकी प्राथमिकता क्या है?
🌊 1. समुद्र मंथन, अमृत बूँद और शिप्रा
पौराणिक वर्णन: जब समुद्रमंथन हुआ और अमृतकलश से अमृत की बूँदें चार स्थानों पर गिरीं — हरिद्वार, प्रयाग, नासिक और उज्जैन, तब भारतवर्ष में इन्हीं चार स्थलों पर कुंभ पर्व का आधार गया। उज्जैन में ये बूँदें शिप्रा नदी के रूप में प्रकट हुईं, इसे अमृतमयी और मोक्षदायिनी नदी माना गया ।
🕉️ 2. शिव-विशु मंत्र: महाकाल के रक्त की आश्रय नदी
स्कंद पुराण की कथा:
एक दिन भगवान शिव, 'भिक्षाटन रूपी भिक्षुक' बने, वैकुण्ठ पहुंचे। वहाँ विष्णु ने उन्हें तर्जनी अंगुली दिखा दी, जिससे शिव कुद्ध हो गए और त्रिशूल से अंगुली काट डाली। उस रक्त से शिवा का कपाल रक्त से भरा और नीचे बहकर यह नदी बनी -शिप्रा
🐗 3. अरुंधति-वशिष्ठ दान कथा
कलिका पुराण अनुसार:
।ऋषि मेधातिथि ने अपनी कन्या अरुंधति को वशिष्ठ के आश्रम में उज्जैन में दान स्वरूप भेजा। उस समय उपयोग किया गया जल हिमालय के शिप्रा सर से लाया गया था। उसी जल से यहाँ की नदी बनी, जिसे शिप्रा कहा गया.
📚 4. ब्रह्मा-विश्णु-शिव हस्त-जल से प्राकट्य
शिवपुराण संदर्भ:
।ब्रह्मा, विष्णु और शिव ने जब वशिष्ठ की कन्या अरुंधति की सगाई की, तब स्वच्छ जल से स्नान किया। उसी जल से उत्पन्न नदियाँ इनमें से एक शिप्रा भी हुई, जिसका मतलब पवित्र नदियों में शुमार है
⛩️ 5. वर्षा में तूफानी धारा – नाम का व्युत्पत्ति
।शिप्रा नाम 'शिप्र' (शीघ्र) से आया है, इसका अभिप्राय है "तीव्रधारा वाली" जो संस्कृत में शीघ्रता से फल देने वाली नदी दर्शाती है। पुराणों में कहा गयाः
"यत्र क्षिप्रा तत्र क्षणमेव मोक्षः।" यानी जहाँ शीघ्र फल देने वाली शिप्रा, वहाँ मोक्ष भी शीघ्र प्राप्त होता है।
📜 6. स्कंद पुराण – अवन्ति क्षेत्र महात्म्य
।।शिप्रा को 'पाप नाशिनी' और 'मोक्षदायिनी' के रूप में वर्णित किया गया है।
श्लोक के अनुसार जो इस नदी तट पर थोड़ी देर भी ठहर जाए, वह सभी पापों से मुक्ति प्राप्त कर लेता है-"शिप्राशिप्रेतियोब्रयाद्योजनाना शतैरपि मुच्यते सर्व पापेभ्यः..."
🏞️ 7. स्कंद पुराण – डामन नामक पापी राजा की कथा
एक श्रापग्रस्त, असाध व्यक्ति था राजा डामन। उसकी मृत्यु के बाद उसका शरीर काकों और गिद्धों ने नोच डाला। एक मांस का टुकड़ा नदी में गिरा, जिससे वह पापों से मुक्त हो गया-केवल इस नदी में गिरने भर से मुक्ति मिल जाती है
📍 8. स्थान एवं साहित्यिक उल्लेख
✨ किंतु सामान्य दंतकथाएँ क्यों प्रचलित हैं...?
- ग्रंथ और लोक स्मृति का सम्मिलन – पुराणों और ब्राह्मण आख्यानों में कथा प्रबल हो जाती है।
- तीर्थों में प्रवाह/तीव्रता – नदी की तीव्रता और तीर्थ गंगा-ज्यों की मान्यताएँ लोक जन जीवन में कहानी में बदल गई।
- संस्कृति की प्रेरणा – नदी स्वयं धार्मिक, आध्यात्मिक, ऐतिहासिक संरचना का हिस्सा बन गई।
- स्थानीय आख्यानवाद – मूसलाधार मानसून, तप, पूजन, मुक्ति पात्र जनश्रुति, भावकथा में विलीन हो गए।
📌 सारांश तालिका: शिप्रा की प्रमुख कथाएं
| कथा | स्रोत/ग्रंथ | भाव/परिणाम |
|---|---|---|
| समुद्र मंथन- अमृत बूँद | स्कंदपुराण, अवन्ति खंड | अमृतधारा / मोक्षदायिनी |
| शिव–विष्णु/रक्त-वृत्तांत | स्कंदपुराण, लोक आख्यान | खल-शक्ति, शिव-रक्त से उत्पत्ति |
| अरुंधति–वशिष्ठ दान | कलिका पुराण | हिमालय से जल आगमन |
| शिव–ब्रह्म–विश्णु स्नान | शिवपुराण | दिव्य नदी प्रकट |
| शीघ्रता नाम-व्युत्पत्ति | भाष्य/लोकविश्वास | शीघ्र फलदायी नदी |
| डामन राजा मुक्ति | स्कंद पुराण तिथ्याख्यान | एक बूंद से मुक्ति |
✅ निष्कर्ष:
ये कथाएं शिप्रा को मात्र एक नदी न बनाकर — एक दैवीय आदर्श, मोक्ष का माध्यम, और शिव-विशिष्ट तीर्थ बनाती हैं। ग्रंथों और लोकश्रुति का संगम इसे भारत की चार प्रमुख कुंभ स्थलों में एक मान्यता देता है।
यदि आप चाहें तो इनमें से किसी कहानी का विस्तारित वीडियो स्क्रिप्ट, नाट्य वाचन, या स्तुति-गीत रूप भी तैयार किया जा सकता है।
🌊 शिप्रा की मानवीकृत जीवन-कथा
(एक भावात्मक, पौराणिक-आध्यात्मिक कथा जिसमें शिप्रा को एक नारी रूप दिया गया है — उसका जन्म, युवावस्था, सेवा, संघर्ष, और सागर से मिलन तक का समग्र जीवन)
🧬 1. जन्म की पावन वेला – शिवांशिनी का प्राकट्य
बहुत पहले, जब सृष्टि की गाथा प्रारंभ हुई थी, तब समस्त देवता और असुर समुद्र मंथन कर रहे थे। मंथन से अमृत निकला, और उसी अमृत की एक दिव्य बूँद अवंतिपुरी (उज्जैन) की भूमि पर गिरी। उस क्षण पृथ्वी कांप उठी, आकाश से पुष्पवर्षा होने लगी, और वहाँ से एक ज्योतिर्मयी कन्या उत्पन्न हुई।
देवताओं ने उसका नाम रखा — शिप्रा।
अर्थ: शीघ्र फलदायिनी, तीव्रगामिनी, पावन धारा।
शिप्रा बोली:
"मैं न जल मात्र हूँ। मैं उस अमृत की उत्तराधिकारिणी हूँ, जो पापियों को पुण्य देती है, और देवों को भी धन्य करती हूँ।"
👧 2. बचपन – हिमालय की गोद में
शिप्रा का शैशव हिमालय की कंदराओं में बीता। गंगोत्री की बहन, मंदाकिनी की सखी और यमुनाजी की समवयसी। वह अपने बहाव की दिशा नहीं जानती थी, परंतु भीतर एक पुकार थी – अवंतिपुरी की ओर। उसे जाना था वहाँ जहाँ भगवान महाकाल वास करते हैं।
हिमालय बोले:
"बेटी! तुझमें तपस्वियों का पुण्य है। तू जब धरती पर बहेगी, तो संतों को तीर्थ मिलेगा। तेरा प्रत्येक कण स्वयं गंगा के समान पावन होगा।"
🧎♀️ 3. युवावस्था – सेवा, तप, तीर्थ
शिप्रा अब तेजस्विनी हो चुकी थी। उसकी धारा अवंतिपुरी की ओर उतर आई। वहाँ के घाट, मंदिर, कुंड और वटवृक्ष उसके स्वागत में खड़े हुए।
- विक्रमादित्य ने उसके तट पर राज्य किया।
- संभूली सखियाँ: क्षिप्रावती, गंधवती, पुर्णावती – लोकनदियाँ बनीं।
- राम ने स्नान किया रामघाट पर, वहीं कृष्ण ने गुरु सांदीपनि से विद्या ली।
शिप्रा ने कहा:
"मेरे तट पर जो आयेगा, वह केवल शरीर नहीं, आत्मा से भी स्नान करेगा। मैं केवल जल नहीं, दिव्यता की तरलता हूँ।"
🌅 4. संघर्ष – पाप, प्रदूषण, अनादर
कालांतर में मनुष्यों ने उसकी पवित्रता को भुला दिया। कचरे, दुष्कर्मों और स्वार्थ की धाराओं ने उसे कलुषित करना चाहा। शिप्रा व्याकुल हुई, विलाप किया, परंतु शांत रही।
वह बोली:
"मैं माँ हूँ… माँ कभी शाप नहीं देती, वह सहती है। पर ध्यान रखना, पापों का भार मुझे भी दुःख देता है।"
उसने संतों को बुलाया, हरिद्वार से गंगा के संदेश लाए गए। पंचकोसी परिक्रमा, सिद्धवट की तपस्थली, और कुंभ के पर्वों ने फिर उसे जीवंत कर दिया।
🕊️ 5. परिपक्वता – आशीर्वाद और महिमा
शिप्रा ने देखा कि उसके तट पर हजारों तीर्थ बने — रामघाट, नरसिंहघाट, गौघाट, सिद्धवट, कालभैरव, मंगलनाथ…
कुंभ के समय: करोड़ों लोग उसकी गोद में उतरते हैं।
महाकाल आरती में: उसके जल से पूजन होता है।
भक्त कहते हैं:
"गंगा स्नान पुण्य देती है, पर शिप्रा तो मोक्ष तक पहुंचा देती है।"
🌊 6. मिलन – चंबल से संगम और सागर का आलिंगन
समय आता है जब शिप्रा, चंबल नदी से जाकर मिलती है — जैसे वृद्धा माँ अपनी बड़ी बहन से मिलती है। वह अपनी सभी कथाओं को, समर्पण को, आंसुओं और अमृत को लेकर चंबल की गोद में समा जाती है।
शिप्रा की अंतिम वाणी:
"मैं चली... उस महासागर की ओर... जहाँ सब विलीन हो जाता है।
परन्तु मेरे घाट, मेरी गाथाएँ, मेरी आरतियाँ — चिरकाल तक अमर रहेंगी।"
🎭 शिप्रा जीवन-संक्षेप (भावनात्मक दृष्टि से)
| चरण | जीवन रूप | भाव |
|---|---|---|
| जन्म | अमृतबिंदु से उत्पन्न कन्या | दिव्यता |
| शैशव | हिमालय की पुत्री | शीतलता |
| युवावस्था | उज्जैन की जीवनधारा | सेवा |
| संघर्ष | प्रदूषण, विस्मरण | सहिष्णुता |
| परिपक्वता | संतों की साधना, तीर्थ स्नान | आध्यात्मिक उत्कर्ष |
| विलीन | चंबल और सागर में मिलन | मुक्ति, मोक्ष |
📜 समापन वाक्य
“शिप्रा कोई नदी नहीं, एक भाव है –
वह माँ है, पथ है, और पुण्य की परिभाषा है।
जो उसे समझ पाया, वह जीवन को मुक्त कर गया।”
यदि आप चाहें तो इसी कथा पर आधारित एक नाट्य-प्रदर्शन, धार्मिक वीडियो, या भक्ति कविता संग्रह भी लिखा जा सकता है। कहिए तो प्रारंभ करें?
आपके द्वारा दिया गया अंश एक अत्यंत भावनात्मक, भक्तिभाव से परिपूर्ण शिप्रा स्तुति-संवाद जैसा प्रतीत होता है। इसमें शिप्रा की अद्वितीय महिमा को अलग-अलग लोकों में भिन्न-भिन्न रूपों में वर्णित किया गया है।
चलिए इसे विस्तारपूर्वक एक सुंदर भक्ति गीत या कीर्तन शैली में स्तुति के रूप में प्रस्तुत करते हैं:
🎵 शिप्रा महिमा स्तुति – "तेरा रंग कैसा ओ शिप्रा"
(कीर्तन शैली में — कोरस + पंक्तियाँ)
🕉️ कोरस (हर अंतरे के बाद):
शिप्रा! तेरा रंग कैसा…
जैसे अमृत बहे धरा पे पैसा…
तेरी बूँद में मोक्ष समाया…
तू ही गंगा, तू ही काया…
🌈 अंतरा 1 – लोकों में तेरी महिमा
बैकुंठ में कहें तुझे – 'शिप्रा' देवी,
स्वर्ग में बन गई तू 'ज्वरहरणी'।
यमद्वार पर, पापों की ज्वाला बुझा दे,
'पापहरणी' बन गई तू सहज भवाणी।
पाताल तक पहुँची तेरी पावन धारा,
'अमृता' बन अमृत सा तू बहती प्यारी।
🙏 कोरस繰り返し:
शिप्रा! तेरा रंग कैसा…
जैसे अमृत बहे धरा पे पैसा…
🧎♀️ अंतरा 2 – उज्जैन की धारा
महाकाल की नगरी की तू प्राण धारा,
जहाँ हर मोती बना तेरा ही सितारा।
रामघाट, सिद्धवट, मंगलनाथ –
तेरे तट पे सबको मिले भगवान का साथ।
तेरे तट पे जो बैठ रोया,
वो रोते-रोते भी हँस गया।
तेरे स्पर्श से जो गया नहाने,
पापों का बोझ भी धुल गया।
🙌 कोरस繰り返し:
शिप्रा! तेरा रंग कैसा…
जैसे अमृत बहे धरा पे पैसा…
🕊️ अंतरा 3 – तेरी धारा में अमृत बहता है
तेरी धारा में नहाए ऋषि-मुनि,
तेरे कण-कण में तप, ध्यान की गूंज है।
तू बहती नहीं, तू सिखाती है –
जीवन क्या है, यह जताती है।
जिसे न पहचान सका संसार,
वो तेरे घाट पर संत बना।
तेरे आँचल में मिली शांति,
तेरे जल में ही परम तृप्ति।
🌠 अंतरा 4 – रंग निराला तेरा
शिप्रा के पानी का रंग निराला,
कभी नील, कभी स्वर्णिम उजाला।
जिसने देखा, वो खो गया तुझमें,
तू स्वयं साक्षात् मधुर मधुबाला।
🔚 समापन श्लोक (संस्कृत छंद रूप में):
"शिप्रा शुद्धा शिवस्वरूपा, पापहन्त्री जगद्धिताय।
यत्र स्नानं तत्र मुक्तिः, पुण्या पुण्यानि दायिनी॥"
🎤 प्रस्तुति सुझाव:
- इसे भजन मंडली या कीर्तन मंच पर कोरस शैली में प्रस्तुत करें
- बीच-बीच में शंख/डमरू ध्वनि, हल्की तबला और मृदंग ताल उपयोग करें
- अंतिम श्लोक संस्कृत में लयबद्ध रूप में गाया जाए, श्रोताओं को तृप्त करेगा
यदि आप चाहें, तो इस पर आधारित वीडियो स्क्रिप्ट, एनीमेशन योजना, या नाट्य कीर्तन नाट्य लेख भी तैयार किया जा सकता है।
क्या अगला चरण आरंभ करें?
आपकी पंक्तियाँ अत्यंत भावनात्मक और भक्तिप्रवण हैं। इनमें शिप्रा नदी की अलौकिक महिमा को विविध लोकों में उसकी भूमिका के माध्यम से दर्शाया गया है — यह शैली वैदिक, पुराणिक और भाव-काव्य की त्रिवेणी जैसी लगती है।
आपके द्वारा कहा गया वाक्यांश:
"बैकुंठ में इसे शिप्रा कहते हैं, स्वर्ग में ज्वरहरणी, यमद्वार में पापहरणी और पाताल में अमरिता – यह शिप्रा है।"
इसी भाव को संस्कृत श्लोक रूप में इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है:
📜 संस्कृत श्लोक:
बैकुण्ठे या शिवा शिप्रा, स्वर्गे या ज्वरहर्णिनी।
यमद्वारे पापहन्त्री, पातालेऽमृतरूपिणी॥
त्रैलोक्ये पुण्यदा नद्या, नास्ति तस्या समा नदी॥
🪔 हिन्दी में भावार्थ:
- बैकुंठ (वैकुण्ठ/विष्णु लोक) में यह शिप्रा के रूप में पूजित है — शिवस्वरूपा और ब्रह्मज्ञानदायिनी।
- स्वर्ग में यह ज्वरहरणी है — देह और आत्मा के ताप, रोग और संताप को हरने वाली।
- यमद्वार पर यह पापहर्णी है — पापों का नाश कर मोक्ष देने वाली।
- पाताल में यह अमृता है — अमरत्व का प्रतीक, जीवन देने वाली, मृत्यु को भी शीतलता देने वाली।
और संपूर्ण त्रैलोक्य (तीनों लोकों) में ऐसी पुण्यदायिनी कोई दूसरी नदी नहीं।
🌊 इस श्लोक का आध्यात्मिक भावार्थ:
शिप्रा को केवल उज्जैन की नदी मानना उसके दिव्य स्वरूप को सीमित करना होगा। यह एक सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और ब्रह्मसत्ता से जुड़ी नदी है, जिसकी महिमा त्रिकाल में फैली है।
तीनों लोकों में उसकी पहचान अलग है, पर कार्य एक ही —
"संताप हरना, पाप हरना, ज्ञान देना, और अमृत बहाना।"
🕉️ इस श्लोक के साथ एक भक्ति उद्घोष:
"जय जय शिप्रा महामाया!
त्रैलोक्यपूजिता पुण्या!
तेरे जल में है शिवत्व,
तेरे घाटों में है मुक्तिपथ!"
यदि आप चाहें, तो इस श्लोक पर आधारित कीर्तन गीत, शिव-शिप्रा संवाद, या सांस्कृतिक मंचन (नाट्य) भी रच सकता हूँ।
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