शिव उपासना
🌹// श्री शिव उपासना //🌹
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// श्रीशिव-पञ्चनामानि //
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ॐ सद्योजाताय नमः ।
ॐ वामदेवाय नमः ।
ॐ अघोराय नमः ।
ॐ तत्पुरुषाय नमः ।
ॐ ईशानाय नमः II ५ II
II इति शिवपञ्चनामानि II
🌹// श्रीशिवाष्टनामानि //🌹
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शिवो महेश्वरश्चैव रुद्रो विष्णुः पितामहः ।
संसारवैद्यः सर्वज्ञः परमात्मेति चाष्टकम् ॥
शिवाय नमः । महेश्वराय । रुद्राय ।
विष्णवे ।पितामहाय । संसारवैद्याय ।
सर्वज्ञाय । परमात्मने नमः ।
II इति शिवाष्टनामानि समाप्ता II
🌹// श्रीशिव द्वादशनामस्तोत्रम् //🌹
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प्रथमस्तु महादेवो द्वितीयस्तु महेश्वरः
तृतीयः शङ्करो ज्ञेयश्चतुर्थो वृषभध्वजः॥१॥
पञ्चमः कृत्तिवासाश्च षष्ठः कामाङ्गनाशनः।
सप्तमो देवदेवेशः श्रीकण्ठश्चाष्टमः स्मृतः॥२॥
ईश्वरो नवमो ज्ञेयो दशमः पार्व्वतीपतिः।
रुद्र एकादशश्चैव द्बादशः शिव उच्यते॥३॥
द्वादशैतानि नामानि त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नरः।
कृतघ्नश्चैव गोघ्नश्च ब्रह्महा गुरुतल्पगः॥४॥
स्त्रीबालघातकश्चैव सुरापो वृषलीपतिः।
मुच्यते सर्व्वपापेभ्यो रुद्रलोकं स गच्छति॥६॥
॥ इतिश्री स्कन्दपुराणे श्रीरुद्रद्वादशनामस्तोत्रं समाप्तम् ॥
🌹// श्रीशिव द्वादशनामानि //🌹
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महादेवो महेशानः शङ्करो वृषभध्वजः ।
शूलपाणिः कामहन्ता श्रीकण्ठः पार्वतीप्रियः ।
ईश्वरश्च शिवो रुद्रो देवदेवश्च द्वादश ।
ॐ महादेवाय नमः । ॐ महेशानाय नमः ।
ॐ शङ्कराय नमः । ॐ वृषभध्वजाय नमः ।
ॐ शूलपाणिने नमः । ॐ कामहन्त्रे नमः ।
ॐ श्रीकण्ठाय नमः । ॐ पार्वतीप्रियाय नमः ।
ॐ ईश्वराय नमः । ॐ शिवाय नमः ।
ॐ रुद्राय नमः । ॐ देवदेवाय नमः । १२
II इतिश्री शिव द्वादशनामानि समाप्ता II
🌹// II श्रीशिव प्रातःस्मरण स्तोत्रम् II //🌹
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ॐ अथ शिवप्रातःस्मरणस्तोत्रम् ।
प्रातः स्मरामि भवभीतिहरं सुरेशं
गङ्गाधरं वृषभवाहनमम्बिकेशम् ।
खट्वाङ्गशूलवरदाभयहस्तमीशं
संसाररोगहरमौषधमद्वितीयम् ॥ १॥
प्रातर्नमामि गिरिशं गिरिजार्धदेहं
सर्गस्थितिप्रलयकारणमादिदेवम् ।
विश्वेश्वरं विजितविश्वमनोऽभिरामं
संसाररोगहरमौषधमद्वितीयम् ॥ २॥
प्रातर्भजामि शिवमेकमनन्तमाद्यं
वेदान्तवेद्यमनघं पुरुषं महान्तम् ।
नामादिभेदरहितं षडभावशून्यं
संसाररोगहरमौषधमद्वितीयम् ॥ ३॥
फलश्रुतिः
प्रातः समुत्थाय शिवं विचिन्त्य श्लोकांस्त्रयं येऽनुदिनं पठन्ति ।
ते दुःखजातं बहुजन्मसञ्चितं हित्वा पदं यान्ति तदेव शम्भोः ॥ ४॥
II इति श्रीशिव प्रातःस्मरण स्तोत्रं समाप्तम् ॥
🌹श्रीशिव नमस्कारः स्तुति हिन्दी अर्थ सहित 🌹
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ॐ नमो हिरण्यबाहवे हिरण्यवर्णाय हिरण्यरूपाय |
हिरण्यपतए अंबिका पतए उमा पतए पशूपतए नमो नमः ||१।।
अर्थ
ॐ, उन देव को नमस्कार है
जो हिरण्यबाहु — स्वर्ण-तेजस्वी भुजाओं वाले हैं;
हिरण्यवर्ण — स्वर्णाभा से प्रकाशित हैं;
हिरण्यरूप — दिव्य स्वर्णमय रूप धारण करते हैं।
जिन्हें ‘हिरण्यपति’ कहा गया है,
जो माँ अम्बिका के पति हैं,
उमा के पति हैं,
और पशुपति — समस्त प्राणियों के स्वामी हैं —
ऐसे शिव को बारम्बार नमस्कार है।”**
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नमः शम्भवाय च मयोभवाय च नमः शङ्कराय च ।
मयस्कराय च नमः शिवाय च शिवतराय च ॥ २॥
अर्थ:-
कल्याण एवं सुखके मूल स्रोत भगवान शिवको नमस्कार है । कल्याणके विस्तार करनेवाले तथा सुखके विस्तार करनेवाले भगवान शिवको नमस्कार है । मंगलस्वरूप और मंगलमयताकी सीमा भगवान शिवको नमस्कार है ।
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ईशानः सर्वविद्यानामीश्वरः सर्वभूतानांब्रह्माधिपति-
र्ब्रह्मणोऽधिपतिर्ब्रह्मा शिवो मे अस्तु सदाशिवोम् ॥ ३॥
अर्थ:-
जो सम्पूर्ण विद्याओंके ईश्वर, समस्त भूतोंके अधीश्वर, ब्रह्म-वेदके अधिपति, ब्रह्म-बल-वीर्यके प्रतिपालक तथा साक्षात् ब्रह्मा एवं परमात्मा हैं, वे सच्चिदानन्दमय शिव मेरे लिये नित्य कल्याणस्वरूप बने रहें ।
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तत्पुरुषाय विद्दाहे महादेवाय धीमहि ।
तन्नो रुद्रः प्रचोदयात् ॥ ४॥
अर्थ:-
तत्पदार्थ-परमेश्वररूप अन्तर्यामी पुरुषको हम जानें, उन महादेवका चिन्तन करें, वे भगवान रुद्र हमें सद्धर्मके लिये प्रेरित करते रहें ।
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ॐ महादेवाय विद्महे रुद्रमूर्तये धिमहि।
तन्नः शिवः प्रचोदयात्॥५।।
“अर्थ
हम महादेव को जानने (समझने) का प्रयास करते हैं,
रुद्रस्वरूप शिव का ध्यान करते हैं।
वह कल्याणमय शिव हमारी बुद्धि को सही मार्ग में प्रेरित करें।”।
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अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्यः सर्वेभ्यः
सर्वशर्वेभ्यो नमस्तेऽस्तु रुद्ररूपेभ्यः ॥ ६॥
अर्थ:-
जो अघोर हैं, घोर हैं, घोरसे भी घोरतर हैं और जो सर्वसंहारी रुद्ररूप हैं, आपके उन सभी स्वरूपोंको मेरा नमस्कार हो ।
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वामदेवाय नमो ज्येष्ठाय नमः श्रेष्ठाय नमो रुद्राय नमः
कालाय नमः कलविकरणाय नमो बलविकरणाय
नमो बलाय नमो बलप्रमथनाय नमः
सर्वभूतदमनाय नमो मनोन्मनाय नमः ॥ ७॥
अर्थ:-
प्रभो! आप ही वामदेव, ज्येष्ठ, श्रेष्ठ, रुद्र, काल, कलविकरण, बलविकरण, बल, बलप्रमथन, सर्वभूतदमन तथा मनोन्मन आदि नामोंसे प्रतिपादित होते हैं, इन सभी नाम-रूपोंमें आपके लिये मेरा बारम्बार नमस्कार है ।
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सद्योजातं प्रपद्यामि सद्योजाताय वै नमो नमः ।
भवे भवे नातिभवे भवस्व मां भवोद्भवाय नमः ॥ ८॥
अर्थ:-
मैं सद्योजात [शिव]-की शरण लेता हूँ । सद्योजातको मेरा नमस्कार है । किसी जन्म या जगत्में मेरा अतिभव-पराभव न करें । आप भवोद्भवको मेरा नमस्कार है ।
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नमः सायं नमः प्रातर्नमो रात्र्या नमो दिवा ।
भवाय च शर्वाय चोभाभ्यामकरं नमः ॥ ७॥
यस्य निःश्वसितं वेदा यो वेदेभ्योऽखिलं जगत् ।
निर्ममे तमहं वन्दे विद्यातीर्थ महेश्वरम् ॥ ९॥
अर्थ:-
हे रुद्र! आपको सायंकाल, प्रातःकाल, रात्रि और दिनमें भी नमस्कार है । मैं भवदेव तथा रुद्रदेव दोनोंको नमस्कार करता हूँ । वेद जिनके निःश्वास हैं, जिन्होंने वेदोंसे सारी सृष्टिकी रचना को और जो विद्याओंके तीर्थ हैं, ऐसे शिवकी मैं वन्दना करता हूँ ।
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त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् ।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ॥१०।
अर्थ:-
तीन नेत्रोंवाले, सुगन्धयुक्त एवं पुष्टिके वर्धक शंकरका हम पूजन करते हैं, वे शंकर हमको दुःखोंसे ऐसे छुड़ायें जैसे खरबूजा पककर बन्धनसे अपने-आप छूट जाता है, किंतु वे शंकर हमें मोक्षसे न छुड़ायें ।
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सर्वो वै रुद्रस्तस्मै रुद्राय नमो अस्तु ।
पुरुषो वै रुद्रः सन्महो नमो नमः ।
विश्वं भूतं भुवनं चित्रं बहुधा जातं जायमानं च यत् ।
सर्वो ह्येष रुद्रस्तस्मै रुद्राय नमो अस्तु ॥११।।
अर्थ:-
जो रुद्र उमापति हैं वही सब शरीरोंमें जीवरूपसे प्रविष्ट हैं, उनके निमित्त हमारा प्रणाम हो ।प्रसिद्ध एक अद्वितीय रुद्र ही पुरुष है, वह ब्रह्मलोकमें ब्रह्मारूपसे, प्रजापतिलोकमें प्रजापतिरूपसे, सूर्यमण्डलमें वैराटरूपसे तथा देहमें जीवरूपसे स्थित हुआ है; उस महान सच्चिदानन्दस्वरूप रुद्रको बारम्बार प्रणाम हो । समस्त चराचरात्मक जगत् जो विद्यमान है, हो गया है तथा होगा, बह सब प्रपंच रुद्रकी सत्तासे भिन्न नहीं हो सकता, यह सब कुछ रुद्र ही है, इस रुद्रके प्रति प्रणाम हो ।
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नमस्ते अस्तु भगवान विश्वेश्वराय,
महादेवाय त्र्यंबकाय त्रिपुरान्तकाय,
त्रिकाग्नी कालाय कालाग्नी रुद्राय,
नीलकंठाय मृत्युंजयाय सर्वेश्वराय,
सदशिवाय श्रीमान महादेवाय नमः ||
|| शांति शांति शांति || ॐ नमः शिवाय || १२।।
अर्थ
नमस्कार हो आपको, हे भगवान विश्वेश्वर —
जो संसार के ईश्वर हैं।
नमस्कार हे महादेव, त्र्यंबक (तीन नेत्रों वाले),
त्रिपुर के संहारक,
तीनों कालों के स्वामी, कालाग्नि जैसे शक्तिशाली रुद्र,
नीलकण्ठ, मृत्यु को भी जीतने वाले,
सर्वेश्वर (सभी के ईश्वर),
सदाशिव (सदा शुभ),
ऐसे श्रीमान महादेव — आपको मेरा बार-बार प्रणाम।”
शांति शांति शांति | ॐ नमः शिवाय ||
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🌹// श्रीशिव ध्यानम् स्तोत्र हिन्दी अर्थ सहित//🌹
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ध्यायेन्नित्यं महेशं रजतगिरिनिभं चारुचन्द्रावतंसं
रत्नाकल्पोज्ज्चलाङ्गं परशुमृगवराभीतिहस्तं प्रसन्नम् ।
पद्मासीनं समन्तात् स्तुतममरगणैर्व्याघ्रकृत्तिं वसानं
विश्वाद्यं विश्वबीजं निखिलभयहरं पञ्चववत्न त्रिनेत्रम् ॥
अर्थ:-
चाँदीके पर्वतके समान जिनकी श्वेत कान्ति है, जो सुन्दर चन्द्रमाको आभूषणरूपसे धारण करते हैं, रत्नमय अलंकारोंसे जिनका शरीर उज्ज्वल है, जिनके हाथोंमें परशु तथा मृग, वर और अभय मुद्राएँ हैं, जो प्रसन्न हैं, पद्मके आसनपर विराजमान हैं, देवतागण जिनके चारों ओर खड़े होकर स्तुति करते हैं, जो बाघकी खाल पहनते हैं, जो विश्वके आदि, जगतूकी उत्पत्तिके बीज और समस्त भयको हरनेवाले हैं, जिनके पाँच मुख और तीन नेत्र हैं, उन महेश्वरका प्रतिदिन ध्यान करना चाहिये ।
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हस्ताभ्यां कलशव्दयामृतरसैराप्लावयन्तं शिरो
द्वाभ्यां तौ दधतं मृगाक्षवलये द्वाभ्यां वहन्तं परम् ।
अङ्कन्यस्तकरद्वयामृतघटं कैलासकान्तं शिवं
स्वच्छाम्भोजगतं नवेन्दुमुकुटं देवं त्रिनेत्रं भजे ॥
अर्थ:-
त्र्यम्बकदेव अष्टभुज हैं । उनके एक हाथमें अक्षमाला और दूसरेमें मृगमुद्रा है, दो हाथोंसे दो कलशोंमें अमृतरस लेकर उससे अपने मस्तकको आप्लावित कर रहे हैं और दो हाथोंसे उन्हीं कलशोंको थामे हुए हैं । शेष दो हाथ उन्होंने अपने अंकपर रख छोड़े हैं और उनमें दो अमृतपूर्ण घट हैं । वे श्वेत पद्मपर विराजमान हैं, मुकुटपर बालचन्द्र सुशोभित है, मुखमण्डलपर तीन नेत्र शोभायमान हैं । ऐसे देवाधिदेव कैलासपति श्रीशंकरकी मैं शरण ग्रहण करता हूँ ।
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यो धत्ते भुवनानि सप्त गुणवान् स्त्रष्टा रजः संश्रयः
संहर्ता तमसान्वितो गुणवतीं मायामतीत्य स्थितः ।
सत्यानन्दमनन्तबोधममलं ब्रह्मादिसंज्ञास्पदं
नित्यं सत्त्वसमन्वयादधिगतं पूर्णं शिवं धीमहि ॥
अर्थ:-
जो रजोगुणका आश्रय लेकर संसारकी सृष्टि करते हैं, सत्त्वगुणसे सम्पन्न हो सातों भुवनोंका धारण-पोषण करते हैं, तमोगुणसे युक्त हो सबका संहार करते हैं तथा त्रिगुणमयी मायाको लाँघकर अपने शुद्ध स्वरूपमें स्थित रहते हैं, उन सत्यानन्दस्वरूप, अनन्त बोधमय, निर्मल एवं पूर्णब्रह्म शिवका हम ध्यान करते हैं । वे ही सृष्टिकालमें ब्रह्मा, पालनके समय विष्णु और संहारकालमें रुद्र नाम धारण करते हैं तथा सदैव सात्त्विकभावको अपनानेसे ही प्राप्त होते हैं ।
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हस्ताम्भोजयुगस्थकुम्भयुगलादुद्धृत्य तोयं शिरः
सिञ्चन्तं करयोर्युगेन दधतं स्वाङ्के सकुम्भौ करौ ।
अक्षस्त्रङ्मृगहस्तमम्बुजगतं मूर्धस्थचन्द्रस्त्रव-
त्पीयूषार्द्रंतनुं भजे सगिरिजं त्र्यक्षं च मृत्युञ्जयम् ॥
अर्थ:-
जो अपने दो करकमलोंमें रखे हुए दो कलशोंसे जल निकालकर उनसे ऊपरवाले दो हाथोंद्वारा अपने मस्तकको सींचते हैं । अन्य दो हाथोंमें दो घड़े लिये उन्हें अपनी गोदमें रखे हुए हैं तथा शेष दो हाथोंमें रुद्राक्ष एवं मृगमुद्रा धारण करते हैं, कमलके आसनपर बैठे हैं, सिरपर स्थित चन्द्रमासे निरन्तर झरते हुए अमृतसे जिनका सारा शरीर भीगा हुआ है तथा जो तीन नेत्र धारण करनेवाले हैं, उन भगवान मृत्युंजयका, जिनके साथ गिरिराजनन्दिनी उमा भी विराजमान हैं, मैं भजन (चिन्तन) करता हूँ ।
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वन्दे वन्दनतुष्टमानसमतिप्रेमप्रियं प्रेमदं
पूर्ण पूर्णकरं प्रपूर्णनिखिलैश्वर्यैकवासं शिवम् ।
सत्यं सत्यमयं त्रिसत्यविभवं सत्यप्रियं सत्यदं
विष्णुब्रह्मनुतं स्वकीयकृपयोपात्ताकृतिं शङ्करम् ॥
अर्थ:-
वन्दना करने से जिनका मन प्रसन्न हो जाता है, जिन्हें प्रेम अत्यन्त प्यारा है, जो प्रेम प्रदान करनेवाले, पूर्णानन्दमय, भक्तोंकी अभिलाषा पूर्ण करने- वाले, सम्पूर्ण ऐश्वर्योके एकमात्र आवासस्थान और कल्याणस्वरूप हैं, सत्य जिनका श्रीविग्रह है, जो सत्यमय हैं, जिनका ऐश्वर्य त्रिकालाबाधित है, जो सत्यप्रिय एवं सत्यप्रदाता हैं, ब्रह्मा और विष्णु जिनकी स्तुति करते हैं, स्वेच्छानुसार शरीर धारण करनेवाले उन भगवान शंकरकी मैं वन्दना करता हूँ ।
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वेदान्तेषु यमाहुरेकपुरुषं व्याप्य स्थितं रोदसी
यस्मिन्नीश्वर इत्यनन्यविषयः शब्दो यथार्थाक्षरः ।
अन्तर्यश्च मुमुक्षुभिर्नियमितप्राणादिभिर्मृग्यते
स स्थाणुः स्थिरभक्तियोगसुलभो निः श्रेयसायास्तु वः ॥
अर्थ:-
वेदान्तग्रन्थोंमें जिन्हें एकमात्र परम पुरुष परमात्मा कहा गया है, जिन्होंने समस्त द्यावा-पृथिवीको अन्तर्बाह्य-सर्वत्र व्याप्त कर रखा है, जिन एकमात्र महादेवके लिये `ईश्वर' शब्द अक्षरशः यथार्थरूपमें प्रयुक्त होता है और जो किसी दूसरेके विशेषणका विषय नहीं बनता, अपने अन्तर्ह्रदयमें समस्त प्राणोंको निरुद्ध करके मोक्षकी इच्छावाले योगीजन जिनका निरन्तर चिन्तन और अन्वेषण करते रहते हैं, वे नित्य एक समान सुस्थिर रहनेवाले, महाप्रलयमें भी विक्रियाको प्राप्त न होनेवाले और भक्तियोगसे शीघ्र प्रसन्न होनेवाले भगवान् शिव आप सभीका परम कल्याण करें ।
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कृपाललितवीक्षणं स्मितमनोज्ञवक्त्राम्बुजं
शशाङ्ककलयोज्ज्चलं शमितघोरतापत्रयम् ।
करोतु किमपि स्फुरत्परमसौख्यसच्चिद्वपु-
र्धराधरसुताभुजोद्वलयितं महो मङ्गलम् ॥
अर्थ:-
जिनकी कृपापूर्ण चितवन बड़ी ही सुन्दर है, जिनका मुखारविन्द मन्द मुसकानकी छटासे अत्यन्त मनोहर दिखायी देता है, जो चन्द्रमाकी कला-जैसे परम उज्ज्वल हैं, जो आध्यात्मिक आदि तीनों तापोंको शान्त कर देनेमें समर्थ हैं, जिनका स्वरूप सच्विन्मय एवं परमानन्दरूपसे प्रकाशित होता है तथा जो गिरिराजनन्दिनी पार्वतीके भुजापाशसे आवेष्टित हैं, वे शिव नामक कोई अनिर्वचनीय तेजःपुंज सबका मंगल करें ।
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नीलप्रवालरुचिरं विलसत्त्रिनेत्र
पाशारुणोत्पलकपालत्रिशूलहस्तम् ।
अर्धाम्बिकेशमनिशं प्रविभक्तभूषं
बालेन्दुबद्धमुकुटं प्रणमामि रूपम् ॥
अर्थ:-
श्रीशंकरजीका शरीर नीलमणि और प्रवालके समान सुन्दर (नीललोहित) है, तीन नेत्र हैं, चारों हाथोंमें पाश, लाल कमल, कपाल और त्रिशूल हैं, आधे अंगमें अम्बिकाजी और आधेमें महादेवजी हैं । दोनों अलग-अलग श्रृंगारोंसे सज्जित हैं, ललाटपर अर्धचन्द्र है और मस्तकपर मुकुट सुशोभित है, ऐसे स्वरूपको नमस्कार है ।
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विश्वोद्भवस्थितिलयादिषु हेतुमेकं
गौरीपतिं विदिततत्त्वमनन्तकीर्तिम् ।
मायाश्रयं विगतमायमचिन्त्यरूपं
बोधस्वरूपममलं हि शिवं नमामि ॥
अर्थ:-
जो विशवकी उत्पत्ति, स्थिति और लय आदिके एकमात्र कारण हैं, गौरी गिरिराजकुमारी उमाके पति हैं, तत्त्वज्ञ हैं, जिनकी कीर्तिका कहीं अन्त नहीं है, जो मायाके आश्रय होकर भी उससे अत्यन्त दूर हैं तथा जिनका स्वरूप अचिन्त्य है, उन विमल बोधस्वरूप भगवान शिवको मैं प्रणाम करता हूँ ।
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मुक्तापीतपयोदमौक्तिकजवावर्णैर्मुखैः पञ्चभि-
स्त्र्यक्षैरञ्चितमीशमिन्दुमुकुटं पूर्णेन्दुकोटिप्रभम् ।
शूलं टङ्ककृपाणवञ्रदहनान् नागेन्द्रघण्टाङ्कुशान्
पाशं भीतिहरं दधानममिताकल्पोज्चलं चिन्तयेत् ॥
अर्थ:-
जिन भगवान शंकरके पाँच मुखोंमें क्रमशः ऊर्ध्वमुख गजमुक्ताके समान हलके लाल रंगका, पूर्व-मुख पीतवर्णका, दक्षिण-मुख सजल मेघके समान नील-वर्णका, पश्चिम-मुख मुक्ताके समान कुछ भूरे रंगका और उत्तर-मुख जवापुष्पके समान प्रगाढ़ रक्तवर्णका है, जिनकी तीन आँखें हैं और सभी मुखमण्डलोंमें नीलवर्णके मुकुरके साथ चन्द्रमा सुशोभित हो रहे है, जिनके मुखमण्डलकी आभा करोड़ों पूर्ण चन्द्रमाके तुल्य आह्लादित करनेवाली है, जो अपने हाथोंमें क्रमशः त्रिशूल, टंक (परशु) , तलवार, वज्र, अग्नि, नागराज, घण्टा, अंकुश, पाश तथा अभयमुद्रा धारण किये हुए हैं एवं जो अनन्त कल्पवृक्षके समान कल्याणकारी हैं, उन सर्वेश्वर भगवान शंकरका ध्यान करना चाहिये ।
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स्रष्टारोऽपि प्रजानां प्रबलभवभयाद् यं नमस्यन्ति देवा
यश्चित्ते सम्प्रविष्टोऽप्यवहितमनसां ध्यानमुक्तात्मनां च ।
लोकानामादिदेवः स जयतु भगवाञ्छ्रीमहाकालनामा
बिभ्राणः सोमलेखामहिवलययुतं व्यक्तलिङ्गं कपालम् ॥
अर्थ:-
प्रजाकी सृष्टि करनेवाले प्रजापति देव भी प्रबल संसार- भयसे मुक्त होनेके लिये जिन्हें नमस्कार करते हैं, जो सावधानचित्तवाले ध्यानपरायण महात्माओंके हृदयमन्दिरमें सुखपूर्वक विराजमान होते हैं और चन्द्रमाकी कला, सर्पोंके कंकण तथा व्यक्त चिह्नवाले कपालको धारण करते हैं, सम्पूर्ण लोकोंके आदिदेव उन भगवान महाकालकी जय हो ।
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मध्याह्नार्कसमप्रभं शशिधरं भीमाट्टहासोज्चलं
त्र्यक्षं पन्नगभूषणं शिखिशिखाश्मश्रुस्फुरन्मूर्धजम् ।
हस्ताब्जैस्त्रिशिखं समुद्गरमसिं शक्तिं दधानं विभुं
दंष्ट्राभीमचतुर्मुखं पशुपतिं दिव्यास्त्ररूपं स्मरेत् ॥
अर्थ:-
जिनको प्रभा मध्याहनकालीन सूर्यके समान दिव्य रूपमें भासित हो रही है, जिनके मस्तकपर चन्द्रमा विराजित है, जिनका मुखमण्डल प्रचण्ड अट्टहाससे उद्भासित हो रहा है, सर्प ही जिनके आभूषण हैं तथा चन्द्रमा, सूर्य और अग्नि-ये तीन जिनके तीन नेत्रोंके रूपमें अवस्थित हैं, जिनकी दाढ़ी और सिरकी जटाएँ चित्र-विचित्र रंगके मोरपंखके समान स्फुरित हो रही हैं, जिन्होंने अपने करकमलोंमें त्रिशूल, मुद्गर, तलवार तथा शक्तिको धारण कर रखा है और जिनके चार मुख तथा दाढ़ें भयावह हैं, ऐसे सर्वसमर्थ, दिव्य रूप एवं अस्त्रोंको धारण करनेवाले पशुपतिनाथका ध्यान करना चाहिये ।
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मुद्रां भद्रार्थदात्रीं सपरशुहरिणां बाहुभिर्बाहुमेकं
जान्वासक्तं दधानो भुजगवरसमाबद्धकक्षो वटाधः ।
आसीनश्चन्द्रखण्डप्रतिघटितजटः क्षीरगौरस्त्रिनेत्रो
दद्यादाद्यैः शुकाद्यैर्मुनिभिरभिवृतो भावशुद्धिं भवो वः ॥
अर्थ:-
जो भगवान दक्षिणामूर्ति अपने करकमलोंमें अर्थ प्रदान करनेवाली भद्रामुद्रा, मृगीमुद्रा और परशु धारण किये हुए हैं और एक हाथ घुटनेपर टेके हुए हैं, कटिप्रदेशमें नागराजको लपेटे हुए हैं तथा वटवृक्षे नीचे अवस्थित हैं, जिनके प्रत्येक सिरके ऊपर जटाओंमें द्वितीयाका चन्द्रमा जटित है और वर्ण धवल दुग्धके समान उञ्चल है, सूर्य, चन्द्रमा और अग्नि-ये तीनों जिनके तीन नेत्रके रूपमें स्थित हैं, जो सनकादि एवं शुकदेव [नारद] आदि मुनियोंसे आवृत हैं, वे भगवान भव-शंकर आपके हृदयमें विशुद्ध भावना (विरक्ति) प्रदान करें ।
🌹🌹श्रीशिवस्तुतिः वन्दे देवमुमापतिं... 🌹🌹
( हिन्दी अर्थ सहित.)
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वन्दे देवमुमापतिं सुरगुरुं वन्दे जगत्कारणं
वन्दे पन्नगभूषणं मृगधरं वन्दे पशूनां पतिम् ।
वन्दे सूर्यशशाङ्कवह्निनयनं वन्दे मुकुन्दप्रियं
वन्दे भक्तजनाश्रयं च वरदं वन्दे शिवं शङ्करम् ॥ १॥
अर्थ:-
पार्वतीपति भगवान शंकरको मैं प्रणाम करता हूँ, देवताओंके गुरु तथा सृष्टिके कारणरूप परमेश्वर भगवान शंकरको मैं प्रणाम करता हूँ, नागोंको आभूषणके रूपमें तथा हाथमें मृगमुद्रा धारण करनेवाले एवं समस्त जीवोंके गुरुस्वामी भगवान शंकरको मैं नमस्कार करता हूँ, नमस्कार करता हूँ । सूर्य, चन्द्र और अग्निदेवको नेत्ररूपमें धारण करनेवाले भगवान नारायणके परम प्रिय भगवान् शंकरको मैं प्रणाम करता हूँ । भक्त-जनोंको आश्रय देनेवाले वरदानी कल्याणस्वरूप भगवान शंकरको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ १॥
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वन्दे सर्वजगद्विहारमतुलं वन्देऽन्धकध्वंसिनं
वन्दे देवशिखामणिं शशिनिभं वन्दे हरेर्वल्लभम् ।
वन्दे नागभुजङ्गभूषणधरं वन्दे शिवं चिन्मयं
वन्दे भक्तजनाश्रयं च वरदं वन्दे शिवं शङ्करम् ॥ २॥
अर्थ:-
जिनके विहारकी पूरे विश्वमें कोई तुलना नहीं है, ऐसे अतुलनीय विहारी भगवान शंकरको मैं प्रणाम करता हूँ । अन्धकासुरके हन्ता भगवान शंकरको मैं प्रणाम करता हूँ । जो सभी देवताओंके शिरोमणि हैं, जिनकी कान्ति चन्द्रमाके समान है, जिन्होंने अपने शरीरपर नागों और सर्पोंको आभूषणके रूपमें धारण कर रखा है और जो भगवान विष्णुको अत्यन्त प्रिय अपने भक्त-जनोंको आश्रय देनेवाले हैं, ऐसे वरदानी परम कल्याणस्वरूप चिदानन्द भगवान शंकरको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ २॥
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वन्दे दिव्यमचिन्त्यमद्दयमहं वन्देऽर्कदर्पापहं
वन्दे निर्मलमादिमूलमनिशं वन्दे मखध्वंसिनम् ।
बन्दे सत्यमनन्तमाद्यमभयं वन्देऽतिशान्ताकृतिं
वन्दे भक्तजनाश्रयं च वरदं वन्दे शिवं शङ्करम् ॥ ३॥
अर्थ:-
अचिन्त्य शक्तिसे सम्पन्न, दिव्य लोकोत्तर, अद्य ब्रह्मस्वरूप भगवान शंकरको मैं प्रणाम करता हूँ । सूर्यके अभिमानका दलन करनेवाले, निर्मल स्वरूपवाले, विश्वके मूल कारण भगवान् शंकरकी मैं सतत वन्दना करता हूँ । जो दक्ष प्रजापतिके यज्ञको नष्ट करनेवाले तथा शान्त आकृतिवाले, सत्यस्वरूप, अनन्तस्वरूप, आद्यस्वरूप और सदा निर्भय रहनेवाले एवं भक्त-जनोंको आश्रय देनेवाले हैं, ऐसे वरदानी कल्याणस्वरूप भगवान शंकरको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ३॥
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वन्दे भूरथमम्बुजाक्षविशिखं वन्दे श्रुतित्रोटकं
वन्दे शैलशरासनं फणिगुणं वन्देऽधितूणीरकम् ।
वन्दे पद्म्जसारथिं पुरहरं वन्दे महाभैरवं
वन्दे भक्तजनाश्रयं च वरदं वन्दे शिवं शङ्करम् ॥ ४॥
अर्थ:-
त्रिपुरासुरको दग्ध करनेके लिये पृथ्वीको रथ, ब्रह्माको सारथि, सुमेरु पर्वतको धनुष, श्रुतिको त्रोटक, शेषको प्रत्यंचा, आकाशको तूणीर और कमलनयन भगवान विष्णुको बाण बनानेवाले, महाभैरव रूपधारी, भक्त-जनोंको आश्रय देनेवाले तथा वरदानी कल्याणस्वरूप भगवान शंकरको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ४॥
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वन्दे पञ्चमुखाम्बुजं त्रिनयनं वन्दे ललाटेक्षणं
वन्दे व्योमगतं जटासुमुकुटं चन्द्रार्धगङ्गाधरम् ।
वन्दे भस्मकृतत्रिपुण्डुजटिलं वन्देष्टपूर्त्यात्मकं
वन्दे भक्तजनाश्रयं च वरदं वन्दे शिवं शङ्करम् ॥ ५॥
अर्थ:-
जो पाँच मुखवाले हैं तथा जो अघोर, सद्योजात, तत्पुरुष, वामदेव और ईशानसंज्ञक हैं, उन कमलके समान मुखवाले भगवान शंकरको मैं प्रणाम करता हूँ । जिनके तीन नेत्र हैं, जिनका अग्निरूप नेत्र ललाटमें है, ऐसे भगवान शंकरको मैं प्रणाम करता हूँ । अपने मस्तकपर भगवती गंगा और अर्ध चन्द्रमाको तथा सिरपर मुकुटके रूपमें सुन्दर जटाको धारण किये हैं, ऐसे आकाशकी तरह व्यापक भगवान शंकरको मैं प्रणाम करता हूँ । जिन भगवान शंकरकी पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, यजमान, सूर्य और चन्द्र मतान्तरसे शर्व, भव, रुद्र, उग्र, भीम, पशुपति, ईशान और महादेव नामक आठ मूर्तियाँ हैं, ऐसे उन भस्मनिर्मित त्रिपुण्डूको जटाके रूपमें धारण करनेवाले भगवान शंकरको मैं प्रणाम करता हूँ । जो भक्त-जनोंके आश्रयदाता हैं, उन वरदानी कल्याणस्वरूप भगवान शंकरको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ५॥
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वन्दे कालहरं हरं विषधरं वन्दे मृडं धूर्जटिं
वन्दे सर्वगतं दयामृतनिधिं वन्दे नृसिंहापहम् ।
वन्दे विप्रसुराचिताङ्घ्रिकमलं वन्दे भगाक्षापहं
वन्दे भक्तजनाश्रयं च वरदं वन्दे शिवं शङ्करम् ॥ ६॥
अर्थ:-
जो कालको जीतनेवाले, पापका हरण करनेवाले, कण्ठमें विषको धारण करनेवाले, सुख देनेवाले तथा जटामें गंगाजीको धारण करनेवाले व्यापक, दयारूपी अमृतके निधि हैं और शरभरूप धारणकर नृसिंहको लेकर आकाशमें उड़ जानेवाले हैं एवं जिनके चरणकमलोंको वन्दना ब्राह्मण एवं देवता भी करते हैं, जिन्होंने भगाक्ष (इन्द्र) के दुःखका निवारण किया है तथा जो भक्तोंको आश्रय देनेवाले और वरदानी हैं, ऐसे उन कल्याणस्वरूप भगवान शिवको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ६॥
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वन्दे मङ्गलराजताद्रिनिलयं वन्दे सुराधीश्वरं
वन्दे शङ्करमप्रमेयमतुलं वन्दे यमद्वेषिणम् ।
वन्दे कुण्डलिराजकुण्डलधरं वन्दे सहस्राननं
वन्दे भक्तजनाश्रयं च वरदं वन्दे शिवं शङ्करम् ॥ ७॥
अर्थ:-
जो चाँदीके समान शुभ्र एवं मांगलिक हिमालय पर्वतपर रहते हैं, जो सहस्र (अनन्त) मुखवाले हैं, जो सभी देवताओंके स्वामी हैं, जो कल्याण करनेवाले, अप्रमेय और अतुलनीय हैं एवं शेषनागको जिन्होंने कानोंका कुण्डल बनाया है, यमको पराजित किया है, भक्त-जनोंको आश्रय देनेवाले वरदानी कल्याणस्वरूप भगवान शंकरको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ७॥
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वन्दे हंसमतीन्द्रियं स्मरहरं वन्दे विरूपेक्षणं
वन्दे भूतगणेशमव्ययमहं वन्देऽर्थराज्यप्रदम् ।
वन्दे सुन्दरसौरभेयगमनं वन्दे त्रिशूलायुधं
वन्दे भक्तजनाश्रयं च वरदं वन्दे शिवं शङ्करम् ॥ ८॥
अर्थ:-
जो सूर्यस्वरूप और इन्द्रियोंसे परे हैं, जो कामदेवको भस्म करनेवाले हैं, जो तीन नेत्र होनेके कारण विरूपाक्ष कहे गये हैं, जो सर्वथा अविनाशी हैं, जो धन और राज्यके प्रदाता हैं तथा भूतगणोंके स्वामी हैं, जो सुन्दर वृषवाहनपर आरूढ़ होकर चलते हैं, त्रिशूल ही जिनका आयुध है, ऐसे जो भक्त-जनोंको आश्रय देनेवाले वरदानी कल्याणस्वरूप भगवान शंकर हैं, उनको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ८॥
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वन्दे सूक्ष्ममनन्तमाद्यमभयं वन्देऽन्धकारापहं
वन्दे फूलननन्दिभृङ्गिविनतं वन्दे सुपर्णावृतम् ।
वन्दे शैलसुतार्धभागवपुषं वन्देऽभयं त्र्यम्बकं
वन्दे भक्तजनाश्रयं च वरदं वन्दे शिवं शङ्करम् ॥ ९॥
अर्थ:-
उन महाशिवको प्रणाम है जो सूक्ष्म हैं, अनन्त हैं, जो सबके आद्य हैं और जो निर्भीक हैं; जिन्होंने अन्धकासुरका वध किया है, जिन्हें फूलन, नन्दी और भृंगी प्रणाम अर्पित करते हैं, जो सुपर्णाओं (कमलिनियों) -से आवृत हैं, जिनके आधे शरीरमें शैलसुता पार्वती हैं, जो भक्तोंको निर्भीक करनेवाले हैं, जिनके तीन नेत्र हैं । जो भक्त-जनोंको आश्रय देनेवाले एवं वरदानी हैं, ऐसे कल्याणस्वरूप भगवान शंकरको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ९॥
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वन्दे पावनमम्बरात्मविभवं वन्दे महेन्द्रेश्वरं
वन्दे भक्तजनाश्रयामरतरुं वन्दे नताभीष्टदम् ।
वन्दे जह्नुसुताम्बिकेशमनिशं वन्दे गणाधीश्वरं
वन्दे भक्तजनाश्रयं च वरदं वन्दे शिवं शङ्करम् ॥ १०॥
अर्थ:-
जिनका आत्मविभव परम पावन है और आकाशकी तरह व्यापक है, जो देवराज इन्द्रके भी स्वामी हैं, जो भक्तजनोंके लिये कल्पवृक्षके समान आश्रय हैं, जो प्रणाम करनेवालोंको भी अभीष्ट फल प्रदान करते हैं, जिनकी एक पत्नी गंगा और दूसरी पार्वती हैं और जो अनेक प्रमुख गणोंके भी स्वामी हैं, ऐसे भक्त-जनोंको आश्रय देनेवाले वरदानी कल्याणस्वरूप भगवान शंकरको मैं निरन्तर प्रणाम करता हूँ ॥ १०॥
॥ इति श्रीशिवस्तुतिः सम्पूर्णा ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवस्तुतिं सम्पूर्ण हुई ॥
//🌹 श्रीशिव पञ्चाक्षर स्तोत्रम् :अर्थ सहित🌹 //
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नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय, भस्माङ्गरागाय महेश्वराय ।
नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय, तस्मै न काराय नमः शिवाय ||१||
अर्थ:-
शिवपञ्चाक्षर स्तोत्र के रचयिता आदि गुरु शंकराचार्य हैं, जो परम शिवभक्त थे। शिवपञ्चाक्षर स्तोत्र पंचाक्षरी मन्त्र नमः शिवाय पर आधारित है।'न' – पृथ्वी तत्त्व का, 'म' – जल तत्त्व का, 'शि' – अग्नि तत्त्व का, ''वा – वायु तत्त्व का और 'य' – आकाश तत्त्व का प्रतिनिधित्व करता है। जिनके कण्ठ में सर्पों का हार है, जिनके तीन नेत्र हैं, भस्म ही जिनका अंगराग है और दिशाएँ ही जिनका वस्त्र हैं अर्थात् जो दिगम्बर (निर्वस्त्र) हैं ऐसे शुद्ध अविनाशी महेश्वर न कारस्वरूप शिव को नमस्कार है ||
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मन्दाकिनी सलिलचन्दन चर्चिताय, नन्दीश्वर प्रमथनाथ महेश्वराय ।
मन्दारपुष्प बहुपुष्प सुपूजिताय, तस्मै म काराय नमः शिवाय ||२||
अर्थ:-
गङ्गाजल और चन्दन से जिनकी अर्चना हुई है, मन्दार-पुष्प तथा अन्य पुष्पों से जिनकी भलिभाँति पूजा हुई है। नन्दी के अधिपति, शिवगणों के स्वामी महेश्वर म कारस्वरूप शिव को नमस्कार है ||
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शिवाय गौरीवदनाब्जवृन्द, सूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय ।
श्रीनीलकण्ठाय वृषध्वजाय, तस्मै शि काराय नमः शिवाय ||३||
अर्थ:-
जो कल्याणस्वरूप हैं, पार्वतीजी के मुखकमल को प्रसन्न करने के लिए जो सूर्यस्वरूप हैं, जो दक्ष के यज्ञ का नाश करनेवाले हैं, जिनकी ध्वजा में वृषभ (बैल) का चिह्न शोभायमान है, ऐसे नीलकण्ठ शि कारस्वरूप शिव को नमस्कार है ||
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वसिष्ठकुम्भोद्भवगौतमार्य, मुनीन्द्रदेवार्चितशेखराय।
चन्द्रार्क वैश्वानरलोचनाय, तस्मै व काराय नमः शिवाय ||४||
अर्थ:-
वसिष्ठ मुनि, अगस्त्य ऋषि और गौतम ऋषि तथा इन्द्र आदि देवताओं ने जिनके मस्तक की पूजा की है, चन्द्रमा, सूर्य और अग्नि जिनके नेत्र हैं, ऐसे व कारस्वरूप शिव को नमस्कार है ||
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यक्षस्वरूपाय जटाधराय, पिनाकहस्ताय सनातनाय ।
दिव्याय देवाय दिगम्बराय, तस्मै य काराय नमः शिवाय ||५||
अर्थ:-
जिन्होंने यक्ष स्वरूप धारण किया है, जो जटाधारी हैं, जिनके हाथ में पिनाक है, जो दिव्य सनातन पुरुष हैं, ऐसे दिगम्बर देव य कारस्वरूप शिव को नमस्कार है ||
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पञ्चाक्षरमिदं पुण्यं यः पठेच्छिवसन्निधौ |
शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते ||
अर्थ:-
जो शिव के समीप इस पवित्र पञ्चाक्षर स्तोत्र का पाठ करता है, वह शिवलोक को प्राप्त होता है और वहाँ शिवजी के साथ आनन्दित होता है ||
॥ इति श्रीमच्छंकराचार्यविरचितं शिवपञ्चाक्षरस्तोत्रं समाप्तम् ॥
// 🌹श्रीशिव षडक्षर स्तोत्रम् : हिन्दी अर्थ सहित 🌹
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ॐकारं बिंदुसंयुक्तं नित्यं ध्यायंति योगिनः ।
कामदं मोक्षदं चैव ॐकाराय नमो नमः ॥१॥
अर्थ:-
जो ओमकार के रूप में आध्यात्मिक हृदय केन्द्र में रहते है, जिस पर योगी निरंतर नित्य ही ध्यान करते रहते हे | जो अपने भक्तो की सभी इच्छाए पूरी करते हे और मोक्ष प्रदान करते हे, ऐसे शिव जी को नमन हे प्रणाम हे, जो ॐ शब्दांश द्वारा वर्णन किये जाते हे , षडक्षर/ शदाक्षर मंत्र का पहला शब्दांश (यानी की ॐ) " ॐ - न - मः - शि - वा - य "||
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नमंति ऋषयो देवा नमन्त्यप्सरसां गणाः ।
नरा नमंति देवेशं नकाराय नमो नमः ॥२॥
अर्थ:-
जिनको सभी ऋषि सम्मान से श्रधा से जुक के नमस्कार करते हे, जिनको सभी देव सम्मान से श्रधा से जुक के नमस्कार करते हे, जिनको सभी अपसराए सम्मान से श्रधा से जुक के नमस्कार करती हे, जिनको मनुष्य भी सम्मान और श्रधा से जुक के नमस्कार करते हे, जो देवो के इश्वर हे , ऐसे शिव जी को नमन हे प्रणाम हे, जो "न" शब्दांश द्वारा वर्णन किये जाते हे. षडक्षर/ शदाक्षर मंत्र का दूसरा शब्दांश (यानी की न) " ॐ - न - मः - शि - वा - य "||
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महादेवं महात्मानं महाध्यानं परायणम् ।
महापापहरं देवं मकाराय नमो नमः ॥३॥
अर्थ:-
जो महादेव हे , जो महात्मा हे, जो ध्यान का अंतिम लक्ष्य हे, जो अपने भक्तो के सभी पापो(पापकर्मो) के हरने वाले हे विनाश करने वाले हे ..महापाप हरता हे, ऐसे शिव जी को नमन हे प्रणाम हे, जो "म:" शब्दांश द्वारा वर्णन किये जाते हे. षडक्षर/ शदाक्षर मंत्र का तिशरा शब्दांश (यानी की म:) " ॐ - न - मः - शि - वा - य "||
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शिवं शांतं जगन्नाथं लोकानुग्रहकारकम् ।
शिवमेकपदं नित्यं शिकाराय नमो नमः ॥४॥
अर्थ:-
जो सबसे शुभ (मंगलकारी) है, जो शांति के धाम है, जो जगत के नाथ है,
विश्वलोक के कल्याण के लिए कार्य करते है, जो शिव के रूप में जाने वाला एक अनन्त(अमर) शब्द है, ऐसे शिव जी को नमन हे प्रणाम हे, जो "शि" शब्दांश द्वारा वर्णन किये जाते हे. षडक्षर/ शदाक्षर मंत्र का चौथा शब्दांश (यानी की शि:) " ॐ - न - मः - शि - वा - य "||
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वाहनं वृषभो यस्य वासुकिः कंठभूषणम् ।
वामे शक्तिधरं देवं वकाराय नमो नमः ॥५॥
अर्थ:-
जिनका वाहन नंदी हे , जिनके पास वासुकी नाग गले के अभुषण(हार) के रूप में हे (वासुकी नाग जिनके गले का आभूषण(हार) हे ), देवी माँ शक्ति उनकी बाई तरफ बिराजमान हे, ऐसे शिव जी को नमन हे प्रणाम हे, जो "वा" शब्दांश द्वारा वर्णन किये जाते हे. षडक्षर/ शदाक्षर मंत्र का पांचवा शब्दांश (यानी की वा) " ॐ - न - मः - शि - वा - य "||
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यत्र यत्र स्थितो देवः सर्वव्यापी महेश्वरः ।
यो गुरुः सर्वदेवानां यकाराय नमो नमः ॥६॥
अर्थ:-
जो सर्वव्यापी हे यानी हर जगह पर उपस्थित हे जहा जहा देव स्थित हे जो सभी देवो के गुरु हे, ऐसे शिव जी को नमन हे प्रणाम हे, जो "य" शब्दांश द्वारा वर्णन किये जाते हे. षडक्षर/ शदाक्षर मंत्र का छठा शब्दांश (यानी की य) " ॐ - न - मः - शि - वा - य "||
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षडक्षरमिदं स्तोत्रं यः पठेच्छिवसंनिधौ ।
शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते ॥७॥
अर्थ:
- जो भी शिव जी (शिवलिंग) के सामने इस षडक्षर स्तोत्र का पाठ करता हे (ॐ न मः शि वा य इन 6 शब्दांश की प्रशंसा में गाया गया स्त्रोत ) उसे शिवलोक की प्राप्ति होती हे और परमसुख परम आनंद पाता हे ||
॥ इतिश्री शिवषडक्षरस्तोत्रं समाप्तम् ॥
// 🌹🌹श्रीशिवरक्षास्तोत्रम् हिन्दी अर्थ सहित 🌹🌹
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श्री गणेशाय नमः ॥
अस्य श्रीशिवरक्षास्तोत्रमन्त्रस्य याज्ञवल्क्य ऋषिः ॥
श्री सदाशिवो देवता ॥ अनुष्टुप् छन्दः ॥
श्रीसदाशिवप्रीत्यर्थं शिवरक्षास्तोत्रजपे विनियोगः ॥
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चरितं देवदेवस्य महादेवस्य पावनम् ।
अपारं परमोदारं चतुर्वर्गस्य साधनम् ॥ १॥
अर्थ - देवादिदेव महादेव का यह परम पवित्र चरित्र अपार, अत्यंत उदार एवं चतुरवर्ग ( धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष ) देने वाला है।
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गौरीविनायकोपेतं पञ्चवक्त्रं त्रिनेत्रकम् ।
शिवं ध्यात्वा दशभुजं शिवरक्षां पठेन्नरः ॥ २॥
अर्थ - गौरी, विनायक सहित, पंचमुख, त्रिनेत्र दस भुजाधारी शिव का ध्यान कर साधक शिव रक्षा स्तोत्र का पाठ करे।
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गंगाधरः शिरः पातु भालं अर्धेन्दुशेखरः ।
नयने मदनध्वंसी कर्णो सर्पविभूषण ॥ ३॥
अर्थ - गंगाधर मेरे सिर की, अर्धचन्द्रधारी मेरे कपाल की, कामदेव को भस्म करने वाले मेरेदोनों नेत्रों की तथा सर्पों के आभूषण धारण करने वाले मेरे दोनों कानों की रक्षा करें।
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घ्राणं पातु पुरारातिः मुखं पातु जगत्पतिः ।
जिह्वां वागीश्वरः पातु कंधरां शितिकंधरः ॥ ४॥
अर्थ - पुराराति ( त्रिपुरासुर का वध करने वाले ) मेरे नाक की, जगत्पति मेरे मुख की, वागीश्वर मेरी जिह्वा की, शितिकंधर मेरी ग्रीवा की रक्षा करें।
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श्रीकण्ठः पातु मे कण्ठं स्कन्धौ विश्वधुरन्धरः ।
भुजौ भूभारसंहर्ता करौ पातु पिनाकधृक् ॥ ५॥
अर्थ - श्रीकण्ठ मेरे कण्ठ की, विश्वधुरन्धर मेरे दोनों कन्धों की, भूभारसंहर्ता मेरी दोनों भुजाओं की, पिनाकधृक मेरे दोनों हाथों की रक्षा करें।
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हृदयं शंकरः पातु जठरं गिरिजापतिः ।
नाभिं मृत्युञ्जयः पातु कटी व्याघ्राजिनाम्बरः ॥ ६॥
अर्थ - शंकर मेरे ह्रदय की, गिरिजापति मेरे पेट की, मृत्युंजय नाभि की तथा व्याघ्रजिनाम्बर मेरी कटि
( कमर) की रक्षा करें।
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सक्थिनी पातु दीनार्तशरणागतवत्सलः ॥
उरू महेश्वरः पातु जानुनी जगदीश्वरः ॥ ७॥
अर्थ - दीनार्त - शरणागत वत्सल मेरी समस्त हड्डियों की, महेश्वर मेरे ऊरू की तथा जगदीश्वर मेरे जानु की रक्षा करें।
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जङ्घे पातु जगत्कर्ता गुल्फौ पातु गणाधिपः ॥
चरणौ करुणासिंधुः सर्वाङ्गानि सदाशिवः ॥ ८॥
अर्थ - जगत्कर्ता मेरी दोनों जांघों की, गणाधिप मेरे दोनों घुटनों की, करुणा सिन्धु मेरे दोनों चरणों की तथा सदा शिव मेरे सभी अंगों की रक्षा करें।
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एतां शिवबलोपेतां रक्षां यः सुकृती पठेत् ।
स भुक्त्वा सकलान्कामान् शिवसायुज्यमाप्नुयात् ॥ ९॥
ग्रहभूतपिशाचाद्यास्त्रैलोक्ये विचरन्ति ये ।
दूरादाशु पलायन्ते शिवनामाभिरक्षणात् ॥ १० ॥
अभयङ्करनामेदं कवचं पार्वतीपतेः ।
भक्त्या बिभर्ति यः कण्ठे तस्य वश्यं जगत्त्रयम् ॥ ११॥
इमां नारायणः स्वप्ने शिवरक्षां यथाऽऽदिशत् ।
प्रातरुत्थाय योगीन्द्रो याज्ञवल्क्यः तथाऽलिखत् ॥ १२॥
II इति श्रीयाज्ञवल्क्यप्रोक्तं शिवरक्षास्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
🌹 श्रीरुद्राष्टकं (श्रीगोस्वामितुलसीदासकृत ) //
(हिन्दी अर्थ सहित)
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नमामीशमीशान निर्वाणरूपं विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम् ।
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहम् ॥ १॥
अर्थ:-
हे भगवन ईशान को मेरा प्रणाम ऐसे भगवान जो कि निर्वाण रूप हैं जो कि महान ॐ के दाता हैं जो सम्पूर्ण ब्रह्माण में व्यापत हैं जो अपने आपको धारण किये हुए हैं जिनके सामने गुण अवगुण का कोई महत्व नहीं, जिनका कोई विकल्प नहीं, जो निष्पक्ष हैं जिनका आकर आकाश के सामान हैं जिसे मापा नहीं जा सकता उनकी मैं उपासना करता हूँ |
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निराकारमोंकारमूलं तुरीयं गिरा ज्ञान गोतीतमीशं गिरीशम् ।
करालं महाकाल कालं कृपालं गुणागार संसारपारं नतोऽहम् ॥ २॥
अर्थ:-
जिनका कोई आकार नहीं, जो ॐ के मूल हैं, जिनका कोई राज्य नहीं, जो गिरी के वासी हैं, जो कि सभी ज्ञान, शब्द से परे हैं, जो कि कैलाश के स्वामी हैं, जिनका रूप भयावह हैं, जो कि काल के स्वामी हैं, जो उदार एवम् दयालु हैं, जो गुणों का खजाना हैं, जो पुरे संसार के परे हैं उनके सामने मैं नत मस्तक हूँ |
🍁
तुषाराद्रि संकाश गौरं गभीरं मनोभूत कोटिप्रभा श्री शरीरम् ।
स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारु गङ्गा लसद्भालबालेन्दु कण्ठे भुजङ्गा ॥ ३॥
अर्थ:-
जो कि बर्फ के समान शील हैं, जिनका मुख सुंदर हैं, जो गौर रंग के हैं जो गहन चिंतन में हैं, जो सभी प्राणियों के मन में हैं, जिनका वैभव अपार हैं, जिनकी देह सुंदर हैं, जिनके मस्तक पर तेज हैं जिनकी जटाओ में लहलहारती गंगा हैं, जिनके चमकते हुए मस्तक पर चाँद हैं और जिनके कंठ पर सर्प का वास हैं |
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चलत्कुण्डलं भ्रू सुनेत्रं विशालं प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालम् ।
मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि ॥ ४॥
अर्थ:-
जिनके कानों में बालियाँ हैं, जिनकी सुन्दर भोहे और बड़ी-बड़ी आँखे हैं जिनके चेहरे पर सुख का भाव हैं जिनके कंठ में विष का वास हैं जो दयालु हैं, जिनके वस्त्र शेर की खाल हैं, जिनके गले में मुंड की माला हैं ऐसे प्रिय शंकर पुरे संसार के नाथ हैं उनको मैं पूजता हूँ |
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प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं अखण्डं अजं भानुकोटिप्रकाशम् ।
त्रयः शूल निर्मूलनं शूलपाणिं भजेऽहं भवानीपतिं भावगम्यम् ॥ ५॥
अर्थ:-
जो भयंकर हैं, जो परिपक्व साहसी हैं, जो श्रेष्ठ हैं अखंड है जो अजन्मे हैं जो सहस्त्र सूर्य के सामान प्रकाशवान हैं जिनके पास त्रिशूल हैं जिनका कोई मूल नहीं हैं जिनमे किसी भी मूल का नाश करने की शक्ति हैं ऐसे त्रिशूल धारी माँ भगवती के पति जो प्रेम से जीते जा सकते हैं उन्हें मैं वन्दन करता हूँ |
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कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी सदा सज्जनानन्ददाता पुरारी ।
चिदानन्द संदोह मोहापहारी प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी ॥ ६॥
अर्थ:-
जो काल के बंधे नहीं हैं, जो कल्याणकारी हैं, जो विनाशक भी हैं,जो हमेशा आशीर्वाद देते है और धर्म का साथ देते हैं , जो अधर्मी का नाश करते हैं, जो चित्त का आनंद हैं, जो जूनून हैं जो मुझसे खुश रहे ऐसे भगवान जो कामदेव नाशी हैं उन्हें मेरा प्रणाम |
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न यावद् उमानाथपादारविन्दं भजन्तीह लोके परे वा नराणाम् ।
न तावत्सुखं शान्ति सन्तापनाशं प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासम् ॥ ७॥
अर्थ:-
जो यथावत नहीं हैं, ऐसे उमा पति के चरणों में कमल वन्दन करता हैं, ऐसे भगवान को पूरे लोक के नर नारी पूजते हैं, जो सुख हैं, शांति हैं, जो सारे दुखो का नाश करते हैं, जो सभी जीवों में वास करते हैं |
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न जानामि योगं जपं नैव पूजां नतोऽहं सदा सर्वदा शम्भु तुभ्यम् ।
जरा जन्म दुःखौघ तातप्यमानं प्रभो पाहि आपन्नमामीश शम्भो ॥ ८॥
अर्थ:-
मैं कुछ नहीं जानता, ना योग , ना ध्यान हैं देव के सामने मेरा मस्तक झुकता हैं, सभी संसारिक कष्टों, दुःख दर्द से मेरी रक्षा करे. मेरी बुढ़ापे के कष्टों से से रक्षा करें | मैं सदा ऐसे शिव शम्भु को प्रणाम करता हूँ |
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रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये ।
ये पठन्ति नरा भक्त्या तेषां शम्भुः प्रसीदति ॥
अर्थ:-
इस रुद्राष्टक को जो सच्चे भाव से पढ़ता हैं शम्भुनाथ उसकी सुनते हैं और आशीर्वाद देते है |
॥ इति श्रीगोस्वामितुलसीदासकृतं श्रीरुद्राष्टकं सम्पूर्णम् ॥
II महाकवि तुलसीदास जी का रुद्राष्टक समाप्त होता हैं |
/🌹🌹/ दारिद्रयदहन शिवस्तोत्रम् पाठ :🌹🌹
(हिन्दी अर्थ सहित )
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विश्वेश्वराय नरकार्णव तारणाय कणामृताय शशिशेखरधारणाय।
कर्पूरकान्तिधवलाय जटाधराय दारिद्र्य दुःखदहनाय नमः शिवाय॥१॥
अर्थ –
समस्त चराचर विश्व के स्वामीरूप विश्वेश्वर! नरकरूपी संसारसागर से उद्धार करने वाले, कानों से श्रवण करने में अमृत के समान नाम वाले, अपने भाल पर चन्द्रमा को आभूषणरूप में धारण करने वाले, कर्पूर की कान्ति के समान धवल वर्ण वाले, जटाधारी और दरिद्रतारूपी दु:ख के विनाशक भगवान शिव को मेरा नमस्कार है ।।१।।
🍁
गौरीप्रियाय रजनीशकलाधराय कालान्तकाय भुजगाधिपकङ्कणाय।
गंगाधराय गजराजविमर्दनाय दारिद्र्य दुःखदहनाय नमः शिवाय॥२॥
अर्थ –
माता गौरी के अत्यन्त प्रिय, रजनीश्वर (चन्द्रमा) की कला को धारण करने वाले, काल के भी अन्तक (यम) रूप, नागराज को कंकणरूप में धारण करने वाले, अपने मस्तक पर गंगा को धारण करने वाले, गजराज का विमर्दन करने वाले और दरिद्रतारूपी दु:ख के विनाशक भगवान शिव को मेरा नमस्कार है ।।२।।
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भक्तिप्रियाय भवरोगभयापहाय उग्राय दुर्गभवसागरतारणाय।
ज्योतिर्मयाय गुणनामसुनृत्यकाय दारिद्र्य दुःखदहनाय नमः शिवाय॥३॥
अर्थ –
भक्तिप्रिय, संसाररूपी रोग एवं भय के विनाशक, संहार के समय उग्ररूपधारी, दुर्गम भवसागर से पार कराने वाले, ज्योति:स्वरूप, अपने गुण और नाम के अनुसार सुन्दर नृत्य करने वाले तथा दरिद्रतारूपी दु:ख के विनाशक भगवान शिव को मेरा नमस्कार है ।।३।।
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चर्मम्बराय शवभस्मविलेपनाय भालेक्षणाय मणिकुण्डलमण्डिताय।
मंझीरपादयुगलाय जटाधराय दारिद्र्य दुःखदहनाय नमः शिवाय॥४॥
अर्थ –
व्याघ्रचर्मधारी, चिताभस्म को लगाने वाले, भालमें तीसरा नेत्र धारण करने वाले, मणियों के कुण्डल से सुशोभित, अपने चरणों में नूपुर धारण करने वाले जटाधारी और दरिद्रतारूपी दु:ख के विनाशक भगवान शिव को मेरा नमस्कार है ।।४।।
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पञ्चाननाय फणिराजविभूषणाय हेमांशुकाय भुवनत्रयमण्डिताय।
आनन्दभूमिवरदाय तमोमयाय दारिद्र्य दुःखदहनाय नमः शिवाय॥५॥
अर्थ –
पांच मुख वाले, नागराजरूपी आभूषणों से सुसज्जित, सुवर्ण के समान वस्त्र वाले अथवा सुवर्ण के समान किरणवाले, तीनों लोकों में पूजित, आनन्दभूमि (काशी) को वर प्रदान करने वाले, सृष्टि के संहार के लिए तमोगुणाविष्ट होने वाले तथा दरिद्रतारूपी दु:ख के विनाशक भगवान शिव को मेरा नमस्कार है ।।५।।
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भानुप्रियाय भवसागरतारणाय कालान्तकाय कमलासनपूजिताय।
नेत्रत्रयाय शुभलक्षण लक्षिताय दारिद्र्य दुःखदहनाय नमः शिवाय॥६॥
अर्थ –
सूर्य को अत्यन्त प्रिय अथवा सूर्य के प्रेमी, भवसागर से उद्धार करने वाले, काल के लिए भी महाकालस्वरूप, कमलासन (ब्रह्मा) से सुपूजित, तीन नेत्रों को धारण करने वाले, शुभ लक्षणों से युक्त तथा दरिद्रतारूपी दु:ख के विनाशक भगवान शिव को मेरा नमस्कार है ।।६।।
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रामप्रियाय रघुनाथवरप्रदाय नागप्रियाय नरकार्णवतारणाय।
पुण्येषु पुण्यभरिताय सुरार्चिताय दारिद्र्य दुःखदहनाय नमः शिवाय॥७॥
अर्थ–
मर्यादापुरुषोत्तम भगवान राम को अत्यन्त प्रिय अथवा राम से प्रेम करने वाले, रघुनाथजी को वर देने वाले, सर्पों के अतिप्रिय, भवसागररूपी नरक से तारने वाले, पुण्यवानों में अत्यन्त पुण्य वाले, समस्त देवताओं से सुपूजित तथा दरिद्रतारूपी दु:ख के विनाशक भगवान शिव को मेरा नमस्कार है ।।७।।
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मुक्तेश्वराय फलदाय गणेश्वराय गीतप्रियाय वृषभेश्वरवाहनाय।
मातङ्गचर्मवसनाय महेश्वराय दारिद्र्य दुःखदहनाय नमः शिवाय॥८॥
अर्थ–
मुक्तजनों के स्वामीरूप, चारों पुरुषार्थों के फल को देने वाले, प्रमथादिगणों के स्वामी, स्तुतिप्रिय, नन्दीवाहन, गजचर्म को वस्त्ररूप में धारण करने वाले, महेश्वर तथा दरिद्रतारूपी दु:ख के विनाशक भगवान शिव को मेरा नमस्कार है ।।८।।
🍁स्तोत्र पाठ का फल
वसिष्ठेन कृतं स्तोत्रं सर्वरोगनिवारणं।
सर्वसंपत्करं शीघ्रं पुत्रपौत्रादिवर्धनम्।
त्रिसंध्यं यः पठेन्नित्यं स हि स्वर्गमवाप्नुयात्
दारिद्रयदुःखदहनाय नमः शिवाय ॥॥९॥
अर्थ–
ऋषि वशिष्ठ द्वारा रचित यह स्तोत्र समस्त रोगों को दूर करने वाला, शीघ्र ही समस्त सम्पत्तियों को प्रदान करने वाला और पुत्र-पौत्रादि वंश-परम्परा को बढ़ाने वाला है। इस स्तोत्र का जो मनुष्य नित्य तीनों कालों में पाठ करता है, उसे निश्चय ही स्वर्गलोक की प्राप्ति होती है। दरिद्रतारूपी दु:ख के विनाशक भगवान शिव को मेरा नमस्कार है ॥९॥
॥ इति वसिष्ठ विरचितं दारिद्र्यदहनशिवस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
॥ ऋषि वशिष्ठ द्वारा रचित दारिद्रयदहन शिवस्तोत्र सम्पूर्ण ॥
🌹🌹श्रीशिवमानसपूजा हिन्दी अर्थ सहित 🌹🌹
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रत्नैः कल्पितमासनं हिमजलैः स्नानं च दिव्याम्बरं
नानारत्नविभूषितं मृगमदामोदाङ्कितं चन्दनम् ।
जातीचम्पकबिल्वपत्ररचितं पुष्पं च धूपं तथा
दीपं देव दयानिधे पशुपते हृत्कल्पितं गृह्यताम् ॥ १॥
भावार्थ:-
मैं ऐसी भावना करता हूँ, कि हे दयालु पशुपति देव! संपूर्ण रत्नों से निर्मित इस सिंहासन पर आप विराजमान होइए। हिमालय के शीतल जल से मैं आपको स्नान करवा रहा हूं। स्नान के उपरांत रत्नजड़ित दिव्य वस्त्र आपको अर्पित है। केसर-कस्तूरी में बनाया गया चंदन का तिलक आपके अंगों पर लगा रहा हूं। जूही, चंपा, बिल्वपत्र आदि की पुष्पांजलि आपको समर्पित है। सभी प्रकार की सुगंधित धूप और दीपक मानसिक प्रकार से आपको दर्शित करवा रहा हूं, आप ग्रहण कीजिए।
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सौवर्णे नवरत्नखण्डरचिते पात्रे घृतं पायसं
भक्ष्यं पञ्चविधं पयोदधियुतं रम्भाफलं पानकम् ।
शाकानामयुतं जलं रुचिकरं कर्पूरखण्डोज्ज्वलं
ताम्बूलं मनसा मया विरचितं भक्त्या प्रभो स्वीकुरु ॥ २॥
भावार्थ:-
मैंने नवीन स्वर्णपात्र, जिसमें विविध प्रकार के रत्न जड़ित हैं, में खीर, दूध और दही सहित पांच प्रकार के स्वाद वाले व्यंजनों के संग कदली फल, शर्बत, शाक, कपूर से सुवासित और स्वच्छ किया हुआ मृदु जल एवं तांबूल आपको मानसिक भावों द्वारा बनाकर प्रस्तुत किया है। हे कल्याण करने वाले! मेरी इस भावना को स्वीकार करें।
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छत्रं चामरयोर्युगं व्यजनकं चादर्शकं निर्मलं
वीणाभेरिमृदङ्गकाहलकला गीतं च नृत्यं तथा ।
साष्टाङ्गं प्रणतिः स्तुतिर्बहुविधा ह्येतत्समस्तं मया
सङ्कल्पेन समर्पितं तव विभो पूजां गृहाण प्रभो ॥ ३॥
भावार्थ:-
हे भगवन, आपके ऊपर छत्र लगाकर चंवर और पंखा झूला रहा हूं। निर्मल दर्पण, जिसमें आपका स्वरूप सुंदरतम व भव्य दिखाई दे रहा है, भी प्रस्तुत है। वीणा, भेरी, मृदंग, दुदुंभि आदि की मधुर ध्वनियां आपको प्रसन्नता के लिए की जा रही हैं। स्तुति का गायन, आपके प्रिय नृत्य को करके मैं आपको साष्टांग प्रणाम करते हुए संकल्प रूप से आपको समर्पित कर रहा हूं। प्रभो! मेरी यह नाना विधि स्तुति की पूजा को कृपया ग्रहण करें।
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आत्मा त्वं गिरिजा मतिः सहचराः प्राणाः शरीरं गृहं
पूजा ते विषयोपभोगरचना निद्रा समाधिस्थितिः ।
सञ्चारः पदयोः प्रदक्षिणविधिः स्तोत्राणि सर्वा गिरो
यद्यत्कर्म करोमि तत्तदखिलं शम्भो तवाराधनम् ॥ ४॥
भावार्थ:
- हे शंकरजी, मेरी आत्मा आप हैं। मेरी बुद्धि आपकी शक्ति पार्वतीजी हैं। मेरे प्राण आपके गण हैं। मेरा यह पंच भौतिक शरीर आपका मंदिर है। संपूर्ण विषय भोग की रचना आपकी पूजा ही है। मैं जो सोता हूं, वह आपकी ध्यान समाधि है। मेरा चलना-फिरना आपकी परिक्रमा है। मेरी वाणी से निकला प्रत्येक उच्चारण आपके स्तोत्र व मंत्र हैं। इस प्रकार मैं आपका भक्त जिन-जिन कर्मों को करता हूं, वह आपकी आराधना ही है।
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करचरण कृतं वाक्कायजं कर्मजं वा ।
श्रवणनयनजं वा मानसं वापराधम् ।
विहितमविहितं वा सर्वमेतत्क्षमस्व ।
जय जय करुणाब्धे श्रीमहादेवशम्भो ॥ ५॥
भावार्थ:-
हे परमेश्वर! मैंने हाथ, पैर, वाणी, शरीर, कर्म, कर्ण, नेत्र अथवा मन से अभी तक जो भी अपराध किए हैं। वे विहित हों अथवा अविहित, उन सब पर आपकी क्षमापूर्ण दृष्टि प्रदान कीजिए। हे करुणा के सागर भोले भंडारी श्री महादेवजी, आपकी जय हो। जय हो।
॥ इति श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचिता शिवमानसपूजा समाप्ता ॥
// 🌹आदि शंकराचार्यरचित: वेदसारशिवस्तोत्रम् //🌹
,(हिन्दी अर्थ सहित)
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पशूनां पतिं पापनाशं परेशं गजेन्द्रस्य कृत्तिं वसानं वरेण्यम्।
जटाजूटमध्ये स्फुरद्गाङ्गवारिं महादेवमेकं स्मरामि स्मरारिम्॥१॥
अर्थ - जो सम्पूर्ण प्राणियोंके रक्षक हैं, पापका ध्वंस करनेवाले हैं, परमेश्वर हैं, गजराजका चर्म पहने हुए हैं तथा श्रेष्ठ हैं और जिनके जटाजूटमें श्रीगंगाजी खेल रही हैं, उन एकमात्र कामारि श्रीमहादेवजीका मैं स्मरण करता हूँ। ॐ नमः शिवाय॥१॥
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महेशं सुरेशं सुरारार्तिनाशं विभुं विश्वनाथं विभूत्यङ्गभूषम्।
विरूपाक्षमिन्द्वर्कवह्नित्रिनेत्रं सदानन्दमीडे प्रभुं पञ्चवक्त्रम्॥२॥
अर्थ - चन्द्र, सूर्य और अग्नि – तीनों जिनके नेत्र हैं, उन विरूपनयन महेश्वर, देवेश्वर, देवदुःखदलन, विभु, विश्वनाथ, विभूतिभूषण, नित्यानन्दस्वरूप, पंचमुख भगवान् महादेवकी मैं स्तुति करता हूँ। ॐ नमः शिवाय॥२॥
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गिरीशं गणेशं गले नीलवर्णं गवेन्द्राधिरूढं गणातीतरूपम्।
भवं भास्वरं भस्मना भूषिताङ्गं भवानीकलत्रं भजे पञ्चवक्त्रम्॥३॥
अर्थ - जो कैलासनाथ हैं, गणनाथ हैं, नीलकण्ठ हैं, बैलपर चढ़े हुए हैं, अगणित रूपवाले हैं, संसारके आदिकारण हैं, प्रकाशस्वरूप हैं, शरीरमें भस्म लगाये हुए हैं और श्रीपार्वतीजी जिनकी अर्द्धांगिनी हैं, उन पंचमुख महादेवजीको मैं भजता हूँ। ॐ नमः शिवाय॥३॥
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शिवाकान्त शम्भो शशांकार्धमौले महेशान शूलिन् जटाजूटधारिन्।
त्वमेको जगद-व्यापको विश्वरूप प्रसीद प्रसीद प्रभो पूर्णरूप॥४॥
अर्थ - हे पार्वतीवल्लभ महादेव! हे चन्द्रशेखर! हे महेश्वर! हे त्रिशूलिन्! हे जटाजूटधारिन्! हे विश्वरूप! एकमात्र आप ही जगत्में व्यापक हैं। हे पूर्णरूप प्रभो! प्रसन्न होइये, प्रसन्न होइये। ॐ नमः शिवाय॥४॥
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परात्मानमेकं जगद्बीजमाद्यं निरीहं निराकारम-ओमकारवेद्यम्।
यतो जायते पाल्यते येन विश्वं तमीशं भजे लीयते यत्र विश्वम्॥५॥
अर्थ - जो परमात्मा हैं, एक हैं, जगत्के आदिकारण हैं, इच्छारहित हैं, निराकार हैं और प्रणवद्वारा जाननेयोग्य हैं तथा जिनसे सम्पूर्ण विश्वकी उत्पत्ति और पालन होता है और फिर जिनमें उसका लय हो जाता है उन प्रभुको मैं भजता हूँ। ॐ नमः शिवाय॥५॥
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न भूमिर्न चापो न वह्निर्न वायु- र्न चाकाशमास्ते न तन्द्रा न निद्रा।
न ग्रीष्मो न शीतं न देशो न वेषो न यस्यास्ति मूर्तिस्त्रिमूर्तिं तमीडे॥६॥
अर्थ - जो न पृथ्वी हैं, न जल हैं, न अग्नि हैं, न वायु हैं और न आकाश हैं; न तन्द्रा हैं, न निद्रा हैं, न ग्रीष्म हैं और न शीत हैं तथा जिनका न कोई देश है, न वेष है, उन मूर्तिहीन त्रिमूर्तिकी मैं स्तुति करता हूँ। ॐ नमः शिवाय॥६॥
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अजं शाश्वतं कारणं कारणानां शिवं केवलं भासकं भासकानाम्।
तुरीयं तमःपारमाद्यन्तहीनं प्रपद्ये परं पावनं द्वैतहीनम्॥७॥
अर्थ - जो अजन्मा हैं, नित्य हैं, कारणके भी कारण हैं, कल्याणस्वरूप हैं, एक हैं, प्रकाशकोंके भी प्रकाशक हैं, अवस्थात्रयसे विलक्षण हैं, अज्ञानसे परे हैं, अनादि और अनन्त हैं, उन परमपावन अद्वैतस्वरूपको मैं प्रणाम करता हूँ । ॐ नमः शिवाय॥७॥
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नमस्ते नमस्ते विभो विश्वमूर्ते नमस्ते नमस्ते चिदानन्दमूर्ते।
नमस्ते नमस्ते तपोयोगगम्य नमस्ते नमस्ते श्रुतिज्ञानगम्य॥८॥
अर्थ - हे विश्वमूर्ते! हे विभो! आपको नमस्कार है, नमस्कार है। हे चिदानन्दमूर्ते! आपको नमस्कार है, नमस्कार है। हे तप तथा योगसे प्राप्तव्य प्रभो! आपको नमस्कार है, नमस्कार है। हे वेदवेद्य भगवन्! आपको नमस्कार है, नमस्कार है। ॐ नमः शिवाय॥८॥
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प्रभो शूलपाणे विभो विश्वनाथ महादेव शम्भो महेश त्रिनेत्र।
शिवाकान्त शान्त स्मरारे पुरारे त्वदन्यो वरेण्यो न मान्यो न गण्यः॥९॥
अर्थ - हे प्रभो! हे त्रिशूलपाणे! हे विभो! हे विश्वनाथ! हे महादेव! हे शम्भो! हे महेश्वर! हे त्रिनेत्र! हे पार्वतीप्राणवल्लभ! हे शान्त! हे कामारे! हे त्रिपुरारे! तुम्हारे अतिरिक्त न कोई श्रेष्ठ है, न माननीय है और न गणनीय है। ॐ नमः शिवाय॥९॥
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शम्भो महेश करुणामय शूलपाणे गौरीपते पशुपते पशुपाशनाशिन्।
काशीपते करुणया जगदेतदेकस्त्वं हंसि पासि विदधासि महेश्वरोऽसि॥१०॥
अर्थ - हे शम्भो! हे महेश्वर! हे करुणामय! हे त्रिशूलिन्! हे गौरीपते! पशुपते! हे पशुबन्धमोचन! हे काशीश्वर! एक तुम्हीं करुणावश इस जगत्की उत्पत्ति, पालन और संहार करते हो; प्रभो! तुम ही इसके एकमात्र स्वामी हो। ॐ नमः शिवाय॥१०॥
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त्वत्तो जगद्भवति देव भव स्मरारे त्वय्येव तिष्ठति जगन्मृड विश्वनाथ।
त्वय्येव गच्छति लयं जगदेतदीश लिङ्गात्मकं हर चराचरविश्वरूपिन्॥११॥
अर्थ - हे देव! हे शंकर! हे कन्दर्पदलन! हे शिव! हे विश्वनाथ! हे ईश्वर! हे हर! हे चराचरजगद्रूप प्रभो! यह लिंगस्वरूप समस्त जगत् तुम्हींसे उत्पन्न होता है, तुम्हींमें स्थित रहता है और तुम्हींमें लय हो जाता है। ॐ नमः शिवाय॥११॥
II इति श्रीमच्छङ्कराचार्यकृतो वेदसारशिवस्तवः सम्पूर्णम् II
🌹🌹// श्री शिव चालीसा पाठ //🌹🌹
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।दोहा।।
श्री गणेश गिरिजा सुवन, मंगल मूल सुजान।
कहत अयोध्यादास तुम, देहु अभय वरदान॥
जय गिरिजा पति दीन दयाला। सदा करत सन्तन प्रतिपाला॥
भाल चन्द्रमा सोहत नीके। कानन कुण्डल नागफनी के॥
अंग गौर शिर गंग बहाये। मुण्डमाल तन छार लगाये॥
वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे। छवि को देख नाग मुनि मोहे॥
मैना मातु की ह्वै दुलारी। बाम अंग सोहत छवि न्यारी॥
कर त्रिशूल सोहत छवि भारी। करत सदा शत्रुन क्षयकारी॥
नन्दि गणेश सोहै तहँ कैसे। सागर मध्य कमल हैं जैसे॥
कार्तिक श्याम और गणराऊ। या छवि को कहि जात न काऊ॥
देवन जबहीं जाय पुकारा। तब ही दुख प्रभु आप निवारा॥
किया उपद्रव तारक भारी। देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी॥
तुरत षडानन आप पठायउ। लवनिमेष महँ मारि गिरायउ॥
आप जलंधर असुर संहारा। सुयश तुम्हार विदित संसारा॥
त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई। सबहिं कृपा कर लीन बचाई॥
किया तपहिं भागीरथ भारी। पुरब प्रतिज्ञा तसु पुरारी॥
दानिन महं तुम सम कोउ नाहीं। सेवक स्तुति करत सदाहीं॥
वेद नाम महिमा तव गाई। अकथ अनादि भेद नहिं पाई॥
प्रगट उदधि मंथन में ज्वाला। जरे सुरासुर भये विहाला॥
कीन्ह दया तहँ करी सहाई। नीलकण्ठ तब नाम कहाई॥
पूजन रामचंद्र जब कीन्हा। जीत के लंक विभीषण दीन्हा॥
सहस कमल में हो रहे धारी। कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी॥
एक कमल प्रभु राखेउ जोई। कमल नयन पूजन चहं सोई॥
कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर। भये प्रसन्न दिए इच्छित वर॥
जय जय जय अनंत अविनाशी। करत कृपा सब के घटवासी॥
दुष्ट सकल नित मोहि सतावै । भ्रमत रहे मोहि चैन न आवै॥
त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो। यहि अवसर मोहि आन उबारो॥
लै त्रिशूल शत्रुन को मारो। संकट से मोहि आन उबारो॥
मातु पिता भ्राता सब कोई। संकट में पूछत नहिं कोई॥
स्वामी एक है आस तुम्हारी। आय हरहु अब संकट भारी॥
धन निर्धन को देत सदाहीं। जो कोई जांचे वो फल पाहीं॥
अस्तुति केहि विधि करौं तुम्हारी। क्षमहु नाथ अब चूक हमारी॥
शंकर हो संकट के नाशन। मंगल कारण विघ्न विनाशन॥
योगी यति मुनि ध्यान लगावैं। नारद शारद शीश नवावैं॥
नमो नमो जय नमो शिवाय। सुर ब्रह्मादिक पार न पाय॥
जो यह पाठ करे मन लाई। ता पार होत है शम्भु सहाई॥
ॠनिया जो कोई हो अधिकारी। पाठ करे सो पावन हारी॥
पुत्र हीन कर इच्छा कोई। निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई॥
पण्डित त्रयोदशी को लावे। ध्यान पूर्वक होम करावे ॥
त्रयोदशी ब्रत करे हमेशा। तन नहीं ताके रहे कलेशा॥
धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे। शंकर सम्मुख पाठ सुनावे॥
जन्म जन्म के पाप नसावे। अन्तवास शिवपुर में पावे॥
कहे अयोध्या आस तुम्हारी। जानि सकल दुःख हरहु हमारी॥
॥दोहा॥
नित्त नेम कर प्रातः ही, पाठ करौं चालीसा।
तुम मेरी मनोकामना, पूर्ण करो जगदीश॥
मगसर छठि हेमन्त ॠतु, संवत चौसठ जान।
अस्तुति चालीसा शिवहि, पूर्ण कीन कल्याण॥
// 🌹🌹श्री शिव निरंजनम् 🌹🌹//
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जय गंगाधर हर शिव, जय गिरिजाधीश
त्वं मां पालन नित्यं कृपया जगदीश... हर हर महादेव
कैलासे गिरिशिखरे, कल्पद्रुम विपिने शिव कल्पद्रु विपिने
गुंजति मधुकर पूंजे कुंजवने गहने...हर हर महादेव
कोकिल कूजति खेलति, हंसावन ललिता-शिव...
रचयति कला कलापं नृत्यति संहिता... हर हर महादेव
तस्मिन्ललित सुदेशे शाखा मणि रचिता-शिव...
तन्मध्ये हर निकटे गौरी मुद सहिता... हर हर महादेव
क्रीडां रचयति भूषा रंजित निजमीशम्-शिव...
ब्रह्मादिक सुरसेवित प्रणमतिते शीर्षम... हर हर महादेव
विबुधवधू बहुनृत्यति हृदये सुदसहिता-शिव...
किन्नरगानं कुरुते सप्तस्वर सहित... हर हर महादेव
धिनकत थैथै धिनकत मृदंग वाद्यते-शिव...
कण कण ललित सुवेणु मधुरं नादयते... हर हर महादेव
रूणु रूणु चरणे रचयति नुपूर मुज्वलिता-शिव...
चक्रावर्ते भ्रमयति कुरुते तां धिक्ताम्... हर हर महादेव
तां तां लुपचुप तालं मधुरं नादयते-शिव...
अंगुष्ठांगुली नादं लास्यकतां कुरुते... हर हर महादेव
कर्पूर धौति गौरं पंचानन सहितम्-शिव...
त्रिनयन शशिधर मौले विषधर कण्ठयुतम्... हर हर महादेव
सुंदर जटा कलापं पावकयुत भालम्-शिव...
त्रिशूल डमरू पिनाकं करघृत नृकपालम्... हर हर महादेव
शंख निनादं कृत्वाझल्लरी नादयते-शिव...
नीराजयते ब्रह्मा वेद ऋचां पठते... हर हर महादेव
इति मृदुचरण सरोजे ह्रदिकमले घृत्वा-शिव...
अवलोकयति महेशम् ईशम् अभिनत्वा... हर हर महादेव
रुंड-रचित उर माला पन्नगमुपवतीतम्-शिव...
वाम विभागे रूपम् अति ललितम्... हर हर महादेव
सकल शरीरे मनसिज कृतभस्या भरणम्-शिव...
इति वृषभध्वजरूपं तापत्रय हरणम्... हर हर महादेव
ध्यानम् आरति समये हृदये इति कृत्वा-शिव...
रामं त्रिजटार्नां ईशम् अभिनत्वा... हर हर महादेव
प्रतिदिनमेवं पठनं संगीतं कुरुते-शिव...
शिव सायुज्यं गच्छति भक्त्याः श्रृणोति... हर हर महादेव।
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