सारंगनाथ मंदिर, सारनाथ, काशी, उत्तर प्रदेश भारत
सारंगनाथ मंदिर
इस मंदिर में है महादेव का ससुराल, दर्शन करने से संतान होने की मनोकामना होती है पूर्ण
माता सती के भाई के साथ खुद महादेव रहते हैं विराजमान, सावन में भगवान शिव के यहां पर कल्पवास करने की भी है मान्यता

भगवान शिव की नगरी काशी की तो बात ही निराली है। यहां के कण-कण में भगवान भोलेनाथ विराजमान रहते हैं। शायद ही आपको मालूम हो कि बनारस में ही भगवान भोलेनाथ का एक ऐसा मंदिर भी है, जिसे भगवान महादेव का ससुराल कहा जाता है और यहां पर महादेव अपने भक्तों को दर्शन देने के लिए अपने साले के साथ स्वयं विराजमान हैं। इस मंदिर का नाम है सारंग नाथ मंदिर। चलिए जानने का प्रयास करते हैं यह मंदिर काशी में कहां पर स्थित है और इसका नाम सारंग नाथ क्यों पड़ा।
चलिए सबसे पहले हम आपको बताने का प्रयास करते हैं कि मंदिर कहां पर स्थित है?
सारंगनाथ मंदिर सारनाथ का एक बहुत ही प्रसिद्ध मंदिर है अर्थात हम कह सकते हैं कि सारंग नाथ मंदिर सारनाथ में ही स्थित है शहर सारनाथ का नाम भी सारंग नाथ के नाम पर ही सारनाथ पड़ा है ऐसी मान्यता है।
भगवान भोलेनाथ की ससुराल कहलाने वाला सारंगनाथ नामक यह मंदिर काशी के कैंट रेलवे स्टेशन से लगभग सात किलोमीटर की दूरी पर स्थित है । धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस मंदिर को शिव का ससुराल माना जाता है।
चलिए अब हम आपको बताते हैं कि इसे भगवान शिव का ससुराल क्यों कहा जाता है ?
पुराणों में मिले वर्णनों के आधार पर यह तो हम सभी जानते हैं कि भगवान महादेव का विवाह राजा दक्ष की पुत्री सती से हुआ था। सती के बड़े भाई ऋषि सारंग थे जो सती के विवाह के समय विवाह में उपस्थित नहीं थे।
जब ऋषि सारंग घर वापस लौटे तो उन्हें अपनी बहन के विवाह की जानकारी हुई। ऋषि को पता चला कि उनकी बहन की शादी कैलाश पर रहने वाले औघड़ से की गयी है, जिसके पास रहने और खाने की बात तो दूर पहनने तक के लिए वस्त्र भी नहीं है, तो यह सुनकर सारंग ऋषि बहुत परेशान हो गये कि भस्म रमाने वाले एक बाघांबर धारी के साथ उनकी बहन कैसे सुखी रह पाएगी।
ऋषि सारंग ने भगवान शंकर को खोजना शुरू कर दिया। तो उन्हें जानकारी मिली कि बहन सती व महादेव विमुक्त नगरी काशी में विचरण कर रहे हैं। यह जानकर सारंग ऋषि बहुत सा धन लेकर अपनी बहन से मिलने के लिए निकले थे। कहते हैं कि जहां यह मंदिर है उस स्थान पर आकर उन्होंने अपना आश्रम बना लिया और भगवान शिव और सती को खोजने लगे। एक दिन बहुत थक जाने के कारण थक जाने के कारण उन्हें नींद आ गयी। सारंग ऋषि ने सपना देखा कि काशी नगरी तो सोने से बनी हुई हे। इसके बाद उन्हें अपनी गलती का अहसास हुआ और बहनोई के बारे में क्या-क्यो सोचने को लेकर उन्हें ग्लानी भी हुई। इसके बाद उन्होंने प्रण किया कि वह अब यही रह कर बाबा विश्वनाथ की तपस्या करेंगे।
सारंगनाथ महादेव मंदिर में नंदी
सारंगनाथ महादेव मंदिर में नंदी के कान में अपनी मुराद पूरी करने के लिए कहती हुए।

ऋषि के तप से प्रसन्न होकर महादेव ने सती के साथ दिया था दर्शन
ऋषि सारंग ने कठोर तप आरंभ कर दिया था। तपस्या करते उनके शरीर से लावे की तरह गोंद निकलने लगी थी लेकिन उन्हें भगवान भोलेनाथ के दर्शन नहीं हुए। ऋषि ने अपनी तपस्या जारी रखी। सारंग ऋषि की तपस्या से प्रसन्न होकर महादेव ने माता सती के साथ उन्हें दर्शन दिया था। इसके बाद महादेव ने सारंग ऋषि को साथ चलने को कहा।
ऋषि सारंग ने कठोर तप आरंभ कर दिया था। तपस्या करते उनके शरीर से लावे की तरह गोंद निकलने लगी थी लेकिन उन्हें भगवान भोलेनाथ के दर्शन नहीं हुए। ऋषि ने अपनी तपस्या जारी रखी। सारंग ऋषि की तपस्या से प्रसन्न होकर महादेव ने माता सती के साथ उन्हें दर्शन दिया था। इसके बाद महादेव ने सारंग ऋषि को साथ चलने को कहा।
इस पर ऋषि ने कहा कि बहन के घर भाई का रहना उचित नहीं है लेकिन जीजा का अपने साले की घर में रहना उचित है। इस जगह आपने मुझे दर्शन दिए हैं और यह पवित्र और पावन हो गई है इसलिए मैं इसे नहीं छोड़ सकता। मेरी आपसे प्रार्थना है कि आप मेरे साथ यही विराजमान हो और भगवान भोलेनाथ ने उनके साथ रहने का आश्वासन दे दिया। जहां वो अपने साले के साथ सदियों से विराजमान हैं।
इस प्रकार यह सारनाथ नामक स्थान पर भगवान भोलेनाथ की ससुराल कहालाया। यह तो थी किसा रंगनाथ मंदिर को भगवान भोलेनाथ की ससुराल क्यों कहा जाता है। इस प्रकार सारंग ऋषि की भक्ति से प्रसन्न हो काशी विश्वनाथ यहां पर अपने साले के साथ सोमनाथ रुप में विराजमान है। इस मंदिर में सारंगनाथ महादेव व बाबा सोमनाथ रूपी विश्वनाथ की एक साथ पूजा होती है।
साथ ही उन्होंने ऋषि सारंग से कहा की है सारंग भविष्य में तुम सारंगनाथ के नाम से जाने जाओगे। कलयुग में तुम्हे गोंद चढ़ाने की परम्परा रहेगी। जा चर्म रोगी सच्चे मन से गोंद चढ़ायेगा उसे चर्म रोग से मुक्ति मिल जायेगी।
चलिए अब हम आपको बताते हैं कि यहां पर कल्पवास क्यों किया जाता है?
मान्यता है कि सावन के महीने में भोलेनाथ काशी छोड़ कर देवी पार्वती के साथ अपने साले सारंगनाथ महादेव के यहां मेहमान बन कर रहते हैं।
भारतवर्ष ही नहीं विश्व के सभी शिव भक्तों के लिए सावन माह बहुत महत्वपूर्ण होता है। ऐसी मान्यता है कि महाशिवरात्रि व सावन में पूजा करने से महादेव बहुत जल्दी प्रसन्न हो जाते हैं। जब सारंग ऋषि ने भगवान महादेव को यहां निवास करने के लिए कहा तो भगवान महादेव ने सारंग ऋषि को आशीर्वाद देते हुए कहा था कि हे सारंग ! मैं सावन के महीने में काशी छोड़कर देवी पार्वती के साथ आपके साथ निवास किया करूंगा। जो लोग यहां कल्पवास करेंगे मैं उनकी हर मनोकामना पूर्ण करूंगा।
जैसा की मान्यता है कि सावन में बाबा विश्वनाथ यहां निवास करते हैं और जो भी व्यक्ति सावन में काशी विश्वनाथ मंदिर के दर्शन नहीं कर पाता वह एक दिन भी यदि सारंगनाथ का दर्शन करेगा। उसे काशी विश्वनाथ मंदिर में जलाभिषेक के बराबर पुण्य मिलेगा।
उन्हें आशीर्वाद दिया कि वो सारंगनाथ महादेव कहलाएंगे।" सारंगनाथ ने भोलेनाथ से कहा, "वो यहीं रहे।" भोलेनाथ ने सारंगनाथ को वचन दिया था कि सावन के महीने में वह काशी छोड़कर देवी पार्वती के साथ उनके यहां रहेंगे।"
सारंगनाथ महादेव मंदिर के गर्भगृह में एक ही जगह पर दो शिवलिंग हैं। इस मंदिर में भोलेनाथ सोमनाथ के रूप में विराजते हैं। मंदिर के पुजारी के बताए अनुसार सारंगनाथ का शिवलिंग लंबा है और सोमनाथ का शिवलिंग गोल आकार में और ऊंचा है। इस मंदिर में जीजा (भगवान भोलेनाथ) व साले (सारंग) की पूजा एक साथ होती है । इसलिए इस मंदिर को जीजा साले का भी मंदिर कहा जाता है।
कौन सा रंगनाथ और कौन सोमनाथ ?
सारंगनाथ महादेव मंदिर के गर्भगृह में दो शिवलिंग हैं। इनमें से एक सारंगनाथ महादेव हैं और दूसरे उनके जीजा भोलेनाथ हैं।जैसा कि हम जानते हैं कि इस मंदिर में काशी विश्वनाथ अपने साले के साथ सोमनाथ रुप में विराजमान है। इस मंदिर में सारंग व बाबा सोमनाथ रूपी विश्वनाथ दोनों लिंग रूप में विराजमान है और उनकी एक साथ पूजा होती है।
अब कैसे पहचाने कि कौन सारंग है और कौन सारंगनाथ ? तो हम आपको बता दें कि सारंग का शिवलिंग लम्बा है और सोमनाथ का गोलाकार और ऊंचा है।
ससुराल और मायके का संबंध सुदृढ़ बनता है
विवाह के बाद यहां पर दर्शन करने से ससुराल और मायके का संबंध अच्छा बना रहता है।
होती है संतान की प्राप्ति !
जिस किसी दम्पत्ति का संतान नहीं हो रही है तो यहां पर दर्शन करने तथा मान्यता लेने पर उन्हें संतान सुख अवश्य प्राप्त होता है।
वर्तमान शिवलिंग किसने स्थापित किए ?
बताया जाता है कि सारनाथ से ही बौद्ध धर्म का तेजी से प्रचार-प्रसार शुरू हुआ था। कहा जाता है कि जब बौद्ध धर्म चरम सीमा पर था तब आदि गुरु शंकराचार्य जी अपने भ्रमण पर थे। उस दौरान आदि शंकराचार्य ने यहां के बौद्ध गुरुओं से शास्त्रार्थ कर उन्हें हरा दिया था। और यहां पर शिवलिंग की स्थापना की। ये शिवलिंग भी उन्ही के द्वारा स्थापित किया हुआ है। यह तो हम सभी जानते हैं कि उन्होंने जहां जहां भ्रमण किया वहां वहां शिवलिंग की स्थापना की थी।
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