Kashi Darshan

काशी
काशी में नाम लेते ही हमें एक नाम की याद आती है वह है काशी विश्वनाथ जी हां काशी विश्वनाथ मंदिर पिछले कई हजार वर्षों से वाराणसी में अर्थात काशी में ही स्थित है। काशी विश्वनाथ मंदिर बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक होने के कारण हिंदू धर्म में एक विशिष्‍ट स्‍थान रखता है। । ऐसी मान्यता है कि एक बार इस मंदिर के दर्शन करने और पवित्र गंगा में स्‍नान कर लेने से व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति होती है। 

शायद इसीलिए इस मंदिर में दर्शन करने के लिए आदि शंकराचार्य, सन्त एकनाथ, गोस्‍वामी तुलसीदास आदि का आगमन हुआ है। यहीं पर सन्त एकनाथजी ने वारकरी सम्प्रदाय का महान ग्रन्थ 'श्रीएकनाथी भागवत' लिखकर पूरा किया और काशीनरेश तथा विद्वतजनों द्वारा उस ग्रन्थ की हाथी पर धूमधाम से शोभायात्रा निकाली गयी। 

सर्वतीर्थमयी एवं सर्वसंतापहारिणी मोक्षदायिनी काशी की महिमा ऐसी है कि यहां प्राणत्याग करने प्राणी जीवन के आवागमन से मुक्ति मिल जाती है। चाहे मृत-प्राणी कोई भी क्यों न हो। कहते हैं कि भगवान भोलेनाथ मरते हुए प्राणी के कान में तारक-मंत्र का उपदेश करते हैं, जिससे वह आवगमन से छुट जाता है। ऐसा कहा जाता है कि जिस व्यक्ति के कान में तारक मंत्र का उपदेश दिया गया होता है उस व्यक्ति के का मृत्यु उपरांत टेढ़े देखे जा सकते हैं इसे काशीवासी अनुमान लगाते हैं कि यह व्यक्ति अपने आवागमन से मुक्त हो गया है।

मतस्यपुराण का मत है कि जप, ध्यान और ज्ञान से रहित एवं दुखों से पीड़ित जनों के लिये काशीपुरी ही एकमात्र गति है। 




महाशिवरात्रि की मध्य रात्रि में प्रमुख मंदिरों से भव्य शोभा यात्रा ढोल नगाड़े इत्यादि के साथ बाबा विश्वनाथ जी के मंदिर तक जाती है। 

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के दृढ़ संकल्प से काशी कारीडोर के अन्तर्गत काशी विश्वनाथ जी के मंदिर का विस्तार किया गया जो अद्भुत अकल्पनीय साथ ही आश्चर्य जनित भी है प्रत्येक काशी वासियों ने ऐसी परिकल्पना भी नहीं की होगी । माननीय प्रधानमंत्री मोदी जी ने 8 मार्च 2019 को काशी विश्वनाथ कारीडोर का शिलान्यास किया गया लगभग 32 महिनों के अनवरत निर्माण कार्य के बाद 13 दिसम्बर 2021 मोदी जी द्वारा लोकार्पण किया गया ।

ललिता घाट के रास्ते प्रथम भारत माता के दर्शन होते हैं फिर अहिल्या बाई की मूर्ति है आगे चलकर ज्ञानवापी में नंदी जी के दर्शन एवं स्पर्श करने की सुविधा है जो आज के पूर्व संभव नहीं था वही दूसरी ओर काशी विश्वनाथ मंदिर न्यास द्वारा विभिन्न प्रकार की सुविधाएं प्राप्त करने हेतु सुगम दर्शन से लेकर रुद्राभिषेक विभिन्न आरती इत्यादि के लिए शुल्कों का प्रावधान कर जिस तरह से जन साधारण विशेष कर नित्य पूजार्चन करने वालों के लिए यह कष्टप्रद है किसी भी ज्योतिर्पिठ का व्यवसायी करण उचित नहीं है। बाबा विश्वनाथ जी के गर्भ गृह में प्रधानमंत्री जी की प्रेरणा से 60 कि. ग्रा.भार के सोने से गर्भ गृह में पत्तर चढ़ाने का कार्य किया गया है वर्तमान समय में ज्ञान वापी कूप नंदी बहुत चर्चा में हैं| 

श्री काशी विश्वनाथ, विश्वेश्वर

सम्बद्धता                    हिंदू धर्म
देवता                         विश्वनाथ
अवस्थिति                   वाराणसी, उत्तर प्रदेश
वास्तु विवरण शैली       हिन्दू वास्तुकला
निर्माता                       महारानी अहिल्या बाई होल्कर
स्थापित                      1780

सामान्यतः वाराणसी शहर को कम से कम 5,000 वर्ष प्राचीन तो माना ही जाता है। यह नगर चंदन, मलमल और रेशमी कपड़ों, इत्रों, हाथी दाँत और शिल्प कला के लिये व्यापारिक एवं औद्योगिक केन्द्र रहा है। 

गौतम बुद्ध (जन्म 567 ई.पू.) के काल में, वाराणसी, काशी राज्य की राजधानी हुआ करता था। प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेन त्सांग ने नगर को धार्मिक, शैक्षणिक एवं कलात्मक गतिविधियों का केन्द्र बताया है और इसका विस्तार गंगा नदी के किनारे 5 कि॰मी॰ तक लिखा है।

जिसका जीर्णोद्धार 11 वीं सदी में राजा हरीशचन्द्र ने करवाया था और वर्ष 1194 में मुहम्मद गौरी ने ही इसे तुड़वा दिया था। 

जिसे एक बार फिर बनाया गया लेकिन वर्ष 1447 में पुनं इसे जौनपुर के सुल्तान महमूद शाह ने तुड़वा दिया।

वर्तमान मंदिर का निर्माण महारानी अहिल्या बाई होल्कर द्वारा सन् 1780 में करवाया गया था। 

बाद में महाराजा रणजीत सिंह द्वारा 1853 में 1000 कि.ग्रा शुद्ध सोने द्वारा बनवाया गया था।

 कहा जाता है कि गंगा नदी के पश्चिमी तट पर स्थित यह मंदिर भगवान शिव और माता पार्वती का आदि निवास स्थान है।

पुराणों में वर्णन मिलता है कि जब शादी के उपरांत देवी पार्वती अपने पिता के घर रह रही थीं। जहां उन्हें बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगता था। देवी पार्वती ने एक दिन भगवना शिव से उन्हें अपने घर ले जाने के लिए आग्रह किया, उन्होंने भगवान शिव से अपने मन की बात कही। भगवान शिव देवी पार्वती की बात मानकर उन्हें काशी लेकर आए और यहां विश्वनाथ-ज्योतिर्लिंग के रूप में खुद को स्थापित कर लिया।

कहते हैं कि आदि नगरी है यह कभी नष्ट नहीं होती, प्रलयकाल में भगवान शिव काशी को अपने त्रिशूल पर धारण कर लेते हैं और सृष्टि काल आने पर इसे पुनः नीचे उतार देते हैं। इस प्रकार का शिकार कभी अंत नहीं होता।

जैसा कि ऊपर हम आपको बता चुके हैं कि काशी की भूमि को आदि सृष्टि स्थली भी बतलाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि इसी स्थान पर भगवान विष्णु ने सृष्टि उत्पन्न करने की कामना से तपस्या करके भगवान आशुतोष को प्रसन्न किया था और फिर उनके शयन करने पर उनके नाभि-कमल से ब्रह्मा उत्पन्न हुए, जिन्होने सारे संसार की रचना की। 

अगस्त्य मुनि ने भी इसी स्थान पर विश्वेश्वर अर्थात विश्वनाथ की बड़ी आराधना की थी और भगवान विश्वेश्वर की कृपा से श्रीवशिष्ठजी तीनों लोकों में पुजित हुए तथा राजर्षि विश्वामित्र ब्रह्मर्षि कहलाये।

आदि देव भगवान शंकर की बसायी धर्म नगरी काशी की सबसे बड़ी बात की नगर काशी में सावन महीने का अलग ही महत्व है। यहां सावन महीने में कांवरियों का सैलाब उमड़ता है। 

सर्वप्रथम काशी के यदुवंशी (Yadav) "चंद्रवंशी गोप सेवा समिति" अपने प्रिय देव बाबा विश्वनाथ के शिवलिंग पर जलाभिषेक करते हैं। ये परंपरा करीब 90 साल पुरानी है। पहली बार इस परंपरा की शुरूआत 1932 में हुई जो अब तक निर्विवाद् रूप से जारी है। पिछले दो वर्ष कोरोना संक्रमण के चलते चंद्रवंशी गोप सेवा समिति ने सांकेतिक रूप से ही सही पर परंपरा को जीवित रखा और सीमित संख्या में ही बाबा का जलाभिषेक किया। 

चंद्रवंशी गोप सेवा समिति के प्रदेश अध्यक्ष लालजी यादव बताते हैं कि सन 1932 में पड़े अकाल के समय बाबा विश्वनाथ के जलाभिषेक की परम्परा शुरू हुई थी। तब से अब तक इस परम्परा का निर्वहन निरंतरत जारी है। मान्यता है कि यादव (Ahir) बंधुओं के जलाभिषेक से बाबा प्रसन्न होते हैं फिर वर्षा होती है। पूरा साल धन-धान्य से परिपूर्ण होता है। भारत में वर्ष 1932 में घोर अकाल के दौरान यहां के यदुवंशियों ने बाबा विश्वनाथ का जलाभिषेक किया था। जलाभिषेक होते ही वर्षा शुरू हुई और लगातार तीन दिनों तक होती रही। तभी से हर वर्ष यदुवंशी (यादव) समाज को ही सावन के पहले सोमवार को सर्वप्रथम बाबा का जलाभिषेक करने का अधिकार प्राप्त है।




महिमा



विश्वेश्वर के आनंद-कानन में पा पांचों तीर्थ युक्त यह क्षेत्र अविमुक्त क्षेत्र कहा जाता है

गंगा तट पर बसी काशी बड़ी पुरानी नगरी है। इतने प्राचीन नगर संसार में बहुत नहीं हैं। वाराणसी का मूल नगर काशी था। पौराणिक कथाओं के अनुसार, काशी नगर की स्थापना हिन्दू भगवान शिव ने हजारों वर्ष पूर्व की थी, जिस कारण ये आज एक महत्त्वपूर्ण तीर्थ स्थल है। ये हिन्दुओं की पवित्र सप्तपुरियों में से एक है। स्कन्द पुराण, रामायण एवं महाभारत सहित प्राचीनतम ऋग्वेद में भी काशी नगर का उल्लेख आता है।

द्वापरयुग
महाभारत पूर्व मगध में राजा जरासन्ध ने राज्य किया और काशी भी उसी साम्राज्य में समा गई। आर्यों के यहां कन्या के विवाह स्वयंवर के द्वारा होते थे। एक स्वयंवर में पाण्डव और कौरव के पितामह भीष्म ने काशी नरेश की तीन पुत्रियों अंबा, अंबिका और अंबालिका का अपहरण किया था। इस अपहरण के परिणामस्वरूप काशी और हस्तिनापुर की शत्रुता हो गई। महाभारत युद्ध में जरासन्ध और उसका पुत्र सहदेव दोनों काम आये। कालांतर में गंगा की बाढ़ ने पाण्डवों की राजधानी हस्तिनापुर को डुबा दिया, तब पाण्डव वर्तमान प्रयागराज जिला में यमुना किनारे कौशाम्बी में नई राजधानी बनाकर बस गए। उनका राज्य वत्स कहलाया और काशी पर मगध की जगह अब वत्स का अधिकार हुआ।

उपनिषद काल
इसके बाद ब्रह्मदत्त नाम के राजकुल का काशी पर अधिकार हुआ। उस कुल में बड़े पंडित शासक हुए और बाद में ज्ञान और पंडिताई ब्राह्मणों से क्षत्रियों के पास पहुंच गई थी। इनके समकालीन पंजाब में कैकेय राजकुल में राजा अश्वपति था। तभी गंगा-यमुना के दोआब में राज करने वाले पांचालों में राजा प्रवहण जैबलि ने भी अपने ज्ञान का डंका बजाया था। इसी काल में जनकपुर, मिथिला में विदेहों के शासक जनक हुए, जिनके दरबार में याज्ञवल्क्य जैसे ज्ञानी महर्षि और गार्गी जैसी पंडिता नारियां शास्त्रार्थ करती थीं। इनके समकालीन काशी राज्य का राजा अजातशत्रु हुआ। ये आत्मा और परमात्मा के ज्ञान में अनुपम था। ब्रह्म और जीवन के सम्बन्ध पर, जन्म और मृत्यु पर, लोक-परलोक पर तब देश में विचार हो रहे थे। इन विचारों को उपनिषद् कहते हैं। इसी से यह काल भी उपनिषद-काल कहलाता है।

महाजनपद युग
युग बदलने के साथ ही वैशाली और मिथिला के लिच्छवियों में साधु वर्धमान महावीर हुए, कपिलवस्तु के शाक्यों में गौतम बुद्ध हुए। उन्हीं दिनों काशी का राजा अश्वसेन हुआ। इनके यहां पार्श्वनाथ हुए जो जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर हुए। उन दिनों भारत में चार राज्य प्रबल थे जो एक-दूसरे को जीतने के लिए, आपस में बराबर लड़ते रहते थे। ये राज्य थे मगध, कोसल, वत्स और उज्जयिनी। कभी काशी वत्सों के हाथ में जाती, कभी मगध के और कभी कोसल के। पार्श्वनाथ के बाद और बुद्ध से कुछ पहले, कोसल-श्रावस्ती के राजा कंस ने काशी को जीतकर अपने राज में मिला लिया। उसी कुल के राजा महाकोशल ने तब अपनी बेटी कोसल देवी का मगध के राजा बिम्बसार से विवाह कर दहेज के रूप में काशी की वार्षिक आमदनी एक लाख मुद्रा प्रतिवर्ष देना आरंभ किया और इस प्रकार काशी मगध के नियंत्रण में पहुंच गई। राज के लोभ से मगध के राजा बिम्बसार के बेटे अजातशत्रु ने पिता को मारकर गद्दी छीन ली। तब विधवा बहन कोसलदेवी के दुःख से दुःखी उसके भाई कोसल के राजा प्रसेनजित ने काशी की आमदनी अजातशत्रु को देना बन्द कर दिया जिसका परिणाम मगध और कोसल समर हुई। इसमें कभी काशी कोसल के, कभी मगध के हाथ लगी। अन्ततः अजातशत्रु की जीत हुई और काशी उसके बढ़ते हुए साम्राज्य में समा गई। बाद में मगध की राजधानी राजगृह से पाटलिपुत्र चली गई और फिर कभी काशी पर उसका आक्रमण नहीं हो पाया।

आधुनिक काशी राज्य
आधुनिक काशी राज्य वाराणसी का राज्य बना है। भारतीय स्वतंत्रता उपरांत अन्य सभी रजवाड़ों के समान काशी नरेश ने भी अपनी सभी प्रशासनिक शक्तियां छोड़ कर मात्र एक प्रसिद्ध हस्ती की भांति रहना आरंभ किया। वर्तमान स्थिति में ये मात्र एक सम्मानीय उपाधि रह गयी है। काशी नरेश का रामनगर किला वाराणसी शहर के पूर्व में गंगा नदी के तट पर बना हुआ है। काशी नरेश का एक अन्य किला चेत सिंह महल, शिवाला घाट, वाराणसी में स्थित है। यहीं महाराज चेत सिंह को ब्रिटिश अधिकारी ने 200 से अधिक ब्रिटिश सैनिकों के संग घेर कर मार गिराया था। रामनगर किला और इसका संग्रहालय अब बनारस के राजाओं के सम्मान में एक स्मारक बना हुआ है। इसके अलावा 18वीं शताब्दी से ये काशी नरेश का आधिकारिक आवास बना हुआ है। आज भी काशी नरेश को शहर में सम्मान की दृष्टि के साथ देखा जाता है। ये शहर के धार्मिक अग्रणी रहे हैं और यहाँ की प्रजा के द्वारा भगवान शिवजी के अवतार माने जाते हैं। ये शहर के धार्मिक संरक्षक भी माने जाते हैं और सभी धामिक कार्यकलापों में अभिन्न भाग लेतें हैं।

काशी नरेशों की सूची

काशी नरेशों की सूची राज्य आरंभ राज्य समाप्त
मनसा राम 1737, 1740
बलवंत सिंह 1740, 1770
चेत सिंह 1770, 1780
नारायण सिंह 1781, 1794
उदित नारायण सिंह 1794, 1835
महाराजा श्री ईश्वरी नारायण सिंह बहादुर 1835, 1889
लेफ़्टि. कर्नल महाराजा श्री सर प्रभु नारायण सिंह बहादुर 1889, 1931
कैप्टन महाराजा श्री सर आदित्य नारायण सिंह 1931, 1939
डॉ॰विभूति नारायण सिंह 1939, 1947
डॉ॰ विभूति नारायण सिंह भारतीय स्वतंत्रता पूर्व के अंतिम काशीनरेश थे। 
इसके बाद 15 अक्टूबर 1948 को काशी राज्य भारतीय संघ में मिल गया। 2000 में इनकी मृत्यु के उपरांत इनके पुत्र अनंत नारायण सिंह ही काशी नरेश हैं और इस परंपरा के वाहक हैं।

पतितपावनी गंगा के तट पर बसी काशी बड़ी पुरानी नगरी है। इतने प्राचीन नगर संसार में बहुत नहीं हैं। आज से हजारों बरस पहले नाटे कद के साँवले लोगों ने इस नगर की नींव डाली थी। तभी यहाँ कपड़े और चाँदी का व्यापार शुरू हुआ। वे नाटे कद के साँवले लोग शान्ति और प्रेम के पुजारी थे।


काशी विश्वनाथ मंदिर नगर से जुड़े 10 रहस्य, आप नहीं जानते होंगे


अनिरुद्ध जोशी
बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक ज्योतिर्लिंग काशी में है जिसे बाबा विश्वनाथ कहते हैं। काशी को बनारस और वाराणसी भी कहते हैं। शिव और काल भैरव की यह नगरी अद्भुत है जिसे सप्तपुरियों में शामिल किया गया है। दो नदियों 'वरुणा' और 'असि' के मध्य बसे होने के कारण इसका नाम 'वाराणसी' पड़ा। 
 
1.शिव के त्रिशुल पर बसी काश
कहते हैं कि गंगा किनारे बसी काशी नगरी भगवान शिव के त्रिशुल की नोक पर बसी है जहां बारह ज्योर्तिलिंगों में से एक काशी विश्वनाथ विराजमान हैं। पतित पावनी भागीरथी गंगा के तट पर धनुषाकारी बसी हुई यह काशी नगरी वास्तव में पाप-नाशिनी है। भगवान शंकर को यह गद्दी अत्यन्त प्रिय है इसीलिए उन्होंने इसे अपनी राजधानी एवं अपना नाम काशीनाथ रखा है।
 
2. विष्णु की पुरी
पुराणों के अनुसार पहले यह भगवान विष्णु की पुरी थी, जहां श्रीहरि के आनंदाश्रु गिरे थे, वहां बिंदु सरोवर बन गया और प्रभु यहां 'बिंधुमाधव' के नाम से प्रतिष्ठित हुए। महादेव को काशी इतनी अच्छी लगी कि उन्होंने इस पावन पुरी को विष्णुजी से अपने नित्य आवास के लिए मांग लिया। तब से काशी उनका निवास स्थान बन गई। काशी में हिन्दुओं का पवित्र स्थान है 'काशी विश्वनाथ'। कहते हैं कि विष्णु ने अपने चिन्तन से यहां एक पुष्कर्णी का निर्माण किया और लगभग पचास हजार वर्षों तक वे यहां घोर तपस्या करते रहे।
 
3.ध्वस्थ कर दिया था यहां का मंदिर
चीनी यात्री (ह्वेनसांग) के अनुसार उसके समय में काशी में सौ मंदिर थे, किन्तु मुस्लिम आक्रमणकारियों ने सभी मंदिर ध्वस्त कर मस्जिदों का निर्माण किया। ईसा पूर्व 11वीं सदी में राजा हरीशचन्द्र ने जिस विश्वनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था उसका सम्राट विक्रमादित्य ने जीर्णोद्धार करवाया था। उसे ही 1194 में मुहम्मद गौरी ने लूटने के बाद तुड़वा दिया था। इतिहासकारों के अनुसार इस भव्य मंदिर को सन् 1194 में मुहम्मद गौरी द्वारा तोड़ा गया था। इसे फिर से बनाया गया, लेकिन एक बार फिर इसे सन् 1447 में जौनपुर के सुल्तान महमूद शाह द्वारा तोड़ दिया गया। पुन: सन् 1585 ई. में राजा टोडरमल की सहायता से पं. नारायण भट्ट द्वारा इस स्थान पर फिर से एक भव्य मंदिर का निर्माण किया गया। इस भव्य मंदिर को सन् 1632 में शाहजहां ने आदेश पारित कर इसे तोड़ने के लिए सेना भेज दी। सेना हिन्दुओं के प्रबल प्रतिरोध के कारण विश्वनाथ मंदिर के केंद्रीय मंदिर को तो तोड़ नहीं सकी, लेकिन काशी के 63 अन्य मंदिर तोड़ दिए गए।
 
डॉ. एएस भट्ट ने अपनी किताब 'दान हारावली' में इसका जिक्र किया है कि टोडरमल ने मंदिर का पुनर्निर्माण 1585 में करवाया था। 18 अप्रैल 1669 को औरंगजेब ने एक फरमान जारी कर काशी विश्वनाथ मंदिर ध्वस्त करने का आदेश दिया। यह फरमान एशियाटिक लाइब्रेरी, कोलकाता में आज भी सुरक्षित है। उस समय के लेखक साकी मुस्तइद खां द्वारा लिखित 'मासीदे आलमगिरी' में इस ध्वंस का वर्णन है। औरंगजेब के आदेश पर यहां का मंदिर तोड़कर एक ज्ञानवापी मस्जिद बनाई गई। 2 सितंबर 1669 को औरंगजेब को मंदिर तोड़ने का कार्य पूरा होने की सूचना दी गई थी।

4.काशी के कोतवाल
भैरव शिव के गण और पार्वती के अनुचर माने जाते हैं। हिंदू देवताओं में भैरव का बहुत ही महत्व है। इन्हें काशी का कोतवाल कहा जाता है। काशी विश्‍वनाथ में दर्शन से पहले भैरव के दर्शन करना होते हैं तभी दर्शन का महत्व माना जाता है। उल्लेख है कि शिव के रूधिर से भैरव की उत्पत्ति हुई। बाद में उक्त रूधिर के दो भाग हो गए- पहला बटुक भैरव और दूसरा काल भैरव। मुख्‍यत: दो भैरवों की पूजा का प्रचलन है, एक काल भैरव और दूसरे बटुक भैरव। 
 
5.काशी में मिलता है मोक्ष
ऐसी मान्यता है कि वाराणसी या काशी में मनुष्य के देहावसान पर स्वयं महादेव उसे मुक्तिदायक तारक मंत्र का उपदेश करते हैं। इसीलिए अधिकतर लोग यहां काशी में अपने जीवन का अंतिम वक्त बीताने के लिए आते हैं और मरने तक यहीं रहते हैं। इसके काशी में पर्याप्त व्यव्था की गई है। वाराणसी कई शताब्दियों से हिन्दू मोक्ष तीर्थस्थल माना जाता है। शास्त्र मतानुसार जब मनुष्य की मृत्यु हो जाती है तो मोक्ष हेतु मृतक की अस्थियां यहीं पर गंगा में विसर्जित की जाती हैं। यह शहर सप्तमोक्षदायिनी नगरी में एक है। 

6.भारत का सबसे प्राचीन शहर काशी
इजिप्ट (मिस्र), बगदाद, देहरान, मक्का, रोम, एथेंस, येरुशलम, बाइब्लोस, जेरिको, मोहन-जोदड़ो, हड़प्पा, लोनान, मोसुल आदि नगरों की दुनिया के प्राचीन नगरों में गिनती की जाती है, लेकिन पौराणिक और ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार दुनिया का सबसे प्राचीन शहर वाराणसी है। दुनिया न भी माने, तो यह भारत का सबसे प्राचीन शहर है।
 
शहरों और नगरों में बसाहट के अब तक प्राप्त साक्ष्यों के आधार पर एशिया का सबसे प्राचीन शहर वाराणसी को ही माना जाता है। इसमें लोगों के निवास के प्रमाण 3,000 साल से अधिक पुराने हैं। हालांकि कुछ विद्वान इसे करीब 5,000 साल पुराना मानते हैं, लेकिन हिन्दू धर्मग्रंथों में मिलने वाले उल्लेख के अनुसार यह और भी पुराना शहर है। विश्व के सर्वाधिक प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद में काशी का उल्लेख मिलता है। इसका उल्लेख उल्लेख महाभारत और उपनिषद में भी किया गया है।
 
7.महात्मा और संतों की नगरी
भगवान बुद्ध ने बोध गया में ज्ञान प्राप्त कर यहीं पर अपना पहला प्रवचन दिया और जैनियों के तीन तीर्थंकरो का जन्म यहीं हुआ इसीलिए यह तीनों धर्मों के लिए पवित्र स्थल है। कबीर ने यहीं पर बैठकर अपने संदेश को दु‍निया में फैलाया। तुलसीदास जी ने यहीं बैठकर रामचरित मानस की रचना की। इस तरह काशी कई महात्मा और संतों की पुण्य स्थली है।

भगवान बुद्ध और शंकराचार्य के अलावा रामानुज, वल्लभाचार्य, संत कबीर, गुरु नानक, तुलसीदास, चैतन्य महाप्रभु, रैदास आदि अनेक संत इस नगरी में आए। एक काल में यह हिन्दू धर्म का प्रमुख सत्संग और शास्त्रार्थ का स्थान बन गया था। संस्कृत पढ़ने के लिए प्राचीनकाल से ही लोग वाराणसी आया करते थे।
 
8.संगीत घरानों की नगरी
वाराणसी के घरानों की हिन्दुस्तानी संगीत में अपनी ही शैली है। सन् 1194 में शहाबुद्दीन गौरी ने इस नगर को लूटा और क्षति पहुंचाई। मुगलकाल में इसका नाम बदलकर मुहम्मदाबाद रखा गया। बाद में इसे अवध दरबार के प्रत्यक्ष नियंत्रण में रखा गया।
 
9.बनारसी पान, बाबू और साड़ी दुनिया में प्रसिद्ध
काशी को बनारस भी कहते हैं। यहां का बनारसी पान, बनारसी सिल्क साड़ी और काशी हिन्दू विश्वविद्यालय संपूर्ण भारत में ही नहीं, विदेश में भी अपनी प्रसिद्धि के लिए ‍चर्चित है। यहां के लोग भी अद्भुत होते हैं, जिन्हें बनारसी बाबू कहते हैं। इनका व्यवहार बहुत मीठा और ज्ञानपूर्ण होता है। दिमाग से तेज होते हैं बनारसी बाबू। देखा जाए तो काशी बहुत बड़े नेता, अभिनेता, गायक, संगीतकार, नृत्यकार और कलाकारों की नगरी है।
 
10. उत्तरकाशी भी काशी
उत्तरकाशी को भी छोटा काशी कहा जाता है। ऋषिकेश उत्तरकाशी जिले का मुख्य स्थान है। उत्तरकाशी जिले का एक भाग बड़कोट एक समय पर गढ़वाल राज्य का हिस्सा था। बड़कोट आज उत्तरकाशी का काफी महत्वपूर्ण शहर है। उत्तरकाशी की भूमि सदियों से भारतीय साधु-संतों के लिए आध्यात्मिक अनुभूति की और तपस्या स्थली रही है। दुनियाभर से लोग यहां वैदिक भाषा सीखने के लिए आते रहे हैं। महाभारत के अनुसार उत्तरकाशी में ही एक महान साधु जड़ भारत ने यहां घोर तपस्या की थी। स्कंद पुराण के केदारखंड में उत्तरकाशी और भागीरथी, जाह्नवी व भीलगंगा के बारे में वर्णन है।







बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक ज्योतिर्लिंग काशी में है जिसे बाबा विश्वनाथ कहते हैं। काशी को बनारस और वाराणसी भी कहते हैं। शिव और काल भैरव की यह नगरी अद्भुत है जिसे सप्तपुरियों में शामिल किया गया है। दो नदियों 'वरुणा' और 'असि' के मध्य बसे होने के कारण इसका नाम 'वाराणसी' पड़ा। आओ जानते हैं बाबा का‍शी विश्वनाथ के 10 अनसुने रहस्य।
 
 
1. त्रिशुल की नोक कर बसी है काशी : पुरी में जगन्नाथ है तो काशी में विश्वनाथ। भगवान शिव के त्रिशुल की नोक पर बसी है शिव की नगरी काशी।
 
2. भगवान शिव की सबसे प्रिय नगरी : भगवान शंकर को यह गद्दी अत्यन्त प्रिय है इसीलिए उन्होंने इसे अपनी राजधानी एवं अपना नाम काशीनाथ रखा है।

 
3. विष्णु की तभोभूमि : विष्णु ने अपने चिन्तन से यहां एक पुष्कर्णी का निर्माण किया और लगभग पचास हजार वर्षों तक वे यहां घोर तपस्या करते रहे। 
 
4. सदाशिव ने की उत्पत्ति काशी की : शिवपुराण अनुसार उस कालरूपी ब्रह्म सदाशिव ने एक ही समय शक्ति के साथ 'शिवलोक' नामक क्षेत्र का निर्माण किया था। उस उत्तम क्षेत्र को 'काशी' कहते हैं। यहां शक्ति और शिव अर्थात कालरूपी ब्रह्म सदाशिव और दुर्गा यहां पति और पत्नी के रूप में निवास करते हैं।

 
5. ब्रह्मा विष्णु और महेष की उत्पत्ति : कहते हैं कि यहीं पर सदाशिव से पहले विष्णु, फिर ब्रह्मा, रुद्र और महेष की उत्पत्ति हुई। 
 
6. काशी में मिलता है मोक्ष : ऐसी मान्यता है कि वाराणसी या काशी में मनुष्य के देहावसान पर स्वयं महादेव उसे मुक्तिदायक तारक मंत्र का उपदेश करते हैं। इसीलिए अधिकतर लोग यहां काशी में अपने जीवन का अंतिम वक्त बीताने के लिए आते हैं और मरने तक यहीं रहते हैं। इसके काशी में पर्याप्त व्यव्था की गई है। यह शहर सप्तमोक्षदायिनी नगरी में एक है।

 
7. उत्तरकाशी भी काशी : उत्तरकाशी को भी छोटा काशी कहा जाता है। ऋषिकेश उत्तरकाशी जिले का मुख्य स्थान है। उत्तरकाशी जिले का एक भाग बड़कोट एक समय पर गढ़वाल राज्य का हिस्सा था। बड़कोट आज उत्तरकाशी का काफी महत्वपूर्ण शहर है। उत्तरकाशी की भूमि सदियों से भारतीय साधु-संतों के लिए आध्यात्मिक अनुभूति की और तपस्या स्थली रही है। महाभारत के अनुसार उत्तरकाशी में ही एक महान साधु जड़ भारत ने यहां घोर तपस्या की थी। स्कंद पुराण के केदारखंड में उत्तरकाशी और भागीरथी, जाह्नवी व भीलगंगा के बारे में वर्णन है।
 
8. ज्योतिर्लिंग : द्वादश ज्योतिर्लिंगों में प्रमुख काशी विश्वनाथ मंदिर अनादिकाल से काशी में है। ह स्थान शिव और पार्वती का आदि स्थान है इसीलिए आदिलिंग के रूप में अविमुक्तेश्वर को ही प्रथम लिंग माना गया है। इसका उल्लेख महाभारत और उपनिषद में भी किया गया है। 1460 में वाचस्पति ने अपनी पुस्तक 'तीर्थ चिंतामणि' में वर्णन किया है कि अविमुक्तेश्वर और विशेश्वर एक ही शिवलिंग है।

 
9. विष्णु की पुरी : पुराणों के अनुसार पहले यह भगवान विष्णु की पुरी थी, जहां श्रीहरि के आनंदाश्रु गिरे थे, वहां बिंदु सरोवर बन गया और प्रभु यहां 'बिंधुमाधव' के नाम से प्रतिष्ठित हुए। महादेव को काशी इतनी अच्छी लगी कि उन्होंने इस पावन पुरी को विष्णुजी से अपने नित्य आवास के लिए मांग लिया। तब से काशी उनका निवास स्थान बन गई।
 
10. धनुषाकारी है यह नगरी : पतित पावनी भागीरथी गंगा के तट पर धनुषाकारी बसी हुई है जो पाप-नाशिनी है।
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वाराणसी - काशी विश्वनाथ मंदिर
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काशी विश्वनाथ मंदिर

काशी विश्वनाथ मंदिर उत्तर प्रदेश के वाराणसी में स्थित है। यह मंदिर हिंदू के सबसे प्रसिद्ध मंदिरों में से एक है और यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। वाराणसी शहर को काशी के नाम से जाना जाता है। इसलिए यह मंदिर काशी विश्वनाथ के नाम से प्रसिद्ध है।

काशी विश्वनाथ मंदिर के बारे में

ऐसा माना जाता है कि काशी में महादेव साक्षात् रूप में वास करते है इसलिए इसे शिव की नगरी भी कहा जाता है। काशी विश्वनाथ मंदिर पवित्र नदी गंगा के पश्चिमी तट पर बना हुआ है। यह भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है। यहाँ पर भगवान शिव वाम रूप में माँ भगवती के साथ विराजमान है। ऐसा कहा जाता है कि इस मंदिर के दर्शन और गंगा में स्नान करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। काशी तीनों लोकों में सबसे सुंदर नगरी है, जो भगवान शिव के त्रिशूल पर विराजती है। इसे आनन्दवन, आनन्दकानन, अविमुक्त क्षेत्र और काशी आदि नामों से स्मरण किया जाता है।

 

काशी विश्वनाथ मंदिर की विशेषता

ऐसी मान्यता है कि जब पृथ्वी का निर्माण हुआ था, तब सूर्य की पहली किरण काशी की धरती पर पडी थी। तभी से काशी ज्ञान और आध्यात्म का केंद्र बन गई।

गंगा किनारे संकरी गली में स्थित विश्वनाथ मंदिर कई मंदिरों और पीठों से घिरा हुआ है। यहाँ पर एक कुआँ है, जो मंदिर के उत्तर में स्थित है जिसे ज्ञानवापी की संज्ञा दी जाती है।

मंदिर के ऊपर एक सोने का बना छत्र है। इस छत्र को चमत्कारी माना जाता है और इसे लेकर एक मान्यता है, अगर भक्त इस छत्र के दर्शन करने के बाद कोई भी कामना करते है तो उसकी वो मनोकामना पूरी हो जाती है। 

काशी विश्वनाथ मंदिर में ज्योतिर्लिंग दो भागों में है। दाहिने भाग में माँ, शक्ति के रूप में विराजमान हैं और दूसरी ओर भगवान शिव वाम रूप में विराजमान हैं। इसीलिए काशी को मुक्ति क्षेत्र कहा जाता है।

श्रृंगार के समय सारी मूर्तियां पश्चिम मुखी होती हैं। इस ज्योतिर्लिंगों में शिव और शक्ति दोनों साथ ही विराजते हैं, जो अद्भुत है। ऐसा दुनिया में कहीं और देखने को नहीं मिलता है।

बाबा विश्वनाथ के दरबार में तंत्र की दृष्टि से चार प्रमुख द्वार हैं, जिनका नाम शांति द्वार, कला द्वार, प्रतिष्ठा द्वार और निवृत्ति द्वार। इन चारों द्वारों का तंत्र में अलग ही स्थान है। पूरी दुनिया में ऐसी कोई जगह नहीं है, जहां शिवशक्ति एक साथ विराजमान हों और तंत्र द्वार भी हो।

भगवान शिव का ज्योतिलिंग गर्भग्रह में ईशान कोण में मौजूद है। इस कोण का मतलब संपूर्ण विद्या और हर कला में परिपूर्ण होना होता है।

काशी विश्वनाथ कैसे पहुँचे ?

हवाई अड्डा

काशी विश्वनाथ मंदिर के सबसे निकटतम लाल बहादुर शास्त्री अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा है। जहाँ से, मंदिर लगभग 25 किमी दूर है। हवाई अड्डे के बाहर से कैब और बसें, निजी और सार्वजनिक सेवाएं उपलब्ध हैं, जो आपको सीधे हवाई अड्डे से मंदिर ले जा सकती हैं।

रेवले स्टेशन

वाराणसी शहर रेलवे स्टेशन अन्य रेलवे स्टेशन से जुड़ा हुआ है। वाराणसी सिटी स्टेशन मंदिर से सिर्फ 2 किमी दूर है और वाराणसी जंक्शन मंदिर से करीब 6 किमी दूर है। मुगलसराय जंक्शन स्टेशन 17 किमी दूर है, लेकिन लगभग 4 किमी दूर मदुआदीह स्टेशन भी है।

सडक द्वारा

वाराणसी के लिए उत्तर प्रदेश के सभी प्रमुख शहरों और कस्बों से लगातार निजी और सार्वजनिक बसों चलती है, साथ ही अन्य शहरों से सड़क द्वारा अच्छे से जुडा हुआ है। इसलिए मंदिर तक आप ऑटो रिक्शा या टैक्सी द्वारा पहुँच सकते है।

 

काशी विश्वनाथ मंदिर में पूजा की जानकारी

इस मंदिर में पाँच आरती होती है।

मंगला आरती
भोग आरती
संध्या आरती
श्रृंगार आरती
शयन आरती

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होम राज्य उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड Kashi Vishwanath Mandir: काशी विश्वनाथ मंदिर में ज्योतिर्लिंग के स्थापना की कहानी जानिए, कितने शिवलिंग हैं और उनकी उत्पत्ति कैसे हुई?
Kashi Vishwanath Mandir: काशी विश्वनाथ मंदिर में ज्योतिर्लिंग के स्थापना की कहानी जानिए, कितने शिवलिंग हैं और उनकी उत्पत्ति कैसे हुई?

ABP Ganga
Updated at: 15 Oct 2021 11:19 AM (IST)
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Vishwanath Jyotirlinga: वाराणसी का काशी विश्वनाथ मंदिर विश्व प्रसिद्ध है. इस मंदिर को कई बार तोड़ा गया और फिर से बनवाया गया.
Kashi Vishwanath Mandir: काशी विश्वनाथ मंदिर में ज्योतिर्लिंग के स्थापना की कहानी जानिए, कितने शिवलिंग हैं और उनकी उत्पत्ति कैसे हुई?

काशी विश्वनाथ मंदिर

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Kashi Vishwanath Jyotirlinga Temple History: काशी की बात हो और काशी विश्वनाथ मंदिर की बात न हो, ऐसा कैसे हो सकता है. भगवान शिव का यह मंदिर उत्तर प्रदेश के वाराणसी शहर में गंगा नदी के किनारे स्थित है. काशी विश्वनाथ मंदिर भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है. इस मंदिर को विश्वेश्वर नाम से भी जाना है. इस शब्द का अर्थ होता है 'ब्रह्माड का शासक'.


विश्वनाथ मंदिर में ज्योतिर्लिंग की स्थापना



पौराणिक कथाओं के मुताबिक, भगवान शिव देवी पार्वती से विवाह करने के बाद कैलाश पर्वत आकर रहने लगे. वहीं देवी पार्वती अपने पिता के घर रह रही थीं जहां उन्हें बिल्कुल अच्छा नहीं लग रहा था. देवी पार्वती ने एक दिन भगवना शिव से उन्हें अपने घर ले जाने के लिए कहा. भगवान शिव ने देवी पार्वती की बात मानकर उन्हें काशी लेकर आए और यहां विश्वनाथ-ज्योतिर्लिंग के रूप में खुद को स्थापित कर लिया.




Kashi Vishwanath Mandir: काशी विश्वनाथ मंदिर में ज्योतिर्लिंग के स्थापना की कहानी जानिए, कितने शिवलिंग हैं और उनकी उत्पत्ति कैसे हुई?

इस मंदिर का उल्लेख महाभारत और उपनिषदों में भी है. इस मंदिर का निर्माण किसने कराया इसके बारे में पुख्ता जानकारी नहीं है. साल 1194 में मुहम्मद गौरी ने इस मंदिर को लूटने के बाद इसे तुड़वा दिया था. इस मंदिर का निर्माण फिर से कराया गया लेकिन जौनपुर के सुल्तान महमूद शाह ने इसे दोबारा तुड़वा दिया. इतिहासकारों के मुताबिक विश्वनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार अकबर के नौरत्नों में से एक राजा टोडरमल ने कराया था. उन्होंने साल 1585 में अकबर के आदेश पर नारायण भट्ट की मदद से इसका जीर्णोद्धार कराया.




Kashi Vishwanath Mandir: काशी विश्वनाथ मंदिर में ज्योतिर्लिंग के स्थापना की कहानी जानिए, कितने शिवलिंग हैं और उनकी उत्पत्ति कैसे हुई?

ज्ञानवापी मस्जिद का इतिहास क्या है


साल 1669 में औरंगजेब ने एक फरमान जारी किया. जिसके बाद उसने काशी विश्वनाथ मंदिर को ध्वस्त करके मस्जिद का निर्माण कराने का आदेश दिया. वहीं कुछ इतिहासकारों के मुताबिक ज्ञानवापी मस्जिद को 14वीं सदी में जौनपुर के शर्की सुल्तानों ने विश्वनाथ मंदिर को तुड़वाकर बनवाया था. लेकिन कई इतिहासकर इस बात से इनकार करते हैं.


हालांकि काशी विश्वनाथ मंदिर के वर्तमान ढांचे का निर्माण इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने साल 1777 में कराया था.


काशी विश्वनाथ मंदिर कब खुलता है


काशी विश्वनाथ मंदिर सुबह 2 बजकर 30 मिनट पर खुलता है. यहां प्रतिदिन पांच बार भगवान शिव की आरती होती है. पहली आरती सुबह 3 बजे और आखिरी आरती रात 10.30 बजे की जाती है.


काशी विश्वनाथ मंदिर कैसे पहुंचे


वाराणसी आप फ्लाइट, ट्रेन, बस या किसी अन्य साधन की मदद से पहुंच सकते हैं.लेकिन अगर आप ट्रेन या बस से बनारस जा रहे हैं तो वहां से ऑटो या ऐप बेस्ड टैक्सी की मदद से भी मंदिर पहुंच सकते हैं. वाराणसी रेलवे स्टेशन से मंदिर की दूरी करीब साढ़े चार किलोमीटर है. बस स्टैंड से भी मंदिर की दूरी करीब इतनी ही है. अगर आप फ्लाइट से वाराणसी पहुंच रहे हैं तो आपको लगभग 25 किलोमीटर का सफर तय करना पड़ेगा. वाराणसी पर्यटन स्थल है इसलिए यहां ठहरने के लिए सस्ते होटल से लेकर मंहगे लॉज मिल जाएंगे.




Kashi Vishwanath Mandir: काशी विश्वनाथ मंदिर में ज्योतिर्लिंग के स्थापना की कहानी जानिए, कितने शिवलिंग हैं और उनकी उत्पत्ति कैसे हुई?

सुरक्षा व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए मंदिर परिसर में सेलफोन, कैमरा, धातु की वस्तुएं, सिगरेट और लाइटर आदि ले जाने की अनुमति नहीं है.


भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंग कौन-कौन से हैं –


सोमनाथ ज्योतिर्लिंग- यह ज्योतिर्लिंग गुजरात के सौराष्ट्र नगर में अरब सागर के तट पर स्थित है.


मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग- आंध्र प्रदेश के कृष्णा जिले में कृष्णा नदी के तट श्रीशैल पर्वत पर स्थापित है.


महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग- भगवान शिव का यह ज्योर्तिंलिंग मध्य प्रदेश के उज्जैन में स्थित है.


ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग- यह ज्योतिर्लिंग मध्य प्रदेश के मालवा में है.             


केदारनाथ ज्योतिर्लिंग- केदारनाथ ज्योतिर्लिंग उत्तराखंड में हिमालय की चोटी पर स्थित है.


भीमशंकर ज्योतिर्लिंग- यह महाराष्ट्र के डाकिनी में है.


विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग- भगवान शिव का यह ज्योतिर्लिंग उत्तर प्रदेश के वाराणसी शहर में स्थित है.


त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग- महाराष्ट्र के नासिकजिले में त्रयंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग है.


वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग- यह झारखंड के संथाल परगना में स्थित है.


नागेश्वर ज्योतिर्लिंग- यह ज्योतिर्लिंग गुजरात के बड़्रौदा में गोमती के पास है.


रामेश्वर ज्योतिर्लिंग- यह तमिलनाडु के रामेश्वर में स्थित है.


घृश्णेश्वर ज्योतिर्लिंग- यह ज्योतिर्लिंग महाराष्ट्र के दौलताबाद स्थित बेरूलठ गांव में स्थापित है.


विश्वनाथ मंदिर से जुड़े रोचक तथ्य



ऐसा माना जाता है कि वाराणसी शहर भगवान शिव के त्रिशूल पर टिका हुआ है.

काशी विश्वनाथ मंदिर को सोने का मंदिर भी कहा जाता है. मंदिर के गुंबद को सोने का बनाया गया है. जिसके लिएपंजाब के महारड रणजीत सिंह ने सोना दान में दिया था.

ऐसीमान्यता है कि पवित्र नदी गंगा में स्नान करके काशी विश्वनाथ मंदिर में दर्शन करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है.

मंदिर के गर्भगृह में मंडप और शिवलिंग है.यह चांदी की चौकोर वेदी में स्थापित हैं. वहीं मंदिर परिसर में कालभैरव, भगवान विष्णु और विरूपाक्ष गौरी के भी मंदिर हैं.

ऐसा माना जाता है कि जब पृथ्वी का निर्माण हुआ तो सूर्य की पहली किरण काशी पर ही पड़ी थी.

इस मंदिर के दर्शन के लिए आदि शंकराचार्य, संत एकनाथ, रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद, महर्षि दयानंद और गोस्वामी तुलसीदास भी आए.

यह मंदिर 15.5 मीटर ऊंचा है.


15:18 = 0.

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Adiyogi #Shambhu || शिव की नगरी.....

Adiyogi #Shambhu || शिव की नगरी काशी ||

काशी का इतना माहात्म्य है कि सबसे बड़े पुराण स्कन्दमहापुराण में

काशीखण्ड के नाम से एक विस्तृत पृथक विभाग ही है। इस पुरी के

बारह प्रसिद्ध नाम काशी, वाराणसी, अविमुक्त क्षेत्र, आनन्दकानन,

महाश्मशान, रुद्रावास, काशिका, तपःस्थली, मुक्तिभूमि, शिवपुरी,

त्रिपुरारिराजनगरी और विश्वनाथनगरी हैं।

स्कन्दपुराण काशी की महिमा का गुणगान करते हुए कहता है-

भूमिष्ठापिन यात्र भूस्त्रिदिवतोऽप युच्चैरथ स्थापकिया या बद्धाभुविमुक्तिदास्युरमृतंयस्य मृताजन्तवः

या नित्यंत्रिजगत्पवित्रतटिनीतीरेस रे सेव्यते सा काशी त्रिपुरारिराजनगरीपायादपायाज्जगत् ॥

जो भूतल पर होने पर भी पृथ्वी से संबद्ध नहीं है, जो जगत की सीमाओं से बंधी होने पर भी सभी का बन्धन काटनेवाली (मोक्ष

दायिनी है, जो महात्रिलोकपावनीगङ्गाके तट पर सुशोभित तथा देवताओं से सुसेवित, त्रिपुरारि भगवान विश्वनाथ की राजधानी वह काशी संपूर्ण जगत् की रक्षा करें। सनातन धर्म के ग्रंथों के अध्ययन से काशी का लोकोत्तर स्वरूप विदित होता है। कहा जाता है कि यह पुरी में बसी होने के कारण इसे वाराणसी भी कहते हैं काशी नाम का अर्थ भी यही है जहां ब्रह्म प्रकाशित हो भगवान शिव काशी को कभी नहीं छोड़ते जहां देह त्यागने मात्र से प्राणी मुक्त हो जाय, वह अविमुक्त क्षेत्र यही है। सनातन धर्मावलंबियों का दृढ विश्वास है कि काशी में देहावसान के समय भगवान शंकर मरणोन्मुख प्राणी को यत्र कुत्रापिवाकाश्य मरणेसमहेश्वरः । जन्तोर्दक्षिणकर णेतुमत्तारंसमुपादिशेत् ॥

भगवान शंकर के त्रिशूल पर बसी है। अतः प्रलय होने पर भी इसका नाश नहीं होता है। वरुणा और असि नामक नदियों के बीच पांच कोस

तारकमन्त्रसुनात हैं। इससे जीव को तत्वज्ञान हो जाता है और उसके सामने अपना ब्रह्मस्वरूपप्रकाशित हो जाता है। शास्त्रों का उद्घोष है-

काशी में कहीं पर भी मृत्यु के समय भगवान विश्वेश्वर (विश्वनाथजी) प्राणियों के दाहिने कान में तारक मन्त्र का उपदेश देते हैं।

तारकमन्त्रसुनकर जीव भव बन्धन से मुक्त हो जाता है। यह मान्यता है। कि केवल काशी ही सीधे मुक्ति देती है, जबकि अन्य तीर्थस्थान काशी

की प्राप्ति कराके मोक्ष प्रदान करते हैं। इस संदर्भ में काशीखण्ड में

लिखा भी है-

अन्यानिमुक्तिक्षेत्राणिकाशीप्राप्तिकराणिच । काशींप्राप्य विमुच्येतनान्यथ तीर्थकोटिभिः ।।

ऐसा इसलिए है कि पांच कोस की संपूर्ण काशी ही विश्व के अधिपति भगवान विश्वनाथ का आधिभौतिक स्वरूप है। काशीखण्ड पूरी काशी को ही ज्योतिलिंगका स्वरूप मानता है-

अविमुक्तं महत्क्षेत्रं पञ्चक्रोशपरीमितम्।" ॥

ज्योतिलङ्गम्तदेकंहि ज्ञेयंविश्वेश्वराभिधम्

पांच कोस परिमाण के अविमुक्त (काशी) नामक क्षेत्र को विश्वेश्वर (विश्वनाथ) संज्ञक ज्योतिर्लिंग स्वरूप मानना चाहिए।

• अनेक प्रकाण्ड विद्वानों ने काशी मरणान्मुक्ति के सिद्धांत का समर्थन

करते हुए बहुत कुछ लिखा और कहा है रामकृष्ण मिशन के स्वामी शारदानंदजीद्वार लिखित श्रीरामकृष्ण-लीलाप्रसंग नामक पुस्तक में श्रीरामकृष्ण परमहंसदेवका इस विषय में प्रत्यक्ष अनुभव वाणत है। वह

दृष्टांत बाबा विश्वनाथ द्वारा काशी में मृतक को तारकमन्त्रप्रदान करने

की सत्यता उजागर करता है। लेकिन यहां यह भी बात ध्यान रहे कि

काशी में पाप करने वाले को मरणोपरांत मुक्ति मिलने से पहले

अतिभयंकर भैरवी यातना भी भोगनी पड़ती है। सहस्रों वर्षों तक

रुद्रपिशाचबनकर कुकर्मो का प्रायश्चित करने के उपरांत ही उसे मुक्ति

मिलती है। किंतु काशी में प्राण त्यागने वाले का पुनर्जन्म नहीं होता।

फाल्गुन शुक्ल एकादशी को काशी में रंगभरी एकादशी कहा जाता है। इस दिन बाबा विश्वनाथ का विशेष शृंगार होता है और काशी में होली का पर्वकाल प्रारंभ हो जाता है।

मुक्तिदायिनीकाशी की यात्रा, यहां निवास और मरण तथा दाह- संस्कार का सौभाग्य पूर्वजन्मों के पुण्यों के प्रताप तथा बाबा विश्वनाथ

की कृपा से ही प्राप्त होता है। तभी तो काशी की स्तुति में कहा गया

यत्र देहपतनेऽपिदेहिनमुक्तिरेव भवतीतिनिश्चितम्। पूर्वपुण्यनिचयेनलभ्यते विश्वनाथनगरीगरीयसी ॥ विश्वनाथजी की अतिश्रेष्ठनगरी काशी पूर्वजन्मों के पुण्यों के प्रताप से

ही प्राप्त होती है। यहां शरीर छोड़ने पर प्राणियों को मुक्ति अवश्य मिलती है। काशी बाबा विश्वनाथ की नगरी है। काशी के अधिपति

भगवान विश्वनाथ कहते हैं इदं मम प्रियक्षेत्र पञ्चक्रोशीपरीमितम् ।

पांच कोस तक विस्तृत यह क्षेत्र (काशी) मुझे अत्यंत प्रिय है।

पतितपावनीकाशी में स्थित विश्वेश्वर (विश्वनाथ ज्योतिर्लिंगसनात

नकाल से हिंदुओं के लिए परम आराध्य है, किंतु जनसाधारण इस तथ्य से प्रायः अनभिज्ञ ही है कि यह ज्योतिर्लिंगपांच कोस तक विस्तार लिए हुए है- पञ्चकोशात्मक लिङ्गज्योतिरूप सनातनम् । ज्ञानर पापञ्चक्रोशात् मकयह पुण्यक्षेत्र काशी के नाम से भी जाना जाता

हे ज्ञानरूपा तुकाशीयं पञ्चक्रोशपरिमिता पद्मपुराणमें लिखा है कि

सृष्टि के प्रारंभ में जिस ज्योतिर्लिंगका ब्रह्मा और विष्णुजीने दर्शन किया, उसे ही वेद और संसार में काशी नाम से पुकारा गया-

यल्लिङ्गदृष्टवन्तोहि नारायणपितामहो । तदेवलोके वेदेचकाशीतिपरिगीयते ॥

पांच कोस की काशी चैतन्यरूप है इसलिए यह प्रलय के समय भी नष्ट नहीं होती। प्राचीन ब्रह्मवैवर्तपुराणमें इस संदर्भ में स्पष्ट उल्लेख है कि अमर ऋषिगण प्रलयकालमें श्री सनातन महाविष्णुसे पूछते हैं - हे भगवन्! वह छत्र के आकार की ज्योति जल के ऊपर कैसे प्रकाशित है,

जो प्रलय के समय पृथ्वी के डूबने पर भी नहीं डूबती? महाविष्णुजी

बोले हे ऋषियों! लिंगरूपधारीसदाश वमहादेव का हमने (सृष्टि के

आरम्भ में) तीनों लोकों के कल्याण के लिए जब स्मरण किया, तब वे

शम्भु एक बित्ता परिमाण के लिंग-रूप में हमारे हृदय से बाहर आए

और फिर वे बढते हुए अतिशय वृद्धि के साथ पांच कोस के हो गए-

लिङ्गरूपधरः शम्भ हर्दयाद्बहिरागतः । महतीवृद्धिमासाद्य पञ्चक्रोशात्मकोऽभवत् ॥

यह काशी वही पंचक्रोशात्मकज्योतिर्लिंग है। काशीरहस्य के दूसरे अध्याय में यह कथानक मिलता है। स्कन्दपुराणके काशीखण्डमें स्वयं

भगवान शिव यह घोषणा करते हैं-

अविमुक्तं महत्क्षेत्र पञ्चक्रोशपरिमितम्। ज्योतिर्लिङ्गमृतदेकहि ज्ञेयविश्वेश्वराऽभिधम् ।। पांच कोस परिमाण का अविमुक्त (काशी) नामक जो महाक्षेत्र है, उस

सम्पूर्ण पंचक्रोशात्मक क्षेत्र को विश्वेश्वर नामक एक ज्योतिर्लिङ्गही मानें। इसी कारण काशी प्रलय होने पर भी नष्ट नहीं होती। काशीखण्डमें भगवान शंकर पांच कोस की पूरी काशी में बाबा विश्वनाथ का वास बताते हैं-

एकदेशस्थितमपियथा मार्तण्डमण्डलम् दृश्यते सवर्गसर्वैः काश्यांविश्व ेश्वरस्तथा

जैसे सूर्यदेव एक जगह स्थित होने पर भी सबको दिखाई देते हैं, वैसे ही संपूर्ण काशी में सर्वत्र बाबा विश्वनाथ का ही दर्शन होता है। स्वयं विश्वेश्वर (विश्वनाथ) भी पांच कोस की अपनी पुरी (काशी) को अपना ही रूप कहते हैं पञ्चकोश्या परिमितातनुरेषाप ुरी मम। काशी

की सीमा के विषय में शास्त्रों का कथन है-असी-वरणयोर्मध्ये

पञ्चकोशमहत्तरम असी और वरुणा नदियों के मध्य स्थित पांच

कोस के क्षेत्र (काशी) की बडी महिमा है। महादेव माता पार्वती से काशी का इस प्रकार गुणगान करते हैं- सर्वक्षेत्रेषु भूपृष्ठेकाशी क्षत्रचमेवपुः ।

भूलोक के समस्त क्षेत्रों में काशी साक्षात् मेरा शरीर है।

पञ्चक्रोशात् मकज्योतिर्लिंग-स वरूपाकाशी सम्पूर्ण विश्व के स्वामी

श्री विश्वनाथ का निवास स्थान होने से भव-बंधन से मुक्तिदायिनी है।

धर्मग्रन्थों में कहा भी गया है काशी मरणान्मुक्तिः कि शी की परिक्रमा करने से सम्पूर्ण पृथ्वी की प्रदक्षिणा का पुण्यफलप्राप्त होता है। भक्त सब पापों से मुक्त होकर पवित्र हो जाता है। तीन पंचक्रोशी परिक् रमाकरने वाले के जन्म-जन्मान्तर के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। काशीवासियोंको कम से कम वर्ष में एक बार पंचकोसी परिक्रम

अवश्य करनी चाहिए क्योंकि अन्य स्थानों पर किए गए पाप तो काशी

की तीर्थयात्रा से उत्पन्न पुण्याग्निमें भस्म हो जाते हैं, परन्तु काशी में हुए पाप का नाश केवल पंचकोसी प्रदक्षणा से ही संभव है। काशी में सदाचार संयम के साथ धर्म का पालन करना चाहिए। यह पर्यटन की नहीं वरन् तीर्थाटन की पावन स्थली है। वस्तुतः काशी और विश्वेश्वर ज्योतिर्लिंगमें तत्त्वतः कोई भेद नहीं है। निःसंदेह सम्पूर्ण काशी ही बाबा

विश्वनाथ का स्वरूप है। काशी महात्म्य में ऋषियों का उद्घोष है-

काशी सर्वाऽपिविश्वेशरूपिणीनात्र संशयः ।

अतएव काशी को विश्वनाथजीका रूप मानने में कोई संशय न करें और भक्ति भाव से नित्य जप करें-

शिव: काशी शिव: काशी, काशी काशी शिवः शिवः । Apr 27, 2015 Find support or report photo

बहुत बढ़िया प्रश्न है। काशी का वासी होने के नाते मेरा यह दायित्व बनता है कि इस प्रश्न का जवाब दूँ।

🌷वास्तव में देखें तो काशी का माहात्म्य मां गंगा और भगवान शिव से है। मां गंगा भारतीय संस्कृति की जीवित स्मृति है, जो युगों-युगों से भौतिक जीवन को सभालने के साथ आध्यात्मिक जीवन को भी रसासिक्त करती आ रही है। गंगा भारत की सनातन संस्कृति का अविरल प्रवाह तो है ही, साथ ही साक्षी है उसकी जीवंतता का। गंगा प्रतीक है शुभ्रता का,पवित्रता का, ऊष्मा का, स्वास्थ्य और कल्याण का। काशी की पहचान शिव की नगरी के रूप में है। इसे मोक्षदायिनी नगरी भी कहा जाता है। काशी को हरिहर धाम भी कहते है और आनन्द कानन भी। यह मुक्तिधाम भी है और अविमुक्त क्षेत्र भी।

स्कन्द पुराण के काशी खण्ड के अनुसार ज्ञानवापी (ज्ञान का कूप) काशी का मूल केंद्र है। यह आदिकाल से अभी तक नष्ट नहीं हुआ है। यह काशी का अविनाशी तत्व है,इसलिए काशी को अविनाशी भी कहा जाता है। ज्ञानवापी को केंद्र में रखकर एक योजन का गोला खीचा जाए तो जो क्षेत्र उसमें समाहित होते हैं, उसे 'अविमुक्त क्षेत्र' कहा जाता है। स्कन्द पुराण के काशी खण्ड में सात उपखण्ड हैं, इनमें पाँचवे उपखण्ड में ज्ञानवापी माहात्म्य का वर्णन है। काशी की पंचकोशी परिक्रमा इसी के अंतर्गत आती है।

हमारे पौराणिक ग्रंथों में सप्तपुरियों की चर्चा की गई हैं। अयोध्या, मथुरा, माया (हरिद्वार),काशी, कांची, अवंतिका एवं जगन्नाथपुरी। ये सभी मोक्ष प्रदान करने वाले हैं। परन्तु मोक्ष के साथ पुण्य की प्राप्ति काशी में ही संभव है,जहां मृत्यु भी मंगल है।

देवगुरु वृहस्पति ने याज्ञवल्क्य से एक समय   पूछा ” सर्व प्रसिद्द कुरुक्षेत्र कहाँ है? वह क्षेत्र जहाँ देवता यजन करते हैं? क्षेत्र जो सभी प्राणियों के लिए ब्रह्म सदन हैं? ” याज्ञवल्क्य ने उत्तर दिया ” हे गुरु ! अविमुक्त वह क्षेत्र है जहाँ देववर्ग यजन करता है, यही कुरुक्षेत्र है जहाँ मृत्यु काल में प्राणियों को रूद्र तारक मंत्र उपदेश करते हैं जिससे मुक्त होकर वह अमरत्व प्राप्त कर लेता है।” ज्ञातव्य है कि वाराणसी को भी पुराणो में अविमुक्त क्षेत्र कहा गया हैं। पुराणो में यह प्रसिद्ध है मृत्यु को प्राप्त जीवात्माओं को भगवान शिव इसी क्षेत्रमें तारक मंत्र का उपदेश देते हैं जिससे उनको उत्तम गति प्राप्त होती है। याज्ञवल्क्य उपदेश में स्पष्ट करते हैं कि अविमुक्त क्षेत्र अनंत और अव्यक्त आत्मा का सदन है। इसी क्षेत्र में प्राणियों को आत्मउद्धार के लिए उपासना करनी चाहिये। इस क्षेत्र की उपस्थिति समष्टि में काशी और व्यष्टि में मानव देह है।

वाराणसी दो शब्दों से मिलकर बना है – वरणा और नासी । वरणा का अर्थ है सभी इन्द्रियों के दोषो का निवारण करने वाला और नासी का अर्थ है इन्द्रियों द्वारा किये गये पापों का निवारण करने वाला । कहाँ होता है यह ? अविमुक्त क्षेत्र वाराणसी में होता है । व्यष्टि में यह क्षेत्र भ्रूवों के मिलन बिंदु और नासाग्र का मिलान बिंदु के बीच स्थित कहा गया है । इस आकाश को ही योग उपनिषदों में द्यौ कहा गया है जहां देव वर्ग अपना यजन करता है। भ्रुवों और नासाग्र की सन्धि को ही संध्या कहा गया है और इसकी ही उपासना का विधान योग शास्त्र में किया गया है । इस द्यौ लोक में ही रूद्र की यथेष्ट उपासना सम्भव है और यही कर्त्तव्य है ।

उक्त वर्णित अविमुक्त क्षेत्र में जब रूद्र की शतरुद्रिय
ॐ नमस्ते रूद्र मन्यवउतोत इषवे नमः!
बाहुब्यामुतते नमः!!
याते रूद्रशिवा तनूर घोरापाप्काशिनी!
तया नस्तान्वा गिरिशंताभी चाकशीह!
इत्यादि मन्त्रों से उपासना की जाती है तो अमृतत्व की उपलब्धि सहज ही संभव हो जाती है । शतरुद्रिय वे वैदिक मंत्र हैं जो अमृत स्वरूप ही कहे गए हैं । इनका वाचन मनुष्य को मुक्ति प्रदान करता है । भगवदगीता में श्री कृष्ण ने इसी क्षेत्र में अवस्थित हो ध्यान करने उपदेश किया है ।
समं कायशिरोग्रीवं धारयन्न्न चलम् स्थिरम् ।
सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रे स्व दिशश्चानवलोकयन् ॥
काया, शिर और गले को समान एवं अचल धारण करके और स्थिर होकर अपनी नासिका के अग्रभाग पर दृष्टि जमाकर अन्य दिशाओं को न देखता हुआ भलीभांति शान्त अन्तःकरण वाला योगी मेरे परायण होकर स्थित होवे ।

यह ध्यान की प्रक्रिया अविमुक्त की उपासना की ही प्रक्रिया है जिसमे भगवान ने आगे कहा है “भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक । स तं पुरुषमुपैती दिव्यं “| कृष्ण ने ध्यान की जो विधि बतलाई वह सनातन विधि है, उपनिषदों में इसी ध्यान विधि का वर्णन है । इसी क्षेत्र में ईश्वर की ज्ञान रूप से अवस्थिति है । गौरतलब है कि योगसूत्र में प्रणव अर्थात ओउम को ईश्वर का वाचक कहा गया है। चन्द्र बिंदु सहित प्रणव सबका समाहार है जिसकी अवस्थिति भ्रूमध्य में बतलाई जाती है जिसे योग में आज्ञाचक्र नाम से जाना जाता है! आज्ञाचक्र में ब्रह्मा और विष्णु दोनों का समाहार है जिसके देवता परमशिव हैं ! इससे भी यह स्पष्ट हो जाता है कि यही अविमुक्त क्षेत्र है चेतनात्मक विकास का क्षेत्र जहां प्रणव रूप रूद्र का निवास है। इस क्षेत्र में ध्यान का फल कर्म बंधन से विमुक्ति है और इसी क्षेत्र प्राण को सम्यक स्थापित कर योगीजन अपनी देह का त्याग करते हैं ।

आध्यात्म अविमुक्त क्षेत्र में अवस्थिति को ही कहा गया है क्योकि इसी क्षेत्र में मन का पूर्ण समाहार होता है ! केनोपनिषद में इस बात को बहुत स्पष्टता से कहा गया है ” अथाध्यात्मं यदेतद् गच्छतीव च मनोSनेन चैतदुपस्मरत्यभीक्ष्णं संकल्पः ” अर्थात   अध्यात्म इस ब्रह्म रूपी प्रणव अर्थात ओउम में मन का पूर्ण समाहार है ! सत्य में नानात्व नहीं है, जो पिण्ड में है वही ब्रह्माण्ड में है, जो यहां है वही वहां भी है । नेत्रों की दृष्टि को भृकुटि के बीच स्थित करके तथा नासिका में प्राण और समान को सम करके जिन्होंने मन और बुद्धि को जीत लिया है उन्हें इन्द्रियनिग्रह नहीं करना पड़ता है । इन्द्रिय निग्रह इत्यादि तो वे मुर्ख लोग ही करते हैं जिनकी अपनी बुद्धि अपने वश में नहीं है । अविमुक्त क्षेत्र में अवस्थित होकर आत्मतत्व की उपासना करने वाला शिवत्व को प्राप्त करता है ।

काशी विश्वनाथ मंदिर बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है। यह मंदिर पिछले कई हजारों वर्षों से वाराणसी में स्थित है। काशी विश्‍वनाथ मंदिर का हिंदू धर्म में एक विशिष्‍ट स्‍थान है। ऐसा माना जाता है कि एक बार इस मंदिर के दर्शन करने और पवित्र गंगा में स्‍नान कर लेने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस मंदिर में दर्शन करने के लिए आदि शंकराचार्य, सन्त एकनाथ रामकृष्ण परमहंस, स्‍वामी विवेकानंद, महर्षि दयानंद, गोस्‍वामी तुलसीदास सभी का आगमन हुआ हैं। यहीं पर सन्त एकनाथजीने वारकरी सम्प्रदायका महान ग्रन्थ श्रीएकनाथी भागवत लिखकर पुरा किया और काशीनरेश तथा विद्वतजनो द्वारा उस ग्रन्थ की हाथी पर से शोभायात्रा खुब धुमधामसे निकाली गयी।महाशिवरात्रि की मध्य रात्रि में प्रमुख मंदिरों से भव्य शोभा यात्रा ढोल नगाड़े इत्यादि के साथ बाबा विश्वनाथ जी के मंदिर तक जाती है।




हिन्दू धर्म के अनुसार प्रलयकाल में भी काशी का लोप नहीं होता। उस समय भगवान शंकर इसे अपने त्रिशूल पर धारण कर लेते हैं और प्रलय काल के बाद इसे पुनः स्थापित कर देते हैं। यही नहीं, आदि सृष्टि स्थली भी यहीं भूमि बतलायी जाती है। इसी स्थान पर भगवान विष्णु ने सृष्टि उत्पन्न करने का कामना से तपस्या करके आशुतोष को प्रसन्न किया था और फिर उनके शयन करने पर उनके नाभि-कमल से ब्रह्मा उत्पन्न हुए, जिन्होने सारे की रचना की। अगस्त्य मुनि ने भी विश्वेश्वर की बड़ी आराधना की थी और इन्हीं की अर्चना से श्री वशिष्ठजी तीनों लोकों में पूजित हुए तथा राजर्षि विश्वामित्र ब्रह्मर्षि कहलाये।

1. काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग दो भागों में है। दाहिने भाग में शक्ति के रूप में मां भगवती विराजमान हैं। दूसरी ओर भगवान शिव वाम रूप (सुंदर) रूप में विराजमान हैं। इसीलिए काशी को मुक्ति क्षेत्र कहा जाता है।

2. देवी भगवती के दाहिनी ओर विराजमान होने से मुक्ति का मार्ग केवल काशी में ही खुलता है। यहां मनुष्य को मुक्ति मिलती है और दोबारा गर्भधारण नहीं करना होता है। भगवान शिव खुद यहां तारक मंत्र देकर लोगों को तारते हैं। अकाल मृत्यु से मरा मनुष्य बिना शिव अराधना के मुक्ति नहीं पा सकता।

3. श्रृंगार के समय सारी मूर्तियां पश्चिम मुखी होती हैं। इस ज्योतिर्लिंग में शिव और शक्ति दोनों साथ ही विराजते हैं, जो अद्भुत है। ऐसा दुनिया में कहीं और देखने को नहीं मिलता है।

4.विश्वनाथ दरबार में गर्भ गृह का शिखर है। इसमें ऊपर की ओर गुंबद श्री यंत्र से मंडित है। तांत्रिक सिद्धि के लिए ये उपयुक्त स्थान है। इसे श्री यंत्र-तंत्र साधना के लिए प्रमुख माना जाता है।

5. बाबा विश्वनाथ के दरबार में तंत्र की दृष्टि से चार प्रमुख द्वार इस प्रकार हैं :- 1. शांति द्वार। 2. कला द्वार। 3. प्रतिष्ठा द्वार। 4. निवृत्ति द्वार। इन चारों द्वारों का तंत्र में अलग ही स्थान है। पूरी दुनिया में ऐसा कोई जगह नहीं है जहां शिवशक्ति एक साथ विराजमान हों और तंत्र द्वार भी हो।

6. बाबा का ज्योतिर्लिंग गर्भगृह में ईशान कोण में मौजूद है। इस कोण का मतलब होता है, संपूर्ण विद्या और हर कला से परिपूर्ण दरबार। तंत्र की 10 महा विद्याओं का अद्भुत दरबार, जहां भगवान शंकर का नाम ही ईशान है।

7. मंदिर का मुख्य द्वार दक्षिण मुख पर है और बाबा विश्वनाथ का मुख अघोर की ओर है। इससे मंदिर का मुख्य द्वार दक्षिण से उत्तर की ओर प्रवेश करता है। इसीलिए सबसे पहले बाबा के अघोर रूप का दर्शन होता है। यहां से प्रवेश करते ही पूर्व कृत पाप-ताप विनष्ट हो जाते हैं।

8. भौगोलिक दृष्टि से बाबा को त्रिकंटक विराजते यानि त्रिशूल पर विराजमान माना जाता है। मैदागिन क्षेत्र जहां कभी मंदाकिनी नदी और गौदोलिया क्षेत्र जहां गोदावरी नदी बहती थी। इन दोनों के बीच में ज्ञानवापी में बाबा स्वयं विराजते हैं। मैदागिन-गौदौलिया के बीच में ज्ञानवापी से नीचे है, जो त्रिशूल की तरह ग्राफ पर बनता है। इसीलिए कहा जाता है कि काशी में कभी प्रलय नहीं आ सकता।

9. बाबा विश्वनाथ काशी में गुरु और राजा के रूप में विराजमान है। वह दिनभर गुरु रूप में काशी में भ्रमण करते हैं। रात्रि नौ बजे जब बाबा का श्रृंगार आरती किया जाता है तो वह राज वेश में होते हैं। इसीलिए शिव को राजराजेश्वर भी कहते हैं।

10. बाबा विश्वनाथ और मां भगवती काशी में प्रतिज्ञाबद्ध हैं। मां भगवती अन्नपूर्णा के रूप में हर काशी में रहने वालों को पेट भरती हैं। वहीं, बाबा मृत्यु के पश्चात तारक मंत्र देकर मुक्ति प्रदान करते हैं। बाबा को इसीलिए ताड़केश्वर भी कहते हैं।

11. बाबा विश्वनाथ के अघोर दर्शन मात्र से ही जन्म जन्मांतर के पाप धुल जाते हैं। शिवरात्रि में बाबा विश्वनाथ औघड़ रूप में भी विचरण करते हैं। उनके बारात में भूत, प्रेत, जानवर, देवता, पशु और पक्षी सभी शामिल होते हैं।

12. मान्यता है कि जब औरंगजेब इस मंदिर का विनाश करने के लिए आया था, तब मंदिर में मौजूद लोगों ने यहां के शिवलिंग की रक्षा करने के लिए उसे मंदिर के पास ही बने एस कुएं में छुपा दिया था। कहा जाता है कि वह कुआं आज भी मंदिर के आस-पास कहीं मौजूद है।

13. कहानियों के अनुसार, काशी का मंदिर जो की आज मौजूद है, वह वास्तविक मंदिर नहीं है। काशी के प्राचीन मंदिर का इतिहास कई साल पुराना है, जिसे औरंगजेब ने नष्ट कर दिया था। बाद में फिर से मंदिर का निर्माण किया गया, जिसकी पूजा-अर्चना आज की जाती है।

14. काशी विश्वनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण इन्दौर की रानी अहिल्या बाई होल्कर ने करवाया था। मान्यता है कि 18वीं शताब्दी के दौरान स्वयं भगवान शिव ने अहिल्या बाई के सपने में आकर इस जगह उनका मंदिर बनवाने को कहा था।

15. रानी अहिल्या बाई के मंदिर निर्माण करवाने के कुछ साल बाद महाराज रणजीत सिंह ने मंदिर में सोने का दान किया था। कहा जाता है कि महाराज रणजीत ने लगभग एक टन सोने का दान किया था, जिसका प्रयोग से मंदिर के छत्रों पर सोना चढाया गया था।

16. मंदिर के ऊपर एक सोने का बना छत्र लगा हुआ है। इस छत्र को चमत्कारी माना जाता है और इसे लेकर एक मान्यता प्रसिद्ध है। अगर कोई भी भक्त इस छत्र के दर्शन करने के बाद कोई भी प्रार्थना करता है तो उसकी वो मनोकामना जरूर पूरी होती है।

तीर्थ के रुप में वाराणसी का नाम सबसे पहले महाभारत मे मिलता है

अविमुक्तं समासाद्य तीर्थसेवी कुरुद्वह।
दर्शनादेवदेस्य मुच्यते ब्रह्महत्यया ।।
(महाभारत, वन., ८४/१८)
ततो वाराणसीं गत्वा देवमच्र्य वृषध्वजम्।
कपिलाऊदमुपस्पृश्य राजसूयफलं लभेत् 
(महाभारत, वन., ८२/७७)

बात तो यह है कि इसके पूर्व के साहित्य में तीर्थे के विषय में कुछ कहा ही नहीं गया है। उस समय धार्मिक केन्द्र कुरुक्षेत्र था, परन्तु देश-भर में आर्य लोगों को जाकर बसना था। वर्तमान तीर्थ स्थलों में बहुधा जंगल थे जिनमें आदिवासियों की इधर-उधर कुछ बस्तियाँ छिटपुट बसी थीं। इनके अतिरिक्त वहाँ मनुष्यों का निवास ही नहीं था। आगे चलकर जब भारत में सर्वत्र आर्य लोग फैल गये और उनके नगर बस गये, तब अध्यात्मिक सर्वेक्षण के द्वारा तीर्थों के अस्तित्व तथा माहात्मय का पता चला। इस संबंध में महाभारत में कहा गया है कि जिस प्रकार शरीर के कुछ अवयव पवित्र माने जाते है, उसी प्रकार पृथ्वी के कतिपय स्थान पुण्य प्रद तथा पवित्र होते है। इनमें से कोई तो स्थान की विचित्रता के कारण कोई जन्म के प्रभाव और कोई ॠषि-मुनियों के सम्पर्क से पवित्र हो गया है :-

भौमानामपि तीर्थनां पुणयत्वे कारणं ॠणु।
यथा शरीरस्योधेशा: केचित् पुण्यतमा: समृता:।
तथा पृथिव्यामुधेशा: केचित् पुण्यतमा: समृता:।।
प्रभावाध्दभुताहभूमे सलिलस्य च तेजसा।
परिग्रहान्युनीमां च तीर्थानां पुण्यता स्मृता।। 
(महाभारत, कृ.क.त., पृ. ७-८)

आधुनिक विचार धारा इस बात को इस प्रकार कहती है कि जहाँ-जहाँ मानव के बहुमुख उत्कर्ष के साधन लभ्य हुए, वहीं-वहीं तीर्थों की परिकल्पना हुई। जो कुछ भी हो, विविध तीर्थों के नाम और उनके माहात्म्य सबसे पहले पुराण-साहित्य में मिलते हैं, जिनमें महाभारत का शीर्षस्थ स्थान है। यजुर्वेदीय जाबाल उपनिषद में काशी के विषय में महत्वपूर्ण उल्लेख है, परन्तु इस उपनिषद् को आधुनिक विद्वान उतना प्राचीन नहीं मानते।

अविमुक्तं वै देवानां देवयजनं सर्वेषां भूतानां ब्रह्मसदनमत्र हि जन्तो: प्राणोषूत्क्रममाणेषु रुद्रस्ताखं ब्रह्म व्याचष्टे येना सावमृततीभूत्वा मोक्षीभवती तस्मादविमुक्तमेव निषेविताविमुक्तं न विमुञ्चेदेवमेवैतद्याज्ञवल्क्यः।
(जबाल-उपनिषद्, खं. १)

जाबाल-उपनिषद् खण्ड-२ में अव्यक्त तथा अनन्त परमात्मा के संबंधमें विचार-विमर्श करते हुए महर्षि अत्रि ने महर्षि याज्ञवल्क्य से पूछा कि उस अव्यक्त और अनन्त परमात्मा को हम किस प्रकार जानें। इस पर याज्ञवल्क्य ने कहा कि उस अव्यक्त और अनन्त आत्मा की उपासना अविमुक्त क्षेत्र में हो सकती है, क्योंकि वह वहीं प्रतिष्ठित है। उस पर अत्रि ने पूछा कि अविमुक्त क्षेत्र कहाँ है। याज्ञवल्क्य ने उत्तर दिया कि वह वरणा तथा नाशी नदियों के मध्य में है। वह वरणा क्या है और वह नाशी क्या है, यह पूछने पर उत्तर मिला कि इन्द्रिय-कृत सभी दोषों का निवारण करने वाली वरणा है और इन्द्रिय-कृत सभी पापों का नाश करने वाली नाशी है। वह अविमुक्त क्षेत्र देवताओं का देव स्थान और सभी प्राणियों का ब्रह्म सदन है। वहाँ ही प्राणियों के प्राण-प्रयाण के समय में भगवान रुद्र तारक मन्त्र का उपदेश देते है जिसके प्रभाव से वह अमृती होकर मोक्ष प्राप्त करता है। अत एव अविमुक्त में सदैव निवास करना चाहिए। उसको कभी न छोड़े, ऐसा याज्ञवल्क्य ने कहा है।

जाबालोपिनषद के अतिरिक्त 'लिखितस्मृति', 'श्रृंगीस्मृति' तथा 'पाराशरस्मृति' में भी काशी के माहात्म्य का वर्णन किया गया है। ब्राह्मीसंहिता तथा सनत्कुमारसंहिता में भी यह विषय प्रतिपादित है। प्राय सभी पुराणों में काशी कामाहात्म्य कहा गया है, यद्यपि उनके क्षेत्रिय विकास के कारण उनमें विषय के विस्तार में भेद है। ब्रह्मवैवर्त्तपुराण में तो काशी क्षेत्र के विषय में 'काशी-रहस्य' नाम एक पूरा ग्रन्थ ही है, जो उसका 'खिल' भाग कहा जाता है। इसी प्रकार, पदमपुराण में काशी-महात्म्य नामक ग्रन्थ है, यद्यपि उसके अतिरिक्त अन्यत्र भी काशी का वर्णन मिलता है। प्राचीन लिंगपुराण में सोलह अध्याय काशी की तीर्थों के संबंध में थे। वर्त्तमान लिंगपुराण में भी एक अध्याय है। स्कन्दपुराण का काशीखण्ड तो काशी के तीर्थ-स्वरुप का विवेचन तथा विस्तृत वर्णन करता ही है। इस प्रकार पुराण-साहित्य में काशी के धार्मिक महात्म्य पर सामग्री है। इसके अतिरिक्त, संस्कृत-वाड्-मय में भी कहीं-कहीं कुछ-न-कुछ सामग्री मिलता ही है। दशकुमारचरित, नैषध तथा राजतरंगिणी में काशी का उल्लेख है और कुट्टनीपतम् में भी काशी के प्रधान देवायतन का सटीक वर्णन मिलता है, यद्यपि उस ग्रन्थ का उद्देश्य दूसरा ही है।

इन सभी आधारों पर काशी का धार्मिक महत्ता स्थापित है। इस संबंध में काल क्रम को लेकर चलना संभव नहीं है, क्योंकि पुराणों में निरन्तर परिवर्तन तथा परिवर्द्धन होते आये हैं और एक ही पुराण के भिन्न-भिन्न अंश भिन्न-भिन्न समय में बने हैं। लिंगपुराण इसका स्पष्ट प्रमाण है, क्योंकि बाहरवी शताब्दी ईसवी तक प्राप्त होने वाले लिंग पुराण में तीसरे अध्याय से अट्ठारहवें अध्याय तक काशी के देवायतनों तथा तीर्थें� का विस्तृत वर्णन था उसका बहुत-सा अंश लक्ष्मीधर के 'कृत्यकल्पतरु' में उद्धत होने से बच गया है जो ९ पृष्ठों का है। 'त्रिस्थलीसेतु' नामक ग्रन्थ की रचना के समय (सन् १५८० ई.) लिंगपुराण का कुछ छोटे-मोटे परिवर्त्तनों के साथ वही स्वरुप था, जैसा उसमे स्पष्ट लिखा है। कि लैंङ्गोडपि तृतीयाध्यायात्षोऽशान्तं लिंङ्गान्युक्तवोक्तम्, अर्थात लिंगपुराण में भी तीसरे अध्याय से सोलहवें अध्याय तक लिंगो का वर्णन करने के बाद कहा गया है कि ( से. पृ. १८१) वर्तमान लिंग पुराण में केवल एक ही अध्याय काशी के विषय में है, जिसमें केवल १४४ श्लोक हैं। पुराणों की इस परिवर्तन परम्परा के कारण उनके सहारे कालक्रम नही स्थापित किया जा सकता, अतएव इस विषय का स्वतन्त्र विवेचन सम्भव है। 
संसार के प्रत्येक धर्म के अपने-अपने तीर्थस्थान है। जिनकी यात्रा से कु लाभ होना माना जाता है। भारतवर्ष के तीर्थें� की संख्या भी उसकी भौगोलिक विशालता के अनुरुप है। महाभारत मे ही उनकी संख्या छोटी नहीं है और यदि सभी पुराणों के आधार पर सूची बनाई जाय, तो वह बहुत ही बड़ी हो जाती है। 'शब्दकल्पहुम' मे २६४ तीर्थों का उल्लेख है। परन्तु महिमा के विचार से भारत के तीर्थों में चार धाम और सात पुरियों के नाम शीर्षस्थ माने जाते है। प्रयाग का नाम इनमें नहीं आता, परन्तु वह तो तीर्थराज है। इसी प्रकार गया का नाम भी इसमें नहीं है और नही ही गंगा सागर का नाम मिलता है। एक बात और भी है कि तीर्थों के महात्म्य समय-समय पर बदलते भी रहे है खास कर गहडवाल युग में तो काशी में तीर्थों की बाढ़ सी आ गई।

वाराणसी के ज्ञानवापी को केंद्र में रख एक योजन का गोला खींचा जाए तो जो क्षेत्र आए वही है अविमुक्त क्षेत्र

काशी कितनी लंबी-चौड़ी है तो स्कंदपुराण का काशी खंड बताता है कि ज्ञानवापी को केंद्र में रखकर एक योजन का गोला खींचा जाए तो जो क्षेत्र उसमें समाहित होता है उसे ही अविमुक्त क्षेत्र कहते हैं। यह वैज्ञानिक रूप से भी सिद्ध हो चुका है।

स्कंदपुराण के काशी खंड के अनुसार ज्ञानवापी काशी का मूल केंद्र है। यह आदिकाल से अब तक कभी नष्ट नहीं हुआ। यही काशी का अविनाशी तत्व है, इसलिए इसीलिए काशी को अविनाशी कहते हैं। जब भी काशी में धार्मिक, वैज्ञानिक, भौगोलिक या खगोलीय, कोई माप करनी हो, ज्ञानवापी को केंद्र में रखकर ही करनी होगी। जो स्थान शरीर में नाभि का है, वही काशी में ज्ञानवापी का है।

यह कहना है काशी हिंदू विश्वविद्यालय के भूगाेल विभाग के पूर्व अध्यक्ष व काशी के अध्येता प्रो. राणा पीबी सिंह का। वह कहते हैं कि जानना हो कि काशी कितनी लंबी-चौड़ी है तो स्कंदपुराण का काशी खंड बताता है कि ज्ञानवापी को केंद्र में रखकर एक योजन का गोला खींचा जाए तो जो क्षेत्र उसमें समाहित होता है, उसे ही अविमुक्त क्षेत्र कहते हैं। यह वैज्ञानिक रूप से भी सिद्ध हो चुका है।

प्रो. सिंह बताते हैं कि 1993-94 में एक अमेरिकी खगोलशास्त्री जान किम मालविल भारत आए थे। वह भारत सरकार के कई प्रोजेक्ट पर कार्य कर रहे थे। वह भी उनके साथ सहयोगी के रूप में थे। उन्होंने जब पौराणिक उद्धरणों के अनुसार खगोलशास्त्र की विधि से काशी की माप की तो यह तथ्य वैज्ञानिक रूप से भी सत्य सिद्ध होकर सामने आया कि ज्ञानवापी ही काशी का केंद्र है।

स्कंदपुराण के अनुसार, पृथ्वी पर प्राणियों की उत्पत्ति हो या ज्ञान की, उसका भी केंद्र ज्ञानवापी ही है। कहा जाता है कि भगवान शिव ने अपने ज्ञान स्वरूप को स्पष्ट करने के लिए ईशान रूप में त्रिशूल से उस स्थान पर खोदाई की, जो आज भी कूप के रूप में उपस्थित है। जल का अर्थ है ज्ञान और वापी का अर्थ है कूप। इस तरह इसका नामकरण ज्ञानवापी हुआ। प्रो. सिंह बताते हैं कि स्कंद पुराण के काशी खंड में सात उपखंड हैं, इनमें पांचवें खंड में ज्ञानवापी महात्म्य का वर्णन है।


नमामि गोविन्दपदारविन्दं सदेन्दिरानन्दनमुत्तमाढ्यम् ।
जगञ्जनानां हृदि संनिविष्टं महाजनैकायनमुत्तमोत्तमम् ॥

मैं भगवान् विष्णुके उन चरणकमलोंको भक्तिपूर्वक प्रणाम करती हूँ, जो भगवती लक्ष्मीजी को सदा ही आनन्द प्रदान करनेवाले और उत्तम शोभासे सम्पन्न हैं, जिनका संसारके प्रत्येक जीवके हृदयमें निवास है तथा जो महापुरुषोंके एकमात्र आश्रय और श्रेष्ठसे भी श्रेष्ठ हैं।

श्री पद्मपुराण के स्वर्ग खण्ड में काशी के अविमुक्त क्षेत्र का महादेव द्वारा वर्णन

नमामि गोविन्दपदारविन्दं सदेन्दिरानन्दनमुत्तमाढ्यम् ।
जगञ्जनानां हृदि संनिविष्टं महाजनैकायनमुत्तमोत्तमम् ॥

मैं भगवान् विष्णुके उन चरणकमलोंको भक्तिपूर्वक प्रणाम करती हूँ, जो भगवती लक्ष्मीजी को सदा ही आनन्द प्रदान करनेवाले और उत्तम शोभासे सम्पन्न हैं, जिनका संसारके प्रत्येक जीवके हृदयमें निवास है तथा जो महापुरुषोंके एकमात्र आश्रय और श्रेष्ठसे भी श्रेष्ठ हैं।

यह स्वर्गखण्ड रोमहर्षण जी का सुनाया हुआ है।
यह प्रसंग तब का है जब युधिष्ठिर महाराज और नारदजी के बीच तीर्थयात्रा के बारे में संवाद होता है और नारदजी इंद्र आदि देवताओं के द्वारा युधिष्ठिर और पांंण्डव भाइयों के लिए दिए संदेश दे रहे थे कि महाभारत युद्ध के पहले तीर्थ यात्रा करके आशिर्वाद लेने से पांडवों को युद्ध में उत्तम परिणाम मिलेंगे।

युधिष्ठिर नारदजी से विभिन्न तीर्थस्थलों के बारे में जानकारी लेते हैं। युधिष्ठिर बोले – मुने! आपने काशीका माहात्म्य बहुत थोड़ेमें बताया है, उसे कुछ विस्तारके साथ कहिये।

नारदजीने कहा – राजन्! मैं इस विषयमें एक – संवाद सुनाऊँगा, जो वाराणसीके गुणोंसे सम्बन्ध रखनेवाला है। उस संवादके श्रवणमात्रसे मनुष्य ब्रह्महत्याके पापसे छुटकारा पा जाता है। पूर्वकालकी बात है, भगवान् शंकर मेरुगिरिके शिखरपर विराजमान थे तथा पार्वती देवी भी वहीं दिव्य सिंहासनपर बैठी थीं । उन्होंने महादेवजीसे पूछा—’भक्तोंके दुःख दूर करनेवाले देवाधिदेव! मनुष्य शीघ्र ही आपका दर्शन कैसे पा सकता है ? समस्त प्राणियोंके हितके लिये यह बात मुझे बताइये ।

यत्र साक्षान्महादेवो देहान्ते स्वयमीश्वरः । व्याचष्टे तारकं ब्रह्म तत्रैव ह्यविमुक्तके ॥
वरणायास्तथा चास्या मध्ये वाराणसी पुरी । तत्रैव संस्थितं तत्त्वं नित्यमेवं विमुक्तकम् ॥
वाराणस्याः परं स्थानं न भूतं न भविष्यति । यत्र नारायणो देवो महादेवो दिवीश्वरः ॥
महापातकिनो देवि ये तेभ्यः पापकृत्तमाः । वाराणसीं समासाद्य ते यान्ति परमां गतिम् ॥ तस्मान्मुमुक्षुर्नियतो वसेद्वै मरणान्तकम् । वाराणस्यां महादेवाज्ज्ञानं लब्ध्वा विमुच्यते ॥ (३३ | ४६, ४९-५०, ५२-५३)

भगवान् शिव बोले- देवि! काशीपुरी मेरा परम गुह्यतम क्षेत्र है। वह सम्पूर्ण भूतों को संसार सागर से पार उतारने वाली है। वहाँ महात्मा पुरुष भक्तिपूर्वक मेरी भक्ति का आश्रय ले उत्तम नियमों का पालन करते हुए निवास करते हैं। वह समस्त तीर्थों और सम्पूर्ण स्थानों में उत्तम है। इतना ही नहीं, अविमुक्त क्षेत्र मेरा परम ज्ञान है। वह समस्त ज्ञानों में उत्तम है। देवि! यह वाराणसी सम्पूर्ण गोपनीय स्थानोंमें श्रेष्ठ तथा मुझे अत्यन्त प्रिय है। मेरे भक्त वहाँ जाते तथा मुझमें ही प्रवेश करते हैं।

श्री पद्मपुराण के स्वर्ग खण्ड में काशी के अविमुक्त क्षेत्र का महादेव द्वारा वर्णन

नमामि गोविन्दपदारविन्दं सदेन्दिरानन्दनमुत्तमाढ्यम् ।
जगञ्जनानां हृदि संनिविष्टं महाजनैकायनमुत्तमोत्तमम् ॥

मैं भगवान् विष्णुके उन चरणकमलोंको भक्तिपूर्वक प्रणाम करती हूँ, जो भगवती लक्ष्मीजी को सदा ही आनन्द प्रदान करनेवाले और उत्तम शोभासे सम्पन्न हैं, जिनका संसारके प्रत्येक जीवके हृदयमें निवास है तथा जो महापुरुषोंके एकमात्र आश्रय और श्रेष्ठसे भी श्रेष्ठ हैं।

यह स्वर्गखण्ड रोमहर्षण जी का सुनाया हुआ है।
यह प्रसंग तब का है जब युधिष्ठिर महाराज और नारदजी के बीच तीर्थयात्रा के बारे में संवाद होता है और नारदजी इंद्र आदि देवताओं के द्वारा युधिष्ठिर और पांंण्डव भाइयों के लिए दिए संदेश दे रहे थे कि महाभारत युद्ध के पहले तीर्थ यात्रा करके आशिर्वाद लेने से पांडवों को युद्ध में उत्तम परिणाम मिलेंगे।

युधिष्ठिर नारदजी से विभिन्न तीर्थस्थलों के बारे में जानकारी लेते हैं। युधिष्ठिर बोले – मुने! आपने काशीका माहात्म्य बहुत थोड़ेमें बताया है, उसे कुछ विस्तारके साथ कहिये।

नारदजीने कहा – राजन्! मैं इस विषयमें एक – संवाद सुनाऊँगा, जो वाराणसीके गुणोंसे सम्बन्ध रखनेवाला है। उस संवादके श्रवणमात्रसे मनुष्य ब्रह्महत्याके पापसे छुटकारा पा जाता है। पूर्वकालकी बात है, भगवान् शंकर मेरुगिरिके शिखरपर विराजमान थे तथा पार्वती देवी भी वहीं दिव्य सिंहासनपर बैठी थीं । उन्होंने महादेवजीसे पूछा—’भक्तोंके दुःख दूर करनेवाले देवाधिदेव! मनुष्य शीघ्र ही आपका दर्शन कैसे पा सकता है ? समस्त प्राणियोंके हितके लिये यह बात मुझे बताइये ।

यत्र साक्षान्महादेवो देहान्ते स्वयमीश्वरः । व्याचष्टे तारकं ब्रह्म तत्रैव ह्यविमुक्तके ॥
वरणायास्तथा चास्या मध्ये वाराणसी पुरी । तत्रैव संस्थितं तत्त्वं नित्यमेवं विमुक्तकम् ॥
वाराणस्याः परं स्थानं न भूतं न भविष्यति । यत्र नारायणो देवो महादेवो दिवीश्वरः ॥
महापातकिनो देवि ये तेभ्यः पापकृत्तमाः । वाराणसीं समासाद्य ते यान्ति परमां गतिम् ॥ तस्मान्मुमुक्षुर्नियतो वसेद्वै मरणान्तकम् । वाराणस्यां महादेवाज्ज्ञानं लब्ध्वा विमुच्यते ॥ (३३ | ४६, ४९-५०, ५२-५३)

भगवान् शिव बोले- देवि! काशीपुरी मेरा परम गुह्यतम क्षेत्र है। वह सम्पूर्ण भूतों को संसार सागर से पार उतारने वाली है। वहाँ महात्मा पुरुष भक्तिपूर्वक मेरी भक्ति का आश्रय ले उत्तम नियमों का पालन करते हुए निवास करते हैं। वह समस्त तीर्थों और सम्पूर्ण स्थानों में उत्तम है। इतना ही नहीं, अविमुक्त क्षेत्र मेरा परम ज्ञान है। वह समस्त ज्ञानों में उत्तम है। देवि! यह वाराणसी सम्पूर्ण गोपनीय स्थानोंमें श्रेष्ठ तथा मुझे अत्यन्त प्रिय है। मेरे भक्त वहाँ जाते तथा मुझमें ही प्रवेश करते हैं।

वाराणसीमें किया हुआ है दान, जप, होम, यज्ञ, तपस्या, ध्यान, अध्ययन और ज्ञान – सब अक्षय होता है। पहलेके हजारों जन्मों में जो पाप संचित किया गया हो, वह सब अविमुक्त क्षेत्र में प्रवेश करते ही नष्ट हो जाता है। वरानने! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, वर्णसंकर, स्त्रीजाति, म्लेच्छ तथा अन्यान्य मिश्रित जातियोंके मनुष्य, चाण्डाल आदि, पापयोनिमें उत्पन्न जीव, कीड़े, चींटियाँ व तथा अन्य पशु-पक्षी आदि जितने भी जीव हैं सब समयानुसार अविमुक्त क्षेत्रमें मरनेपर मेरे अनुग्रह से परम गतिको प्राप्त होते हैं।

मोक्ष को अत्यन्त दुर्लभ और संसार को अत्यन्त भयानक समझकर मनुष्य को काशीपुरी में निवास करना चाहिये। जहाँ-तहाँ मरनेवाले को संसार- बन्धनसे छुड़ानेवाली सद्गति तपस्यासे भी मिलनी कठिन है। किन्तु वाराणसीपुरीमें बिना तपस्याके ही ऐसी गति अनायास प्राप्त हो जाती है। जो विद्वान् सैकड़ों विघ्नोंसे आहत होनेपर भी काशीपुरी में निवास करता है, वह उस परमपदको प्राप्त होता है। जहाँ जाने पर शोक से पिण्ड छूट जाता है। काशीपुरी रहने वाले जीव जन्म, मृत्यु और वृद्धावस्था से रहित परमधामको प्राप्त होते हैं। उन्हें वही गति प्राप्त होती है, जो पुनः मृत्यु के बन्धन में न आने वाले मोक्षाभिलाषी पुरुषों को मिलती है तथा जिसे पाकर जीव कृतार्थ हो जाता है।

अविमुक्त क्षेत्रमें जो उत्कृष्ट गति प्राप्त होती है वह अन्यत्र दान, तपस्या, यज्ञ और विद्या से भी नहीं मिल सकती। जो चाण्डाल आदि घृणित जातियों में उत्पन्न हैं तथा जिनकी देह विशिष्ट पातकों और पापों से परिपूर्ण है, उन सबकी शुद्धि के लिये विद्वान् पुरुष अविमुक्त क्षेत्र को ही श्रेष्ठ औषध मानते हैं।

अविमुक्त क्षेत्र परम ज्ञान है, अविमुक्त क्षेत्र परम पद है, अविमुक्त क्षेत्र परम तत्त्व है और अविमुक्त क्षेत्र परम शिव-परम कल्याणमय है।

जो मरणपर्यन्त रहनेका नियम लेकर अविमुक्त क्षेत्रमें निवास करते हैं, उन्हें अन्त में मैं परम ज्ञान एवं परम पद प्रदान करता हूँ।

वाराणसीपुरी में प्रवेश करके बहने वाली त्रिपथगामिनी गंगा विशेष रूप से सैकड़ों जन्मों का पाप नष्ट कर देती। हैं। अन्यत्र गंगाजी का स्नान, श्राद्ध, दान, तप, जप व्रत सुलभ हैं; किन्तु वाराणसीपरी में रहते हुए इन सबका अवसर मिलना अत्यन्त दुर्लभ है।

वाराणसीपुरी में निवास करनेवाला मनुष्य जप, होम, दान एवं देवताओं का नित्यप्रति पूजन करने का तथा निरन्तर वायु पीकर रहनेका फल प्राप्त कर लेता है।

पापी, शठ और अधार्मिक मनुष्य भी यदि वाराणसीमें चला जाय तो वह अपने समूचे कुलको पवित्र कर देता है। जो वाराणसीपुरी में मेरी पूजा और स्तुति करते हैं, वे सब पापोंसे मुक्त हो जाते हैं।

देवदेवेश्वरि ! जो मेरे भक्तजन वाराणसीपुरी में निवास करते हैं, वे एक ही जन्ममें परम मोक्ष को पा जाते हैं। परमानन्द की इच्छा रखनेवाले ज्ञाननिष्ठ पुरुषों के लिये शास्त्रों में जो गति प्रसिद्ध है, वही अविमुक्त क्षेत्र में मरनेवाले को प्राप्त हो जाती है। अविमुक्त क्षेत्रमें देहावसान होनेपर साक्षात् परमेश्वर में स्वयं ही जीवको तारक ब्रह्म (राम-नाम) का उपदेश करता हूँ।

वरणा और असी नदियोंके बीचमें वाराणसीपुरी स्थित है तथा उस पुरीमें ही नित्य-विमुक्त तत्त्वकी स्थिति है।

वाराणसीसे उत्तम दूसरा कोई स्थान न हुआ है और न होगा। जहाँ स्वयं भगवान् नारायण और देवेश्वर मैं विराजमान हूँ। देवि! जो महापातकी हैं तथा जो उनसे भी बढ़कर पापाचारी हैं, वे सभी वाराणसीपुरी में जाने से परमगति को प्राप्त होते हैं। इसलिये मुमुक्षु पुरुषको मृत्युपर्यन्त नियमपूर्वक वाराणसीपुरीमें निवास करना चाहिये। वहाँ मुझसे ज्ञान पाकर वह मुक्त हो जाता है।

किन्तु जिसका चित्त पापसे दूषित होगा, उसके सामने नाना प्रकारके विघ्न उपस्थित होंगे। अतः मन, वाणी और शरीरके द्वारा कभी पाप नहीं करना चाहिये।

नारदजी कहते हैं— राजन्! जैसे देवताओंमें ! पुरुषोत्तम नारायण श्रेष्ठ हैं, जिस प्रकार ईश्वरोंमें महादेवजी श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार समस्त तीर्थस्थानोंमें यह काशीपुरी उत्तम है। जो लोग सदा इस पुरीका स्मरण और नामोच्चारण करते हैं, उनका इस जन्म और पूर्वजन्मका भी सारा पातक तत्काल नष्ट हो जाता है; इसलिये योगी हो या योगरहित, महान् पुण्यात्मा हो अथवा पापी – प्रत्येक मनुष्यको पूर्ण प्रयत्न करके वाराणसीपुरीमें निवास करना चाहिये ।

हर हर महादेव काशी विश्वनाथ की जय

रहते थे। ये राज्य थे मगधकोसलवत्स और उज्जयिनी। कभी काशी वत्सों के हाथ में जाती, कभी मगध के और कभी कोसल के। पार्श्वनाथ के बाद और बुद्ध से कुछ पहले, कोसल-श्रावस्ती के राजा कंस ने काशी को जीतकर अपने राज में मिला लिया। उसी कुल के राजा महाकोशल ने तब अपनी बेटी कोसल देवी का मगध के राजा बिम्बसार से विवाह कर दहेज के रूप में काशी की वार्षिक आमदनी एक लाख मुद्रा प्रतिवर्ष देना आरंभ किया और इस प्रकार काशी मगध के नियंत्रण में पहुंच गई।[1] राज के लोभ से मगध के राजा बिम्बसार के बेटे अजातशत्रु ने पिता को मारकर गद्दी छीन ली। तब विधवा बहन कोसलदेवी के दुःख से दुःखी उसके भाई कोसल के राजा प्रसेनजित ने काशी की आमदनी अजातशत्रु को देना बन्द कर दिया जिसका परिणाम मगध और कोसल समर हुई। इसमें कभी काशी कोसल के, कभी मगध के हाथ लगी। अन्ततः अजातशत्रु की जीत हुई और काशी उसके बढ़ते हुए साम्राज्य में समा गई। बाद में मगध की राजधानी राजगृह से पाटलिपुत्र चली गई और फिर कभी काशी पर उसका आक्रमण नहीं हो पाया।

आधुनिक काशी राज्यसंपादित करें

आधुनिक काशी राज्य वाराणसी का राज्य बना है। भारतीय स्वतंत्रता उपरांत अन्य सभी रजवाड़ों के समान काशी नरेश ने भी अपनी सभी प्रशासनिक शक्तियां छोड़ कर मात्र एक प्रसिद्ध हस्ती की भांति रहना आरंभ किया। वर्तमान स्थिति में ये मात्र एक सम्मानीय उपाधि रह गयी है। काशी नरेश का रामनगर किला वाराणसी शहर के पूर्व में गंगा नदी के तट पर बना हुआ है।[2] काशी नरेश का एक अन्य किला चेत सिंह महल, शिवाला घाट, वाराणसी में स्थित है। यहीं महाराज चेत सिंह को ब्रिटिश अधिकारी ने २०० से अधिक ब्रिटिश सैनिकों के संग घेर कर मार गिराया था।[3] रामनगर किला और इसका संग्रहालय अब बनारस के राजाओं के सम्मान में एक स्मारक बना हुआ है। इसके अलावा १८वीं शताब्दी से ये काशी नरेश का आधिकारिक आवास बना हुआ है।[4] आज भी काशी नरेश को शहर में सम्मान की दृष्टि के साथ देखा जाता है।[5] ये शहर के धार्मिक अग्रणी रहे हैं और यहाँ की प्रजा के द्वारा भगवान शिवजी के अवतार माने जाते हैं।[6] ये शहर के धार्मिक संरक्षक भी माने जाते हैं और सभी धामिक कार्यकलापों में अभिन्न भाग लेतें हैं।[7]


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