शिव पुराण कथा चरित्र 01 | देवराजक ब्राह्मण को शिवलोककी प्राप्ति


शिव पुराण कथा चरित्र 01 | देवराजक ब्राह्मण को शिवलोककी प्राप्ति 

श्री शौनकजीने सूतजी से कहा
महाभाग सूतजी ! आप धन्य है, परमार्थ-तत्वके ज्ञाता हैं, आपने कृपा करके हमलोगोको यह बड़ी अद्भुत एवं दिव्य कथा सुनानी प्रारंभ की है। आज हमने आपकी कृपासे निश्चयपूर्वक समझ लिया है कि भूतलपर इस कथाके समान कल्याणका दूसरा कोई सर्वश्रेष्ठ साधन नहीं है।
महाभाग सूतजी कलियुगमें इस कथाके द्वारा कौन-कौन-से पापी शुद्ध हुए हैं? कृपापूर्वक उनके बारे में बताइये और इस जगत्‌को कृतार्थ कीजिये। 

सूतजी बोले
मुने ! जो मनुष्य पापी, दुराचारी, खल तथा काम-क्रोध आदिमें निरन्तर डूबे रहनेवाले हैं, वे भी इस पुराणके श्रवण-पठन अर्थात सुनने और पढ़ने से अवश्य ही शुद्ध हो जाते हैं। 
मुने ! इसी विषय में जानकार ऋषि-मुनि इसी प्राचीन इतिहासका उदाहरण देते हैं, जिसके श्रवणमात्रसे मनुष्य के पापोंका पूर्णतया नाश हो जाता है।

इस बात का सर्वश्रेष्ठ धारण देवराज ब्राह्मण की कथा है। बहुत पहलेकी बात है, कहीं किरातोंके नगरमें देवराज नाम का एक ब्राह्मण रहता था। जो ब्राह्मण होते हुए भी, वैदिक धर्मसे विमुख, ज्ञानमें अत्यन्त दुर्बल, दरिद्र, रस बेचनेवाला था। वह स्नान-संध्या आदि कमोंसे भ्रष्ट हो गया ।

देवराज अपने ऊपर विश्वास करनेवाले लोगोंको ठगा लिया करता था। उसने ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों शुद्रों तथा दूसरोंका धन भी नये नये बहाने बनाकर हड़प लिया था। इस कारण वह बहुत धनी हो गया धनी होने के बावजूद उस पापी ने थोड़ा-सा भी धन कभी धर्मके काममें नहीं लगाया। धन और संगत के कारण वह जुआ खेलने लगा और मद्यपान करने लगा। एक दिन वह मद्यपान करके लौट रहा था तो मध्य में मस्त होकर वह एक मार्ग में गिर पड़ा।

कुछ समय बाद उस मार्ग से एक व्यस्य निकल रही थी जो उसे धनवान जानकर अपने साथ ले गए और वह वैश्यव धन के लालच में उसके साथ रहने लगी। धीरे-धरे वह वेश्यागामी होकर अन्य सब प्रकारसे आचार विचार और आचरण से भी भृष्ट था। 

धीरे-धीरे उसकी सारी जमा पूंजी खत्म हो गई। घरवालों ने उसे धक्के मार कर निकाल दिया तो एक दिन भूख प्यास से आ दूर देवराज घूमता-घामता दैवयोगसे प्रतिष्ठानपुर (झूसी - प्रयाग) में जा पहुँचा। 

वहाँ उसने एक शिवालय देखा, जहाँ बहुत से साधु-महात्मा एकत्र हुए थे। वहाँ एक ब्राह्मणदेवता शिवपुराणकी कथा सुना रहे थे अतः वहां शिव कथा का वाचन चल रहा था। देवराज भोजन की आस में उस शिवालय में ठहर गया, किंतु वहाँ उस देवराज ब्राह्मणको ज्वर आ गया। उस ज्वरसे देवराज को बड़ी पीड़ा होने लगी। 

देवराज ज्वरमें पड़ा हुआ  ब्राह्मणके मुखारविन्दसे निकली हुई उस शिवकथाको निरन्तर सुनता रहा। अब मंदिर में शिवरात्रि आ गई लोगों में व्रत रखा था इसलिए वहां भंडारा नहीं हो रहा था इस कारण देवराज को भूखे ही रहना पड़ा इसी बीच रात्रि के तीन प्रहर तक कीर्तन चलता रहा और उसी कीर्तन में देवराज बैठा रहा। 

एक मास तक वहां कथा हुई और वह उनसे सुनता रहा लेकिन ज्वर कम होने के स्थान पर और बढ़ गया और ज्वार और पीड़ा के कारण मंदिर में ही उसका प्राणांत हो गया।

यमराजके दूत आये और उसे पाशोंसे बाँधकर बलपूर्वक यमपुरीमे ले गये। इतनेमें ही शिवलोकसे भगवान् शिवके चार क्रोधित पार्षदगण यमपुरीमे आ गये। उनके गौर अङ्ग कर्पूरके समान उज्ज्वल थे, उनके हाथों में त्रिशूल सुशोभित हो रहे थे, उनके सम्पूर्ण अङ्ग परम तेज से उद्भासित थे और रूद्राक्षकी मालाएँ उनके शरीरकी शोभा बढ़ा रही थीं।

उन शिव पार्षदों ने यमराजके दूतोंको मार-पीटकर, और ब्रा धमकाकर देवराजको उनके चंगुल से छुड़ा लिया और उसे अपने अत्यन्त अद्भुत विमानपर बिठाकर कैलास जानेको उद्यत हुए।

यमदूत होने का यह ऐसा प्राणी है जिसने ब्राह्मण होते हुए भी ब्राह्मण का एक भी कर्म नहीं किया। इसने सभी दुष्कर्म की है इसलिए यह नरक का अधिकारी है। 

इस पर शिव गण बोले इसने पूरे एक मास तक शिव कथा सुनी है इसलिए यह शिवलोक का अधिकारी है। यही हम लोग रह गए यह सब लोग इसका निर्णय भगवान भोलेनाथ करेंगे।

इससे यमपुरीमें बड़ा भारी कोलाहल मच गया। उस कोलाहल सुनकर धर्मराज अपने महल से बाहर आये। साक्षात् दूसरे रुद्रोंके समान प्रतीत होनेवाले उन चारों दूतोंको देखकर धर्मज्ञ धर्मराज ने ज्ञानदृष्टिसे सारा वृत्तान्त जान लिया। धर्मराज ने उन सबकी पूजा एवं प्रार्थना की और भगवान भोलेनाथ से अपने प्रणाम कहने के लिए कहा और अपने दूतों से कहा की आज के बाद शिव पुराण सुनने वाले पर हमारा अधिकार नहीं होगा यह शिवलोक जाएगा।

तत्पश्चात् वे शिवदूत देवराज को लेकर कैलासको चले गये और वहाँ पहुँचकर उन्होंने उस ब्राह्मणको दयासागर साम्ब सदाशिवके हाथोंमें दे दिया।






★★★

उन्होंने चढ़ावे में आए हुए धन को शिवलिंग के ऊपर लगे घंटे से बांध दिया और फिर निश्चिंत होकर सो गए।

जब सब सो गए तो देवराज ने ज्वार में ही एक बार फिर से भगवान शिव पर चढ़े चढ़ावे और प्रसाद को चुराने की युक्ति बना डाली उसने अपनी धोती को फाड़ कर उसकी बच्ची बनाई और उसमें आग जलाकर और उसने की कहीं ऐसा ना हो कि चढ़ावे तक पहुंचते हुए किसी पर पैर पड़ जाए और वह जग जाए।
अचानक हुई रोशनी से भगवान भोलेनाथ जाग गए और भी देवराज को देखने लगे और सोचने लगे कि कितना प्यारा वक है जब दीपक जलाने के लिए रोई आदि नहीं मिली तो उसने अपने वस्त्र को ही फाड़कर दीपक बना डाला। देवराज तेजी से शिवलिंग के पास पहुंचा तो उसने धन प्राप्ति के लिए हाथ बढ़ाया लेकिन कुछ छोटा रह गया तो उसने उस धन को पाने के लिए भगवान भोलेनाथ के शिवलिंग पर पैर रखा और घंटे को पकड़ लिया उसने जैसे घंटा पकड़ा वह हिल गया और बज गया इसी बीच वहां से लोगों की नींद लग गई और उन्होंने से चोर समझकर बहुत मारा । वह ज्वार में तो था ही और ऊपर से बड़ी मार के कारण उसके प्राण पखेरू उड़ गए।

यमराजके दूत आये और उसे पाशोंसे बाँधकर बलपूर्वक यमपुरीमे ले गये। इतनेमें ही शिवलोकसे भगवान् शिवके चार क्रोधित पार्षदगण यमपुरीमे आ गये। उनके गौर अङ्ग कर्पूरके समान उज्ज्वल थे, उनके हाथों में त्रिशूल सुशोभित हो रहे थे, उनके सम्पूर्ण अङ्ग परम तेज से उद्भासित थे और रूद्राक्षकी मालाएँ उनके शरीरकी शोभा बढ़ा रही थीं।

उन शिव पार्षदों ने यमराजके दूतोंको मार-पीटकर, और ब्रा धमकाकर देवराजको उनके चंगुल से छुड़ा लिया और उसे अपने अत्यन्त अद्भुत विमानपर बिठाकर कैलास जानेको उद्यत हुए।

इससे यमपुरीमें बड़ा भारी कोलाहल मच गया। उस कोलाहल सुनकर धर्मराज अपने महल से बाहर आये। साक्षात् दूसरे रुद्रोंके समान प्रतीत होनेवाले उन चारों दूतोंको देखकर धर्मज्ञ धर्मराज ने ज्ञानदृष्टिसे सारा वृत्तान्त जान लिया। धर्मराज ने उन सबकी पूजा एवं प्रार्थना की और भगवान भोलेनाथ से अपने प्रणाम कहने के लिए कहा।

तत्पश्चात् वे शिवदूत देवराज को लेकर कैलासको चले गये और वहाँ पहुँचकर उन्होंने उस ब्राह्मणको दयासागर साम्ब सदाशिवके हाथोंमें दे दिया।

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