परिजात पुष्प कथा

पारिजात को हरसिंगार, रात की रानी, शेफाली, शिउली आदि नामों से भी जाना जाता है। इसका वानस्पतिक नाम 'निक्टेन्थिस आर्बोर्ट्रिस्टिस' है और अंग्रेजी में इसे नाइट जैस्मीन कहते हैं।

पारिजात का पेड़ बहुत खूबसूरत होता है। पारिजात के फूल को भगवान हरि और हर दोनों के श्रृंगार और पूजन में प्रयोग किया जाता है। दुनिया भर में इसकी सिर्फ पांच प्रजातियां पाई जाती हैं। हरसिंगार का फूल पश्चिम बंगाल का राजकीय पुष्प भी है। पारिजात वृक्ष में फूल आमतौर पर वृक्षारोपण के पांच साल बाद होता है। पौधे पर आकर्षक सुगंध लिए छोटे नारंगी केंद्र के साथ छोटे सफेद फूल लगते हैं। 

पारिजात के फूल को भगवान शिव अर्थात हर के श्रृंगार और पूजन में प्रयोग किया जाता है, इसलिए इस मनमोहक और सुगंधित पुष्प को हरसिंगार के नाम से भी जाना जाता है। 
पारिजात के ये अद्भुत  पुष्प रात में ही खिलते हैं और सुबह होते होते ही सारे फूल मुरझा जाते और झड़ जाते हैं, इसलिए इसे रात की रानी भी कहा जाता है। इसकी खास बात ये है कि पूजा-पाठ में पारिजात के वे ही फूल इस्तेमाल किए जाते हैं जो वृक्ष से टूटकर गिर जाते हैं। पूजा के लिए इस वृक्ष से फूल तोड़ना पूरी तरह से निषिद्ध है। 

पौराणिक मान्यता
पौराणिक मान्यता के अनुसार परिजात वृक्ष की उत्पत्ति समुद्र मंथन से हुई थी, जिसे इन्द्र ने अपनी वाटिका में लगाया था। हरिवंश पुराण में पारिजात को कल्पवृक्ष भी कहा गया है। मान्यता है कि स्वर्गलोक में इसको स्पर्श करने का अधिकार सिर्फ उर्वशी नाम की अप्सरा को था। इस वृक्ष के स्पर्श मात्र से ही उर्वशी की सारी थकान मिट जाती थी। इसी कारण हिन्दू धर्म में इस वृक्ष का बहुत महत्व माना जाता है। ऐसी भी मान्यता है कि पारिजात को छूने मात्र से ही व्यक्ति की थकान मिट जाती है।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार धन की देवी लक्ष्मी को पारिजात के फूल अत्यंत प्रिय हैं। पूजा-पाठ के दौरान मां लक्ष्मी को ये फूल चढ़ाने से वो प्रसन्न होती हैं। 

एक और मान्यता यह भी है क‍ि 14 साल के वनवास के दौरान सीता माता हर‍सिंगार के फूलों से ही अपना श्रृंगार करती थीं।

परिजात वृक्ष के पृथ्वी पर आने की पौराणिक कथा

परिजात वृक्ष के पृथ्वी पर आने की एक पौराणिक कथा विख्यात है जिसके अनुसार एक बार नरकासुर के वध के पश्चात एक बार श्रीकृष्ण अपनी पटरानी रुक्मिणी के साथ व्रतोद्यापन समारोह में रैवतक पर्वत पर गए। उसी समय स्वर्ग से देवऋषि नारद अपने हाथ में पारिजात का पुष्प लिए हुए पधारे। नारद ने वह पुष्प श्रीकृष्ण को भेंट कर दिया। श्रीकृष्ण ने इस पुष्प को रुक्मिणी को दे दिया और रुक्मिणी ने इसे अपने बालों के जूड़े में लगा लिया। इस पर नारद ने प्रशंसा करते हुए कहा कि फूल को जूड़े में लगाने पर रुक्मिणी अपनी सभी बहनों से हजार गुना सुन्दर और चिरयौवना लगने लगी हैं। 

देवी सत्यभामा को देवलोक से देवमाता अदिति ने चिरयौवन का आशीर्वाद पहले ही प्राप्त कर लिया था। तभी नारदजी आए और सत्यभामा को पारिजात पुष्प के बारे में बताया ।
नारद जी बोले, "वाह ! क्या पुष्प था ? उस पुष्प में कितनी शक्ति थी कि उस पुष्प के प्रभाव से देवी रुक्मिणी भी चिरयौवन हो गई हैं।" 

यह जान सत्यभामा क्रोधित हो गईं और श्रीकृष्ण से पारिजात वृक्ष लेने की जिद्द करने लगी। जब ये बात कृष्ण की दूसरी पत्नी सत्यभामा को पता लगी तो वो क्रोधित हो उठी और कृष्ण से अपनी वाटिका के लिए परिजात वृक्ष की मांग करने लगी।

कृष्ण के समझाने पर भी सत्यभामा का क्रोध शांत नहीं हुआ और अन्त में अपनी पत्नी की जिद के सामने झुकते हुए उन्होंने अपने एक दूत को स्वर्गलोक में परिजात वृक्ष को लाने के लिए भेजा पर उनकी यह मांग इन्द्र ने ठुकरा दी और वृक्ष नहीं दिया। जब यह सन्देश कृष्ण तक पहुँचा तो वे रोष से भर गए और उन्होंने इन्द्र पर आक्रमण कर दिया। युद्ध में कृष्ण ने विजय प्राप्त की और इन्द्र से परिजात वृक्ष ले आए। 

इन्द्र ने क्रोध में आकर परिजात वृक्ष को उस पर कभी भी फल ना आने का श्राप दे दिया इसी कारण इस वृक्ष पर कभी भी फल नहीं लगते ।

वादे के अनुसार कृष्ण ने उस वृक्ष को सत्यभामा को सबक सिखाते हुए उसकी वाटिका में लगवा दिया लेकिन उन्होंने  कुछ ऐसा किया जिस कारण रात को वृक्ष पर पुष्प तो लगते लेकिन वे उनकी पहली पत्नी रुक्मणी की वाटिका में ही गिरते थे । इसीलिए आज भी के जब इस वृक्ष के पुष्प झड़ते हैं तो पेड़ से काफी दूर जाकर गिरते हैं।

परिजात वृक्ष के द्वारिका से किन्तूर आने की पौराणिक कथा
किन्तूर में है पारिजात वृक्ष की एक अनोखी प्रजाति, माना जाता है कि किन्तूर गांव का नाम पाण्डवों की माता कुन्ती के नाम पर है। जब धृतराष्ट्र ने पाण्डु पुत्रों को अज्ञातवास दिया तो पांडवों ने अपनी माता कुन्ती के साथ यहां के वन में निवास किया था। पांडवों के अज्ञातवास के दौरान माता कुंती ने पारिजात पुष्प से शिव पूजन करने की इच्छा जाहिर की तो
पांडवों ने अपनी माता कुंती के पूजन के लिए यहां महादेव मंदिर का निर्माण कर उसमें अनार वाली महादेव की स्थापना की जिस कारण इस मंदिर का नाम कुंतेश्वर महादेव मंदिर हो गया। 
जैसा कि पांडवों की माता कुंती ने अपने पुत्र अर्जुन से शिवपूजन में शिवजी पर पारिजात के पुष्प अर्पित करने की इच्छा जाहिर की थी। इस पर अर्जुन द्वारका गए और अपनी माता की छापर करने के लिए भगवान श्री कृष्ण से पारिजात का वृक्ष मांग लिया और भगवान श्री कृष्ण ने अपनी बुआ की इच्छा पूरी करने के लिए उन्हें पारिजात का वृक्ष देना सहर्ष स्वीकार कर लिया। भगवान की आज्ञा मिलने पर अर्जुन पूरा का पूरा पारिजात वृक्ष ही उठा लाए और उसे मंदिर के पास स्थापित कर दिया। और माता कुंती ने पारिजात के पुष्पों से शिव आराधना करके अपनी इच्छा पूर्ण की, तभी से इस वृक्ष के पुष्पों से पूजा अर्चना की जाती रही है। 5000 वर्ष बीत जाने के बाद भी यह पारिजात वृक्ष अटल खड़ा हुआ है।

एक और पौराणिक कथा

पारिजात रात को क्यों रोता हैं?
एक अन्य मान्यता यह भी है कि बहुत समय पहले 'पारिजात' नाम की एक राजकुमारी हुआ करती थी, जिसे भगवान सूर्य से प्रेम हो गया था। लेकिन अथक प्रयास करने पर भी भगवान सूर्य ने पारिजात के प्रेम कों स्वीकार नहीं किया। जिससे खिन्न होकर राजकुमारी पारिजात ने जब तुम मुझे स्वीकार ही नहीं कर रहे तो मैं भी तुम्हें अपने अश्रु नहीं दिखाऊंगी यह कहकर उसने आत्महत्या कर ली। 

कहा जाता है की जिस स्थान पर परिजात की समाधि बनाई गई थी, उसी स्थान पर यह वृक्ष अपने आप उग आया था। यही कारण है कि तभी से लोगों ने इस वृक्ष को पारिजात नाम से पुकारना शुरू कर दिया। 

इस प्रकार पारिजात नामक वृक्ष ने जन्म लिया। यदि पुष्पित वृक्ष को यदि रात मैं देखा जाए तो इसके झड़ते हुए फूलों से ऐसा लगता है कि वह रो रहा है और सफेद रंग की उसकी अश्रु जमीन पर गिर रहे हैं। इसी कारण ऐसा कहा जाता है कि पारिजात वृक्ष को रात को रोता है। 

वहीं सूर्य उदय के साथ ही पारिजात वृक्ष की टहनियाँ और पत्तियां अपने प्रेमी भगवान सूर्य को प्रेम से अपने आगोष में लेने को आतुर दिखाई पड़ता है। 

पारिजात का पौधा कौन से दिन लगाना चाहिए?
पारिजात सोमवार या गुरुवार के दिन लगाना शुभ माना गया हैं। इससे पारिजात पौधा ज्यादा प्रफुल्लित रहता है और घर के सदस्यों के लिए ज्यादा शुभ और लाभकारी माना जाता है।

पारिजात का पौधा छंटाई करनी चाहिए
गर्मियों का मौसम पारिजात के पौधे की वृद्धि के लिए बहुत अच्छा होता है अतः पारिजात का फूल गर्मियों के दौरान तेजी से बढ़ता है। कभी-कभी यह एक दिशा में बढ़ना शुरू कर देता है और आकार से बाहर हो जाता है। इसलिए, जब यह फूल नहीं रहा हो तो इसकी अच्छी तरह से छंटाई करके इसे एक बेहतर आकार दे देना  उचित रहेगा।

पारिजात अपने गुण
हरिवंश पुराण में इस वृक्ष और फूलों का विस्तार से वर्णन मिलता है। पारिजात अपने औषधीय गुणों के लिए भी जाना जाता है। 
★ पौराणिक मान्यता अनुसार पारिजात के वृक्ष को स्वर्ग से लाकर धरती पर लगाया गया था। 
★ यह फूल जिसके भी घर आंगन में खिलते हैं वहां हमेशा शांति और समृद्धि का निवास होता है।
★ हर दिन इसके एक बीज के सेवन से बवासीर रोग ठीक हो जाता है।
★ इसके फूल हृदय के लिए भी उत्तम माने जाते हैं। इनके फूलों के रस के सेवन से हृदय रोग से बचा जा सकता है।
★ इतना ही नहीं पारिजात की पत्तियों को पीस कर शहद में मिलाकर खाने से सूखी खांसी भी ठीक हो जाती है। 
★ पारिजात की पत्तियों से त्वचा संबंधित रोग ठीक हो जाते हैं।
★ पारिजात वृक्ष के ऐतिहासिक महत्तव व इसकी दुर्लभता को देखते हुए सरकार ने इसे संरक्षित घोषित कर दिया है। भारत सरकार ने इस पर एक डाक टिकट भी जारी किया है।
खासतौर पर लक्ष्मी पूजन के में तो केवल उन्हीं फूलों को इस्तेमाल किया जाता है जो अपने आप पेड़ से टूटकर नीचे गिर जाते हैं। 

विभिन्न भाषाओं में नाम : 

संस्कृत- शेफालिका। हिन्दी- हरसिंगार। मराठी- पारिजातक।कोंकणी- पार्दक। गुजराती- हरशणगार। बंगाली- शेफालिका, शिउली। असमिया- शेवालि। तेलुगू- पारिजातमु, पगडमल्लै। तमिल- पवलमल्लिकै, मज्जपु। मलयालम - पारिजातकोय, पविझमल्लि। कन्नड़- पारिजात। उर्दू- गुलजाफरी। इंग्लिश- नाइट जेस्मिन। मैथिली- सिंघार, सिंगरहार |

देवी लक्ष्मी को प्रिय

धन की देवी लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए यदि नीचे दी गई विधि से उनकी पूजा निम्नलिखित पाँच शुभ मुहर्तों- होली, दीवाली, ग्रहण, रवि पुष्प तथा गुरु पुष्प नक्षत्र में की जाए तो उत्तम फल प्राप्त होता है।

इसके लिए देवी लक्ष्मी को प्रसन्न करने में भी पारिजात वृक्ष का उपयोग किया जाता है। देवी लक्ष्मी को पारिजात के पुष्प प्रिय हैं। उन्हें  यदि "ओम नमो मणिंद्राय आयुध धराय मम लक्ष्मी़वसंच्छितं पूरय पूरय ऐं हीं क्ली हयौं मणि भद्राय नम:।" मन्त्र का जाप 108 बार करते हुए नारियल पर पारिजात पुष्प अर्पित किये जाएँ और पूजा के इस नारियल व फूलों को लाल रंग कपड़े में लपेटकर घर के पूजा घर में स्थापित किया जाए तो लक्ष्मी सहज ही प्रसन्न होकर साधक के घर में वास करती हैं। 

उपयोग

सायटिका रोग को दूर करने का इसमें विशेष गुण है।
हरसिंगार की पत्तियाँ व टहनी

इस वृक्ष के पत्ते और छाल विशेष रूप से उपयोगी होते हैं। इसके पत्तों का सबसे अच्छा उपयोग गृध्रसी (सायटिका) रोग को दूर करने में किया जाता है।

विधि: हरसिंगार के ढाई सौ ग्राम पत्ते साफ करके एक लीटर पानी में उबालें। जब पानी लगभग 700 मिली बचे तब उतारकर ठण्डा करके छान लें, पत्ते फेंक दें और 1-2 रत्ती केसर घोंटकर इस पानी में घोल दें। इस पानी को दो बड़ी बोतलों में भरकर रोज सुबह-शाम एक कप मात्रा में इसे पिएँ।

ऐसी चार बोतलें पीने तक सायटिका रोग जड़ से चला जाता है। किसी-किसी को जल्दी फायदा होता है फिर भी पूरी तरह चार बोतल पी लेना अच्छा होता है। 

नोट : इस प्रयोग में एक बात का खयाल रखें कि वसन्त ऋतु में ये पत्ते गुणहीन रहते हैं अतः यह प्रयोग वसन्त ऋतु में लाभ नहीं करता।


वनस्पतिक जानकारी

परिजात वृक्ष कथा

पारिजात को हरसिंगार, रात की रानी, शेफाली, शिउली आदि नामों से भी जाना जाता है। इसका वानस्पतिक नाम 'निक्टेन्थिस आर्बोर्ट्रिस्टिस' है और अंग्रेजी में इसे नाइट जैस्मीन कहते हैं। विभिन्न भाषाओं में इसे भिन्न-भिन्न नामों से पुकारा जाता है। जैसे – संस्कृत- शेफालिका। हिन्दी- हरसिंगार। मराठी- पारिजातक।कोंकणी- पार्दक। गुजराती- हरशणगार। बंगाली- शेफालिका, शिउली। असमिया- शेवालि। तेलुगू- पारिजातमु, पगडमल्लै। तमिल- पवलमल्लिकै, मज्जपु। मलयालम - पारिजातकोय, पविझमल्लि। कन्नड़- पारिजात। उर्दू- गुलजाफरी। इंग्लिश- नाइट जेस्मिन। मैथिली- सिंघार, सिंगरहार |

पारिजात का पेड़ बहुत खूबसूरत होता है। पारिजात के फूल को भगवान हरि और हर दोनों के श्रृंगार और पूजन में प्रयोग किया जाता है। दुनिया भर में इसकी सिर्फ पांच प्रजातियां पाई जाती हैं। हरसिंगार का फूल पश्चिम बंगाल का राजकीय पुष्प भी है। पारिजात वृक्ष में फूल आमतौर पर वृक्षारोपण के पांच साल बाद होता है।

विशेषकर मध्यभारत और हिमालय की नीची तराइयों में ज्यादातर पैदा होने वाला यह वृक्ष 10  से 15 फीट ऊँचा और कहीं 25 से 30 फीट तक ऊँचा होता है। अपनी सुंदरता और सुगंध के कारण लगभग पूरे भारत में विशेषतः बाग-बगीचों में लगा हुआ मिलता है। है। इसके फूल बहुत सुगंधित, सफेद और सुन्दर होते हैं। 

पारिजात के ये अद्भुत पुष्प केवल रात में सूर्यास्त के एक घण्टे बाद खिलते हैं और सुबह होते होते ही सारे फूल मुरझा जाते और झड़ जाते हैं, इसलिए इसे रात की रानी भी कहा जाता है।

 वैज्ञानिक वर्गीकरण

जगत: पादप जगत

प्रभाग : मैग्नोलियोफाइटा

वर्ग : मेंग्नालियोप्सिडा

गण: लेमियेल्स Lamiales

कुल: ओलियेसी Oleaceae

वंश: निक्टेन्थिस Nyctanthes

जाति: आरबोर-ट्रिस्टीस N. arbor-tristis

द्विपद-नामकरण : Nyctanthes arbor-tristis

(unranked) Eudicots

(unranked) Asterids


गुण

यह हलका, रूखा, तिक्त, कटु, गर्म, वात-कफनाशक, ज्वार नाशक, मृदु विरेचक, शामक, उष्णीय और रक्तशोधक है। 

रासायनिक संघटन : पारिजात के फूलों में सुगंधित तेल होता है। इसकी केसरिया रंग की रंगीन पुष्प नलिका में निक्टैन्थीन नामक रंगीन द्रव्य ग्लूकोसाइड के रूप में 0.1% पाया जाता है जो केसर में स्थित ए-क्रोसेटिन के समान है। 

इसके बीज कमज्जा से 12-16% पीले भूरे रंग का तेल निकलता है। 

पत्तों में टैनिक एसिड, मेथिलसेलिसिलेट, एक ग्लाइकोसाइड (1%), मैनिटाल (1.3%), एक राल (1.2%), कुछ उड़नशील तेल, विटामिन सी और ए पाया जाता है। 

छाल में एक ग्लाइकोसाइड और दो क्षाराभ होते हैं।


वृक्ष की आयु
अगर इस वृक्ष की उम्र की बात की जाए तो वैज्ञानिकों के अनुसार यह वृक्ष 1 हजार से 5 हजार साल तक जीवित रह सकता है। इस प्रकार की दुनिया में सिर्फ पांच प्रजातियां हैं, जिन्हें एडोसोनिया वर्ग में रखा जाता है। परिजात का पेड़ भी इन्हीं पांच प्रजातियों में से ‘डिजाहट’ प्रजाति का सदस्य है।

विश्व प्रसिद्ध पारिजात वृक्ष
बाराबंकी जिले के ग्राम बरौलिया बाराबंकी जिला मुख्यालय से लगभग 38 किलोमीटर दूर पूर्व दिशा में स्थित है। पारिजात के वृक्ष को महाभारतकालीन माना जाता है जो लगभग 45 फीट ऊंचा है। इसी ग्राम में विश्व प्रसिद्ध पारिजात वृक्ष स्थित है। यह वृक्ष सरकार द्वारा संरक्षित है। 

लोकमत इस वृक्ष की आयु लगभग 1000 वर्ष मानता है। सन् 2019 में हुए रेडियोकार्बन कालनिर्धारण में इसकी आयु तब 793±37 वर्ष मापी गई। इसके तने का परिमाप 50 फ़ीट और ऊंचाई लगभग 45 फ़ीट होगी। गोरखचिंच (बाओबाब) जाति के वृक्ष केवल अफ्रीका के कुछ भागों में ही उगते हैं, इसलिए इस वृक्ष की यहाँ उपस्थिति एक रहस्य है।

इस पारिजात को किन्तूर में स्थापित कर दिया। 

विज्ञान भी इसे बताता है असाधारण पेड़

किन्तूर गांव के इस पारिजात पेड़ की जांच कई बार वनस्पति विज्ञानियों ने की है. जिन्होंने इसे असाधारण करार दिया है. वनस्पति वैज्ञानिकों के मुताबिक परिजात के इस पेड़ को ‘ऐडानसोनिया डिजिटाटा’ के नाम से जाना जाता है. इसे एक विशेष श्रेणी में रखा गया है क्योंकि यह अपने फल या उसके बीज का उत्पादन नहीं करता है. यही नहीं इसकी शाखा या कलम से एक दूसरा परिजात वृक्ष भी नहीं लगाया जा सकता. वनस्पतिशास्त्रियों के अनुसार यह एक यूनिसेक्स पुरुष वृक्ष है. ऐसा कोई पेड़ और कहीं नहीं मिला है. इस पेड़ के बारे में एक और खास बात कही जाती है कि इसकी शाखाएं टूटती या सूखती नहीं हैं. बल्कि पुरानी हो जाने के बाद सिकुड़ते हुए मुख्य तने में ही गायब हो जाती हैं.

इस पेड़ की पत्तियां भी बेहद खास हैं. पारिजात पेड़ के निचले हिस्से में पत्तियां हाथ की उंगलियों की तरह पांच युक्तियों वाली होती है. जबकि पेड़ के उपरी हिस्सों में यही पत्तियां सात युक्तियों वाली हो जाती हैं. 











ज्योतिष विज्ञान में भी पारिजात का विशेष महत्व बताया गया है।


इस फूल को श्रृंगार हार और हरसिंगार के नाम से भी जाना जाता है। माता सीता को पारिजात के फूल बहुत ही प्रिय हैं। ऐसी मान्यता हैं इसके फूलों से माता लक्ष्मी और उनके अवतारों सीता और रुक्मणी की पूजा की जाए तो घर में धन-धान्य की वृद्धि होती है।



रात में खिलने वाल फूल कौन सा है?
बेला, चमेली, चाँदनी, कुमुदिनी, श्वेत कनेर, पारिजात, मौलश्री के फूल रात में खिलते हैं.



 

भौगोलिक स्थितिसंपादित करें





इसका पुष्प श्वेत रंग का और सूखने पर सुनहरे रंग का हो जाता है। इस वृक्ष में पुष्प बहुत ही कम संख्या में और कभी-कभी ही गंगा दशहरा (जून के माह) के अवसर पर लगते हैं। पुष्प सदैव रात्रि में ही पुष्पित होते हैं और प्रातः काल मुरझा जाते हैं। रात्रि के समय पुष्प पुष्पित होने पर इसकी सुगंध दूर-दूर तक फैल जाती है।[3]

1: नकारात्मक ऊर्जा को दूर करता है
#2: घर में देवी लक्ष्मी का आगमन होता है
#3: परिवार के सदस्यों की लंबी आयु
#4: मंदिर के पास रखने से सौभाग्य की प्राप्ति होती है
माहौल को शांत रखता है। 
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पारिजात या हरसिंगार के पौधे के लिए वास्तु - कुछ ख़ास बातें
Parijat Tree (पारिजात का पौधा) को हरसिंगार या रातरानी भी कहा जाता है। यह पौधा घर से निगेटिविटी को दूर करता है और माहौल को शांत रखता है। इस ब्लॉग में हम पारिजात का पौधा (Parijat Tree) के वास्तु लाभ और फायदों के बारे में जानेंगे।

आमतौर पर अंग्रेजी में 'Night Blooming Jasmine' के नाम से जाने जाने वाला पारिजात का पौधा (Parijat Tree) इनडोर डेकोर में इस्तेमाल किया जाता है और इसके वास्तु व औषधीय महत्व भी है। होम्योपैथी और आयुर्वेद में, यह पौधा और इसके फूल बहुत महत्व रखते हैं। 

अपनी  जाना जाता है। 



इसे रातरानी इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह आमतौर पर देर शाम या रात में खिलता है, 
जिससे इसके चारों ओर मीठी महक फैलती है। 
यह पौधा सितंबर के अंत से दिसंबर के अंत खिलता है।

वैसे तो वास्तु में कई पौधों को घर में रखने की सलाह दी गई है, आज हम केवल पारिजात के पौधा के बारे में जानेंगे। 
यह पौधे न केवल अच्छी-सुगंधित फूल देता है बल्कि आपके घर के लिए बहुत शुभ माना जाता है। 
इसके फूलों का इस्तेमाल पूजा व आरती में किया जाता है। 
घर में पौधे को रखना शुभ माना जाता है। 


हरसिंगार या पारिजात का पौधा और वास्तु के अनुसार इसका इस्तेमाल
सिंगल फूल वाला पारिजात का पौधा - हरसिंगार पौधे (स्रोत: विकिमीडिया )
इन दिनों कई घर में इनडोर प्लांट जैसे पारिजात का पौधा (Parijat Tree) या हरसिंगार का पौधा रखा जाने लगा है। ये पौधे केवल घर की साजवट के लिए ही इस्तेमाल नहीं होते हैं। आज लोग अच्छी और बुरी ऊर्जाओं को लेकर काफी सतर्क हैं, इसलिए वे इस बात का अधिक ध्यान रखते हैं कि उन्हें घर में क्या रखना चाहिए। वास्तु शास्त्र में पौधों का हमेशा महत्वपूर्ण स्थान रहा है। फेंगशुई के जैसे ही वास्तु शास्त्र में भी घर में पॉजिटिविटी के लिए पौधे रखने की बात कही गई है।

ये पौधे इसलिए शुभ हैं क्योंकि यह देवी लक्ष्मी को अत्यंत प्रिय माना जाता है। 

ऐसा कहा जाता है कि यह पौधा घर को रहने लायक बनाता है। पारिजात का पौधा का घर में शांति, समृद्धि, खुशी और अच्छा स्वास्थ्य लाता है। 

सही दिशा में लगाने पर यह पौधा आपके घर में सकारात्मक वाइब्स ला सकता है और इसकी अच्छी सुगंध से मन को सुकून मिलता है।


वास्तु शास्त्र के अनुसार हरसिंगार या पारिजात का पौधा (Parijat Tree) हमेशा अपने घर के पूर्व या उत्तर दिशा में रखना चाहिए। इससे घर से अपशकुन और ऊर्जाएं दूर हो जाएंगी और घर में पॉजिटिविटी और शांति आएगी। घर में पारिजात का पौधा (Parijat Tree) लगाने की सबसे सही दिशा पश्चिम या उत्तर-पश्चिम दिशा है। हालांकि, वास्तु शास्त्र के अनुसार दक्षिण दिशा में पौधे लगाने से बचना चाहिए, क्योंकि यह वह दिशा है जहां से मृत्यु के देवता यम अपनी यात्रा करते हैं।

अगर आपके आंगन या छत पर तुलसी का पौधा या मंदिर है तो आप इसके पास पारिजात का पौधा लगा सकते हैं। इससे न केवल आपके घर में धन का आगमन होगा बल्कि आपके परिवार के पाप भी धुल जाएंगे।


पारिजात के पौधे का लाभ (Parijat Tree Benefit) 
#1: नकारात्मक ऊर्जा को दूर करता है
वास्तु शास्त्र में कहा गया है कि इस पौधे को घर में रखने से घर से सभी नकारात्मक ऊर्जा दूर हो जाती है। इसके फूलों की सुगन्धित सुगंध मन को शांत करती है, मानसिक तनाव से मुक्ति दिलाती है। 


#2: घर में देवी लक्ष्मी का आगमन होता है
वास्तु शास्त्र के अनुसार जिस घर में पारिजात का पौधा (Parijat Tree) लगा होता है वहां कोई भी ऊर्जा देवी लक्ष्मी को वास करने से नहीं रोक सकती है। माना जाता है कि घर में धन का आगमन होता है और परिवार में कभी भी धन की कमी नहीं होती है। इसका एक कारण है कि पारिजात के पौधे को देवी लक्ष्मी का पसंदीदा माना जाता है। 

समुद्र मंथन के दौरान निकले 14वें रत्नों में से यह पौधा स्वयं देवी के साथ 11वें स्थान पर था। यही कारण है कि लक्ष्मी पूजा में इन फूलों का इस्तेमाल आरती के लिए किया जाता है।

#3: परिवार के सदस्यों की लंबी आयु
ऐसा कहा जाता है कि घर की सही दिशा में लगाए जाने पर यह पौधा परिवार के सदस्यों की लंबी उम्र बढ़ा सकता है। यह सदस्यों को उनके पिछले पापों से भी शुद्ध करता है।

#4: मंदिर के पास रखने से सौभाग्य की प्राप्ति होती है
ऐसा कहा जाता है कि पारिजात का पौधा समुद्र के मंथन से उत्पन्न हुआ था और भगवान इंद्र ने इसे स्वर्ग वाटिका में रखा था, जिसका अर्थ है कि जहां स्वर्ग के देवताओं का निवास हो। इस पौधे को आंगन मंदिर के पास या जहां तुलसी का पौधा है वहां लगाने से परिवार के सदस्यों के बीच बहुत सद्भाव और शांति आएगी।


पारिजात पौधे के कई औषधीय या स्वास्थ्य लाभ भी हैं। पारिजात के पौधे के स्वास्थ्य लाभ (health benefits of the Parijat tree) इस प्रकार हैं : 

गठिया (Arthritis) : पारिजात के पेड़ या हरसिंगार की पत्तियां ऑस्टियोआर्थराइटिस के कारण होने वाले दर्द तुरंत राहत दिलाती हैं। पारिजात के पत्तों (Parijat Tree) के चूर्ण का सेवन करने से गठिया के दर्द में आराम मिलता है। 
साइटिका (Sciatica) : साइटिका में पारिजात के पत्तों का 10 से 20 मिलीलीटर रस वात दोष को दूर करने और साइटिका के कारण होने वाले दर्द से राहत दिलाने में मदद करेगा। खाने से पहले रस को पानी में मिलाकर पीना सबसे सही है। 
बुखार (Fever) : पारिजात शरीर में विषाक्त पदार्थों के इक्ट्ठा होने के कारण होने वाले बुखार के इलाज में प्रभावी है। पारिजात के पेड़ (Parijat Tree) की पत्तियों को अन्य जड़ी बूटियों के साथ मिलाकर चाय का सेवन करने से बुखार कम होता है। 
अपच (Indigestion) : पारिजात के पेड़ (Parijat Tree) के पत्तों का चूर्ण न पचने वाले भोजन के कारण होने वाली अपच को दूर करने में मदद करता है। पारिजात के पेड़ की पत्तियां पाचन में सुधार करती हैं। 
मधुमेह (Diabetes) : पारिजात के पत्तों का सेवन करने का सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह ब्लड शुगर को कम करने में मदद करता है। पारिजात के पेड़ (Parijat Tree) के पत्तों का सेवन करने से विषाक्त पदार्थ बाहर निकल जाते हैं और पाचन में सुधार होता है। इससे अग्न्याशय और शरीर के इंसुलिन स्तर का संतुलन होता है। 

शहद के साथ मिलाकर, इस पौधे की पत्तियों का रस पुरानी खांसी में लाभदायक हो सकता है।

सांस की समस्या या गैस की समस्या के लिए इस पौधे के फूल बेहद फायदेमंद होते हैं।

सांप के काटने, पीठ दर्द या जोड़ों के दर्द में इस पौधे के तने को इस्तेमाल किया जाता है।

पारिजात के पौधे के फूल मधुमेह रोगियों के ग्लूकोज स्तर को नियंत्रित रखने में अत्यधिक इस्तेमाल होते हैं।

गले की सूखी खांसी से राहत पाने के लिए इस पौधे का प्रयोग किया जाता है।

पेट के दर्द से राहत पाने के लिए पौधे के फूलों से निकाले गए अर्क का इस्तेमाल किया जा सकता है।

पौधे से निकाले गए बीजों का इस्तेमाल रूसी और जूँ को खत्म करने में किया जाता है।

पौधे की पत्तियाँ और फूल इम्युनोस्टिममुलंट्स के रूप में कार्य करते हैं।

पारिजात के पौधे की देखभाल कैसे करें?
अगर बेहतर देखभाल के लिए इन सुझावों का पालन किया जाए तो पारिजात के पौधे हर घर में आसानी से लगाए जा सकते हैं:

तापमान: पारिजात के पौधे के लिए आदर्श तापमान 20 से 25 डिग्री सेल्सियस है, इसलिए यह भारतीय जलवायु के प्रति उपयुक्त बनाता है। ठंडे तापमान में यह पौधे अधिक समय तक बचा नहीं रह सकता है।

मिट्टी: पारिजात के पौधे को ऐसी मिट्टी की आवश्यकता होती है जो जड़ों को नम रखें। यही कारण है कि ये खुली मिट्टी या ऐसे गमले में उग सकते हैं जिसमें से पानी आसानी से निकल जाता हो। पौधे के लिए मिट्टी का pH मान 5.3 से 7.6 के बीच होना चाहिए।

पानी: हालाँकि इन पौधे के लिए पानी महत्वपूर्ण है, लेकिन गमले में रुका हुआ पानी इन पौधों के लिए सही नहीं है। पानी के निकलने की उचित व्यवस्था होनी चाहिए। गर्म, उमस भरे दिनों में, पौधे को ठंडे दिनों की तुलना में अधिक पानी की आवश्यकता होती है। जब ऊपर की 1 या 2 इंच मिट्टी सूखी और भुरभुरी लगे तो 200 मिलीलीटर पानी गमले में डाल देना चाहिए।

धूप: हरसिंगार के पौधे को रोजाना कम से कम 6 घंटे धूप की जरूरत होती है। इन पौधे को खुली जगह में लगाना चाहिए। यदि वास्तु शास्त्र के अनुसार घर में रखा जाता है, तो इसे उन खिड़कियों के पास रखना चाहिए, जहां से बहुत अधिक धूप आती है।

पारिजात या हरसिंगार के पौधे के लिए वास्तु - कुछ ख़ास बातें
Parijat Tree 

(पारिजात का पौधा) या हरसिंगार का पौधा बहुत ही शुभ माना जाता है क्योंकि इसे लगाने से घर में शांति और समृद्धि आती है। वास्तु के अनुसार इस पौधे को घर में सही दिशा में लगाने से घर सुख-समृद्धि से भर जाएगा। 

अगर आप वास्तु में विश्वास रखते हैं या आपकी आस्था है, तो आपको पारिजात के पौधे के फायदों पर विचार करना चाहिए और उन्हें अपने घर में लगाना चाहिए। यह घर की डेकोर के लिए एक अच्छा विकल्प हो सकता है।

वृक्ष की आयु

अगर इस वृक्ष की उम्र की बात की जाए तो वैज्ञानिकों के अनुसार यह वृक्ष 1 हजार से 5 हजार साल तक जीवित रह सकता है। इस प्रकार की दुनिया में सिर्फ पांच प्रजातियां हैं, जिन्हें एडोसोनिया वर्ग में रखा जाता है। परिजात का पेड़ भी इन्हीं पांच प्रजातियों में से ‘डिजाहट’ प्रजाति का सदस्य है।



पारिजात के पेड़ को हरसिंगार का पेड़ भी कहा जाता है। इसमें बहुत ही सुंदर और सुगंधित फूल उगते हैं। यह सारे भारत में पैदा होता है। इसे संस्कृत में पारिजात, शेफालिका। हिन्दी में हरसिंगार, परजा, पारिजात। मराठी में पारिजातक। गुजराती में हरशणगार। बंगाली में शेफालिका, शिउली। तेलुगू में पारिजातमु, पगडमल्लै। तमिल में पवलमल्लिकै, मज्जपु। मलयालम में पारिजातकोय, पविझमल्लि। कन्नड़ में पारिजात। उर्दू में गुलजाफरी। इंग्लिश में नाइट जेस्मिन। लैटिन में निक्टेन्थिस आर्बोर्ट्रिस्टिस कहते हैं। उत्तर प्रदेश में दुर्लभ प्रजाति के पारिजात के चार वृक्षों में से हजारों साल पुराने वृक्ष दो वन विभाग इटावा के परिसर में हैं जो पर्यटकों को 'देवताओं और राक्षसों के बीच हुए समुद्र मंथन' के बारे में बताते हैं।

पारिजात वृक्ष की उत्पत्ति समुद्र मंथन के दौरान हुई थी। इसे देवराज इंद्र द्वारा स्वर्ग में स्थापित कर दिया गया था। पारिजात के फूलों का देवपूजा में विशेष महत्व है। जल से उत्पत्ति होने के कारण देवी लक्ष्मी को पारिजात के फूल अतिप्रिय हैं। क्योंकि देवी लक्ष्मी का प्रादुर्भाव भी समुद्र मंथन के दौरान जल से ही हुआ था। पारिजात को हरश्रृंगार भी कहा जाता है। यहां जानिए, कहां स्थित है स्वर्ग से लाया गया पारिजात वृक्ष और क्या है इसकी स्वर्ग से धरती पर आने की कहानी...

ये हैं इस वृक्ष की खूबियां

यह वृक्ष 10 से 30 फीट तक की ऊंचाईवाला होता है। खासतौर से हिमालय की तराईवाले क्षेत्रों में ज्यादा संख्या में मिलता है। इसके फूल, पत्तों और तने की छाल का उपयोग औषधियां बनाने में किया जाता है।




पारिजात का वृक्ष सुन्दर तथा औषधीय गुणों से युक्त होता है। संस्कृत भाषा में इसे शेफालिका के नाम से जाना जाता है, जिसका अर्थ हैं, वह फूल जिसमें शिलीमुख अर्थात् भंवरा आराम से सोता है। यह उन प्रमुख वृक्षों में से एक है, जिसके फूल ईश्वर की आराधना में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। इसके पुष्पों को भगवान श्री कृष्ण की पूजा में प्रयोग किया जाता है। इसमें आकर्षक एवं अनुपम सुगंध से युक्त फूल आते हैं, जो सामान्यतः रात में खिलते हैं और सुबह स्वतः गिर जाते हैं। पारिजात या हरसिंगार का वानस्पतिक नाम निक्टेन्थिस आरबोर ट्रिस्टीस है, जो ओलिऐसी कुल का सदस्य है। इसके फूल, पत्ते व छाल का औषधीय कार्यों के लिये भारतीय चिकित्सा प्रणालियों में उपयोग प्राचीन काल से ही किया जा रहा है। ऐसी मान्यता है कि पारिजात के वृक्ष को छूने मात्र से ही व्यक्ति की थकान मिट जाती है। यह जाति भारत की स्थानिक जाति है तथा संपूर्ण भारत में पायी जाती है।

वानस्पतिक वर्णन: पारिजात का वृक्ष 10 से 15 फीट ऊँचा होता है, कहीं-कहीं पर इसकी ऊँचाई 20 से 25 फीट तक भी होती है। इसकी शाखायें, टहनियां एवं पत्तियां खुरदुरी तथा रोमिल होती है। इसकी शाखायें चतुष्कोणीय होती है। पत्तिया अंडाकार, 6-15 सेमी लंबी एवं 25-75 सेमी. चौड़ी, आधार पर कटी हुई, अग्रभाग पर नुकीली एवं दोनों सतहों पर खुरदुरी होती हैं। इसके पुष्प टहनियों पर गुच्छों में ही लगते है और पुष्प की पंखुडियां 6-7, सफेद रंग की तथा नारंगी रंग के डंठल से जुड़ी होती है। इसके फल अर्द्ध गोलाकार व चपटे होते हैं।


भौगोलिक वितरण पारिजात का वृक्ष भारत, बांग्लादेश, भारत-पाक उप महाद्वीपीय क्षेत्र, वर्मा, श्रीलंका, दक्षिण-पूर्व एशिया, उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में पाया जाता है। यह विशेष रूप से बाग-बगीचों एवं सुन्दरता के लिए घरों मे लगा हुआ मिलता है।


पारिजात के रसायनिक गुण एवं संघटक : पारिजात का फूल हल्का रूखा, तिक्त, कटु, गर्म, वात-कफनाशक, ज्वर नाशक, मृदु विरेचक, शामक, उष्णीय और रक्त शोधक होता है। इसके फूलों में सुगंधित तेल होता है तथा इसकी रंगीन पुष्प नलिका में निक्टेन्थिन नामक रंग द्रव्य पाया जाता है, जो केसर में स्थित ई-क्रोसेटिन के सदृश होता है। इसके बीज मज्जा से 12-16 प्रतिशत पीले भूरे रंग का स्थिर तेल निकलता है तथा इसके पत्तों में टाइनिक एसिड, मिथाइल सेल्सीलेट, ग्लाइकोसाइड (1.0 प्रतिशत) माइनीटल (1.0 प्रतिशत) राल (1.0 प्रतिशत) कुछ उड़नशील तेल, विटामिन-सी एवं विटामिन ई पाया जाता है। इसकी छाल में ग्लाइकोसाइड पाया जाता है।


पारिजात के औषधीय गुण पारिजात वृक्ष औषधीय गुणों का भण्डार है। यह रूमेटिज्म, गठिया के अतिरिक्त और अन्य प्रकार की बीमारियों जैसे- बवासीर, हृदय संबंधी रोग, सूखी खांसी, बुखार, त्वचा रोग, स्त्री रोगों आदि के उपचार हेतु बनने वाली औषधियों में भी प्रयोग किया जाता है। पारिजात वृक्ष के विभिन्न भागों का उपयोग निम्नानुसार है:-


1. तना: परंपरागत रूप से तना की छाल का चूर्ण गठिया, जोड़ों का दर्द, मलेरिया एवं कफ निवारक रोगों के लिये उपयोग में लाया जाता है। इसकी पत्तियां, छाल एवं टहनी का लगभग 10 ग्राम की मात्रा में लेकर एक गिलास पानी में उबाल कर प्रति दिन पीने से जोड़ों के दर्द में लाभ मिलता है।


2. पत्ती इसकी पत्तियों काढ़ा आयुर्वेद में साइटिका, रुमेटिज्म, गठिया आदि बीमारियों के उपचार में प्रयोग किया जाता है। इसके अतिरिक्त बवासीर, यकृत रोग, पित्त विकार एवं बुखार आदि में इसकी पत्तियों का उपयोग किया जाता है। खांसी रोग इसकी पत्तियों के रस को शहद में मिलाकर सेवन करने से सूखी खांसी ठीक हो जाती है। उच्च रक्त एवं मधुमेह इसकी पत्तियों को पीसकर शहद में मिलाकर सेवन करने से उच्च रक्त चाप और मधुमेह लाभ मिलता है।

त्वचा संबंधी रोग : इसकी पत्तियों का लेप बनाकर त्वचा पर लगाने से त्वचा संबंधी रोगों के निदान के लिये भरपूर इस्तेमाल किया जाता है।


स्त्री रोग पारिजात की कोपलों को काली मिर्च के 5 दानों के साथ पीसकर सेवन करने से स्त्री रोगों में लाभ मिलता है।


हड्डी टूटना : हड्डी टूटने परइसकी पत्तियों एवं छाल का लेप बनाकर लगाने से लाभ मिलता है।। सर्दी एवं खांसी इसकी 2-3 पत्तियों को चाय में मिलाकर नियमित पीने से सर्दी एवं खांसी में लाभ मिलता है। मधुमेह : इसकी पत्तियों का काढा बनाकर 30 दिनों तक नियमित सेवन करने से मधुमेह रोग में लाभ मिलता है।


चोट व घाव इसकी पत्तियों एवं छाल का लेप बनाकर लगाने से किसी भी प्रकार की चोट व घाव ठीक हो जाते है।


पुराना बुखार : पारिजात की 3-5 ग्राम पत्तियों का रस शहद में मिलाकर गर्म पानी के साथ तीन दिन तक नियमित लेने से पुराना


बुखार में लाभ मिलता है।


विषम ज्वर : इसकी 4-5 ताजा पत्तियों को पीस कर तथा पानी में मिलाकर 7-8 दिनों तक नियमित पीने से ज्वर में लाभ मिलता है। पेट के कीड़े : इसकी पत्तियों का रस लगभग 2 चम्मच में चुटकी भर नमक मिलाकर 2-3 दिन तक नियमित खाली पेट रहते हुए, पीने से पेट के कीडे समाप्त हो जाते है।


3. पुष्प इसके फूलों का रस हृदय संबंधी रोगों के लिये उत्तम औषधि मानी जाती है। पुष्पों का प्रयोग पित्त दोष को कम करने तथा बवासीर और त्वचा रोगों में भी किया जाता है।


4. बीज इसके बीजो का उपयोग कृमिनाशक के रूप में किया जाता है तथा इसके बीजों को चबाने से सिर दर्द जैसी बीमारी में लाभ मिलता है। इसके अतिरिक्त इसके बीजों को पीस कर पानी में मिलाकर प्रयोग करने से सिर की रूसी, पपड़ी एवं सूखी त्वचा आदि में लाभ मिलता है। इसके एक से दो बीज का सेवन प्रतिदिन किया जाये तो बवासीर रोग ठीक हो जाता है, तथा इसके बीज का लेप बनाकर


गुदाद्वार पर लगाने से बवासीर के रोगी को राहत मिलती है। इसके बीजों को पीसकर बालों को धोने से बालों को पोषण मिलता है, अर्थात्


बाल मुलायम एवं चमकदार बनते हैं।


5. बालों की रूसी इसके बीजों को पीस कर पानी में मिलाकर बालों को धोने से रूसी दूर हो जाती है तथा बाल मुलायम एवं स्वच्छ हो जाते हैं।

1. चिरयौवन : पौराणिक मान्यता अनुसार पारिजात के वृक्ष को स्वर्ग से लाकर धरती पर लगाया गया था। नरकासुर के वध के पश्चात एक बार श्रीकृष्ण स्वर्ग गए और वहां इन्द्र ने उन्हें पारिजात का पुष्प भेंट किया। वह पुष्प श्रीकृष्ण ने देवी रुक्मिणी को दे दिया। कहते हैं कि पारिजात वृक्ष की उत्पत्ति समुद्र मंथन के दौरान हुई थी जिसे इंद्र ने अपनी वाटिका में रोप दिया था।
 
2.तनाव घटाता : पारिजात के फूल आपके जीवन से तनाव हटाकर खुशियां ही खुशियां भर सकने की ताकत रखता है। इसकी सुगंध आपके मस्तिष्क को शांत कर देती है।

3.थकान मिटाता : यह माना जाता है कि पारिजात के वृक्ष को छूने मात्र से ही व्यक्ति की थकान मिट जाती है।

4.शांति और समृद्धि लाता : हरिवंश पुराण में इस वृक्ष और फूलों का विस्तार से वर्णन मिलता है। इन फूलों को खासतौर पर लक्ष्मी पूजन के लिए इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन केवल वही फूलों को इस्तेमाल किया जाता है जो अपने आप पेड़ से टूटकर नीचे गिर जाते हैं। यह फूल जिसके भी घर आंगन में खिलते हैं वहां हमेशा शांति और समृद्धि का निवास होता है।

5. हृदय रोग में लाभदायक : हृदय रोगों के लिए हरसिंगार का प्रयोग बेहद लाभकारी है। इस के 15 से 20 फूलों या इसके रस का सेवन करना हृदय रोग से बचाने का असरकारक उपाय है, लेकिन यह उपाय किसी आयुर्वेदिक डॉक्टर की सलाह पर ही किया जा सकता है।

घर में लगाएं यह पौधा बनी रहेगी मां लक्ष्मी की कृपा, बढ़ता रहेगा धन-धान्य और नहीं होगी घर में किसी को बीमारी |PICS

पारिजात के पौधे में रात में फूल खिलते हैं. ऐसा माना जाता है कि इन्हें घर में लगाने से शांति बनी रहती है. इसके फूलों की सुगंध इतनी अच्छी होती है कि इससे तनाव और अनिद्रा जैसी चीजें दूर होती हैं. इसके फूलों की खुशबू से मानसिक परेशानियां दूर हो जाती हैं और मानसिक शांति मिलती है.
पारिजात का फूल घर में लगाने से क्या होता है?

पारिजात को खिलने में कितना समय लगता है?
इसके पत्ते गुर्दे और मूत्राशय की बीमारियों के इलाज के लिए भी उपयोगी होते हैं. 

पारिजात के फूल कौन से भगवान को चढ़ाए जाते हैं?
पारिजात के फूल को भगवान हरि के श्रृंगार और पूजन में प्रयोग किया जाता है, इसलिए इस मनमोहक और सुगंधित पुष्प को हरसिंगार के नाम से भी जाना जाता है. हिन्दू धर्म में इस वृक्ष का बहुत महत्व माना जाता है. ऐसी भी मान्यता है कि पारिजात को छूने मात्र से ही व्यक्ति की थकान मिट जाती है.

पारिजात का वृक्ष हिन्दू संस्कृति, परम्पराओं और कई मान्यताओं में भी परिलक्षित होता है जिस कारण इसके पुष्पों का देव पुष्पाजलि आदि में प्राचीन


काल से ही प्रयोग किया जाता रहा है। इस वृक्ष से जुड़े कुछ रोचक पौराणिक धार्मिक किस्से कहानियाँ भी हैं जिनमें - पौराणिक उल्लेख (1) प्रथम कथानक : हरिवंशपुराण में एक ऐसे वृक्ष का उल्लेख मिलता है, जिसको छूने से देव नर्तकी उर्वशी की थकान मिट जाती थी। पौराणिक कथानकों के अनुसार पारिजात वृक्ष की उत्पत्ति देवताओं और दानवों के द्वारा किये गये सागर मंथन से हुई है। कहा जाता है कि देवराज इन्द्र ने इस वृक्ष को अपने उद्यान नंदन कानन में लगा दिया था। देवराज इन्द्र के निमंत्रण पर जब श्री कृष्ण इन्द्र लोक में अपनी पहली पत्नी देवी रुक्मिणी के साथ पहुंचे, तो देवराज इन्द्र ने स्वागत करते हुये पारिजात का पुष्प भेंट किये थे।


तत्पश्चात् एक बार नारद मुनि इन्द्र लोक के कानन वन से पारिजात वृक्ष के कुछ फूल लाकर श्री कृष्ण को दिये, तथा श्री कृष्ण ने उन फूलों को अपनी पत्नी रूक्मिणी को दे दिया। यह देखकर नारद मुनि श्री कृष्ण की दूसरी पत्नी सत्यभामा के पास गये और चुपके से बता दिया कि इन्द्र लोक से लाये गये दिव्य फूलों को श्री कृष्ण ने रूक्मिणी को दे दिया है। यह सुनकर सत्यभामा को क्रोध आ गया और उसने कृष्ण के पास जाकर कहा कि उसे उक्त पारिजात वृक्ष ही चाहिये। तब श्रीकृष्ण ने सत्यभामा को इन्द्र लोक से लाकर उसे पारिजात वृक्ष देने का वादा किया।


तत्पश्चात् नारद मुनि इन्द्र के पास गये और कहा कि स्वर्ग के दिव्य पारिजात वृक्ष को लेने के लिये मृत्यु लोक से कुछ लोग आने वाले हैं। लेकिन पारिजात वृक्ष तो इन्द्र लोक की शोभा है, और इसे यहीं पर रहना चाहिये। जब श्री कृष्ण जी पत्नी सत्यभामा के साथ पारिजात वृक्ष को लेने ने के लिये इन्द्र लोक पहुँचे तो इन्द्र ने पारिजात को देने का विरोध किया। परन्तु श्री कृष्ण के आगे उनका हठ नहीं चला और पारिजात उन्हें देना ही पड़ा। लेकिन श्री कृष्ण के हाथ में पारिजात वृक्ष को देते हुए इन्द्र ने श्राप दिया कि इस वृक्ष का फूल दिन में कभी नहीं खिलेगा।

श्री कृष्ण जी पत्नी सत्यभामा की हठ के कारण पारिजात को साथ लेकर मृत्यु लोक आ गये और उसे सत्यभामा की वाटिका में रोपित कर दिया। परन्तु सत्यभामा को सीख देने के लिये श्री कृष्ण ने कुछ ऐसा कर दिया कि पारिजात का वृक्ष तो सत्यभामा की वाटिका में था, लेकिन उसके फूल रूक्मिणी की वाटिका में गिरते थे। इस प्रसंग में सत्यभामा को पारिजात वृक्ष मिला, लेकिन रूक्मिणी के हिस्से में पुष्प मिले। इस कथानक के अनुसार आज भी पारिजात के फूल अपनी छाया परिधि से हटकर कुछ दूर ही गिरते हैं।


पौराणिक उल्लेख (2) द्वितीय कथानक एक अन्य जनश्रुति के अनुसार पारिजात' नाम की एक राजकुमारी थी, जिसे भगवान सूर्य से प्रेम हो गया था। लेकिन अथक प्रयासों के बावजूद भी भगवान सूर्य ने 'पारिजात' के प्रेम को स्वीकार नहीं किया था, जिससे खिन्न होकर राजकुमारी 'पारिजात' ने आत्महत्या कर लिया। कहा जाता है कि जिस स्थान पर राजकुमारी पारिजात की कब्र बनी थी, उसी कब्र के ऊपर 'पारिजात' नामक वृक्ष ने जन्म लिया था। 'पारिजात वृक्ष को रात में देखने से ऐसा लगता है, जैसे कि वह रो रहा हो, लेकिन सूर्योदय के साथ ही पारिजात की टहनिया • और पत्तियां सूर्य को आगोश में लेने के लिये आतुर दिखाई पड़ते हैं। ज्योतिष विज्ञान में भी पारिजात का विशेष महत्व बताया गया है।


पौराणिक उल्लेख (3) तृतीय कथानक धन की देवी माँ लक्ष्मी को पारिजात के पुष्प प्रिय हैं, तथा उन्हें प्रसन्न करने संबंधी अनुष्ठानों में भी पारिजात वृक्ष का उपयोग किया जाता है। धन लक्ष्मी को प्रसन्न करने संबंधी संस्कृत भाषा में लिखे गये मंत्र 'ओम नमो मनिन्द्राय आयुध धराय माम् लक्ष्मी वस्नच्छिन पूराय पूराय ऐन हींन् क्लीम् स्यायुण मणी भद्राय नमः' का 108 बार जाप करते हुए नारियल पर पारिजात के पुष्प अर्पित किये जायें और पूजा के इस नारियल एवं फूलों को लाल रंग के कपड़े में लपेटकर, पूजा घर में स्थापित किया जाय, तो धन लक्ष्मी सहज ही प्रसन्न होकर साधक के घर में वास करने लगती हैं। यह पूजा वर्ष के 5 शुभ मुहुर्त जैसे- होली, दीपावली, सूर्य ग्रहण, चन्द्र ग्रहण, नवरात्रि के रवि पुष्प तथा गुरु पुष्प नक्षत्र में की जाये तो उत्तम फल प्राप्त होता है। यह तथ्य भी महत्वपूर्ण है कि पारिजात वृक्ष के वे फूल ही उपयोग में लाये जाते हैं, जो वृक्ष से टूटकर गिर जाते हैं, अर्थात् वृक्ष से पुष्प तोड़ना वर्जित कहा गया है।



अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
Q:
वास्तु के अनुसार पारिजात का पौधा घर में किस दिशा में लगाना चाहिए?
A:
पारिजात का पौधा न केवल घर को हरा-भरा बनाते हैं बल्कि सही दिशा में लगाए जाने पर फायदेमंद भी साबित हो सकते हैं। वास्तु के अनुसार पारिजात के पेड़ को हमेशा घर के उत्तर या पूर्व दिशा में लगाना चाहिए। पारिजात के पेड़ पश्चिम और उत्तर पूर्व में भी लगाया जा सकता है।
Q:
क्या पारिजात का पौधा घर में लगाया जा सकता है?
A:
हां, पारिजात के पौधा का धार्मिक महत्व है और इसमें औषधीय गुण भी हैं। पेड़ के फूल, तने और पत्तियों का उपयोग डेंगू, पेट के संक्रमण और सांस की समस्याओं में किया जाता है। ऐसा भी माना जाता है कि जिस घर में पारिजात का पेड़ लगाया जाता है वहां मां लक्ष्मी का वास होता है।
Q:
क्या पारिजात का पेड़ शुभ माना जाता है?
A:
हरसिंगार या 'रातरानी' कहे जाने वाला पारिजात का पेड़ शुभ होता है क्योंकि इन्हें स्वर्ग के पौधे माना जाता है। इस पेड़ को घर में लगाना नवविवाहित जोड़ों के लिए वरदान माना जाता है। लोककथाओं के अनुसार, पारिजात वृक्ष के फूल भगवान कृष्ण की ओर से उनकी पत्नियों को प्रेम के प्रतीक के रूप में एक उपहार थे।
Q:
पारिजात के पेड़ के बारे में क्या खास है?
A:
प्रातःकाल में खिलने वाले अधिकांश फूलों के विपरीत, पारिजात वृक्ष के फूल शाम के बाद या देर रात में खिलते हैं। इतना ही नहीं, जैसे ही सूरज की पहली किरण पड़ती है, फूल जमीन पर गिर जाते हैं। यही कारण है कि सुबह के समय में, सुगंधित सफेद फूल ज़मीन पर नज़र आते हैं। यह एकमात्र ऐसा फूल है जिसे जमीन से उठाकर धार्मिक उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।
Q:
पारिजात वृक्ष का क्या महत्व है?
A:
पूजा में इस्तेमाल होने के अलावा, इस पेड़ में औषधीय गुण भी होते हैं। इसका उपयोग घरेलू उपचार के रूप में कई बीमारियों से राहत दिलाने के लिए किया जाता है। सूखी खांसी और जुकाम से राहत पाने के लिए इस पौधे की पत्तियों के रस को कच्चे शहद में मिलाकर इस्तेमाल किया जा सकता है।
Q:
क्या पारिजात के फूल खाए जा सकते हैं?
A:
बंगाली और असमिया संस्कृतियों में पारिजात के पेड़ के फूलों को 'शेफाली फूल' कहा जाता है। ये फूल खाए जा सकते हैं और इन्हें भूनकर खाया जा सकता है। हालांकि इसका स्वाद कड़वा होता है, इन फूलों का सेवन औषधीय गुणों के लिए जाना जाता है और कई तरह की बीमारियों से प्रभावी राहत दिला सकता है।
Q:
मैं जोड़ों के दर्द के लिए पारिजात के पत्तों का उपयोग कैसे कर सकता हूँ?
A:
आयुर्वेद के अनुसार पारिजात के पेड़ की पत्तियां गठिया के दर्द से राहत दिलाती हैं। शुद्ध नारियल के तेल में पारिजात के तेल की 4-6 बूंदें मिलाकर घुटनों की मालिश करने से गठिया के दर्द से राहत मिलती है।
Q:
क्या मैं पारिजात का पेड़ काट सकता हूँ?
A: चूंकि फूल सितंबर के अंत से दिसंबर के मध्य तक पूरी तरह से खिलते हैं, पौधे को गर्मी के महीनों में साल में कम से कम एक बार छंटाई करनी चाहिए। पुरानी शाखाओं और पत्तियों की छंटाई से पौधे पर नई पत्तियां और शाखाएं निकलेंगी।   



पौधे पर आकर्षक सुगंध लिए छोटे नारंगी केंद्र के साथ छोटे सफेद फूल लगते हैं। 
                 








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