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पशुपति व्रत

पशुपति व्रत | Pashupati Vrat ki Vidhi in Hindi 


पशुपति शब्द का अर्थ होता है शिव अर्थात वह जो सभी जीवों (जीवितो) का भगवान हैं। पशुपतास्र के सामने कोई भी जीवित या मृत वस्तु नहीं टिक सकती यहा तक कि यह भगवन ब्रम्हा के बनाये ब्रह्मास्त्र और ब्रम्हाशिर अस्त्र को भी निगल सकता है।

पशुपति व्रत का नाम आते ही दिमाग में पशुपति अस्त्र का नाम घूमने लगता है। जो महान भयानक एवं अत्यन्त विध्वंसक है। पशुपातास्त्र सम्पूर्ण सृष्टि का विनाश कर सकता है।  इसका प्रहार अचूक होने के कारण इसके प्रहार से बचना अत्यन्त कठिन। इसके लिए एक सार्वभौमिक नियम बनाया गया है कि इस अस्त्र से किया गया विनाश दोबारा ठीक नही किया जा सकता है। इस अस्त्र को अपने से कम बली या कम योद्धा पर नहीं चलाया जाता चाहिये। 

यह भगवान पशुपतिनाथ का अस्त्र है, कहा जाता है कि उन्होने इस अस्त्र को ब्रह्माण्ड की सृष्टि से पहले ही आदि परा शक्ति का घोर तप करके उनसे प्राप्त किया था। यह भगवान शिव, माता काली और आदि परा शक्ति का अस्त्र है। यह एक ऐसा अस्त्र है जिसे मन, आँख, शब्द और धनुष से नियंत्रित किया जा सकता है। पुराग्रंथों में आवाहनित अर्थात प्रयोग किये गये पशुपतास्र का वर्णन इस प्रकार मिलता है कि यह “एक पैर, बड़े दात, 1000 सर, 1000 धड और 1000 हाथ, 1000 आंखे और 1000 जिव्हाओ के साथ अग्नि की वर्षा करता है।” ऐसा कहा जा सकता है कि यह अस्र तीनो लोको को नष्ट करने में सक्षम है।

महाभारत के युद्ध में भी पाशुपतास्त्र अस्त्र का वर्णन मिलता है। अर्जुन ने पाशुपतास्त्र प्राप्त करने के लिए भगवान शिव की अराधना की थी  जिसका प्रयोग महाभारत युद्ध में अर्जुन ने जयद्रथ का वध करने के लिए पाशुपतास्त्र का प्रयोग किया था। 

महाभारत काल में जब सात-सात योद्धाओं ने मिलकर अभिमन्यु का वध किया तो उसमें जयद्रथ ने अभिमन्यु के सिर के पीछे से वार किया। वार इतना जोरदार था कि अभिमन्यु की वही मृत्यु हो गई उसके गिरने के उपरांत घृणा से जयद्रथ ने उसके सिर पर अपना पैर और मारा ।

जयद्रथ की भर्त्सना सभी उपस्थित सैनिकों ने की तो यह बात अर्जुन के कान तक पहुंची तो उसने तभी शपथ ले ली कि कल सूर्यास्त तक में जयद्रथ का वध कर दूंगा। अन्यथा स्वयं को चिता के हवाले कर दूंगा। 

परंतु जयद्रथ को वरदान था कि जो भी जयद्रथ के सिर को काट कर जमीन पर गिराने का कारण बनेगा उसके सिर के सौ टुकड़े हो जाएंगे। यह युद्ध का चौदहवां दिन था। द्रोणाचार्य ने विकट व्यूह रचना कर इस व्यूह के मध्य में जयद्रथ को अपने कौरव वीरों भूरिश्रवा, कर्ण, अश्वत्थामा, शल्य, वृषसेन आदि कितने ही महारथियों की सुरक्षा में रखा दिया।

अर्जुन ने जयद्रथ तक पहुंचने के लिए घमासान युद्ध छेड़ दिया। परंतु वह जयद्रथ तक पहुंचने में कामयाब न हो सका। धीरे-धीरे सूर्य अस्ताचल की ओर जाने लगा। कृष्ण को चिंता हुई कि सूर्यास्त से पहले यदि जयद्रथ नहीं मारा गया तो अर्जुन अपनी प्रतिज्ञा पूरी न कर पाने के कारण मृत्यु का वरण कर लेगा।

श्रीकृष्ण ने तत्काल माया रचकर सूर्य को छिपा दिया। सभी ने समझा कि सूर्यास्त हो गया और युद्ध बंद कर दिया गया। जयद्रथ हंसता हुआ अपने सुरक्षा कवच से बाहर निकल आया और अर्जुन को चिढ़ाने लगा, तभी श्रीकृष्ण ने अर्जुन से धीरे से कहा– “पार्थ! अभी सूर्यास्त नहीं हुआ है। तुम जयद्रथ का मस्तक इस तरह से काटो कि इसका सिर इसके पिता वृद्धक्षत्र की गोद में जा गिरे।" तभी आकाश में सूर्य फिर से चमकने लगा। 

उस समय भगवान श्रीकृष्ण ने ये जरुर कहा था की “अगर तुम्हे पशुपतास्र याद हे तो तुम जयद्रथ का निश्चित ही वध करोगे” श्रीकृष्ण का संकेत पाते ही अर्जुन ने पशुपत अस्त्र चलाया और उसे आदेश दिया कि वह जयद्रथ के सिर को ले जाकर उसके पिता वृद्धक्षत्र की गोद में गिरा दे। 

अस्त्र ने ऐसा ही किया। वह जयद्रथ का सिर को हवा में ले उड़ा। सिर हवा में उड़ता हुआ तपस्यारत वृद्धक्षत्र की गोद में जा गिरा । वृद्धक्षत्र घबराकर जैसे ही उठे, जयद्रथ का सिर उनकी गोद से धरती पर जा गिरा। जयद्रथ के सिर के धरती पर उसके गिरते ही वृद्धक्षत्र के सिर के सौ टुकड़े हो गए। पिता और पुत्र दोनों एक साथ तत्काल यमलोक सिधार गए।

कौरवों और पाण्डवों में भयानक युद्ध छिड़ गया। युद्ध मर्यादा की सारी सीमाएं टूट गईं। धर्म-अधर्म की चिंता किए बिना युद्ध होता रहा। चौदहवें दिन का युद्ध सूर्यास्त तक ही नहीं चला, बल्कि मशालों की रोशनी में रात्रि में भी चलता रहा। कौरव सेना के अनेक वीर उस दिन मारे गए, उनमें भूरिश्रवा भी एक था।


पशुपति व्रत

नमस्कार मित्रों, आज इस वीडियो के माध्यम से हम आप सभी के लिए पशुपति व्रत की जानकारी प्रदान करने जा रहे हैं। 

पशुपति व्रत भगवान शिव को समर्पित अर्थात भगवान शिव से संबंधित है।

भगवान शिव दीन दयालु है। उन्होंने अपने अचूक पाशुपतास्त्र की तरह ही पशुपति व्रत का विधान भक्तों के दिया है। इस व्रत से भक्तों के जीवन की सभी कठिनाई समाप्त हो जाती हैं और जीवन आनंदमय हो जाता है। 

पशुपतिनाथ व्रत 
पशुपतिनाथ का व्रत करने का मुख्य उद्देश्य तो भगवान शंकरजी को प्रसन्न करना होता है। इसलिए हम भक्तों से आग्रह करेंगे कि पशुपति व्रत करने से पूर्व इसकी करने की संपूर्ण जानकारी हमें प्राप्त कर लेनी चाहिए जो हम इसी वीडियो में आपको बताने जा रहे हैं। वैसे तो यह व्रत बहुत प्राचीन है जिसका वर्णन हमारे पुराणों में मिलता है फिर भी गुरु जी पंडित प्रदीप मिश्रा जी ने इसका जो वर्णन किया है हम उसे आपको बता रहे हैं।

गुरु जी ने बताया कि व्रत करने का उद्देश्य मात्र भूखा रहना नहीं है अपितु भक्ति भाव से अपने जीवन में आध्यात्मिक उन्नति पाने के लिए उपवास को प्राथमिकता दी जाती है। 

गुरुजी के अनुसार इस व्रत व कथा का वर्णन शिव महापुराण और रूद्र पुराण में भी मिलता है कि जो भक्त पशुपतिनाथ जी की कथा का श्रवण करता है , श्रवण मात्र से उसके सारे पापों का अंत हो जाता है, उसे असीम आनंद की प्राप्ति होती है और वह शिव का अत्यधिक प्रिय बन जाता है। 

पशुपति नाथ जी की कथा

शिव महापुराण और रूद्र पुराण में कई बार वर्णन आता है कि जो भक्त पशुपतिनाथ जी की कथा का श्रवण करता है , श्रवण मात्र से उसके सारे पापों का अंत हो जाता है, उसे असीम आनंद की प्राप्ति होती है और वह शिव का अत्यधिक प्रिय बन जाता है।

एक समय की बात है जब शिव चिंकारा का रूप धारण कर निद्रा ध्यान में मग्न थे।

उसी वक्त देवी-देवताओं पर भारी आपत्ति आन पड़ी, और दानवों और राक्षसों ने तीन लोक में, स्वर्ग में त्राहि-त्राहि मचा दी तब देवताओं को भी यह स्मरण था कि इस समस्या का निदान केवल शंकर ही कर सकते हैं।

इसलिए वह शिव को वाराणसी वापस ले जाने के प्रयत्न करने के लिए शिव के पास गए।

परंतु जब शिव ने सभी देवी देवताओं को उनकी और आते हुए देखा तो शिव ने नदी में छलांग लगा दी।

छलांग इतनी तीव्र थी कि उनके सिंग के चार टुकड़े हो गए।

इसके पश्चात भगवान पशुपति चतुर्मुख लिंग के रूप में प्रकट हुए और तभी से इस लिंग की पशुपतिनाथ जी के  रूप में पूजा और व्रत करने का विधान प्रारंभ हुआ।


पशुपति व्रत करने की विधि (पशुपति व्रत कैसे करे)

रूद्र पुराणों, शिव महापुराण में जहां वर्णन आता है कि पशुपति व्रत करने का मुख्य उद्देश्य भगवान शंकर को प्रसन्न करना है।

जैसा कि नाम से ही विदित है कि इस व्रत का प्रारंभ सोमवार के दिन किया जाता है। यह व्रत केवल 5 सोमवार किया जाता है और इस व्रत का उद्यापन भी पांचवें और अंतिम व्रत में ही कर दिया जाता है। 

पशुपति नाथ जी का पशुपति व्रत सोमवार को किया जाता है।
व्रती जो पशुपति नाथ जी का व्रत करने जा रहा है, वह ब्रह्म मुहूर्त में उठें और स्नान कर साफ-सुथरे वस्त्र धारण करें।

व्रती निरंतर अपने मन में और मुख से पंचाक्षर मंत्र 'नमः शिवाय' और षडाकक्षर मंत्र 'ॐ नमः शिवाय' या फिर 'श्री शिवाय नमस्तुभ्यम' का जप करता रहना चाहिए।

व्रत में प्रयुक्त होने वाली पूजा की थाली सुबह के समय एक ही बार तैयार की जाती है। इस में जो पूजा का सामान रखा जाता है वह उतना ही रखा जाता है कि वह सामान सुबह में और शाम की पूजा में भी काम आ जाए। अर्थात शाम की पूजा के लिए इसमें से ही सामान बचा कर लाना होता है।

पूजा की थाली में दोनों वक्त के लिए प्रयुक्त होने वाली सामग्री जैसे देशी घी दीपक खड़ी बत्ती वाला, फूल, बेलपत्र , कुमकुम, (अबीर , गुलाल) चंदन (लाल या पीला), थाली में अखंडित चावल, मिश्री के दाने रखें जाते हैं। थाली में बेलपत्र, धतूरा, शमीपत्र, आंकड़ा और पंचामृत हो रखें। 

व्रती के मन में प्रश्न आता है कि यदि यह सब पूजा सामग्री एकत्रित करना बहुत ही कठिन है, इसका यह अर्थ कतई नहीं है कि अगर इसमें से एक भी सामग्री नहीं हुई तो भोले बाबा हम से प्रसन्न नहीं होंगे। याद रखें कि आप सामान उपलब्धता के आधार पर ले, ऐसा ना समझे कि सामान पूरा न होने पर पूजा अधूरी रहेगी। जो भी सामान उपलब्ध हो उसी से भोलेनाथ के शिवलिंग की पूजा करें।

वृती यह भी ध्यान रखें कि आप जो जो सामान पूजा के लिए ले जा रहे हैं। वह सामान शाम की पूजा में भी प्रयोग किया जाएगा इसलिए सामान की मात्रा अधिक रखें ताकि इसकी थोड़ी-थोड़ी मात्रा में शाम के लिए भी बचा कर रखेनी है। 

एक लोटा जल और थाली लेकर श्री शिवाय नमस्तुभयम का निरंतर जप करते हुए मंदिर में प्रवेश करें।

आप जो एक लोटा जल शिव अभिषेक के लिए लेकर जा रहे हैं। वह आपके घर में रखे हुए पीने के पानी से लिया जाना चाहिए नाकी चालू हैंडपंप या नल के जल से ताजा समझकर। यदि आप पीने के लिए पानी नहीं रखते हैं तो कोई ऐसा बर्तन बनाएं जिसमें पानी सुबह से शाम तक या सुबह से अगले दिन सुबह तक रखा रहे।

गुरुजी का कहना है कि घर में पीने के लिए रखे हुए जल में पितरों का वास होता है। यदि इस जल को अभिषेक के लिए ले जाया जाएगा तो घर में होने वाले सभी दोष अपने आप घर से बाहर निकल जाएंगे। उन दोषों की शांति कराने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।

यदि आप जल प्रातः 5 से 11 बजे तक चढ़ाएंगी तो ये विशेष रूप से फलदायी होगा। कभी भी शाम के समय शिवलिंग पर जल न चढ़ाएं। ऐसा करने से शिव पूजन का फल नहीं मिलता है। यदि आप शाम को उन्हें भोजन प्रसाद अर्पित कर रहे हैं तो आप जल के छींटें अर्पित कर सकते हैं।

लेकिन जल चढ़ाने से पहले हमें एक बात जान लेनी चाहिए कि भगवान भोलेनाथ एक जलहरी पर स्थापित होते हैं । जिसे गुरुजी माता का हस्तकमल बताते हैं। जो चित्र में नंबर 4 द्वारा दर्शाया गया है। 
एक नंबर भगवान गणेश का दो नंबर भगवान कार्तिकेय का तीन नंबर उनकी पुत्री अशोक सुंदरी का चार नंबर माता का राज कमल और पांच नंबर स्वयं भगवान भोलेनाथ हैं कहीं कहीं पर शिवलिंग के ऊपर एक कलश होता है जिसमें भगवान शिव की 5 नाग कन्याएं (पुत्रियां)  जया, विषहरा, शामिलबारी, देव और दोतलि निवास करती हैं।

उन्होंने बताया कि जल चढ़ाने का क्रम कभी कभार बदल जाता है परंतु आपको सबसे पहले जल एक नंबर पर अर्थात गणेश जी पर सिर्फ दो नंबर अर्थात कार्तिकेय पर फिर तीन नंबर अर्थात अशोक सुंदरी पर फिर चार नंबर पर शिवलिंग के चारों ओर घुमाते हुए और अंत में पांचवें नंबर पर भगवान भोलेनाथ अर्थात शिव लिंग को अर्पित करें यदि ऊपर कलश लगा है तो छठे नंबर पर उसमें कुछ जल चढ़ाएं। यही है जल चढ़ाने का सही क्रम है।

दक्षिण और पूर्व दिशा की ओर मुख करके शिवलिंग पर जल नहीं चढ़ाना चाहिए। भगवान शिव को जल चढ़ाते वक्त आपका मुंह पूर्व दिशा की ओर कभी नहीं होना चाहिए। इस दिशा को भगवान शिव का प्रवेश द्वार माना जाता है। इसलिए इस दिशा की ओर मुंह करके जल चढ़ाने से भगवान शिव के द्वार में रुकावट पैदा होती है और वह नाराज हो जाते हैं। 

शिवलिंग पर जल चढ़ाते वक्त आपका मुख उत्तर दिखा की ओर होना चाहिए। उत्तर दिशा को शिव जी का बायां अंग माना जाता है जहां माता पार्वती विराजमान हैं। इस दिशा की ओर मुख करके जल चढ़ाने से शिव और पार्वती दोनों की कृपा मिलती है।

हमेशा उत्तर दिशा की ओर मुंह करके ही शिवलिंग पर जल चढ़ाएं। उत्तर दिशा को शिव जी का बायां अंग माना जाता है जहां माता पार्वती विराजमान हैं। इस दिशा की ओर मुख करके जल चढ़ाने से शिव और पार्वती दोनों की कृपा मिलती है।

शिवलिंग पर जल हमेशा तांबे के लोटे से चढ़ाना ही शुभ माना जाता है। जब आप जल चढ़ाएं तो जलधारा टूटनी नहीं चाहिए और एक साथ ही जल अर्पित करना चाहिए। 

यदि आप जल के स्थान पर दूध चढ़ा रही हैं तब तांबे के लोटे का इस्तेमाल न करें।

शिवलिंग पर शंख से जल न चढ़ाएं। शिव पूजन में शंख का इस्तेमाल वर्जित होता है क्योंकि एक पौराणिक कथा के अनुसार शिव जी ने एक बार शंखचूड़ राक्षस का वध किया था और मान्यता है कि शंख उसी राक्षस की हड्डियों से बना होता है।

ध्यान रहे कि जल में अन्य कोई भी सामग्री न मिलाएं। ऐसी मान्यता है कि जल में कुछ भी मिलाने से जल की पवित्रता कम हो जाती है। जिससे पूजा का पूर्ण फल नहीं मिलता है। यहां तक कि जे में पुष्प भी ना डालें क्योंकि जल के देव वरुण देव है । अतः जल में पुष्प डालने पर पुष्प वरुण देव को समर्पित हो जाते हैं इसलिए चढ़े हुए पुष्प भगवान भोलेनाथ पर नहीं चढाए जाते हैं।।

इसके उपरांत धूप दीप नैवेद्य चंदन फूल फूल माला आदि के द्वारा भगवान भोलेनाथ की पूजा करें। 

परंतु यहां भी है ध्यान रखें कि फल, मिष्ठान अर्थात नैवेद्य, दीपक आदि जलहरी पर या माता के हस्त कमल पर कभी ना रखें।


जिस प्रकार से एक पिता को अपने पुत्र की चिंता होती है उसी प्रकार से शिव अपने भक्तों की चिंता करते हैं, उन्हें रिझाने के लिए हमें कोई कठिन परिश्रम नहीं करना है अपितु एक लोटा जल भी अगर हमने उन्हें प्रेम से अर्पित किया तो वह बहुत है।

भक्तों को यह भी ज्ञात होना चाहिए 
अगर आप को लगता हैं कि शिवलिंग के आसपास साफ सफाई नहीं है तो सबसे पहले सफाई सेवा करनी चाहिए।
सफाई के बाद शिव की सभी पूजा सामग्रियों का इस्तेमाल करते हुए उनका पूजन करें ,जल और बेलपत्र अर्पित करें।



भक्तों को यह स्मरण होना चाहिए कि शिवलिंग का अभिषेक सबसे ऊपरी भाग पर जल डालकर करें।
जो भी प्रसाद भक्तों ने श्रद्धा पूर्वक बनाया है उसे जलधारी में ना रखें।
बहुत बार भक्तों के मन में यह संशय होता है कि बेलपत्र पूजा सामग्री का अभिन्न भाग है और बहुत बार यह भक्तों को उपलब्ध नहीं हो पाता है। अगर ऐसी कठिनाई भक्तों के पूजन में आती है तो उसे यह ज्ञात होना चाहिए कि जो बेलपत्र शिवलिंग पर पहले से चढ़ा हुआ है उसे साफ करके भी शिवलिंग को अर्पित किया जा सकता है और जब सुबह की आरती समाप्त हो जाए तो शाम को भी यही प्रक्रिया पुनः करें।
पूजा की थाली में याद से 6 दिए रखें, जिनमें से 5 दिए भक्तों को मंदिर में प्रज्वलित करना है और एक दिया जो बचा हुआ है उसे घर के दरवाजे के बाहर दाई तरफ प्रज्वलित करें.

पशुपति व्रत में किस प्रकार से उपवास करें

भक्तों को जय स्मरण रखना चाहिए कि यह व्रत हम शंकर को प्रसन्न करने के लिए कर रहे हैं, इसलिए व्रत करते समय हमें भोजन का ध्यान ना करते हुए अपितु

।। ओम शिवाय नमस्तुभ्यं।। का जप करना चाहिए।


सुबह-सुबह भक्तों को फलाहार ले लेना चाहिए को शाम को पशुपति नाथ जी की पूजा होने के पश्चात भोजन ग्रहण करना चाहिए।

परंतु भोजन के पूर्व उसे प्रसाद का वह भाग लेना चाहिए जो वह घर में लाया था, परंतु भक्तों को यह स्मरण होना चाहिए कि प्रसाद सबसे पूर्व उस व्यक्ति को मिले जिसमें उपवास रखा है फिर भी उस प्रसाद को परिवार के अन्य सदस्यों को देना चाहिए।

किन बातों का ध्यान रखना आवश्यक है

भक्तों को यह ध्यान रखना चाहिए कि शंकर को पंचानन भी कहा जाता है इसलिए जब पूजा अर्चना करते समय हम पांच दियो को प्रज्वलित करते हैं तो उसी समय भक्तों को अपनी सारी इच्छाएं शिव के सामने प्रकट कर देना चाहिए।

कितने समय तक पशुपति व्रत रखें

भक्तों को कम से कम पांच सोमवार तक पशुपतिनाथ का व्रत रखना चाहिए, इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि भक्त 5 सोमवार से अधिक पशुपतिनाथ जी का व्रत नहीं रख सकता।

जब भक्त सफलतापूर्वक पांचों व्रत कर ले, तो छोटे सोमवार भक्तों को उद्यापन करने की विधि प्रारंभ कर देनी चाहिए।

उद्यापन के दिवस भक्तों को ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करके पूजा थाली को तैयार रखना चाहिए।

परंतु उद्यापन के लिए थाली में 108 वस्तुएं रखकर चाहे वह मूंग हो चावल हो मखाने या आदि।

और अगर भक्त परिस्थितियों का कारण 108 वस्तुएं रखने में असक्षम है तो जितना श्रद्धा पूर्वक भक्त थाली में सामग्री एकत्रित कर सकता है उतना सामान एकत्रित करें।

पूर्व व्रत की तरह ही सुबह और शाम को पशुपतिनाथ जी की पूजा करें।

पूजा करने के पश्चात मंदिर में ₹11 का दान दें

इस दिवस आप प्रसाद थोड़ा ज्यादा बनाए ताकि ज्यादा भक्तों को प्रसादी बांटी जा सके।

पशुपति व्रत में बाधाएं आए तो क्या करें

अगर भक्त किसी भी परिस्थितियों के कारण सोमवार को व्रत करने में असफल है तो उसे इस व्रत को अगले सोमवार पर करना चाहिए।

अगर स्त्रियों में महामारी का दौर हो तो भी व्रत अगले समय पर डाल दें।

परंतु सबसे महत्वपूर्ण बात तो यह है कि व्रत करते समय हमें हमारे मस्तिष्क और मन में किसी भी प्रकार का लोभ, लालच ईर्ष्या का भाव उत्पन्न नहीं करना चाहिए क्योंकि हमें ज्ञात होना चाहिए कि पशुपतिनाथ जी का व्रत करने का अर्थ है, कि हम अपने आराध्य से प्रेम को बढ़ाना चाहते हैं।

इसलिए इस दिवस हमें ।।ओम शिवाय नमस्तुभयम।। का जप अधिक से अधिक करना चाहिए |

पशुपति नाथ जी का मंत्र क्या है ?

।। संजीवय संजीवय फट।।
।। विदरावय विदरावय फट।।
।। सर्वदूरीतं नाशाय नाशाय फट।।

तो इस प्रकार से जब कभी भी भक्त पशुपतिनाथ जी का व्रत करें तो शिवलिंग पर जल अर्पण करने के पश्चात पूजा के वक्त यह आरती गावे।

पशुपति नाथ जी की आरती शिव को बहुत अधिक प्रिय है। यह आरती ना केवल शिव को प्रसन्न करती है अपितु भक्तों की हर इच्छाओं की पूर्ति कर शिव के साथ प्रेम संबंध को और भी प्रगाढ़ कर देती है।

1. इस व्रत को रखने का नियम यह है कि जिस सोमवार से यह व्रत रखना है उससे एक दिन पहले ब्रह्मचर्य का पालन करें। सोमवार के दिन सूर्योदय से पहले उठकर नित्य कर्मों के बाद यदि आपके घर के पास कोई पवित्र नदी बह रही हो तो जाकर उसमें स्नान कर लें, नहीं तो नहाने के पानी में थोड़ा सा गंगाजल मिलाकर घर में ही स्नान करें।

2. स्नान के बाद पूजा की थाली बनाएं जिसमें धूप-दीप, शमी पत्र, बेलपत्र, भांग धतूरा, मंदार पुष्प, पंचामृत आदि भगवान शिव के मंदिर में जाएं।

3. याद रखें कि व्रत के पहले दिन आप जिस मंदिर में जाते हैं, बाकी के चार सोमवार उसी मंदिर में जाएं।

4. शिव मंदिर में जाकर घी का दीपक जलाएं। हो सके तो मिट्टी या आटे का दीपक भी बनाया जा सकता है। हो सके तो शिवलिंग के आसपास की जगह को अच्छे से साफ कर लें। अब सबसे पहले शिवलिंग पर जल चढ़ाएं।
5. जल चढ़ाते समय मन ही मन भगवान शिव के किसी मंत्र का जाप करते रहें। उसके बाद पंचाभिषेक यानी दूध, दही, घी, शहद और अंत में फिर से जल चढ़ाएं।

6. पंचाभिषेक करने के बाद शिवलिंग पर बेलपत्र, मंदार के फूल आदि पूजन सामग्री चढ़ाकर मिठाई चढ़ाएं।

7. ध्यान रहे कि शिवलिंग से हमेशा धूप, दीप आदि कुछ दूरी पर रखना चाहिए। देखा गया है कि भक्त अक्सर शिवलिंग पर ही अगरबत्ती आदि लगाते हैं, जो सर्वथा अनुचित है। इसके बाद घर आकर फलाहार करें।

8. शाम को दोबारा मंदिर जाएं और 6 दीपक भी साथ ले जाएं। इनमें से 5 दीपक मंदिर में ही जला लें और आखिरी यानी छठा दीपक अपने साथ घर ले आएं। घर आकर इस दीपक को प्रवेश द्वार पर अपने दाहिने हाथ से यानी दरवाजे के दाहिने तरफ जलाएं।

9. जो मिठाई आप मंदिर ले गए थे उसे तीन भागों में बांट लें, दो भाग मंदिर में ही भोग लगाएं और तीसरा भाग घर में लाकर भगवान शिव को अर्पित कर प्रसाद के रूप में ग्रहण करें। अब आप व्रत का पारण कर सकते हैं, लेकिन ध्यान रहे कि नमक का प्रयोग न करें।

10. यह क्रम लगातार पांच सोमवार तक करें। पाशुपति व्रत पांचवें सोमवार को मनाया जाता है।

Pashupati Vrat PDF | पशुपतिनाथ व्रत विधि – उपवास के दौरान रखें ये सावधानियां
1. पूजन सामग्री में शुद्धता का विशेष ध्यान रखें।

2. शिवलिंग पर चढ़ाए जाने वाले पत्र, मंदार के फूल आदि साफ होने चाहिए और ध्यान रहे कि पत्ते कटे या फटे नहीं होने चाहिए।
कुछ धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सोमवार के दिन बेलपत्र नहीं तोड़ना चाहिए, इसके लिए एक दिन पहले यानी रविवार के दिन बेलपत्र तोड़कर सुरक्षित रख लें।

3. भगवान शिव को प्रिय यह पशुपति व्रत निश्चय ही सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाला है। व्रत के दौरान काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार जैसे विकारों से दूर रहें। व्रत के दौरान भूलकर भी कभी भी तामसिक पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए।

4. वैसे तो कभी भी हिंसा नहीं करनी चाहिए, लेकिन इस दौरान कभी भी इंसान या किसी जानवर के साथ हिंसक व्यवहार नहीं करना चाहिए।

5. महिलाओं और बच्चों को सम्मान दें और किसी भी प्रकार के अनावश्यक वाद-विवाद और कलह में न पड़ें।

पशुपति व्रत कब नहीं करना चाहिए | Pashupati Vrat Kab Nahi Karna Chahiye
वैसे तो कोई भी व्यक्ति पूरी श्रद्धा से इस व्रत को कर सकता है, लेकिन यदि कोई बीमार है या वृद्धावस्था के कारण इस व्रत को करने में असमर्थ है तो उसे इस व्रत को नहीं करना चाहिए।

गर्भवती महिलाओं को यह व्रत नहीं करना चाहिए और मासिक धर्म के दौरान ऐसी महिलाएं अपने पति के न होने पर अपने पुत्र से पूजा का कार्य करवा सकती हैं। इनके लिए केवल पूजा विधि ही वर्जित है, अन्यथा ये व्रत भी रख सकते हैं।

Pashupati Vrat Kitne Kare | पशुपति व्रत कितने करे
मुख्य रूप से सभी को पांच व्रत करने चाहिए। बात का ध्यान अवश्य रखना चाहिए की जब से आप व्रत शुरू करे उस दिन सोमवार होना आवश्यक है। उसके ठीक पांच सोमवार बाद व्रत को पूर्ण करे।


त्वमेव माता च पिता त्वमेव, त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव। 
त्वमेव विद्या च द्रविणं त्वमेव, त्वमेव सर्वम् मम देवदेवं।। 
सरल-सा अर्थ है- 'हे भगवान! तुम्हीं मेरी माता हो, तुम्हीं पिता हो, तुम्हीं बंधु हो, तुम्हीं सखा हो। तुम्हीं विद्या हो, तुम्हीं द्रव्य हो, तुम्हीं मेरे सब कुछ हो। और तुम ही मेरे देवों में देवता हो।' 

'द्रविणं' का अर्थ –> शब्द 'द्रविणं' का अर्थ जानकर चौंक पड़ेंगे कि द्रविणं जिसका अर्थ है निरंतर प्रवाहमान तरल रूप द्रव्य है, यानी तरल रूप द्रव्य, धन-संपदा जो कभी स्थिर नहीं रहता। दूसरे शब्दों में हम इसे 'लक्ष्मी' भी कह सकते हैं क्योंकि वे कहीं टिकती नहीं है।

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