परिजात पुष्प की कथा

परिजात पुष्प  की कथा

पारिजात को हरसिंगार, रात की रानी, शेफाली, शिउली आदि नामों से भी जाना जाता है। इसका वानस्पतिक नाम 'निक्टेन्थिस आर्बोर्ट्रिस्टिस' है और अंग्रेजी में इसे नाइट जैस्मीन कहते हैं।

पारिजात का पेड़ बहुत खूबसूरत होता है। पारिजात के फूल को भगवान हरि और हर दोनों के श्रृंगार और पूजन में प्रयोग किया जाता है। दुनिया भर में इसकी सिर्फ पांच प्रजातियां पाई जाती हैं। हरसिंगार का फूल पश्चिम बंगाल का राजकीय पुष्प भी है। पारिजात वृक्ष में फूल आमतौर पर वृक्षारोपण के पांच साल बाद होता है। पौधे पर आकर्षक सुगंध लिए छोटे नारंगी केंद्र के साथ छोटे सफेद फूल लगते हैं। 

पारिजात के फूल को भगवान शिव अर्थात हर के श्रृंगार और पूजन में प्रयोग किया जाता है, इसलिए इस मनमोहक और सुगंधित पुष्प को हरसिंगार के नाम से भी जाना जाता है। 


पारिजात के ये अद्भुत  पुष्प रात में ही खिलते हैं और सुबह होते होते ही सारे फूल मुरझा जाते और झड़ जाते हैं, इसलिए इसे रात की रानी भी कहा जाता है। इसकी खास बात ये है कि पूजा-पाठ में पारिजात के वे ही फूल इस्तेमाल किए जाते हैं जो वृक्ष से टूटकर गिर जाते हैं। पूजा के लिए इस वृक्ष से फूल तोड़ना पूरी तरह से निषिद्ध है। 

पौराणिक मान्यता
पौराणिक मान्यता के अनुसार परिजात वृक्ष की उत्पत्ति समुद्र मंथन से हुई थी, जिसे इन्द्र ने अपनी वाटिका में लगाया था। हरिवंश पुराण में पारिजात को कल्पवृक्ष भी कहा गया है। मान्यता है कि स्वर्गलोक में इसको स्पर्श करने का अधिकार सिर्फ उर्वशी नाम की अप्सरा को था। इस वृक्ष के स्पर्श मात्र से ही उर्वशी की सारी थकान मिट जाती थी। इसी कारण हिन्दू धर्म में इस वृक्ष का बहुत महत्व माना जाता है। ऐसी भी मान्यता है कि पारिजात को छूने मात्र से ही व्यक्ति की थकान मिट जाती है।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार धन की देवी लक्ष्मी को पारिजात के फूल अत्यंत प्रिय हैं। पूजा-पाठ के दौरान मां लक्ष्मी को ये फूल चढ़ाने से वो प्रसन्न होती हैं। 

एक और मान्यता यह भी है क‍ि 14 साल के वनवास के दौरान सीता माता हर‍सिंगार के फूलों से ही अपना श्रृंगार करती थीं।

परिजात वृक्ष के पृथ्वी पर आने की पौराणिक कथा

परिजात वृक्ष के पृथ्वी पर आने की एक पौराणिक कथा विख्यात है जिसके अनुसार एक बार नरकासुर के वध के पश्चात एक बार श्रीकृष्ण अपनी पटरानी रुक्मिणी के साथ व्रतोद्यापन समारोह में रैवतक पर्वत पर गए। उसी समय स्वर्ग से देवऋषि नारद अपने हाथ में पारिजात का पुष्प लिए हुए पधारे। नारद ने वह पुष्प श्रीकृष्ण को भेंट कर दिया। श्रीकृष्ण ने इस पुष्प को रुक्मिणी को दे दिया और रुक्मिणी ने इसे अपने बालों के जूड़े में लगा लिया। इस पर नारद ने प्रशंसा करते हुए कहा कि फूल को जूड़े में लगाने पर रुक्मिणी अपनी सभी बहनों से हजार गुना सुन्दर और चिरयौवना लगने लगी हैं। 

देवी सत्यभामा को देवलोक से देवमाता अदिति ने चिरयौवन का आशीर्वाद पहले ही प्राप्त कर लिया था। तभी नारदजी आए और सत्यभामा को पारिजात पुष्प के बारे में बताया ।
नारद जी बोले, "वाह ! क्या पुष्प था ? उस पुष्प में कितनी शक्ति थी कि उस पुष्प के प्रभाव से देवी रुक्मिणी भी चिरयौवन हो गई हैं।" 

यह जान सत्यभामा क्रोधित हो गईं और श्रीकृष्ण से पारिजात वृक्ष लेने की जिद्द करने लगी। जब ये बात कृष्ण की दूसरी पत्नी सत्यभामा को पता लगी तो वो क्रोधित हो उठी और कृष्ण से अपनी वाटिका के लिए परिजात वृक्ष की मांग करने लगी।

कृष्ण के समझाने पर भी सत्यभामा का क्रोध शांत नहीं हुआ और अन्त में अपनी पत्नी की जिद के सामने झुकते हुए उन्होंने अपने एक दूत को स्वर्गलोक में परिजात वृक्ष को लाने के लिए भेजा पर उनकी यह मांग इन्द्र ने ठुकरा दी और वृक्ष नहीं दिया। जब यह सन्देश कृष्ण तक पहुँचा तो वे रोष से भर गए और उन्होंने इन्द्र पर आक्रमण कर दिया। युद्ध में कृष्ण ने विजय प्राप्त की और इन्द्र से परिजात वृक्ष ले आए। 

इन्द्र ने क्रोध में आकर परिजात वृक्ष को उस पर कभी भी फल ना आने का श्राप दे दिया इसी कारण इस वृक्ष पर कभी भी फल नहीं लगते ।

वादे के अनुसार कृष्ण ने उस वृक्ष को सत्यभामा को सबक सिखाते हुए उसकी वाटिका में लगवा दिया लेकिन उन्होंने  कुछ ऐसा किया जिस कारण रात को वृक्ष पर पुष्प तो लगते लेकिन वे उनकी पहली पत्नी रुक्मणी की वाटिका में ही गिरते थे । इसीलिए आज भी के जब इस वृक्ष के पुष्प झड़ते हैं तो पेड़ से काफी दूर जाकर गिरते हैं।

परिजात वृक्ष के द्वारिका से किन्तूर आने की पौराणिक कथा
किन्तूर में है पारिजात वृक्ष की एक अनोखी प्रजाति, माना जाता है कि किन्तूर गांव का नाम पाण्डवों की माता कुन्ती के नाम पर है। जब धृतराष्ट्र ने पाण्डु पुत्रों को अज्ञातवास दिया तो पांडवों ने अपनी माता कुन्ती के साथ यहां के वन में निवास किया था। पांडवों के अज्ञातवास के दौरान माता कुंती ने पारिजात पुष्प से शिव पूजन करने की इच्छा जाहिर की तो
पांडवों ने अपनी माता कुंती के पूजन के लिए यहां महादेव मंदिर का निर्माण कर उसमें अनार वाली महादेव की स्थापना की जिस कारण इस मंदिर का नाम कुंतेश्वर महादेव मंदिर हो गया। 
जैसा कि पांडवों की माता कुंती ने अपने पुत्र अर्जुन से शिवपूजन में शिवजी पर पारिजात के पुष्प अर्पित करने की इच्छा जाहिर की थी। इस पर अर्जुन द्वारका गए और अपनी माता की छापर करने के लिए भगवान श्री कृष्ण से पारिजात का वृक्ष मांग लिया और भगवान श्री कृष्ण ने अपनी बुआ की इच्छा पूरी करने के लिए उन्हें पारिजात का वृक्ष देना सहर्ष स्वीकार कर लिया। भगवान की आज्ञा मिलने पर अर्जुन पूरा का पूरा पारिजात वृक्ष ही उठा लाए और उसे मंदिर के पास स्थापित कर दिया। और माता कुंती ने पारिजात के पुष्पों से शिव आराधना करके अपनी इच्छा पूर्ण की, तभी से इस वृक्ष के पुष्पों से पूजा अर्चना की जाती रही है। 5000 वर्ष बीत जाने के बाद भी यह पारिजात वृक्ष अटल खड़ा हुआ है।

एक और पौराणिक कथा

पारिजात रात को क्यों रोता हैं?
एक अन्य मान्यता यह भी है कि बहुत समय पहले 'पारिजात' नाम की एक राजकुमारी हुआ करती थी, जिसे भगवान सूर्य से प्रेम हो गया था। लेकिन अथक प्रयास करने पर भी भगवान सूर्य ने पारिजात के प्रेम कों स्वीकार नहीं किया। जिससे खिन्न होकर राजकुमारी पारिजात ने जब तुम मुझे स्वीकार ही नहीं कर रहे तो मैं भी तुम्हें अपने अश्रु नहीं दिखाऊंगी यह कहकर उसने आत्महत्या कर ली। 

कहा जाता है की जिस स्थान पर परिजात की समाधि बनाई गई थी, उसी स्थान पर यह वृक्ष अपने आप उग आया था। यही कारण है कि तभी से लोगों ने इस वृक्ष को पारिजात नाम से पुकारना शुरू कर दिया। 

इस प्रकार पारिजात नामक वृक्ष ने जन्म लिया। यदि पुष्पित वृक्ष को यदि रात मैं देखा जाए तो इसके झड़ते हुए फूलों से ऐसा लगता है कि वह रो रहा है और सफेद रंग की उसकी अश्रु जमीन पर गिर रहे हैं। इसी कारण ऐसा कहा जाता है कि पारिजात वृक्ष को रात को रोता है। 

वहीं सूर्य उदय के साथ ही पारिजात वृक्ष की टहनियाँ और पत्तियां अपने प्रेमी भगवान सूर्य को प्रेम से अपने आगोष में लेने को आतुर दिखाई पड़ता है। 

देवी लक्ष्मी को प्रिय

धन की देवी लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए यदि नीचे दी गई विधि से उनकी पूजा निम्नलिखित पाँच शुभ मुहर्तों- होली, दीवाली, ग्रहण, रवि पुष्प तथा गुरु पुष्प नक्षत्र में की जाए तो उत्तम फल प्राप्त होता है।

इसके लिए देवी लक्ष्मी को प्रसन्न करने में भी पारिजात वृक्ष का उपयोग किया जाता है। देवी लक्ष्मी को पारिजात के पुष्प प्रिय हैं। उन्हें  यदि "ओम नमो मणिंद्राय आयुध धराय मम लक्ष्मी़वसंच्छितं पूरय पूरय ऐं हीं क्ली हयौं मणि भद्राय नम:।" मन्त्र का जाप 108 बार करते हुए नारियल पर पारिजात पुष्प अर्पित किये जाएँ और पूजा के इस नारियल व फूलों को लाल रंग कपड़े में लपेटकर घर के पूजा घर में स्थापित किया जाए तो लक्ष्मी सहज ही प्रसन्न होकर साधक के घर में वास करती हैं। 

उपयोग

सायटिका रोग को दूर करने का इसमें विशेष गुण है।
हरसिंगार की पत्तियाँ व टहनी

इस वृक्ष के पत्ते और छाल विशेष रूप से उपयोगी होते हैं। इसके पत्तों का सबसे अच्छा उपयोग गृध्रसी (सायटिका) रोग को दूर करने में किया जाता है।

विधि: हरसिंगार के ढाई सौ ग्राम पत्ते साफ करके एक लीटर पानी में उबालें। जब पानी लगभग 700 मिली बचे तब उतारकर ठण्डा करके छान लें, पत्ते फेंक दें और 1-2 रत्ती केसर घोंटकर इस पानी में घोल दें। इस पानी को दो बड़ी बोतलों में भरकर रोज सुबह-शाम एक कप मात्रा में इसे पिएँ।

ऐसी चार बोतलें पीने तक सायटिका रोग जड़ से चला जाता है। किसी-किसी को जल्दी फायदा होता है फिर भी पूरी तरह चार बोतल पी लेना अच्छा होता है। 

नोट : इस प्रयोग में एक बात का खयाल रखें कि वसन्त ऋतु में ये पत्ते गुणहीन रहते हैं अतः यह प्रयोग वसन्त ऋतु में लाभ नहीं करता।


हरसिंगार या  पारिजात का पुष्प या रात की रानी
हारशृंगार का पुष्प ऊपर से सफेद होता है तथा उसकी जो ठंडी होती है वह केसरिया या नारंगी रंग की होती है और बहुत खुशबूदार होता है। यह फूल रात्रि में खेलता है इसलिए इसे रात की रानी भी कहा जाता है। देसी कहीं-कहीं सीडली का पुष्पे भी कहते हैं ।

कार्य सिद्धि , वंश वृद्धि व वैभव की वृद्धि के लिए 
यह पुष्प ऐसा है की जिस का वंश वृक्ष नहीं बढ़ रहा हो जिसके संतान नहीं हो रही हो तो भगवान भोलेनाथ की इस पुष्प से पूजा की जाती है। इस पुष्प के चढ़ाने का एक तरीका है।
कार्य सिद्धि वंश वृद्धि वैभव की वृद्धि या अपने मन की सुख समृद्धि और संतान प्राप्ति के लिए हरसिंगार का पौधा से आराधना की जाती है। इस आराधना में हरसिंगार का पौधा का पुष्प अशोक सुंदरी वाले स्थान पर अर्पित करते हैं। इस समय पुष्प की डंडी हम भगवान की तरफ अर्थात लिंग की तरफ तथा मुख जल के गिरने की तरफ होता है अब इसी पुष्प उठाकर पुनः माता के हास्त कमल पर अर्पित करते हैं परंतु इस स्थिति में फूल भगवान भोलेनाथ के लिंग की तरफ तथा उसकी डंडी हमारी तरफ होती है। अब ऐसी पोस्ट को तीसरी बार माता के हंस कमल से उठाते हैं और भगवान भोलेनाथ के ऊपर अर्पित करते हैं उस समय फूल भगवान भोलेनाथ के ऊपर उसकी डंडी तथा फूल का मुख हमारी तरफ होती है।

पारिजात केसर

अब एक और बात ध्यान ध्यान देने वाली है। कि हमें आराधना से पूर्व पारिजात की पुष्प की केसरिया डंडी से केसर तैयार किया जाता है और उसी का त्रिपुंड लगाकर भगवान से अपने मन की बात कही जाती है यह केसर कैसे तैयार करना है यह भी चलो हम बता देते हैं इसके लिए पारिजात के पोस्ट एकत्रित करें उनकी डंडी को तोड़कर एक कटोरी में रख कर घर में ही सुखा लें और उसे गैस कर उसका पाउडर बना लें और इसमें गंगाजल मिलाकर इसका चंदन तैयार कर ले और सिद्धि के लिए वंश वृद्धि के लिए कार्य सिद्धि के लिए पूजा के समय जब इसका उपयोग करेंगे तो यह त्रिपुंड लगाने के काम आएगा और पारिजात का केसर कहलाएगा।

जब आप आराधना कर रहे होंगे तो पुष्प चढ़ाने के बाद जब आप केसर लगाएंगे तो यह केसर की तरह खुलेगा और उसे की तरह सुगंध उत्पन्न करेगा और वही सुगंध हमारे जीवन में भी आएगी और हमारे शरीर या हमारी कामना पारिजात अर्थात पूर्ण हो जाएगी।

सोमवार की अष्टमी पड़ने पर यदि हम देवादि देव महादेव की पारिजात आराधना करेंगे तो हमें फल कई गुना प्राप्त होगा। यदि आपने हर महीने आने वाली शिवरात्रि को पारिजात के एक पुष्प से आराधना करनी शुरू कर दें तो आप पीछे नहीं रहेंगे भगवान भोलेनाथ आपका हाथ पकड़ ही लेगा।

प्रतिदिन के जलाभिषेक के बाद भी आप पारिजात के चंदन से भगवान शिव की आराधना कर सकते हैं।

पारिजात के पुष्प से 3 शिवलिंग की आराधना की जाती है और बहुत अधिक फल देने वाली होती है

पहला नर्मदे हर महादेव शिवलिंग पर हड़ताल जो से नहीं नर्मदा से प्राप्त हुआ है उसकी आराधना हरसिंगार से की जाए तो कई गुना अधिक फल प्राप्त होता है।

दूसरे एकांत में स्थापित महादेव को एकांत ईश्वर महादेव कहते हैं इन पर भी पारिजात का पुष्प से आराधना की जा सकती है और यह भी कई गुना फल देने वाली होती है। जिद्दी कोर्ट केस चल रहा है तो एकांत ईश्वर महादेव के पास पारिजात के पेड़ का स्मरण करना या फिर इसे चढ़ाकर आराधना कर देने से ही कोर्ट केस में सफलता प्राप्त होती है।

तीसरा किसी जलस्रोत जैसे कुआ बावड़ी तालाब नदी आदि के तट पर बना शिवालय प्राचीन काल में या उन मंदिरों में आज भी आप महसूस कर सकते होंगे कि मंदिरों के को तालाबों आदि के पास भगवान भोलेनाथ मंदिर स्थापित किया गया है इसका कारण क्या है। इसका कारण यह है कि जल स्रोतों में रहने वाली गंगा मैया शिवलिंग गोस्वामी सिद्ध कर देती हैं इन्हें सिद्ध करने की जरूरत नहीं पड़ती यही कारण है। या बिहार से अगार का पुष्प अर्पित किया जाता है। यदि पोस्ट ना मिले तो आप हार सिंगार के केसर चंदन का प्रयोग भी कर सकते हैं।

पारिजात का पौधा कौन से दिन लगाना चाहिए?
पारिजात सोमवार या गुरुवार के दिन लगाना शुभ माना गया हैं। इससे पारिजात पौधा ज्यादा प्रफुल्लित रहता है और घर के सदस्यों के लिए ज्यादा शुभ और लाभकारी माना जाता है।

पारिजात का पौधा छंटाई करनी चाहिए
गर्मियों का मौसम पारिजात के पौधे की वृद्धि के लिए बहुत अच्छा होता है अतः पारिजात का फूल गर्मियों के दौरान तेजी से बढ़ता है। कभी-कभी यह एक दिशा में बढ़ना शुरू कर देता है और आकार से बाहर हो जाता है। इसलिए, जब यह फूल नहीं रहा हो तो इसकी अच्छी तरह से छंटाई करके इसे एक बेहतर आकार दे देना  उचित रहेगा।

पारिजात अपने गुण
हरिवंश पुराण में इस वृक्ष और फूलों का विस्तार से वर्णन मिलता है। पारिजात अपने औषधीय गुणों के लिए भी जाना जाता है। 
★ पौराणिक मान्यता अनुसार पारिजात के वृक्ष को स्वर्ग से लाकर धरती पर लगाया गया था। 
★ यह फूल जिसके भी घर आंगन में खिलते हैं वहां हमेशा शांति और समृद्धि का निवास होता है।
★ हर दिन इसके एक बीज के सेवन से बवासीर रोग ठीक हो जाता है।
★ इसके फूल हृदय के लिए भी उत्तम माने जाते हैं। इनके फूलों के रस के सेवन से हृदय रोग से बचा जा सकता है।
★ इतना ही नहीं पारिजात की पत्तियों को पीस कर शहद में मिलाकर खाने से सूखी खांसी भी ठीक हो जाती है। 
★ पारिजात की पत्तियों से त्वचा संबंधित रोग ठीक हो जाते हैं।
★ पारिजात वृक्ष के ऐतिहासिक महत्तव व इसकी दुर्लभता को देखते हुए सरकार ने इसे संरक्षित घोषित कर दिया है। भारत सरकार ने इस पर एक डाक टिकट भी जारी किया है।

खासतौर पर लक्ष्मी पूजन के में तो केवल उन्हीं फूलों को इस्तेमाल किया जाता है जो अपने आप पेड़ से टूटकर नीचे गिर जाते हैं। 

विभिन्न भाषाओं में नाम : 

संस्कृत- शेफालिका। हिन्दी- हरसिंगार। मराठी- पारिजातक।कोंकणी- पार्दक। गुजराती- हरशणगार। बंगाली- शेफालिका, शिउली। असमिया- शेवालि। तेलुगू- पारिजातमु, पगडमल्लै। तमिल- पवलमल्लिकै, मज्जपु। मलयालम - पारिजातकोय, पविझमल्लि। कन्नड़- पारिजात। उर्दू- गुलजाफरी। इंग्लिश- नाइट जेस्मिन। मैथिली- सिंघार, सिंगरहार |



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