नमः पार्वतीपतये हर हर महादेव 🙏
इस प्रश्न का अभिप्राय बाग-बगीचे में खिलने वाले फूल से नही है । धार्मिक परिभाषा में पंचांग अस्थियों को भी 'फूल कहा जाता है। यह शब्द मृतक के प्रति श्रद्धा का सूचक है। वैज्ञानिक मतानुसार फील के बाद ही फल आता है । फूक का सम्बोधन पूर्वजों के लिए और फल का सम्बोधन सन्तान के लिए है । इस तरह भी पूर्वजों की अस्थियों को फूल कहा जाना उचित है ।
पौधों में फूल आना एक सामान्य प्रक्रिया है। जब पौधा एक निर्धारित ग्रोथ तक पहुंच जाता है तब उसमें फ्लावरिंग बड्स आती है।
पौधों में भी हार्मोन्स होते हैं जो कि पौधों की विभिन्न गतिविधियों को नियंत्रित करते हैं। ऑक्सिन, जिब्रेलिन्स, साइटोकाइनिन्स आदि ग्रोथ हारमोन्स हैं।
विकास की विविध स्थितियों में विविध हार्मोन उद्दीपित (stimulate) होते हैं और उन्हीं के अनुरूप विकास होता है।
इसी तरह फूल में सीओ नाम का एक और प्रोटीन होता है जो फूल खिलाने वाले जीनों को सक्रिय कर देता है, जिससे कि फूल खिल जाते हैं. शोध में बताया गया है कि पौधे सूर्य की किरणों की नीली रोशनी और दिन की बढ़ती लंबाई से प्राकृतिक बदलावों के बारे में सटीक जानकारी पाल लेते हैं.
प्राचीन काल से, फूलों को शांति का प्रतीक माना जाता है। प्राचीन हिंदू धर्मग्रंथों में मंत्रों का उच्चारण करते हुए देवताओं को 'पुष्पांजलि' (फूल चढ़ाने की क्रिया) का उल्लेख है। फूल अर्पित करना हिंदू पूजा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है और विभिन्न देवी-देवताओं को कुछ फूलों से प्यार करने के लिए जाना जाता है। हिंदू 'पूजा' में फूलों का महत्व …
चूंकि फूल प्रकृति में पाई जाने वाली सबसे खूबसूरत चीजें हैं, इसलिए उन्हें पूजा के दौरान देवताओं को चढ़ाया जाता है। कुछ लोगों का यह भी मानना है कि फूल चढ़ाने से देवता अच्छे स्वास्थ्य, धन और समृद्धि प्राप्त करते हैं
देवताओं को फूल अर्पित करना हिंदू पूजा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। विभिन्न देवताओं को अलग-अलग फूल पसंद हैं। परंपरागत रूप से, यह कहा जाता है कि किसी को केवल उन फूलों की पेशकश करनी चाहिए जिनमे खुशबू होती है
एक अन्य कारण के अनुसार, हिंदू एक अनुष्ठानिक पूजा के भाग के रूप में देवताओं को फूल चढ़ाते हैं। इसे 'पूजा' कहा जाता है, जिसमें 'पु' का अर्थ 'पुष्पम' या फूल होता है और 'जा' का अर्थ 'जप' या देवताओं के पवित्र नामों का जप होता है। 'जा ’का अर्थ जलम’ या जल से भी है क्योंकि पूजा के दौरान पानी डाला जाता है।
चूंकि फूल प्रकृति में पाई जाने वाली सबसे खूबसूरत चीजें हैं, इसलिए उन्हें पूजा के दौरान देवताओं को चढ़ाया जाता है। कुछ लोगों का यह भी मानना है कि फूल चढ़ाने से देवता अच्छे स्वास्थ्य, धन और समृद्धि प्राप्त करते हैं
ऐसा कहा जाता है कि जब कोई भगवान को फूल चढ़ाता है, तो वह अपनी भक्ति 'भाव' या भावना को प्रसारित करता है और सर्वशक्तिमान से उसे स्वास्थ्य, धन और खुशी प्रदान करने का अनुरोध करता है।
गेंद की आकार का हल्का पीला जिस पर ऊपर मुलायम कांटे सफेद सफेद निकले होते हैं
सबसे बड़ा फूल रिफ्लेशिया है जो जावा के उत्तरी जंगलों में पाया जाता है इसका व्यास चार मीटर वजन बारह किलो होता है ये एक परजीवी फूल है इसमें से मधुर गंध निकलती है जो तितली यो कओ अपनी अोर आकर्षित करती है जब वो इस फूल पर बै ठती है तो फूल अपनी पंखुरी बंद कर लेता है और उसे अपना आहार बना लेता है इन फूलों का रंग नारंगी नीला और सफेद होता है
फूल हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा हैं। धार्मिक एवं आध्यात्मिक काम, उत्सव, त्यौहार, सजावट, श्रृंगार, औषधी आदि के लिए हम फूलों का इस्तेमाल करते हैं। फूलों का सबसे महत्वपूर्ण अंग है उनकी प्रसन्नता प्रदान करने वाली खुशबू। हर अलग फूल अलग प्रकार की खुशबू देता है, एक ही गण के फूल भी बहुत बार विभिन्न खुशबू बाँटते है। गुलाब की खुशबू जेरनायल एसीटेट नमक रसायनिक यौगिक के कारण होती है। चमेली की खुशबू नेरोलायडोल के कारण होती है। पुराने जमाने में फूलों से ही इत्र बनता था।
फूलों की खुशबु असल में उनके प्रजनन एवं अलग कार्यों को पूर्ण करने का मार्ग है। फूलों की खुशबु परागण अथवा खाद्य को आकर्षित करने का विकासवादी तंत्र है। विभिन्न फूल अलग-अलग प्रकार की गंध देते हैं, हर प्रकार की गंध का कार्य अलग रहता है। फूल उनके हितेषी परागण को आकर्षित करने के लिए एक विशिष्ट प्रकार की खुशबू फैलाते हैं वो भी समय के हिसाब से, इसीलिए कुछ फूल सुबह सुगंध देते हैं तो कुछ शाम या कुछ रात में और कुछ हर पल, बस उसकी तीव्रता बदलती है। कुछ फूलों के अपने परागण होते हैं जो बस उसी फूल के इर्द-गिर्द मंडराते हैं जैसे ऑर्किड (orchid) इस फूल की खुशबू कम-से-कम 100 रसायनों से बनी होती है तथा इतनी विशिष्ट कि एक और सिर्फ एक ही जाति का कीड़ा इस फूल की एक जाति पर बैठेगा।
फूलों की गंध उनकी पंखुड़ियों से एक रासायनिक तैल के रूप में निकलती है, इन्हें शास्त्रज्ञ उदवायी यौगिक कहते हैं। फूलों में कम से कम 7-10 अथवा ज्यादा से ज्यादा 100 प्रकार के रसायनिक तैल होते हैं। मान्यता है कि इब्न सीना, इस फ़ारस के चिकित्सक ने कुछ 1200 साल पहले गुलाबों से पहली बार इत्र तैयार किया था। परागण फूलों पर बैठते हैं तब उनके पैरों में अथवा उनके शारीर की लव में उस फूल के पराग अटक जाते हैं जो फिर इस तरीके से फूलों के प्रजनन में मदद करते हैं, पराग को एक जगह से दूसरी जगह ले जाकर, मानो जैसे परागन इन फूलों के यातायात के अनोखे साधन हैं।
कुछ फूल मांसाहारी होते हैं जो उनके खाने योग्य कीटकों को आकर्षित करने के लिए सड़े-गले मांस अथवा ऐसी कुछ गन्दी बदबू भरे गंध फैलाते हैं। कुछ फूल उन्हें नुकसान पहुंचाने वाले कीटकों को दूर रखने के लिए उन कीटकों के लिए रोषकारक गंध फैलाते हैं।
यह कारण है कि फूलों में इतनी विभिन्न प्रकार की खुशबू रहती है, कुछ अच्छी कुछ बुरी, प्रकृति की एक अनोखी योजना जो इन्हें सुरक्षित रख सके और प्रजनन में मदद करे।
कौन सा फूल देव पुष्प कहलाता है?
शिव पुराण में गुलाब को देव पुष्प कहा गया है। गुलाब (रोजा सिपेसीज़) एक बहुवर्षीय, झाड़ीदार, कंटीला, पुष्पीय पौधा है। पुष्प बहुत सुंदर सुगंधित होते हैं। इनकी १०० से अधिक जातियां हैं जिनमें से अधिकतर एशियाई मूल की हैं। किन्तु कुछ जातियों के मूल प्रदेश यूरोप, उत्तरी अमेरिकातथा उत्तरी पश्चिमी अफ्रीका भी है। भारत सरकार में 12 फरवरी को 'गुलाब-दिवस' मनाया जाता है। इसका फूल कोमलता और सुंदरता के लिये प्रसिद्ध है, इसी कारण से लोग छोटे बच्चों की उपमा गुलाब के फूल से देते हैं
पौराणिक कथाओं के अनुसार
ब्रह्मा और भगवान विष्णु को या ज्ञान नहीं था कि भगवान शिव ही पूरे सृष्टि के रचयिता हैं पालनहार हैं
इसलिए भगवान विष्णु और ब्रह्मा के बीच में इस बात का विवाद हो गया कि इन दोनों में इष्ट कौन है यह विवाद इतना बढ़ गया कि युद्ध तक पहुंच गया।
इस युद्ध के कारण सृष्टि का विनाश भी हो सकता था।
तभी उन दोनों के बीच में एक अग्नि प्रज्वलित हुई तथा उसमें से भगवान शिव प्रकट हुए उन्होंने उनके विवाद को खत्म करने के लिए यह कहा कि जो शिव स्तंभ के आदि और अंत का पता लगा लेगा वह ही श्रेष्ठ माना जाएगा।
भगवान विष्णु पाताल की ओर तथा भगवान ब्रह्मा आकाश की ओर गमन किए।
समय बीतता गया लेकिन ना भगवान ब्रह्मा को आदि का पता चल रहा था ना भगवान विष्णु को अंत का।
सभी भगवान ब्रह्मा को रास्ते में की थी कि का फूल गिरता हुआ दिखाई दिया उन्होंने सोचा यह फूल गिरते हुए आ रहा है तो जरूर इसको इस शिव स्तंभ का आदि का जानकारी होगा।
ब्रह्मा ने केतकी के फूल से पूछा कि तुम ऊपर से नीचे गिरते हुए आ रही हो बताओ इस स्तंभ का आदि कहां है।
इस पर केतकी के फूल ने कहा की मैं भी बहुत लंबे समय से गिरते आ रही हूं लेकिन मुझे ना इस स्तंभ के आदि का पता है ना इसके अंत का पता है।
तब ब्रह्मा ने उसके थकी के फूल को यह झूठ बोलने के लिए कहा कि मैंने इस स्तंभ के आदि को देखा है जिससे वह उसे मनचाहा वरदान देंगे।
वरदान पाने के लालच में केतकी के फूल झूठ बोलने को तैयार हो गई कि मैंने इस स्तंभ के आदि को देखा है।
केतकी के फूल और ब्रह्मा भगवान शिव के पास जाते हैं और यह कहते हैं कि मैंने इस स्तंभ के आदि को देखा है जिसकी गवा केतकी के फूल है।
ब्रह्मा और केतकी के फूल के द्वारा झूठ बोलने पर भगवान शिव क्रोधित हो गए तथा भगवान शिव ने ब्रह्मा के झूठ बोलने वाले सिर को धड़ से अलग कर दिया और केतकी के फूल को या शराब दिया कि तुम आज के बाद मेरी पूजा में कहीं भी इस्तेमाल नहीं की जाओगी।
ब्रह्मा के क्षमा याचना के पश्चात भगवान शिव ने ब्रह्मा को सृष्टि के रचयिता और भगवान विष्णु को सृष्टि के पालनहार होने की आशीर्वाद दिया।
तथा केतकी के फूल के द्वारा क्षमा याचना करने पर उसे हरितालिका तीज के दिन माता पार्वती के द्वारा भगवान शिव के पूजन में प्रयोग किए जाने की अनुमति दी।
भगवान शंकर को लाल फूल अर्पित क्यों नहीं किया जाता है?
शास्त्रों के अनुसार शिवलिंग पुरुषत्व का प्रतीक है, इसी वजह से महादेव को हल्दी नहीं चढ़ाई जाती. 2. फूल: शिव को कनेर और कमल के अलावा लाल रंग के फूल प्रिय नहीं हैं. शिव को केतकी और केवड़े के फूल चढ़ाने का निषेध किया गया है. 3. कुमकुम या रोली: शास्त्रों के अनुसार शिव जी को कुमकुम और रोली नहीं लगाई जाती है. 4. शिव पूजा में वर्जित है शंख: शंख भगवान विष्णु को बहुत ही प्रिय हैं लेकिन शिव जी ने शंखचूर नामक असुर का वध किया था इसलिए शंख भगवान शिव की पूजा में वर्जित माना गया है. 5. नारियल पानी: नारियल पानी से भगवान शिव का अभिषेक नहीं करना चाहिए क्योंकि नारियल को लक्ष्मी का स्वरूप माना जाता है इसलिए सभी शुभ कार्य में नारियल का प्रसाद के तौर पर ग्रहण किया जाता है. लेकिन शिव पर अर्पित होने के बाद नारियल पानी ग्रहण योग्य नहीं रह जाता है. 6. तुलसी दल: तुलसी का पत्ता भी भगवान शिव को नहीं चढ़ाना चाहिए. इस संदर्भ में असुर राज जलंधर की कथा है जिसकी पत्नी वृंदा तुलसी का पौधा बन गई थी. शिव जी ने जलंधर का वध किया था इसलिए वृंदा ने भगवान शिव की पूजा में तुलसी के पत्तों का प्रयोग न करने की बात कही थी.
नित्य कर्म पूजा पद्धति के अनुसार भगवान शिव को चढ़ाए जाने वाले फूल
सफेद मदार
शमी पत्र
धतूरा
बेल पत्र
मौलश्री
लाल कनेर
पीला कनेर
मोगरा
आवश्यक नहीं
हरसिंगार फूल एक रात का फूल हैऔर सुबह जल्दी नीचे गिर जाता है
इसलिए यह पृथ्वी पर गिरने के बाद भी शिव जी पर अर्पित किया जा सकता है
यदि आप पेड़ से तोड़ सकते हैं तो उस फूल को भी अर्पित किया जा सकता है
ब्रह्मकमल साल में एक बार खिलता है। पूरी रात खिला रहता है सुबह मुरझा जाता है। ब्रह्मकमल उत्तराखंड का पुष्प है।केदार नाथ से 2 किलोमीटर ऊपर वासुकी ताल के समीप तथा ब्रह्मकमल नामक तीर्थ पर ब्रह्मकमल सर्वाधिक उत्पन्न होता है। इसके अतिरिक्त फूलों की घाटी एवं पिंडारी ग्लेशियर रूपकुंड, हेमकुंड, ब्रजगंगा, फूलों की घाटी में यह पुष्प बहुतायत पाया जाता है इस पुष्प का वर्णन वेदों में भी मिलता है।
बह्मकमल
ब्रह्मकमल खिलने के पहले
बहत सारे……
गुलाब, रजनीगन्धा, गुड़हल के फूल, हेना,जुई , जाई, मधुमालती, मोगरा,कमल, निल कमल, कुमुद, गेंदे का फूल, चम्पा, चमेली, कामलता, सूरजमुखी, कनेर के फूल, सदाबहार, ब्रम्ह कमल, रात की रानी, नाग चम्पा, गुलमेंहदी, गुलमोहर, सेवती,गुलबहार,
पारिजात, कामिनी, नर्गिस के फूल, केतकी, धतूरा, कंद पुस्प, दालिया, पलाश के फूल, करवेर के फूल, कर्निया के फूल ,अपराजिता, सुगंध्राज, राधा चूड़ा और बहत सारे फूल है जिनका हिंदी नाम मुझे नहीं पता है, इसलिए में नहीं लिख पाई।😔
नीलकुरिन्जी फूल
आपने कुंभ मेले के बारे में सुना ही होगा जो 12 साल में एक बार होता है. कभी आपने ऐसे फूल के बारे में सुना है जो 12 साल में एक बार खिलता है. अगर नहीं सुना तो आज हम आपको बताने जा रहे हैं देश में होने वाले ऐसे ही एक फूल की प्रजाति के बारे में जो 12 सालों के बाद इस साल खिलने वाला है.
खास बात ये है कि इस फूल को देखने के लिए अभी से लोगों ने प्लान बना लिया है. आप भी जानिए क्या है इस फूल की खासियत और देश के किस हिस्से में खिलने जा रहा है ये अनोखा फूल.
ये फूल खुबसूरत केरल राज्य के मुन्नार में हर 12 साल में खिलता है. इस फूल का नाम नीलकुरिन्जी है.
केरल की स्थानीय भाषा में नीला का तात्पर्य रंग से है और कुरिन्जी फूल का स्थानीय नाम है. इस फूल को देखने के लिए देश ही नहीं बल्कि विदेश से लोग यहां आते हैं.
आखिरी बार 2006 में खिला यह फूल इस साल फिर से खिला रहे हैं जो लगातार 3 महीने तक खिले रहेंगे. भारत में इस फूल की कुल 46 प्रजातियां पाई जाती हैं जिसमें सबसे ज्यादा इनकी संख्या मुन्नार में ही है. जुलाई की शुरुआत में नीलकुरिन्जी के खिलने के बाद अगले तीन माह तक पहाड़ियां नीली दिखेंगी. जिसे देखने और फोटोग्राफी करने लोग दूर से आते हैं.
के के टी।।। केरल कर्नाटक और तमिलनाडु। ओके जी।।।
इन तीन राज्यों मतलब पश्चिमी घाट के यहां नीलगिरी पर्वत माला है।।।
इस पर्वतमाला का नाम नीलगिरी 12 साल में खिलने वाले फूलों के कारण ही रखा गया है।
नीलगिरी की पहाड़ियों पर नीलकुरिंजी या नीलाकुरंज नामक फूल 12 वर्ष में एक बार ही खिलता है।।। नीले रंगो के इन फूलों से पहाड़ियां भर जाती है।
होता यह है कि फूल जब सूखता है बीज वही गिर जाते हैं और नये पौधे बनते हैं जो 12 साल में ही फूल देते हैं।
इस लिए यह क्रम हर 12 वें साल में ही आता है। नीलकुरिंजी पुष्प के कारण वातावरण शानदार हो उठता है।।
इसके अलावा एक और पुष्प है जो कि 36 साल में खिलता है।
वह शायद से हिमालय पर खिलता है और उसका नाम है नागपुष्प।।।
और इन फूलों के अलावा एक ऐसा फूल भी है जो 12 साल में एक बार ही खिलता है और सुगंध पूरी दुनिया में फैल जाती है।
।।।।।।।। वह है।।।।।।।।।
आपकी किशोरावस्था। जो 12 वें साल में खिलती है और आपके व्यक्तित्व व भविष्य को तय कर देती है।।।
किशोरावस्था का फूल जब 12 साल में खिलता है दुनिया रंगीन हो उठती है।। मूंछों के बाल और सीना उभरते हैं। सपने दिन में आने लगते हैं। कद बढ़ने लगता है।।
और दुनिया की सबसे मनमोहक मोहब्बत की सुगंध से दुनिया बड़ी रंगीन दिखाई देती है।।।
जो भी पेरेंट्स व बच्चे इस किशोरावस्था के फूल की सुगंध को सही दिशा में मोड़ देते हैं वे सफल हो जाते हैं।।
नहीं तो फिर यह फूल क्या क्या गुल खिलाता है इतिहास साक्षी है।।।
देव विसर्जन के पश्चात पूजा का अवशेष वहां से उठा सकते हैं।
परंतु दीपावली के पूजन के पश्चात देवी विसर्जन नहीं होता है। इसलिए अगले दिन पुनः पूजन शुरू करने से पहले पिछले दिन के पुष्प हटाने चाहिए
फिर पूजन के पश्चात पुराने पुष्प और कोई भी वास्तु जो विसर्जन के लायक हो उसे किसी ऐसे स्थान पर मिट्टी में दबा दें । जहां गंदगी होने की संभावना न हो। खेत गॉर्डन कहीं भी कर सकते हैं।
नदी तालाब के जल में प्रवाहित न करें। आज कल जल प्रदूषण यों भी बहुत बढ़ रहा है।
पर्यावरण को स्वस्थ रखना हमारे धर्म का ही हिस्सा है। यज्ञ आदि पूरे पर्यावरण को शुद्ध बनाते हैं।
गंगा भी आज बहुत प्रदुषित है। विष उगलने वाले फैक्ट्रि याँ और बढ़ती जनसंख्या के कारण नदियों को बहुत गंदे किया है।
उसे और अधिक प्रदुषित न करें तो अच्छा है।
👉दीपक की लो में फूल बनने का मतलब है कि आपकी पूजा आपके ईष्टदेव तक पहुंच रही है। यानि इस प्रकार दीपक की लो में अगर फूल बनता है तो ये आपकी पूजा आपके ईष्ट तक पहुंचने का संकेत है और उनकी कृपा दृष्टि आपके ऊपर जरुर बनेगी। वो किसी ना किसी रुप में, प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से आपके साथ हैं और आपके कार्यों में आपकी सहायता कर रहे हैं और आपके हर कार्य को बना रहे हैं।
भगवान करते हैं आपकी मदद
अगर दीपक में ऐसा फूल बनता है तो आपको समझ जाना चाहिए कि उस देवी या देवता की कृपा आपके ऊपर हो रही है और आपकी जो पूजा है वह उन तक पहुंच रही है। ये सबसे बड़ा संकेत है कि, पूजा के नियमों के साथ अगर आप पूजा को पूर्णरुप से और भक्ति भाव से करते हो, हालांकि साधनाओं में ऐसा बहुत कम होता है, लेकिन भक्ति मार्ग में ऐसा होता है कि बहुत सारे लोगों की पूजा भगवान तक पहुंचती है और उनकी ख्वाइशें भी पूरी होती हैं, उनकी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। उनके घर से दुख, क्लेश सब मिट जाता है। किसी भी प्रकार का लड़ाई-झगड़ा घर में नहीं रहता। स्वत: ही भगवान खुद प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में उनकी सहायता करते हैं।
क्या करें👉अगर ऐसा आपके साथ होता है और आपके दीपक में भी ऐसा ही फूल बनता है तो आपको धर्म और पुण्य का काम करना चाहिए
आपको गाय को चारा आदि खिलाना चाहिए।
आपको कुत्तों और जानवरों को बिस्किट-रोटी खिलानी चाहिए।
आपको कबूतरों और पक्षियों को दाना डालना चाहिए। इससे आपको और सकारात्मक फल देखने को मिलेंगे।
भगवान शिव को चमेली का फूल बहुत प्रिय है। वेदों में जिक्र आता है कि चमेली के फूल से शिवलिंग की पूजा करने पर मनुष्य के जीवन में सकारात्मकता ऊर्जा और वाहन सुख की प्राप्ति होती है।
भगवान शिव के लिए वर्जित पुष्प
महाशिवरात्रि के दिन यदि भगवान शिव को प्रसन्न करना है तो हमें इस बात का अवश्य ज्ञान होना चाहिए कि उन्हें पूजा में क्या चीजें पसंद हैं और क्या नहीं। महाशिवरात्रि के दिन पवित्र नदी के जल से अभिषेक करने के बाद पुष्प अर्पण करने मात्र से ही शिव जी प्रसन्न होकर मनचाहा वरदान दे देते हैं। हम सभी जानते हैं कि भगवान शिव को सफेद रंग के पुष्प पसंद हैं, लेकिन उन्हें सभी सफेद रंग के फूल नहीं चढ़ाए जाते हैं।
भगवान शिव की पूजा में भूलकर भी केतकी का फूल न चढ़ाएंं क्योंकि महादेव ने इस फूल का अपनी पूजा से त्याग कर दिया है। पौराणिक कथा के अनुसार एक बार भगवान विष्णु और ब्रह्मा जी कौन बड़ा और कौन छोटा है, इस बात का फैसला कराने के लिए भगवान शिव के पास पहुंचे। इस पर भगवान शिव ने एक शिवलिंग को प्रकट कर उन्हें उसके आदि और अंत पता लगाने को कहा। उन्होंने कहा जो इस बात का उत्तर दे देगा वही बड़ा है।
इसके बाद विष्णु जी उपर की ओर चले और काफी दूर तक जाने के बाद पता नहीं लगा पाए। उधर ब्रह्मा जी नीचे की ओर चले और उन्हें भी कोई छोर न मिला। नीचे की ओर जाते समय उनकी नजर केतकी के पुष्प पर पड़ी, जो उनके साथ चला आ रहा था।
उन्होंने केतकी के पुष्प को भगवान शिव से झूठ बोलने के लिए मना लिया। जब ब्रह्मा जी ने भगवान शिव से कहा कि मैंने पता लगा लिया है और केतकी के पुष्प से झूठी गवाही भी दिलवा दी तो त्रिकालदर्शी शिव ने ब्रह्मा जी और केतकी के पुष्प का झूठ जान लिया।
उसी समय उन्होंने न सिर्फ ब्रह्मा जी के उस सिर को काट दिया जिसने झूठ बोला था बल्कि केतकी की पुष्प को अपनी पूजा में प्रयोग किए जाने के अधिकार से भी वंचित कर दिया।
भगवान शिव की पूजा में केतकी के फूल को नहीं चढ़ाया जाता।क्योंकि इस फूल को शिवजी ने श्राप दिया था। लेकिन साल में एक दिन इस पुष्प का प्रयोग शिव पूजा में किया जाता है।
शिव पुराण के अनुसार एक बार ब्रह्मा जी और भगवान विष्णु में विवाद हो गया कि दोनों में श्रेष्ठ कौन है। विवाद का फैसला करने के लिए भगवान शिव को न्यायकर्ता बनाया गया । भगवान शिव की माया से एक ज्योतिर्लिंग प्रकट हुआ।
भगवान शिव ने कहा कि ब्रह्मा और विष्णु में से जो भी ज्योतिर्लिंग का आदि अंत बता देगा वही श्रेष्ठ कहलाएगा। ब्रह्माजी ज्योतिर्लिंग को पकड़कर आदि का पता करने नीचे की ओर चल दिए। और भगवान विष्णु ज्योतिर्लिंग का अंत पता करने ऊपर की ओर चल दिए।
जब काफी चलने के बाद ज्योतिर्लिंग का आदि अंत का पता नहीं लगा तो ब्रह्मा जी ने देखा कि एक केतकी का फूल भी उनके साथ नीचे आ रहा है। ब्रह्मा जी ने केतकी के फूल को बहला-फुसलाकर झूठ बोलने के लिए तैयार कर लिया। और शिव जी के पास पहुंचे। ब्रह्मा जी ने कहा कि मुझे ज्योतिर्लिंग कहां से उत्पन्न हुआ है यह पता चल गया है। लेकिन भगवान विष्णु ने कहा कि मैं ज्योतिर्लिंग का अंत नहीं जान पाया हूं। ब्रह्मा जी ने अपनी बात को सच साबित करने के लिए केतकी के फूल से गवाही दिलवाई।
भगवान शिव ब्रह्मा जी के झूठ को जान गए और ब्रह्मा जी का सिर काट दिया। इसलिए ब्रह्माजी पंचमुख से चार मुख वाले हो गए। केतकी के फूल ने झूठ बोला था इसलिए भगवान शिव ने इसे अपनी पूजा से वर्जित कर दिया।
जब भगवान शिव ने केतकी के फूल को श्राप दिया इसके बाद केतकी के पुष्प ने भगवान शिव से बहुत क्षमा याचना की और कहा कि हे प्रभु भले ही मैंने असत्य कहा है लेकिन मैंने आपके दर्शन किए हैं मुझे इसका कुछ लाभ होना चाहिए। तब भगवान शिव जी ने कहा कि जब पार्वती मुझे प्राप्त करने के लिए शिवलिंग की पूजा करेंगी और उनके पास मुझे अर्पण करने के लिए कुछ नहीं होगा। तब वह गलती से तेरा प्रयोग मेरी पूजा में करेंगी और मैं प्रसन्न होकर पार्वती को वरदान दूंगा। उस दिन से साल में एक बार भाद्रपद की शुक्ल पक्ष की तृतीया को केतकी का फूल मेरी पूजा में अर्पण किया जाएगा। इस दिन को हरतालिका तीज के नाम से भी जाना जाता हैं।
धन्यवाद🙏
काले रंग के कपड़े पहनकर न करें पूजा
महाशिवरात्रि के दिन शिव की पूजा करते समय सिर्फ फूल ही नही बल्कि अन्य बातों का भी ख्याल रखना चाहिए। जैसे इस दिन पूजा करते समय काले रंग के कपड़े ना पहनें। मान्यता है कि भगवान शिव को काला रंग बिल्कुल भी पसन्द नहीं है। इसी तरह शिव की पूजा में शंख से जल और तुलसी अर्पित करना भी निषेध है। भगवान शिव का नारियल पानी से अभिषेक भी नहीं किया जाता है।
महाशिवरात्रि के दिन भक्तगण शिवजी को खुश करने के लिए शिवलिंग पर कई चीजें अर्पित करते हैं, लेकिन कई बार भूलवश ऐसी चीजें भी चढ़ाने लगते हैं, जिसे शास्त्रों में वर्जित माना जाता है।
देवादिदेव महादेव शंकर ने स्वयं श्री राम को इसका उत्तर दिया..
जो शांत, ईमानदार, सत्यवादी, सभी प्राणियों को प्यार करता है, स्वच्छ रहता है, अपनी इंद्रियों पर विजय प्राप्त करता है, और ज्ञान प्राप्त करने के लिए शास्त्रों का अध्ययन करता है, ऐसा भक्त मेरा प्रिय भक्त बन जाता है।
~ पद्म महापुराण : श्री शिव गीता : भक्ति योग
उपरोक्त पद का व्यावहारिक प्रदर्शन नीचे दिया गया है..
परमेश्वर रुद्र/शिव के वचन :-
सत्य, पवित्रता, ईमानदारी, त्याग, तपस्वी तपस्या, व्रत, क्षमा, भक्ति, धैर्य, विचार और वचन के साथ, मुझे शुद्ध कर्मों के कृष्ण द्वारा विधिवत पूजा की गई है। इसके लिए मुझे कृष्ण से प्यारा कोई नहीं है।
~ व्यास महाभारत : सौप्तिका पर्व : खंड 7
यह सब क्यों? क्योंकि श्री रुद्र वेदों के अनुसार धर्म के प्रतीक हैं।
यजुर्वेद घोषणा करता है,
इसलिए उन्होंने रावण (अधर्मी भक्त) को अस्वीकार कर दिया और सहर्ष अपने धार्मिक भक्त {श्री राम} को स्वीकार कर लिया।
मैं अपने एक भक्त के लिए पहले सूर्य पर बहुत क्रोधित हुआ था। मैंने उसे अपने त्रिशूल से दबा दिया। मैं रावण के बुरे कार्यों का पक्षकार नहीं था, हालांकि वह मेरा भक्त था। एक और भक्त [श्री राम] की खातिर, मैंने रावण को उसके सभी अनुयायियों के साथ त्याग दिया… ..
~ शिव महापुराण 2.2.23
परमेश्वर शिव ने मां पार्वती को समझाया ब्राह्मण शिव भक्त के लक्षण...
सहनशीलता, शांत, संतोष, सत्यता, चोरी न करना, ब्रह्मचर्य, मेरा ज्ञान, सांसारिक वस्तुओं से अनासक्तता, भस्म का प्रयोग और सभी के बहुत अधिक पालन से बचना।
~ शिव महापुराण 7.2.11
नमः शिवाय 🙏
नमः पार्वतीपतये हर हर महादेव 🙏
वृकासुर जो अपने शरीर के अंग काट के भगवान को चढ़ा रहा था उसके प्रति प्रेम से शिव जी ने कहा कि उन्हें भक्तों का श्रद्धा से चढ़ाया हुआ जल भी कबूल है।(१०/८८/२० भागवत)। उनके लिए भक्त शरीर को पीड़ा न दें।
जो कुछ भी भक्त प्रेम से शिवजी को चढ़ाते हैं शिवजी उसे कबूल करते हैं। मन में आए जो फूल शिव जी को चढ़ाएं, वैसे कुछ लोग धतूरे का फूल आंकड़े का फूल और बील केपत्ते चढ़ाया करते हैं।
प्रकृति के अनुसार फूलों का उपयोग सूंघ कर किया जाता है । पहले से ही उपयोग की हुई वस्तु हम भगवान को नहीं चढ़ाते हैं , अपितु इस्तेमाल से पहले भगवान को चढ़ा कर फिर उसका उपयोग करते हैं। इसी मान्यता के कारण सूंघा हुए फूलों को भगवान को नहीं चढ़ाया जाता है।
आम तौर पर इन फूलों के निर्माल्य को पवित्र जल में विसर्जित किया जाता रहा है किन्तु इससे वे फूल उस पानी में सड़ जाते हैं जिससे पानी गन्दा हो जाता है और जल ही जीवन है तो हम एक प्रकार से अपने ही जीवन को गन्दा कर रहे होते हैं।
इसलिये हमने इसे एक दूसरे तरीके से आजमाना शुरू कर दिया है। चूँकि हमारे घर में पेड़ लगाने हेतु जमीन नहीं है तो शुरुआत में हमने एक गमला खरीद लिया जिसके नीचे थोडी मिट्टी डाल दी फिर उसके ऊपर दो चार दिन तक निर्माल्य डाले फिर थोडी मिट्टी डाली। ऐसा करते करते हमने गमले को भरने दिया जब गमला तीन चौथाई भर गया तब उस मिट्टी में थोड़ा गोमय ड़ाल के सब को बढ़िया मिला दिया यह एक अच्छा खाद बन गया ।
अब इस मिट्टी में चूँकि गेंदे की भी पत्तियाँ पड़ी थीं तो उसमें से गेंदे के पौधे लहलहाने लगे जो आजकल हमारे लिये ताजे फूलों का स्रोत बन गया है।
फिर एक और गमला ऐसे ही बनाया, लेकिन साथ में इसमें एक और काम किया। एक पानी का मटका नीचे से तडकने से काम से गया था। उसमें हम निर्माल्य, सब्जियों के बचे फेंके जाने वाले हिस्से, नारियल फोड़ने के बाद बची नारियल की सारी कुची, मक्के के दाने खत्म करने के बाद बच्चे भुट्टे का डंडा, आदी सारा गमले में बारीक टुकडे कर के भर देते थे। उसमें थोडी मिट्टी डाल के मिला के ढक के रख देते थे।
उसे खोलना तथा मिलाना तभी जब कुछ उसमें डालना हो । जब वह भर गया एक और गमला खरीद के नया पौधा लगा लिया।
अब हमारा घर छोटे छोटे फुलों के गमलों से सजा है। घर में आते ही इन लहलहाते फूलों को देखकर सारी थकान दूर हो जाती है। घर का बनाया यह खाद आजकल हमारे रिश्तेदार भी ले जाते हैं जो हमारे इस कृत्य से खासे प्रभावित हैं तथा हमारा अनुकरण भी करना चाहते हैं और जिनके घर में पौधे लगाने को थोडी बहुत क्यों न हो पर ज़मीन है। उन रिश्तेदारों को हम, किनारे में कहीं ज़मीन में दो फिट का गढ्ढा खोदकर उसमें खाद बनाने के लिये कहते हैं, जो ऊपर से किसी टिन से ढकने पर ज्यादा सुरक्षित हो जाती है।
इस तरह भगवान के फूल जो हमारे लिए श्रद्धा का विषय हैं बर्बाद भी नहीं होते और अपमानित भी नहीं होते। उलटा हरियाली और खुशहाली भरा भगवद आशीर्वाद हमारे ऊपर छोड़ जाते हैं ।
- भगवान् को चढ़ाए जानेवाले फूलों को हमारे यहाँ, प्रातःकाल उठकर नित्यक्रिया निवृत्ति के पश्चात् दन्तधावन के बाद, तोड़ने का प्रचलन है।
- किन्तु तुलसी, स्नान के बाद तोड़ने का प्रचलन है। नित्यकर्म-पूजाप्रकाश में हारीत धर्मशास्त्र का वचन उद्धृत किया गया है जो इस प्रकार है- स्नानं कृत्वा तु ये केचित् पुष्पं चिन्वन्ति मानवाः।देवतास्तन्न गृह्णन्ति भस्मीभवति दारुवत्।।अर्थ- स्नान करके जो कोई मनुष्य फूल चुनते(तोड़ते) हैं, देवता उसे ग्रहण नहीं करते और वह लकड़ी(सूखी) की तरह भस्म(=व्यर्थ)हो जाता है।
- इसी प्रकार इसमें तुलसी चयन(तोड़ने) के विषय में पद्मपुराण का श्लोक द्रष्टव्य है- अस्नात्वा तुलसीं छित्त्वा देवतापितृकर्मणि।तत्सर्वं निष्फलं याति पञ्चगव्येन शुद्ध्यति।। अर्थ- देवता और पितृकर्म में बिना स्नान किये तुलसी तोड़ने पर वह निष्फल चली जाती है और पञ्चगव्य से शुद्धि होती है।
- किन्तु, वीरमित्रोदय,पूजाप्रकाश,पृष्ठ ५८ में कहा गया है।स्नान का तात्पर्य मध्याह्न-स्नान है।इसके अलावे पद्मपुराण के उपरोक्त श्लोक में वर्णित- तत्सर्वं से यह स्पष्ट होता है कि 'तुलसी' पद पुष्प आदि का उपलक्षक(बोधक)है।सनातन धर्म में विहित त्रिकाल सन्ध्या-वन्दन अथवा त्रिकाल सन्ध्या-कृत्य विधान में मध्याह्न सन्ध्या के लिए किये जाने वाले स्नान को मध्याह्न-स्नान कहा गया है।
- पुष्टि-मार्ग में दीक्षित,वैष्णव,ब्रह्म वेला में ही स्नान कर पुष्प चयन करते हैं(उनके यहाँ यही विधान एवं निर्देश है)।
- किन्तु फूल नहाकर तोड़े जाँय अथवा बिना नहाए,शुचिता(शुद्धता) का ध्यान रखना आवश्यक है।इसीलिए आचारेन्दु में कहा गया है- प्रक्षाल्य पाणिपादौ च आचम्य च कृताञ्जलिः।अर्थात् फूल तोड़ने से पहले हाथ-पैर धोकर आचमन कर ले।
- इस प्रकार फूल बिना नहाए भी तोड़ा जा सकता है किन्तु उसमें आवश्यक शुद्धता अपेक्षित है।
- फूल तोड़ने के समय कुछ मन्त्रों के उच्चारण का उल्लेख भी किया गया है किन्तु प्रातःकाल होने के कारण भगवन्नाम का सहज उच्चारण ही श्रेयस्कर है और मैं ऐसा ही करता भी हूँ।
- पुष्प-चयन से सम्बन्धित अपराध के कारण ही, कविकुलगुरु कालिदास विरचित गीतिकाव्य- मेघदूतम् के यक्ष को अपने स्वामी(मालिक) शिवभक्त यक्षराज से शापित होना पड़ा। कविकुलगुरु कालिदास ने,स्वाधिकारात्प्रमत्तः इस शब्द के द्वारा यह स्पष्ट संकेत किया है कि यक्ष ने अपने अधिकार=कर्तव्य से प्रमाद किया,च्युत् हुआ,अर्थात् समय पर शिवपूजा के लिए यक्षराज को फूल नहीं पहुँचाया, जिसके कारण उसे यक्षराज से शाप मिला।
प्रकाश यादव जी अनुरोध के लिए धन्यवाद ।
#अंचला दत्ता
वैसे तो # फूल चाहे जंगली हों या शहरी क्षेत्रों के घरों की शोभा बढ़ाने वाले होते हैं। सभी फूल स्वयं में सुंदरता से परिपूर्ण होते हैं। उनकी मधुर सुगंध सभी जगह समान रुप से बहती है।कौन सा ऐसा फूल है जो इतना खास है कि राजा ही बन बैठा।
आइये जानते हैं विस्तार से -
फूलों का राजा एक विदेशी है जो फारस से लाया गया है। वैसे भी हम भारतीय हर विदेशी को आत्मसात करते गए। और इस प्यारे से विदेशी फूल को फूलों का राजा स्वीकार किया है।
वैसे ये दिलवालों के लिए बहुत खास है इसलिए ये दिल के बहुत पास है।
कितने कांटों से भरा सुरक्षा के घेरे में, सुंदर सा आंखों को शांति देने वाला, हृदय को खुशी देने वाला एक मात्र गुलाब ही हो सकता है।
फोटो इमेज गूगल से।
गुलाब क्यों है खास? क्यों है राजा?
- गुलाब मात्र एक फूल ही नहीं इसके अनेक गुण भी हैं।
- यदि आंखों में जलन हों तो कॉटन बॉल को गुलाब जल में डूबोकर आंखों पर रखें। आंखों में गुलाब जल के छींटें लें।
- चेहरे के लिए टोनर का भी काम करते हैं। साथ ही यदि आपके होंठ काले हैं तो आप प्रतिदिन गुलाब की पंखुड़ियों को कच्चे दूध में मिलाकर पीस लें और इसे अपने होठों पर लगायें। कुछ ही दिनों में रंग में अंतर दिखेगा।
- गुलाब के फलों में भी पर्याप्त मात्रा में विटामिन भी पाया जाता है।
- गुलाब के फूल को खानें से मस्तिष्क को आॉक्सीजन मिलता है। जिससे मेमोरी अच्छी हो जाती है। यदि आप इस तरह से गुलाब के फूल नहीं खाना चाहते हैं, तो उसका गुलकंद बनाकर खाएं। उससे मस्तिष्क को शांति मिलती है। गुलकंद खानें से मुंह के दुर्गंध से मुक्त मिलती है।
- मिलती है। गुलाब के फूल के इत्र का प्रयोग मानसिक शांति प्रदान करता है। साथ ही ज्योतिष के अनुसार शुक्र ग्रह को भी संतुलित करनें की बात कही गई है।
- दूल्हा दुल्हन का विवाह समारोह में इस फूलों के राजा की उपस्थिति अनिवार्य है। हल्दी के उबटन में इसे डालकर। और बारातियों पर गुलाब के इत्र को छीटकर, शादी के फेरों में वर वधु पर इसकी हल्की बारिश कर स्वागत के रुप में इस फूलों के राजा का महत्व और भी बढ़ जाता है।
- गुलाब को बेचकर माली अच्छे पैसे कमाता है। तो ये अर्थ उपार्जन के रुप में भी सहायक है।
सभी गुणीजन टिप्पणी अवश्य दीजिये
गुलाब को फूलों का राजा यूं ही नहीं कहा जाता। रंग और सौंदर्य के साथ खुशबू का मेल उसे बेजोड़ बना देता है, लेकिन इसके साथ यह बहुउपयोगी है। गुलाब फूल होने के साथ-साथ एक जड़ी बूटी भी है।
गुलाब फूलों का राजा, लिली फूल की रानी।
लिली एक छोटा सा पर अत्यंत सुंदर पुष्प होता है।
बोगनविलिया गलाबर के फूल को कागज़ के फूल कहा जाता है।
चंपा के फूल पर भंवरा नहीं बैठता। चंपा के फूल की उत्कट गंध के कारण भौंरे इनके पास नहीं जाते।ना सिर्फ भँवरा बल्कि ततैया, मधुमखिया भी चंपा के फूलों पर नहीं बैठते।
कारण- इसका परागण नहीं होता। यह फूल वासना रहित माना जाता है।
चंपा का फूल ऐसा दिखता है-
सैंया छेड़ देवे, ननद चुटकी लेवे
ससुराल गेंदा फूल
सास गारी देवे, देवर समझा लेवे
ससुराल गेंदा फूल
छोड़ा बाबुल का अंगना
भावे डेरा पिया का हो
सास गारी देवे...
सैय्याँ हैं व्यापारी, चले हैं परदेस
सुरतिया निहारूँ, जियारा भारी होवे
ससुराल गेंदा फूल
सास गारी देवे...
बुशट पहिने, खाईके बीड़ा पान
पूरे रायपुर से अलग है
सैय्याँ जी की शान
ससुराल गेंदा फूल
सैयां छेड़ देवे...
इस प्यारे से गीत से " ससुराल गेंदा फूल " वाली बात आसानी से समझी का सकती है।
ऐसे ही हमारे देश के अलग अलग राज्य, अलग अलग क्षेत्र के गीत संगीत, लोकगीत, कहावतें भारतीय संस्कृति को बताते हैं। यह हमारे देश की विशेषता है और हमारी विरासत भी है।
नीलकुरिंजी का फूल
अगस्त से अक्तूबर तक ये फूल खिला रहता है। और मुरझाने के बाद इस फूल को पुनः खिलने मे १२ वर्षो का समय लगता है।
ये फूल केरल के शालोम हिल्स पर खिलते है। पूरे हिल्स पर खिले ये फूल बहुत ही मनमोहक दिखते है।
फूलों की नगरी चमोली को कहा जाता है। जहां फूलों की घाटी नामक राष्ट्रीय उद्यान स्थित है, जिसे अंग्रेजी में Valley of Flowers कहते हैं। यूनेस्को द्वारा 1982 में घोषित विश्व धरोहर स्थल नंदा देवी अभयारण्य नंदा देवी राष्ट्रीय उद्यान का एक भाग है। फूलों की घाटी आधा किमी चौड़ी और 3 किलोमीटर लंबी है और 87 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्रफल में फैली हुई है। इस घाटी की खोज दून स्कूल के वनस्पति शास्त के प्राध्यापक रिचर्ड होल्सवर्थ ने अपने कुछ साथियो के साथ की थी। जब वह अपने साथियो के साथ किसी रिसर्च से वापस आ रहे थे तो रास्ता भटकने के कारण वह इस स्थान फिर पहुंच गए। उनके साथी फ्रैंक स्माईथ को यह जगह भहुत भा गयी। उसके बाद भी फ्रैंक स्माइथ इस स्थान पर कई बार आएं और इस स्थान को Valley of Flowers फूलों की घाटी नाम दिया।
फूलो की घाटी भारत के उत्तराखंड राज्य के चमोली जिले में, बद्रीनाथ धाम से 20 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। फूलों की घाटी 87.50 किमी वर्ग क्षेत्र में फैली है। इसे यूनेस्को ने 1982 में राष्ट्रीय उद्यान घोषित किया था। हिमाच्छादित पर्वतों से घिरी हुई यह घाटी बेहद खूबसूरत है।
इस घाटी के पास ही सिखों का तीर्थ स्थान हेमकुंट साहिब है।
हेमकुंट साहिब चमोली जिला, उत्तराखंड, में है,
यह हिमालय में 4632 मीटर (15,192.96 फुट) की ऊँचाई पर एक बर्फ़ीली झील के किनारे सात पहाड़ों के बीच स्थित है।
इन सात पहाड़ों पर निशान साहिब झूलते हैं।
उतराखंड में ही 36साल मे नागपुष्प का फूल खिलता तथा देखने को मिलता हैं।
यह पुष्प की सबसे बड़ी खासियत यह है यह 36 वर्ष में एक बार उगता है इसलिए इसे देखने काफी दुर्लभ है।।
गुलदाउदी का पत्थर(Chrysanthemum stone flower) एक ऐसा पत्थर है जिसको पत्थर का फूल कहा जाता है| ये पत्थर लाखों सालों में भूगोलीय बदलावों और प्राकृतिक परिवर्तनों के कारण से फूल जैसा(खासकर गुलदाउदी के फूल) जैसा आकर ले लेते हैं| यह पत्थर ज्यादातर गहरा भूरे या काले रंग का होता है | वैसे तो ये पत्थर आम तत्त्वों से बना होता है परंतु प्रकर्ति द्वारा लाखों वर्ष तराशने के कारण इसकी जो बनावट बन जाती है इस कारण इसके दाम किसी भी जवाहरात से कम नहीं होते और इसकी कीमत लाखों में होती है|
इस पत्थर की उत्पत्ति के पीछे एक प्राचीन कथा भी जुड़ी हुई है | कहते है बहुत पहले एक प्रेमी जोड़ा जो कि स्वर्ग में रहते थे उन्होंने अपनी प्रेम की निशानी के तौर पर गुलदाउदी के फूल को जगह जगह बिखेर दिया ये फूल लिउयांग नदी जो कि चीन में है गिरे और आज वही फूल पत्थर बन गए है और एक प्रेम की निशानी के तौर पर धरती पर है
एक औऱ कहानी ये भी है कि दो प्रेम करने वाले जोड़ा था उनमे से एक पत्थर बन गया और दूसरा गुलदाउदी का फूल पर वो दोनों एक दूसरे से इतना प्रेम करते थे कि आज वो एक होकर हमे गुलदाउदी पत्थर के रूप में मिलते है|
इन पत्थरों का इतिहास बेहद पुराना है पहली बार इनको लिउयांग नदी चीन में खोजा गया लगभग 1740 के आसपास ये मुख्यतः Al2SiO5 से बने होते है
आज इसको एक कला के रूप में भी विकसित कर लिया गया है और पत्थरों पर बेहद आकर्षक फूल भी इसी तर्ज पर बन रहे है।
मौलश्री, जो भारतीय medlar भी कहलाता है, भारतीय उपमहाद्वीप की देन है।
मौलश्री एक पवित्रतम वृक्ष माना जाता है, उसे संस्कृत साहित्य और भारतीय महाकाव्य रामायण में वकुल के नाम से वर्णित किया गया है। इसका वनस्पति शास्त्रीय नाम है mimusops elengi ( भारतीय medlar, बकुल या मौलश्री)
ये एक सदाबहार पेड़ है जिसमें मीठी खुशबूवाले फूल खिलते हैं। यह अक्सर बागों में लगाया जाता है। मौलश्री के विभिन्न प्रकार से उपयोगी होने के साथ-साथ इसका खासा सांस्कृतिक महत्व भी है।
मौलश्री: कुछ तथ्य
इसका सामान्य नाम spanish cherry है। यह भारतीय उपमहाद्वीप का छोटा सा प्यारा हरा भरा पेड़ है। अपनी छोटी, चमकीली, मोटी, बारीक,नोकदार पत्तियों, तने और फैली हुई शाखाओं में छोटे-छोटे फूलों से भर महकता है और घनी छाया भी देता है।मौलश्री के फूल छोटे, तारे की तरह की आकृति, पीले सफेद रंग के होते हैं। बीच में से एक मुकुट की तरह पंक्तियां निकलती है। अंडाकार पत्तियां, किनारों पर सिलवटें,5-16 सेंटीमीटर और 3-7 सेंटीमीटर चौड़ी।
सुबह के समय खुशबूदार फूल, जो शाम से सारे माहौल को अपनी महक से सराबोर कर देते हैं, जमीन पर गिर जाते हैं। लोग इन गिरे हुए फूलों को इकट्ठा कर माला बना घरों में लटका कर कई दिन तक इनकी खुशबू को बनाये रखते हैं। इनकी खूबी है कि ये सूखने के बाद भी सुगन्धित रहते हैं ।
मौलश्री के फूल मंदिरों और धार्मिक स्थलों में अर्पित किए जाते हैं। भारतीय पौराणिक कहानियों में इसे बकुल नाम से संबोधित किया जाता है। इसके फल ताजे खाए जाते हैं।
औषधियों में प्रयोग —
यह मुंह की सफाई के लिए और उसके इलाज के लिए इस्तेमाल होता है।
मौलश्री के विभिन्न हिस्सों ,फल- फूल, तने की छाल आदि में औषधीय गुण होते हैं । जैसे -
1.प्रोटोजोआ को नष्ट करते हैं, उनकी वृद्धि को रोकते हैं और बार-बार पैदा होने की संभावना को खत्म करते हैं।
2.रोगाणुओं के विरुद्ध काम करते हैं।
3. विषाणु के विरुद्ध सुरक्षा देते हैं।
4. घाव बनने से रोकते हैं।
5. पेट के परजीवी कीड़ों को नष्ट करते हैं।
6 .बुखार कम करने का गुण होता है।
7 . शरीर कीसूजन कम करते हैं
8.रक्त में लिपिड्स को जमा होने से रोकते हैं।
9.रक्त में ज्यादा चीनी की मात्रा को जमा होने से रोकते हैं।
10. हृदय की गति को सामान्य रखते हैं ।
11. दर्द निवारक होते हैं।
मोगरे के फूल गर्मियों में खिलने वाले सफेद रंग का फूल हैं। इसकी भीनी-भीनी महक से तन और मन को ठंडक का अहसास होता है।
जैसे-जैसे गर्मी बढ़ती है, इसकी सुगंध आपको गर्मी के अहसास से दूर रखती है। मोगरा कोढ़, मुंह और आंख के रोगों में लाभ देता है।
केसर के फूलों को संस्कृत में अग्निशाखा कहते है। फूलों का रंग बैंगनी, नीला एवं सफेद होता है,ये फूल कीपनुमा आकार के होते हैं। इनके भीतर लाल या नारंगी रंग के तीन मादा भाग पाए जाते हैं। इस मादा भाग को वर्तिका (तन्तु) एवं वर्तिकाग्र कहते हैं। यही केसर कहलाता है। प्रत्येक फूल में केवल तीन केसर ही पाए जाते हैं। लाल-नारंगी रंग के आग की तरह दमकते हुए केसर को संस्कृत में 'अग्निशाखा' नाम से भी जाना जाता है।
यदि आप चाहते हैं कि वह आपको नफरत करे, तो आप उसे यह दीजिये ।
लाश का फूल (कॉर्प्स फ्लावर)। जब यह फूलता है, तो यह एक अत्यंत तीखी गंध निकालता है, जिसे अक्सर मृत शरीर की तरह महक के रूप में कहा जा सकता है।
दो मुख्य कारण हैं:
एक: वे केवल दुर्लभ अवसरों पर खिलते हैं, इन्हें परागणकों को आकर्षित करने की आवश्यकता होती है।
दो: जो कीड़े उन्हें (गोबर भृंग और मांस की मक्खियां ) परागण करते हैं, वे शवों पर भोजन करते हैं। सड़ते हुए शरीर की गंध उनमें विकसित एक डिजाइन है। (स्रोत: Live Science. Corpse Flower: About the Smelly Plant. Bradford, Alina)
और एक काफी शानदार विकास के रूप में, लाश का फूल खुद को 98.6 डिग्री फ़ारेनहाइट तक गर्म कर सकता है, जो मनुष्य और अन्य जानवरों के शरीर के तापमान के बराबर है। ताकि उनके वो उक्त कीड़े आकर्षित हो सकें।
लेकिन वास्तव में , सभी लोगों से मैंने सुना है - वे पूरी तरह से बेहद बदबूदर होती है। मैं इन्हें एक पीड़ादायक पूर्वप्रेमी के लिए भेजना चाहूंगा , बजाय इसके जिससि कि आप वास्तव में अच्छे सम्बन्ध रखना चाहते हैं।
भगवान शंकर का वाहन नंदी यानी बैल है। बैल बहुत ही मेहनती जीव होता है। वह शक्तिशाली होने के बावजूद शांत एवं भोला होता है। वैसे ही भगवान शिव भी परमयोगी एवं शक्तिशाली होते हुए भी परम शांत एवं इतने भोले हैं कि उनका एक नाम ही भोलेनाथ जगत में प्रसिद्ध है। भगवान शंकर ने जिस तरह काम को भस्म कर उस पर विजय प्राप्त की थी, उसी तरह उनका वाहन भी कामी नही होता। उसका काम पर पूरा नियंत्रण होता है।साथ ही नंदी पुरुषार्थ का भी प्रतीक माना गया है। कड़ी मेहनत करने के बाद भी बैल कभी थकता नहीं है। वह लगातार अपने कर्म करते रहता है। इसका अर्थ है हमें भी सदैव अपना कर्म करते रहना चाहिए। कर्म करते रहने के कारण जिस तरह नंदी शिव को प्रिय है, उसी प्रकार हम भी भगवान शंकर की कृपा पा सकते हैं।..
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केतकी का फूल भगवान शिव को क्यों नहीं अर्पण किया जाता, इसके लिए शिवपुराण में एक कथा है, जो इस प्रकार है।
शिवपुराण के अनुसार एक बार ब्रह्माजी और भगवान विष्णु में विवाद हो गया कि दोनों में कौन अधिक बड़े हैं। विवाद का फैसला करने के लिए भगवान शिव को न्यायकर्ता बनाया गया।
भगवान शिव की माया से एक ज्योतिर्लिंग प्रकट हुआ। भगवान शिव ने कहा कि ब्रह्मा और विष्णु में से जो भी ज्योतिर्लिंग का आदि-अंत बता देगा, वह बड़ा कहलाएगा।
ब्रह्माजी ज्योतिर्लिंग को पकड़कर आदि पता करने नीचे की ओर चल पड़े और विष्णु भगवान ज्योतिर्लिंग का अंत पता करने ऊपर की ओर चल पड़े।
जब काफी चलने के बाद भी ज्योतिर्लिंग का आदि-अंत पता नहीं चल सका तो ब्रह्माजी ने देखा कि एक केतकी फूल भी उनके साथ नीचे आ रहा है। ब्रह्माजी ने केतकी के फूल को बहला-फुसलाकर झूठ बोलने के लिए तैयार कर लिया और भगवान शिव के पास पहुंच गए।
ब्रह्माजी ने कहा कि मुझे ज्योतिर्लिंग कहां से उत्पन्न हुआ, यह पता चल गया है। लेकिन भगवान विष्णु ने कहा कि नहीं, मैं ज्योतिर्लिंग का अंत नहीं जान पाया हूं। ब्रह्माजी ने अपनी बात को सच साबित करने के लिए केतकी के फूल से गवाही दिलवाई, लेकिन भगवान शिव ब्रह्माजी के झूठ को जान गए और ब्रह्माजी का एक सिर काट दिया। इसलिए ब्रह्माजी पंचमुख से चार मुख वाले हो गए।
केतकी के फूल ने झूठ बोला था इसलिए भगवान शिव ने इसे अपनी पूजा से वर्जित कर दिया है।
केतकी पुष्प के अलावा कुछ ऐसी सामग्रियां भी जिनका उपयोग शिव आराधना के दौरान बिल्कुल नहीं करना चाहिए। शिवपुराण के अनुसार भगवान शिव को तुलसी, हल्दी सिंदूर आदि नही चढ़ाना चाहिए।
तुलसी की पत्ती... यूं तो तुलसी की पत्तियां पूजा में काम आती है, लेकिन भगवान शिव की पूजा के लिए नहीं करना चाहिए। भगवान शिव ने तुलसी के पति असुर जालंधरका वध किया था। इसलिए उन्होंने स्वयं भगवान शिव को अपने अलौकिक और दैवीय गुणों वाले पत्तों से वंचित कर दिया।
नारियल का पानी... शिवलिंग पर नारियल अर्पित किया जाता है लेकिन इससे अभिषेक नहीं करना चाहिए। देवताओं को चढ़ाया जाने वाले प्रसाद ग्रहण करना आवश्यक होता है। लेकिन शिवलिंग का अभिषेक जिन पदार्थों से होता है उन्हें ग्रहण नहीं किया जाता। इसलिए शिव पर नारियल का जल नहीं चढ़ाना चाहिए।
हल्दी... शिवजी के अतिरिक्त लगभग सभी देवी-देवताओं को पूजन में हल्दी गंध और औषधि के रूप में प्रयोग की जाती है। शास्त्रों के अनुसार शिवलिंग पुरुष तत्व का प्रतीक है और हल्दी स्त्रियोचित वस्तु है। स्त्रियोचित यानी स्त्रियों संबंधित। इसी वजह से शिवलिंग पर हल्दी नहीं चढ़ाई जाती है।
शंख से जल... दैत्य शंखचूड़ के अत्याचारों से देवता परेशान थे। भगवान शंकर ने त्रिशुल से उसका वध किया था, जिसके बाद उसका शरीर भस्म हो गया,उस भस्म से शंख की उत्पत्ति हुई थी। शिवजी ने शंखचूड़ का वध किया इसलिए कभी भी शंख से शिवजी को जल अर्पित नहीं किया जाता है।
कुमकुम या सिंदूर... सिंदूर, विवाहित स्त्रियों का गहना माना गया है। स्त्रियां अपने पति की लंबे और स्वस्थ जीवन की कामना हेतु अपने मांग में सिंदूर लगाती हैं और भगवान को भी अर्पित करती हैं। लेकिन शिव तो विनाशक हैं, यही वजह है कि सिंदूर से भगवान शिव की सेवा करना अशुभ माना जाता है।
शाम तक था एक भँवरा फूल पर मंडरा रहा,
रात होने पर कमल की पंखड़ी में बंद था।
क़ैद से छूटा सुबह तो हमने पूछा क्या हुआ,
कुछ न बोला अपनी धुन में बस यही गाता रहा ।।
इस गीत को सुनने के पहले कभी सोचा ही नहीं था कि तितली , भँवरे और फूल में कभी कोई आत्मीयता का संवाद भी हो सकता है , मगर यह संवाद हमारे अपने जीवन के कई पहलुओं को भी उजागर करता है। प्यार, तकरार , शिकायत और अंत में प्यार का खो जाना ।
पहले पहल तो सब कुछ अच्छा लगता है , एक दूसरे की तारीफ और बस तारीफ
नीली, पीली औ’ चटकीली
पंखों की प्रिय पँखड़ियाँ खोल,
प्रिय तिली! फूल-सी ही फूली
तुम किस सुख में हो रही डोल?
चाँदी-सा फैला है प्रकाश,
चंचल अंचल-सा मलयानिल,
है दमक रही दोपहरी में
गिरि-घाटी सौ रंगों में खिल!
तुम मधु की कुसुमित अप्सरि-सी
उड़-उड़ फूलों को बरसाती,
शत इन्द्र चाप रच-रच प्रतिपल
किस मधुर गीति-लय में जाती?
तुमने यह कुसुम-विहग लिवास
क्या अपने सुख से स्वयं बुना?
छाया-प्रकाश से या जग के
रेशमी परों का रंग चुना?
कितने सुन्दर पंख तुम्हारे ।
आँखों को लगते हैं प्यारे ।। (तितली / सुमित्रानंदन पंत)
फिर थोड़ी हिदायत ,
जब आती बरसात सुहानी ।
पुरवा चलती है मस्तानी ।।
तब तुम अपनी चाल दिखाती ।
लहरा कर उड़ती बलखाती ।।
पर जल्दी ही थक जाती हो ।
दीवारों पर सुस्ताती हो ।।
बच्चों के मन को भाती हो ।
इसीलिए पकड़ी जाती हो ।। (रंग-बिरंगी तितली आई / रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
फिर शिकायत
हुस्न-ए-आवारा का ऐ हमदम भला क्या ए'तिबार
आज भटनागर के बस में है तो कल मित्तल के पास
और अंत में यह सत्य कि ज्यादातर लोग सिर्फ अच्छे दिनों के साथी होते है।
जो आई बहार , तो गाते हो राग बहार का ,
ख़िज़ाँ जो आएगी तो जाकर बस जाओगे कही और ।
आज बहुत समय बाद एक अच्छा सवाल आया है बताना चाहूंगा कि यदि सामाजिक दृष्टि से देखा जाए तो स्त्री ही पुरुषों का एक मात्र गहना है एक उम्र के बाद यदि उसके साथ कोई स्त्री नही है तो वो समाज मे एक अलग दृष्टि से देखा जाता है साथ ही यदि शादी की उम्र से पहले कोई स्त्री का साथ नही है तो वो मानसिक तौर पर तो अपने आप को हीन समझेगा ही साथ ही अपने मित्र मंडली में भी उसको अच्छी दृष्टि से नही देखा जाता।ये तो रही समाजिक दशा।तो स्त्री ही पुरुषों का गहना या श्रृंगार है।
जहां तक और दूसरे पहलू से देखे तो पुरुषों का श्रृंगार उनका काम काज या रोजगार ही उनका गहना होता है।
उम्मीद है आप और साथ मे अन्य पाठक भी मेरे जवाब से संतुष्ट होंगें ।धन्यवाद
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