शिव पुराण कथा चरित्र 02 | चञ्चुला और बिंदुग की संपूर्ण कथा
शिव पुराण कथा चरित्र 02 | चञ्चुला और बिंदुग की संपूर्ण कथा
शौनकजीने कहा
महाभाग सूतजी | आप सर्वज्ञ हैं। महामते ! आपके कृपाप्रसादसे में बारंबार कृतार्थ हुआ। इस इतिहासको सुनकर मेरा मन अत्यन्त आनन्दित हो रहा है। अतः अब भगवान् शिवमें प्रेम बढ़ानेवाली भगवान् शिव से सम्बन्धिनी दूसरी कथाको भी कहिये ।
श्रीसूतजी बोले
शौनक जी ! सुनो, मैं तुम्हारे सामने गोपनीय कथावस्तुका वर्णन करू रहा हूं ; क्योंकि तुम शिव भक्तोंमें अप्रगण्य तथा वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ हो ।
समुद्रके निकटवर्ती प्रदेशमें एक वाष्कल नामक ग्राम है, जहाँ वैदिक धर्मसे विमुख महापापी द्विज अर्थात ब्राह्मण निवास करते हैं। वे सब-के सब बड़े दुष्ट हैं, उनका मन हमेशा दूषित विषय भोगोंमें ही लगा रहता है। वे न देवताओंपर विश्वास करते हैं न भाग्यपर; वे सभी कुटिल वृत्तिवाले हैं। वे किसानी करते हैं और भाँति भाँतिके घातक अस्त्र-शस्त्र रखते हैं। वे व्यभिचारी और खल भी हैं।
वे इस बातको वे बिलकुल नहीं जानते कि ज्ञान, वैराग्य तथा सद् धर्मका सेवन ही मनुष्यके लिये परम पुरुषार्थ है। इस प्रकार वे सभी पशुबुद्धिवाले हैं।
(जहाँके द्विज अर्थात ब्राह्मण ऐसे हों, वहाँके अन्य वर्णोंके विषयमें क्या कहा जाय।)
अन्य वर्णोंक लोग भी उन्हींकी भाँति कुत्सित विचार रखनेवाले, स्वधर्मविमुख एवं खल हैं; वे सदा कुकर्ममें लगे रहते और नित्य विषयभोगोंमें ही डूबे रहते हैं । इसी प्रकार वहाँकी सब स्त्रियाँ भी कुटिल स्वभावकी, स्वेच्छाचारिणी, पाप आसक्त, कुत्सित विचारवाली और व्यभिचारिणी हैं। वे सद्व्यवहार तथा सदाचारसे सर्वथा शून्य हैं। इस प्रकार वाष्कल में दुष्टोंका ही निवास है।
उस वाष्कल नामक ग्राममें किसी समय एक बिन्दुग नामधारी ब्राह्मण रहता था, बिंदु ब्राह्मण होते हुए भी ब्राह्मण खंड कर्मकांड से सर्वथा विमुक्त था। अन्य की तरह ही वह बड़ा अधम, दुरात्मा और महापापी था। यद्यपि उसकी स्त्री बड़ी सुन्दरी थी, तो भी वह कुमार्गपर ही चलता था।
उसकी पत्नीका नाम चञ्चुला था; वह बहुत ही सुंदर थी तथा सदा उत्तम धर्मके पालनमें लगी रहती थी, तो भी उसे छोड़कर यह दुष्ट ब्राह्मण वेश्यागामी हो गया। इस तरह कुकर्ममे लगे हुए उस बिन्दुगके बहुत वर्ष व्यतीत हो गये।
सदा उत्तम धर्मके पालनमें लगी रहने वाली उसकी स्त्री चञ्चुला कामसे पीड़ित होनेपर भी स्वधर्मनाशके भयसे क्लेश सहकर भी दीर्घकालतक धर्मसे भ्रष्ट नहीं हुई। कहते हैं संगत का असर पड़ता है। इसी कारण दुराचारी पतिके आचरणसे प्रभावित हो कुछ समय बाद वह चञ्चुला भी दुराचारिणी हो गयी।
इस तरह दुराचारमें डूबे हुए उन मूढ चित्तवाले पति-पत्नीका बहुत-सा समय व्यर्थ में ही व्यतीत हो गया। तदनन्तर शूद्रजातीय वेश्याका पति बना हुआ वह दूषित बुद्धिवाला दुष्ट ब्राह्मण बिन्दुग समयानुसार मृत्युको प्राप्त हुआ । करम गति बहुत ही सूक्ष्म है जिसे जान पाना सामान्य मनुष्य की बात नहीं है। तो बिंदु का तो वैसे ही अज्ञानी ब्राह्मण था। मृत्यु उपरांत उसे नरकमें जाना पड़ा। धरा पर पिशाचों की तरह काम करने वाला वह मूढ बुद्धि पापी बिंदुग बहुत दिनोंतक नरकके दुःख भोगकर विन्ध्यपर्वतपर भयंकर पिशाच हुआ।
इधर, उस दुराचारी पति बिन्दुगके मर जानेपर वह मूढ़ हृदया चञ्चुला बहुत समयतक पुत्रोंके साथ अपने घरमें ही रही।
दैवयोगसे किसी पुण्य पर्वके आने पर एक दिन यह स्त्री भाई-बन्धुओंके साथ गोकर्ण नामक तीर्थ क्षेत्र में गयी। तीर्थयात्रियों के संगत से उसने भी उस समय जाकर तीर्थके जलमें स्नान किया। मेला देखनेकी दृष्टिसे वह बन्धुजनोंके साथ यत्र-तत्र घूमने लगी। घूमती घामती किसी देवमन्दिरमें गयी और वहाँ उसने एक दैवज्ञ ब्राह्मणके मुखसे भगवान् शिवकी परम पवित्र एवं मङ्गलकारिणी उत्तम पौराणिक कथा सुनी। उसमें स्वर्ग और नरक संबंधी विषय पर चर्चा चल रही थी।
कथावाचक ब्राह्मण कह रहे थे कि 'जो स्त्रियां परपुरुषोंके साथ व्यभिचार करती हैं, वे मरनेके बाद जब यमलोकमें जाती हैं, तब यमराजके दूत उनकी योनिमें तपे हुए लोहेका परिघ डालते हैं।'
पौराणिक ब्राह्मणके मुखसे यह वैराग्य बढ़ानेवाली कथा सुनकर चञ्चुला भयसे व्याकुल हो वहाँ काँपने लगी। जब कथा समाप्त हुई और सुननेवाले सब लोग वहाँसे बाहर चले गये, तब वह भयभीत नारी एकान्तमें शिवपुराणकी कथा बाँचनेवाले उन ब्राह्मण देवतासे बोली।
चञ्चुलाने कहा
ब्रह्मन् ! मैं अपने धर्मको नहीं जानती थी। इसलिये मेरे द्वारा बड़ा दुराचार हुआ है। स्वामिन् ! मेरे ऊपर अनुपम कृपा करके आप मेरा उद्धार कीजिये। आज आपके वैराग्य- रससे ओतप्रोत इस प्रवचनको सुनकर मुझे बड़ा भय लग रहा है। मैं काँप उठी हूँ और मुझे इस संसारसे वैराग्य हो गया है। मुझ मूढ़ चित्तवाली पापिनीको धिक्कार है। मैं सर्वथा निन्दाके योग्य हूँ। कुत्सित विषयोंमें फँसी हुई हूँ और अपने धर्मसे विमुख हो गयी हूँ। हाय ! न जाने किस-किस घोर कष्टदायक दुर्गतिमें मुझे पड़ना पड़ेगा और वहाँ कौन बुद्धिमान् पुरुष कुमार्गमें मन लगानेवाली मुझ पापिनीका साथ देगा। मृत्युकालमें उन भयंकर यमदूतोंको मैं कैसे देखूँगी ? जब वे बलपूर्वक मेरे गलेमें फंदे डालकर मुझे बाँधंगे, तब मैं कैसे धीरज धारण कर सकूँगी। नरकमें जब मेरे शरीरके टुकड़े टुकड़े किये जायेंगे, उस समय विशेष दुःख देनेवाली उस महायातनाको मैं वहाँ कैसे सहूँगी ? हाय! मैं मारी गयी। मैं जल रही हूँ ! मेरा हृदय विदीर्ण हो रहा है और मैं सब प्रकारसे नष्ट हो गयी हूँ; क्योंकि में हर तरहसे पापमें ही डूबी हुई हूँ। ब्रह्मन ! आप ही मेरे गुरु, आप ही माता और आप ही पिता हैं। मैं आपकी शरण में आयी हुई हूँ, मुझ दीन अबलाका आप ही उद्धार कीजिये, उद्धार कीजिये ।
सूतजी कहते हैं-
शौनक ! इस प्रकार स्वेद और वैराग्यसे युक्त हुई चञ्चुला ब्राह्मण देवताके चरणोंमें गिर पड़ी। तब उन बुद्धिमान् ब्राह्मणने कृपापूर्वक उसे उठाया और इस प्रकार कहा।
ब्राह्मण बोले
हे पुत्री ! यह नारी सौभाग्यकी बात है कि भगवान् शंकरकी कृपा से शिवपुराणकी इस वैराग्ययुक्त कथाको सुनकर तुम्हें समयपर चेत हो गया है।
ब्राह्मणपत्नी तुम डरो मत। भगवान् शिवकी शरण में जाओ। शिवकी कृपासे सारा पाप तत्काल नष्ट हो जाता है। मैं तुमसे भगवान् शिवकी कीर्तिकथासे युक्त उस परम वस्तुका वर्णन करूंगा, जिससे तुम्हें सदा सुख देनेवाली उत्तम गति प्राप्त होगी। शिवकी उत्तम कथा सुननेसे ही तुम्हारी बुद्धि इस तरह पश्चात्तापसे युक्त एवं शुद्ध हो गयी है। साथ ही तुम्हारे मनमें विषयोंके प्रति वैराग्य हो गया है। पश्चात्ताप ही पाप करनेवाले पापियोंके लिये सबसे बड़ा प्रायश्चित है।
सत्पुरुषोंने सबके लिये पश्चातापको ही समस्त पापोंका शोधक बताया है, पश्चात्तापसे ही पापोंकी शुद्धि होती है। जो पश्चात्ताप करता है, वही वास्तव में पापोंका प्रायश्चित करता है; क्योंकि सत्पुरुषोंने समस्त पापोंकी शुद्धिके लिये जैसे प्रायश्चितका उपदेश किया है, वह सब पश्चात्तापसे सम्पन्न हो जाता है।
जो पुरुष विधिपूर्वक प्रायश्चित करके निर्भय हो जाता है, पर अपने कुकर्मके लिये पश्चात्ताप नहीं करता, उसे प्रायः उत्तम गति प्राप्त नहीं होती परंतु जिसे अपने कुकृत्यपर हार्दिक पश्चाताप होता है, वह अवश्य उत्तम गतिका भागी होता है, इसमें संशय नहीं।
इस शिवपुराणकी कथा सुननेसे जैसी चित्तशुद्धि होती है, वैसी दूसरे उपायोंसे नहीं होती। जैसे दर्पण साफ करनेपर निर्मल हो जाता है, उसी प्रकार इस शिवपुराणकी कथासे चित अत्यन्त शुद्ध हो जाता है-इसमें संशय नहीं है।
मनुष्योंके शुद्धचित्तमें जगदम्बा पार्वती सहित भगवान् शिव विराजमान रहते हैं। इससे वह विशुद्धात्मा पुरुष श्रीसाम्ब सदाशिव के पदको प्राप्त कर लेता है।
शिवपुराण रूपी उत्तम कथाका श्रवण समस्त मनुष्योंके लिये कल्याणका बीज है। अतः यथोचित इसकी शास्त्रोक्त तरीके से पूजा या इसकी सेवा की जानी चाहिए। यह भव बंधन रूपी रोग का नाश करने वाला है।
भगवान शिव की कथा सुनने के बाद मन ही मन उस पर मनन करना चाहिए। इससे मन की पूर्ण शुद्धि होती है। मन के शुद्ध होने से महेश्वर की भक्ति निश्चित रूप से अपने दो पुत्रों (ज्ञान और त्याग) के साथ प्रकट होती है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि महेश्वर की कृपा से दिव्य मुक्ति प्राप्त होती है। जो मुक्ति से वंचित है उसे पशु समझना चाहिए; क्योंकि उसका मन माया के बन्धन में लगा हुआ है। निश्चय ही वह संसार के बंधन से मुक्त नहीं हो सकता।
इसलिए आपको अपने मन को विषयों से हटा देना चाहिए और भगवान शिव की इस परम पवित्र कथा को भक्ति के साथ सुनना चाहिए। भगवान शिव की इस कथा को सुनने से आपका मन शुद्ध हो जाएगा और आपको मोक्ष की प्राप्ति होगी। जो शुद्ध मन से भगवान शिव के चरणकमलों का ध्यान करता है, उसे एक जन्म में ही मुक्ति मिल जाती है।
सूतजी कहते हैं
शौनक जी ! इतना कहकर वे श्रेष्ठ शिवभक्त ब्राह्मण चुप हो गये। उनका हृदय करुणासे आद्र हो गया था। वे शुद्धचित्त महात्मा भगवान् शिवके ध्यानमें मग्न हो गये।
तदनन्तर बिन्दुगकी पत्नी चञ्चुला मन-ही-मन प्रसन्न हो उठी। ब्राह्मणका उक्त उपदेश सुनकर उसके नेत्रोमें आनन्दके आँसू छलक आये।
वह ब्राह्मणपत्नी चञ्चुला हर्षभरे हृदयसे उन श्रेष्ठ ब्राह्मणके दोनों चरणोंमें गिर पड़ी और हाथ जोड़कर बोली, 'मैं कृतार्थ हो गयी।"
तत्पश्चात उठकर वैराग्ययुक्त उत्तम बुद्धिवाली वह स्त्री, जो अपने पापोंके कारण आतङ्कित थी, उन महान् शिव-भक्त ब्राह्मणसे हाथ जोड़कर गदगद वाणीमें बोली।
चञ्चलाने कहा
ब्रह्मन् ! शिवभक्तोंमें श्रेष्ठ स्वामिन् ! आप धन्य है, परमार्थदर्शी है और सदा परोपकारमें लगे रहते हैं। इसलिये आप श्रेष्ठ साधु पुरुषों में प्रशंसा के योग्य है। साधो । मैं नरकके समुद्रमें गिर रही हूँ। आप मेरा उद्धार कीजिये, उद्धार कीजिये।
हे ब्रह्मन् ! पौराणिक अर्थतत्व से सम्पन्न जिस सुन्दर शिवपुराणकी कथाको सुनकर मेरे मनमें सम्पूर्ण विषयोंसे वैराग्य उत्पन्न हो गया, उसी इस शिवपुराणको सुननेके लिये इस समय मेरे मनमें बड़ी श्रद्धा हो रही है।
सूतजी कहते हैं
ऐसा कहकर हाथ जोड़ उनका अनुग्रह पाकर चञ्चुला उस शिवपुराणकी कथाको सुननेकी इच्छा मनमें लिये उन ब्राह्मणदेवताकी सेवामें तत्पर हो वहाँ रहने लगी।
तदनन्तर शिवभक्तोंमें श्रेष्ठ और शुद्ध बुद्धिवाले उन ब्राह्मणदेवने उसी स्थानपर उस स्त्रीको शिवपुराणकी उत्तम कथा सुनायी। इस प्रकार चञ्चुला ने उस गोकर्ण नामक महाक्षेत्रमें उन्हीं श्रेष्ठ ब्राह्मण के श्री मुख से शिवपुराणकी यह परम उत्तम कथा सुनी, जो भक्ति, ज्ञान और वैराग्यको बढ़ानेवाली तथा मुक्ति देनेवाली है।
उस परम उत्तम कथाको सुनकर वह ब्राह्मण पत्नी अत्यन्त कृतार्थ हो गयी। उसका चित्त शीघ्र ही शुद्ध हो गया। फिर भगवान् शिवके अनुग्रहसे उसके हृदयमें शिवके सगुणरूपका चिन्तन होने लगा। इस प्रकार उसने भगवान् शिवमें लगी रहनेवाली उत्तम बुद्धि पाकर शिवके सच्चिदानन्दमय स्वरूपका बारंबार चिन्तन आरम्भ किया। तत्पश्चात् समयके पूरे होनेपर भक्ति, ज्ञान और वैराग्यसे युक्त हुई चञ्चलाने अपने शरीरको बिना किसी कष्टके त्याग दिया।
इतनेमें ही त्रिपुरशत्रु भगवान् शिवका भेजा हुआ एक दिव्य विमान द्रुत गतिसे वहाँ पहुँचा, जो उनके अपने गणोंसे संयुक्त और भाँति भांतिके शोधा-साधनोंसे सम्पन्न था। चञ्चुला उस विमानपर आरूढ़ हुई और भगवान् शिवके श्रेष्ठ पार्षदोंने उसे तत्काल शिवलोक में पहुँचा दिया। उसके सारे मल धुल गये थे। वह दिव्यरूपधारिणी दिव्याङ्गना हो गयी । उसके दिव्य अवयव उसकी शोभा बढ़ाते थे।
मस्तकपर अर्धचन्द्राकार मुकुट धारण किये वहां गौराङ्गी देवी शोभाशाली दिव्य आभूषणोंसे विभूषित थी। शिवपुरीमें पहुंचकर उसने सनातन देवता त्रिनेत्रधारी महादेवजीको देखा। सभी मुख्य-मुख्य देवता उनकी सेवा में खड़े थे। गणेश, भृङ्गी, नन्दीश्वर तथा वीरभद्रेश्वर आदि उनकी सेवामें उत्तम भक्तिभावसे उपस्थित थे। उनकी अंगकान्ति करोड़ों सूर्योॉके समान प्रकाशित हो रही थी। कण्ठमें नील चिह्न शोभा पाता था। पाँच मुख और प्रत्येक मुखमें तीन-तीन नेत्र थे। मस्तकपर अर्द्धचन्द्राकार मुकुट शोभा देता था। उन्होंने अपने वामाङ्ग भागमें गौरी देवीको बिठा रखा था, जो विद्युत्-पुञ्जके समान प्रकाशित थीं।
गौरीपति महादेवजीकी कान्ति कपूरके समान गौर थी। उनका सारा शरीर श्वेत भस्मसे भासित हो रहा था। शरीरपर श्वेत वस्त्र शोभा पा रहे थे। इस प्रकार परम उज्ज्वल भगवान् शंकरका दर्शन करके वह ब्राह्मण पत्नी चञ्चला बहुत प्रसन्न हुई।
अत्यन्त प्रीतियुक्त होकर उसने बड़ी उतावलीके साथ भगवान्को बारंबार प्रणाम किया। फिर हाथ जोड़कर वह बड़े प्रेम, आनन्द और संतोषसे युक्त हो विनीतभावसे खड़ी हो गयी। उसके नेत्रोंसे आनन्दाश्रुओं की अविरल धारा बहने लगी तथा सम्पूर्ण शरीरमें रोमाञ्च हो गया।
उस समय भगवती पार्वती और भगवान् शंकरने उसे बड़ी करुणाके साथ अपने पास बुलाया और सौम्य दृष्टिसे उसकी ओर देखा। पार्वतीजीने तो दिव्यरूपधारिणी बिन्दुगप्रिया चञ्चुलाको प्रेमपूर्वक अपनी सखी बना लिया। वह उस परमानन्दवन ज्योतिःस्वरूप सनातन धाममें अविचल निवास पाकर दिव्य सौख्यसे सम्पन्न हो अक्षय सुखका अनुभव करने लगी।
(तुम्बुरुजी का विन्ध्यपर्वतपर शिवपुराणकी कथा सुनाकर बिन्दुगका पिशाचयोनिसे उद्धार )
सूतजी बोले
शौनक ! एक दिन परमानन्दमें निमग्न हुई चञ्चुलाने उमादेवीके पास जाकर प्रणाम किया और दोनों हाथ जोड़कर वह उनकी स्तुति करने लगी।
चञ्चुला बोली
गिरिराजनन्दिनी ! स्कन्दमाता उमे ! मनुष्योंने सदा आपका सेवन किया है। समस्त सुखोंको देनेवाली शम्भुप्रिये ! आप ब्रह्मस्वरूपिणी हैं। विष्णु और ब्रह्मा आदि देवताओंद्वारा सेव्य हैं। आप ही सगुणा और निर्गुणा हैं तथा आप ही सूक्ष्मा सच्चिदानन्द-स्वरूपिणी आद्या प्रकृति हैं। आप ही संसारकी सृष्टि, पालन और संहार करनेवाली हैं। तीनों गुणोंका आश्रय भी आप ही हैं। ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर- इन तीनों देवताओंका आवास स्थान तथा उनकी उत्तम प्रतिष्ठा करनेवाली पराशक्ति आप ही हैं।
सूतजी कहते हैं
शौनक ! जिसे सदगति प्राप्त हो चुकी थी, वह चञ्चुला इस प्रकार महेश्वरपत्नी उमाकी स्तुति करके सिर झुकाये चुप हो गयी। उसके नेत्रोंमें प्रेमके आँसू उमड़ आये थे। तब करुणासे भरी हुई शंकरप्रिया भक्त-वत्सला पार्वतीदेवीने चञ्चुलाको सम्बोधित करके बड़े प्रेमसे इस प्रकार कहा
पार्वती बोलीं
सखी चञ्चुले ! सुन्दरि ! मैं तुम्हारी की हुई इस स्तुतिसे बहुत प्रसन्न हूँ। बोलो, क्या वर माँगती हो ? तुम्हारे लिये मुझे कुछ भी अदेय नहीं है।
चञ्चुला बोली
निष्पाप गिरिराज कुमारी ! मेरे पति बिन्दुग इस समय कहाँ हैं, उनकी कैसी गति हुई है। यह मैं नहीं जानती ! कल्याणमयी दीनवत्सले ! मैं अपने उन पतिदेवसे जिस प्रकार संयुक्त हो सकूँ, वैसा ही उपाय कीजिये।
महेश्वरि ! महादेवि ! मेरे पति एक शूद्रजातीय वेश्याके प्रति आसक्त थे और पापमें ही डूबे रहते थे। उनकी मृत्यु मुझसे पहले ही हो गयी थी। न जाने वे किस गतिको प्राप्त हुए।
गिरिजा बोलीं
बेटी! तुम्हारा बिन्दुग नामवाला पति बड़ा पापी था। उसका अन्तःकरण बड़ा ही दूषित था। वेश्याका उपभोग करनेवाला वह महामूढ़ मरनेके बाद नरकमें पड़ा अगणित वर्षोंतक नरकमें नाना प्रकारके दुःख भोगकर वह पापात्मा अपने शेष पापको भोगनेके लिये विन्ध्यपर्वतपर पिशाच हुआ है। इस समय वह पिशाच अवस्थामें ही है और नाना प्रकारके क्लेश उठा रहा है। वह दुष्ट वहीं वायु पीकर रहता है और सदा सब प्रकारके कष्ट सहता है।
सूतजी कहते हैं
शौनक ! गौरी देवीकी यह बात सुनकर उत्तम व्रतका पालन करनेवाली चञ्चुला उस समय पतिके महान् दुःखसे दुःखी हो गयी। फिर मनको स्थिर करके उस ब्राह्मणपत्नी ने व्यथित हृदयसे महेश्वरीको प्रणाम करके पुनः पूछा।
चञ्चुला बोली
महेश्वरि ! महादेवि ! मुझपर कृपा कीजिये और दूषित कर्म करनेवाले मेरे उस दुष्ट पतिका अब उद्धार कर दीजिये।
देवि ! कुत्सित बुद्धिवाले मेरे उस पापात्मा पतिको किस उपायसे उत्तम गति प्राप्त हो सकती है, यह शीघ्र बताइये । आपको नमस्कार है।
पार्वतीने कहा
तुम्हारा पति यदि शिव पुराणकी पुण्यमयी उत्तम कथा सुने तो सारी दुर्गतिको पार करके वह उत्तम गतिका भागी हो सकता है।
अमृतके समान मधुर अक्षरोंसे युक्त गौरीदेवीका यह वचन आदरपूर्वक सुनकर चञ्चुलाने हाथ जोड़ मस्तक झुकाकर उन्हें बारंबार प्रणाम किया और अपने पतिके समस्त पापोंकी शुद्धि तथा उत्तम गतिकी प्राप्तिके लिये पार्वतीदेवीसे यह प्रार्थना की कि 'मेरे पतिको शिवपुराण सुनानेकी व्यवस्था होनी चाहिये उस ब्राह्मणपत्नी के बारंबार प्रार्थना करनेपर शिवप्रिया गौरीदेवीको बड़ी दया आयी।
उन भक्तवत्सला महेश्वरी गिरिराजकुमारीने भगवान् शिवकी उत्तम कीर्तिका गान करनेवाले गन्धर्वराज तुम्बुरुको बुलाकर उनसे प्रसन्नतापूर्वक इस प्रकार कहा, 'तुम्बुरो ! तुम्हारी भगवान् शिवमें प्रीति है। तुम मेरे मनकी बातोंको जानकर मेरे अभीष्ट कार्योंको सिद्ध करनेवाले हो। इसलिये मैं तुमसे एक बात कहती हूँ। तुम्हारा कल्याण हो। तुम मेरी इस सखीके साथ शीघ्र ही विन्ध्यपर्वतपर जाओ। वहाँ एक महाघोर और महा भयंकर पिशाच रहता है। उसका वृत्तान्त तुम आरम्भ से ही सुनो। मैं तुमसे प्रसन्नतापूर्वक सब कुछ बताती हूँ। पूर्व जन्ममें वह पिशाच बिन्दुग नामक ब्राह्मण था और मेरी इस सखी चञ्चुलाका पति था। परंतु वह दुष्ट वेश्यागामी हो गया।
वह स्नान-संध्या आदि नित्यकर्म छोड़कर अपवित्र रहने लगा। क्रोधके कारण उसकी बुद्धिपर मूढ़ता छा गयी थी इसलिए वह कर्तव्य-अकर्तव्यका विवेक नहीं कर पाता था। अभक्ष्य-भक्षण, सज्जनोंसे द्वेष और दूषित वस्तुओंका दान लेना, यही उसका स्वाभाविक कर्म बन गया था।
वह अस्त्र शस्त्र लेकर हिंसा करता, बायें हाथसे खाता, दीनोंको सताता और क्रूरतापूर्वक पराये घरोंमें आग लगा देता था। चाण्डालोंसे प्रेम करता और प्रतिदिन वेश्याके सम्पर्क में रहता था।
वह बड़ा दुष्ट था। वह पापी अपनी पत्नी का परित्याग करके दुष्टोंके सङ्गमें ही आनन्द मानता था। वह मृत्युपर्यन्त दुराचारमें ही फैसा रहा। फिर अन्तकाल आनेपर उसकी मृत्यु हो गयी। वह पापियोंके भोगस्थान घोर यमपुरमें गया और वहाँ बहुत से नरकोंका उपभोग करके वह दुष्टात्मा जीव इस समय विन्ध्यपर्वतपर पिशाच बना हुआ है। वहीं वह दुष्ट पिशाच अपने पापोंका फल भोग रहा है।
तुम उसके आगे यत्नपूर्वक शिवपुराणकी परम पुण्यमयी तथा समस्त पापोंका नाश करनेवाली दिव्य कथाका प्रवचन करो। शिवपुराणकी कथाका श्रवण सबसे उत्कृष्ट पुण्यकर्म है। उससे उसका हृदय शीघ्र ही समस्त पापोंसे शुद्ध हो जायगा और वह प्रेतयोनिका परित्याग कर देगा। उस दुर्गतिसे मुक्त होनेपर बिन्दुग नामक पिशाचको मेरी आज्ञासे विमानपर बिठाकर तुम भगवान् शिवके समीप ले आओ।'
सूतजी कहते है
शौनक ! महेश्वरी उमाके इस प्रकार आदेश देनेपर गन्धर्वराज तुम्बुरु मन-ही-मन बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने अपने भाग्यकी सराहना की। तत्पश्चात् उस पिशाचकी सती-साध्वी पत्नी चञ्चुलाके साथ विमानपर बैठकर नारदके प्रिय मित्र तुम्बुरु वेगपूर्वक विन्ध्याचल पर्वतपर गये, जहाँ वह पिशाच रहता था।
वहाँ उन्होंने उस पिशाचको देखा उसका शरीर विशाल था। ठोड़ी बहुत बड़ी थी। वह कभी हँसता, कभी रोता और कभी उछलता था। उसकी आकृति बड़ी विकराल थी। भगवान् शिवकी उत्तम कीर्तिका गान करनेवाले महाबली तुम्बुरुने उस अत्यन्त भयंकर पिशाचको पाशोंद्वारा बाँध लिया। तदनन्तर तुम्बुरुने शिवपुराण की कथा बाँचनेका निश्चय करके वहां महोत्सवयुक्त स्थान और मण्डप आदिकी रचना की।
इतनेमें ही सम्पूर्ण लोकोंमें बड़े वेग से यह प्रचार हो गया कि देवी पार्वतीकी आज्ञासे एक पिशाचका उद्धार करनेके उद्देश्यसे शिव पुराणकी उत्तम कथा सुनानेके लिये तुम्बुरुजी विन्ध्यपर्वतपर गये हैं। फिर तो उस कथाको सुननेके लोभसे बहुत-से देवर्षि भी शीघ्र ही वहाँ जा पहुँचे। आदरपूर्वक शिवपुराण सुननेके लिये आये हुए लोगोंका उस पर्वत पर बड़ा अद्भुत और कल्याणकारी समाज जुट गया। फिर तुम्बुरुने उस पिशाचको पाशोंसे बाँधकर आसनपर बिठाया और हाथमें वीणा लेकर गौरी पतिकी कथाका गान आरम्भ किया।
पहली अर्थात् विद्येश्वरसंहितासे लेकर सातवीं वायुसंहितातक माहात्म्यसहित शिवपुराणकी कथाका उन्होंने स्पष्ट वर्णन किया। सातों संहिताओं सहित शिवपुराणका आदरपूर्वक श्रवण करके वे सभी श्रोता पूर्णतः कृतार्थ हो गये।
उस परम पुण्यमयी शिवपुराणको सुनकर उस पिशाचने अपने सारे पापोंको धोकर उस पैशाचिक शरीरको त्याग दिया। फिर तो शीघ्र ही उसका रूप दिव्य हो गया। अङ्गकान्ति गौरवर्णकी हो गयी। शरीरपर श्वेत वस्त्र तथा सब प्रकारके पुरुषोचित आभूषण उसके अङ्गको उद्भासित करने लगे। वह त्रिनेत्रधारी चन्द्रशेखररूप हो गया। इस प्रकार दिव्य देहधारी होकर श्रीमान् बिन्दुग अपनी प्राणवल्लभा चञ्चुलाके साथ स्वयं भी पार्वतीवल्लभ भगवान् शिवका गुणगान करने लगा।
उसकी स्त्रीको इस प्रकार दिव्य रूपसे सुशोभित देख वे सभी देवर्षि बड़े विस्मित हुए। उनका चित्त परमानन्दसे परिपूर्ण हो गया। भगवान् महेश्वरका वह अद्भुत चरित्र सुनकर वे सभी श्रोता परम कृतार्थ हो प्रेमपूर्वक श्रीशिवका यशोगान करते हुए अपने-अपने धामको चले गये। दिव्यरूप धारी श्रीमान् बिन्दुग भी सुन्दर विमानपर अपनी प्रियतमाके पास बैठकर सुख पूर्वक आकाशमें स्थित हो बड़ी शोभा पाने लगा।
तदनन्तर महेश्वरके सुन्दर एवं मनोहर गुणोंका गान करता हुआ वह अपनी प्रियतमा तथा तुम्बुरुजी के साथ शीघ्र ही शिवधाममें जा पहुँचा। वहाँ भगवान् महेश्वर तथा पार्वती देवीने प्रसन्नतापूर्वक बिन्दुगका बड़ा सत्कार किया और उसे अपना पार्षद बना लिया। उसकी पत्नी चञ्चुला पार्वती की सखी हो गयी। उस घनीभूत ज्योतिः स्वरूप परमानन्दमय सनातनधाममे अविचल निवास पाकर वे दोनों दम्पति परम सुखी हो गये।


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