शमी पत्र
चढ़ाने का नियम
सावन महीने में भगवान शिव को शमी पत्र अर्पित करने से मनचाहा वरदान मिलता है। सावन महीने में सोमवार को सुबह शिवालय में जाकर पूर्व या उत्तर दिशा में मुख करके बैठें। इसके बाद तांबे के लोटे में जल, गंगाजल, सफेद चंदन, चावल आदि मिलाकर शिवलिंग को अर्पित करें। इस दौरान ॐ नम: शिवाय मंत्र का जाप करें। इसके बाद भगवान भोलेनाथ को बेल पत्र, सफेद वस्त्र, चावल, शमी पत्र अर्पित करें। शमी पत्र चढ़ाते समय ॐ नम: शिवाय मंत्र का उच्चारण करना चाहिए।
क्यों शुभ है शमी पत्र?
शमी के पेड़ को बेहद शुभ माना गया है। कहा जाता है कि रावण का वध करने के बाद जब भगवान श्रीराम वापस लौटे थे, तब उन्होंने शमी के वृक्ष की पूजा की थी। दूसरी कथा के अनुसार, महाभारत में पांडवों को अज्ञातवास दिए जाने पर अस्त्र शस्त्र शमी के पेड़ में ही छिपा दिए थे। इस वजह से शमी के पेड़ को शुभ माना जाता है।
शमी पत्र का महत्व
हिंदू धर्म और शास्त्रों में बताया गया है कि सावन महीने में भगवान शिव को शमी पत्र विधिवत तरीके से चढ़ाना अति फलदायी होता है। इससे जीवन में सुख समृद्धि का संचार होता है और भगवान शिवजी की कृपा बनी रहती है। हिंदू धर्म के मुताबिक, सावन माह में शिवलिंग पर जलाभिषेक के बाद दूध चढ़ाना शुभ है। इसके पश्चात धतूरा, मदार के फूल, बेल पत्र, शमी पत्र आदि चढ़ाने से शिव प्रसन्न होते हैं।
गणेश द्वारा दिया गया वरदान
शमी और मन्दार हिन्दू मतावलम्बियों के पवित्र एवं पूजनीय वृक्ष हैं। गणपति और शिव की आराधना तो इनके साथ ही पूर्ण माने जाते हैं। इसका कारण शमी और मन्दार को विघ्नहर्ता गणेश से प्राप्त एक वरदान है जिसकी चर्चा गणेश पुराण के क्रीड़ाकांड में वर्णित कथा में की गई है।
कथा इस प्रकार है :-
मन्दार फूल
ऋषि औरव की कथा नारद मुनि के मुख से
एक बार नारद मुनि तीनों लोकों में विचरते हुए स्वर्गलोक में देवराज इंद्र के पास पहुँचे। इंद्र ने उनका यथोचित स्वागत किया। वार्तालाप के क्रम में इंद्र ने मुनि से औरव ऋषि की कथा सुनाने का आग्रह किया। नारदमुनि ने सहर्ष इस प्रकार कथा सुनाई,
"एक समय में मालवा में औरव नाम के ऐसे विद्वान ब्राह्मण हुए जिनका तेज वेदों के ज्ञान रूपी सूर्य के सामान प्रदीप्त था। उन्हें देवताओं के सामान ही शक्तियां प्राप्त थी। बहुत दिनों बाद उनकी पत्नी ने एक अत्यंत सुन्दर पुत्री को जन्म दिया जिसका नाम शमी रखा गया।
ऋषि शमी को बहुत ही स्नेह दिया करते थे। शमी जब बड़ी होने लगी तो उसने एक नियम बना लिया कि जो भी व्यक्ति उनके घर आता वह उसे भूखा नहीं जाने देती । वह भूखी रह जाती पर किसी को भूखा नहीं जाने देते। कोई भी भूखा मिल जाता तो वह अपने भोजन भी उसे दे देती।
शमी उन विचारों की थी कि उसके थाली में कुछ बचे न बचे चलेगा लेकिन उसके घर से कोई भूखा जाए यह नहीं चलेगा।
मन्दार नामक एक सुंदर बालक शौनक ऋषि के आश्रम में रहकर शिक्षा प्राप्त कर रहा था ।
जब वह युवा हुई तो उन्होंने शमी का विवाह धौम्य ऋषि के पुत्र मन्दार से कर दिया। इस प्रकार दोनों का मंगल विवाह हो गया। अतः मंदार विवाह के पश्चात शमी को उसके माता पिता के पास छोड़कर शिक्षा पूरी करने पुनः शौनक ऋषि के आश्रम चला गया।
इसी समय शौनक ऋषि और औरव ऋषि के आश्रमों के मार्ग को जोड़ने वाले रास्ते पर ही एक अन्य महान तपस्वी ऋषि भुशुण्डी का आश्रम पड़ता था। वे गणपति के अनन्य भक्त थे। उन्होंने बहुत समय तक तपस्या की तब भगवान भोलेनाथ गणेश जी से बोले तुम्हारा एक बात तुम्हारी तपस्या में लीन है जाओ और उसे वरदान दो और उसकी इच्छा पूरी करके आओ।
तब भगवान गणेश जी अपने पिता भगवान भोलेनाथ की आज्ञा से वह भुशुण्डी ऋषि को आशीर्वाद देने के लिए जा पहुंचे।
अपनी तपस्या से प्रसन्न भगवान गणेश को अपने सामने देखा तो ऋषि उनके सामने नतमस्तक हो गए। जब गणेश जी ने उनसे वर मांगने के लिए कहा तो भुशुण्डी ऋषि बोले, "हे भगवान ! मुझे और किसी पर से कुछ नहीं लेना देना मुझे तो अपना स्वरूप प्रदान कीजिए ।
भगवान मैं आप जैसा तो नहीं बन सकता और आप मुझ जैसे नहीं बन सकते । परंतु आप मुझे अपना थोड़ा सा स्वरूप दे दीजिए । अपने शीश का स्वरूप दे दीजिए।
वत्स एक बार फिर से सोच लो।
नहीं मैंने सोच लिया।
मुझे आप अपना स्वरूप प्रदान करें ।
"जैसी तुम्हारी इच्छा वत्स !" कहकर गणेश जी अंतर्ध्यान हो गए।
इस प्रकार भुशुण्डी ऋषि गणेश रूपी हो गए। उनके गणेश जी के समान ही सूंड निकल आई। इस प्रकार गणेश जी के स्वरूप वाले एकमात्र व्यक्ति हैं, भुशुण्डी जी।
जब मन्दार और शमी पूर्ण यौवन को प्राप्त हुए तब मन्दार अपने ससुराल गया और शमी को विदा कराकर पुनः शौनक ऋषि के आश्रम की ओर वापस चला।
रास्ते में एक महान तपस्वी ऋषि भुशुण्डी का आश्रम पड़ता था दोनों ने सोचा क्यों नहीं हम भुशुंडी ऋषि का आशीर्वाद लेकर गुरु आश्रम जाएं।
इसलिए वे दोनों उनके आश्रम की ओर चल दिए । उन्हें ऋषि भुशुण्डी के स्वरूप का पता नहीं था । जावे आश्रम के निकट पहुंचे तो उन्होंने आश्रम के बाहर गजमुख व्यक्ति को देखा। तो शमी और मन्दार दोनों को हँसी आ गई।
वे दोनों ठहाके मारकर ऋषि पर हंसने लगे। इस पर ऋषि बहुत क्रुद्ध हो गए और कुपित हो कर उन्होंने दोनों को श्राप दे दिया कि - तुम दोनों वृक्ष बन जाओ, ऐसा वृक्ष कि जिसके पास पशु -पक्षी भी न आएं।
ऐसा ही हुआ। मंदार ऐसा वृक्ष बना जिसकी पत्तियां कोई पशु नहीं खाता और शमी ऐसा वृक्ष बनी जिसपर काँटों की अधिकता के कारण कोई पक्षी शरण नहीं लेता।
ऋषि के श्राप के प्रभाव से दोनों तुरंत वृक्ष में बदल गए। दोनों हाथ जोड़कर प्रार्थना करते रहे छमा मांगते रहे, छमा मांगते रहे। हे रिसीवर हम पर दया कीजिए कृपा कीजिए करुणा कीजिए ही रिसीवर हमें क्षमा कीजिए हमसे गलती हो गई हमें क्षमा कीजिए।
परंतु ऋषि ने उन पर दया नहीं दिखाई और वे वहां से चले गए। अब तो हम कहीं जा भी नहीं सकते किस से कहें, किसे पुकारें दोनों फूट-फूट कर रोने लगे।
इस पर मंदार बोला समी मुझे माफ करना ।
आप ऐसा क्यों सोचते हैं कि यह सब आपकी वजह से हुआ। मैं भी तो उनके स्वरूप को नहीं समझ सकी थी और मैंने भी तो उनका हंसी उड़ाने में कमी तो नहीं की।
बस अब क्या करें मंदार बोला
शमी बोली पिताजी कहा करते थे कि सब देव तो झोली झाड़ कर देते हैं और मेरा देवों के देव महादेव छप्पर फाड़ कर देते हैं। आओ हम दोनों मिलकर उन्हीं की आराधना करते हैं।
और वे दोनों मिलकर भगवान भोलेनाथ की आराधना करने लगे।
बहुत दिन बीतने पर भी जब शमी और मंदार ऋषि शौनक के आश्रम नहीं पहुंचे तब शौनक ऋषि उनकी खोज में निकले। पहले वे शमी के पिता औरव के घर गए।
वहाँ उन्हें न पा कर दोनों ऋषी शमी और मंदार खोजते हुए भृशुण्डी के आश्रम पर आये । दोनों ने उन्हें सम्मान पूर्वक प्रणाम किया।
तब ऋषि हिंदी बोले मान्यवर आपके यहां आने का प्रयोजन क्या है कृपया बताएं।
तब दोनों ने शमी और मंदार के गुम होने की कहानी उन्हें सुनाई तो ऋषि भृशुण्डी उन्हें सारा वृतांत बता दिया।
जब उन्हें सारे वृत्तांत की जानकारी हुई तो उन्होंने भृशुण्डी ऋषि से दोनों को शापमुक्त करने का अनुरोध किया ।
हे प्रभु वे दोनों तो अबोधबलक थे आप सर्व ज्ञान संपन्न एक महान ऋषि फिर भी आपने उन्हें शराब दे दिया जो ठीक नहीं है उनकी गलती के लिए उन्हें छोटा-मोटा दंड देते तो ज्यादा अच्छा रहता।
ऋषि भृशुण्डी बोले आपको ज्ञात होगा कि दोनों बच्चे शिक्षा संपन्न थे और उन्होंने अपनी सभी शिक्षाएं पूर्ण कर ली थी । उन्हें ज्ञात होना चाहिए कि अपनों से बड़ों के साथ कैसा व्यवहार करते हैं।
मुझ पर हंसते तो बात दूसरी थी। वे मेरे गुरुदेव के स्वरूप पर हंसे और एक बार नहीं बार-बार गुरुदेव के स्वरूप को देखते और जोर से हंसे।
पुत्रों इस प्रकार हंसना ठीक नहीं है यह मेरे गुरुदेव का स्वरूप है तुम मेरा नहीं मेरे गुरुदेव का अपमान कर रहे हो।
लेकिन वे हंसते ही रहे और हंसते हंसते लोटपोट होते रहे। पहले तो मैं उन्हें बच्चे समझ रहा था। लेकिन जब उन्होंने हंसना बंद नहीं किया। तो मुझे क्रोध आ गया।
और उन्होंने एक बात और बोल दी कि जैसा चेला शायद वैसा ही गुरु भी हो।
आपके पुत्रों से मुझे यह उम्मीद नहीं थी कि वह एक जड़ की तरह मुझसे व्यवहार करें। तो उन्होंने मेरे साथ एक जड़ जैसा व्यवहार किया इसलिए मैंने उन्हें जड वृक्ष बनने का श्राप दिया।
तुम दोनों महान विषयों की संतान हो और मेरे साथ एक जड़ जैसा व्यवहार कर रहे हो तुमने मेरे साथ मेरे गुरु का भी अपमान किया है इसलिए मैं गुरु को साक्षी रखकर तो मैं शराब देता हूं कि तुम दोनों वृक्ष बन जाओ, ऐसा वृक्ष कि जिसके पास पशु -पक्षी भी न आएं।
मान्यवर जो हुआ वह गलत हुआ अब बच्चों को माफ करके उन्हें श्राप से मुक्ति दिला दो। किन्तु भृशुण्डी ने इसमें अपनी असमर्थता व्यक्त की।
तब शौनक ऋषि और औरव ऋषि ने भगवान गणेश को प्रसन्न करने के लिए कठिन तपस्या प्रारम्भ की। उनकी तपस्या से प्रसन्न हो कर गणपति दस हाथ ऊँचे सिंह पर आरूढ़ हो प्रकट हुए।
गणपति ने उन्हें वरदान मांगने को कहा। उन्होंने शमी और मन्दार को अपने प्रिय भक्त भृशुण्डी को शापमुक्त कर पुनः पूर्वावस्था में लाने का वरदान माँगा।
किन्तु गणेश अपने प्रिय भक्त भृशुण्डी के श्राप की अवहेलना नहीं करना चाहते थे।
गणेश जी बोले, " पुत्रों ! मैं अपने प्रिय भक्त भृशुण्डी की श्राप को वापस तो नहीं ले सकता परन्तु बदले में यह वरदान दिया दे सकता हूं कि भविष्य में ये दोनों वृक्ष तीनो लोको में पूजनीय होंगे और मेरे पिता शिव की पूजा इनकी पूजा इनकी उपस्थिति के पूर्ण नहीं मानी जायेंगी ।
यह कहकर गणपति अंतर्ध्यान हो गए। ऋषि शौनक तो अपने घर लौट गए परन्तु ऋषि औरव वही अपनी पुत्री के समीप अर्थात शमी वृक्ष के पास बैठ गए और वही उन्होंने अपना शरीर वहीँ त्याग दिया। उनका शरीर से उत्पन्न तेज अग्नि रूप में शमी पेड़ के तने में स्थिर हो गया।"
भगवान भोलेनाथ शमी और मंदार की तपस्या से बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने दोनों को आशीर्वाद दिया, "सुनो समी ! सुनो मंदार ! सुनो समी, सुनो मंदार ! यदि भूल से भी कोई तुम्हारा एक पत्र या पत्ता मेरे शिवलिंग पर अर्पित कर देगा। तो वह हज़ारों लाखों अश्वमेध यज्ञों का फल तुरंत प्राप्त कर लेगा।
समी की पत्ती भगवान शिव पर चढ़ाने का तरीका बताता है। संपूर्ण स्नान और श्रृंगार के उपरांत मां जगत जननी की बेटी का पर स्पर्श कराकर और अपनी कामना माता से बोलने के उपरांत भगवान भोलेनाथ की शिवलिंग पर शमी पत्र अर्पित करना चाहिए ताकि वे हमारी कामना भगवान भोलेनाथ तक पहुंचा सके।
जब किसी का जीवन बहुत कष्टमय हो जाए तो दो बेलपत्र और सात समी पत्रों का प्रयोग करना चाहिए। यहां भी पूरा श्रृंगार करने के उपरांत एक बेलपत्र जहां जलाधारी से जल गिरता है तथा दूसरा इसके विपरीत जहां माता के बैठने का स्थान है पर रखो और अपने मन की बात बोलते हुए सात समी पत्रों को भगवान भोलेनाथ के शिवलिंग को अर्पित करें ।
"हे भोलेनाथ ! कांटो से भरी है जिंदगी सभी की जिसे तूने निहाल कर दिया और कांटों से भरी है जिंदगी मेरी मुझे विश्वास है कि तू मुझे भी निहाल कर देगा।
इसलिए आज भी शिव और गणेश जी के मंदिरों में हवन से पहले शमी की लकड़ियों को घिसकर अग्नि प्रज्जलित की जाती है और उसमे शमी की लकड़ियों की आहूतियां डाली जाती हैँ। बिना मंदार पुष्प और शमी पत्रों के शिव एवं गणपति की पूजा पूर्ण नहीं मानी जाती।
इस प्रकार नारद ऋषि ने इंद्र को औरव की कथा सुनाई।
पवित्र शमी वृक्ष के प्रसंग
1. शमी वृक्ष की महिमा
त्रेता युग में भी शमी वृक्ष का एक प्रसंग आता है। वरतन्तु ऋषि का शिष्य उनसे किसी बात पर नाराज हुआ और तो शिष्य ने आश्रम छोड़कर जाने की इच्छा प्रकट की।
गुरु ने शिष्य से गुरु -दक्षिणा में चौदह कोटि स्वर्ण मुद्राएं मांगी। शिष्य अयोध्या के राजा रघु के पास गया और उनसे यह राशि मांगी। राजा रघु ने उस समय एक बड़ा यज्ञ किया था जिसमे अपार दान करने के कारण उनका खजाना पूरा खाली हो गया था। उन्होंने उस ब्राह्मण से कुछ समय माँगा और यह धन प्राप्त करने के लिए आश्विन शुक्ल दशमी की तिथि को इंद्र की राजधानी अमरावती पर चढ़ाई करने का निश्चय किया। नारद मुनि द्वारा यह सूचना इंद्र को प्राप्त हुई। इंद्र राजा रघु को नाराज नहीं करना चाहते थे। अतः उन्होंने अपने खजांची कुबेर को बुला कर अयोध्या पर धन वर्षा करने का आदेश दिया। नियत तिथि से पहले की रात को कुबेर ने ऐसा ही किया। धन वर्षा एक बड़े शमी वृक्ष के उपर हुई। जब राजा रघु ने यह जाना तो ब्राह्मण को सारा धन लेने के लिए बुलाया। परन्तु उसने अपनी आवश्यकतानुसार चौदह कोटि स्वर्ण मुद्राएं ही लीं और गुरु - दक्षिणा चुकाई। दान के उद्देश्य से प्राप्त धन की बची अपार राशि रघु ने स्वयं रखना अपने आत्मसम्मान के विपरीत माना और यह घोषणा की कि जिसे भी आवश्यकता हो यह ले जाये। वह शुभ तिथि दसहरा थी। इसी परम्परा को रखते हुए रामचन्द्र ने भी इसी तिथि को शमी की पूजा कर लंका पर आक्रमण के लिए चुना। आज भी किसी विशेष कार्य पर निकलने से पहले लोग विशेषकर राजपूत शमी की पूजा या शीश नवाते हैं।
शमी वृक्ष का प्रसंग महाभारत में भी आता है। जब पांडवों ने बारह वर्ष के बनवास के बाद एक वर्ष का अज्ञातवास प्रारम्भ किया तो उन्होंने अपने भेष और नाम बदले थे तथा अपने अपने अस्त्र शस्त्र विराटनगर के बाहार श्मशान में एक बड़े शमी वृक्ष के अंदर ही छिपाए थे।
भगवन राम के पूर्वज राजा रघु और शमी वृक्ष
शमी वृक्ष का वैज्ञानिक नाम mimosa cineraria एवं prosopis cineraria है। आज यह हर हिन्दू के घर में एक जाना माना वृक्ष है। लोग इसे मुख्य गेट के पास लगते हैं। देवताओं को शमी पत्र अर्पित करने का मन्त्र मेरे ब्लॉग "शमी पत्र (The holi shami leaves)" में दिया है। मन्दार का लोकप्रिय नाम आक या अकबन है। इसके बारे में मेरे ब्लॉग "आक (aak) के फूल - The Crown Flower" में पढ़ा जा सकता है।
किंतु मन्दार बहुअर्थी है। यह गुड़हल के लिए भी प्रयुक्त होता है, कोरल वृक्ष के फूल के लिए भी प्रयुक्त होता है और अकवन के लिए भी। मन्दार का सिर्फ पुष्प के लिए भी कहीं कहीं प्रयोग होता है।
गणेश पुराण में मन्दार शब्द का प्रयोग किया गया है। ऊपर के ब्लॉग में स्पष्ट है कि मन्दार ऐसा वृक्ष बना जिसकी पत्तियाँ कोई पशु नहीं खाता, जो अकवन को इंगित करता है। फिर गणेश जी द्वारा वरदान में मन्दार को शिवपूजा में महत्व दिया गया है जो अकवन को प्राप्त है। फिर शिवपंचाक्षर स्तोत्र में एक पंक्ति है"मंदारपुष्प बहुपुष्प सुपूजिताय " । यहाँ भी मन्दार का अर्थ अकवन ही है क्योंकि शिव की पूजा अकवन से की जाती है गुड़हल से नही।
अतः उपरोक्त ब्लॉग के संदर्भ में मन्दार का अर्थ अकवन ही है।
शमी वृक्ष के पूजन की 3 पौराणिक कथाएं
दशहरे पर शमी के वृक्ष का पूजन किया जाता है और इसकी पत्तियां एक दूसरे को बांटी जाती है। आओ जानते हैं कि इसके पीछे कौनसी पौराणिक कथा है।
1.कहते हैं कि भगवान श्रीराम ने लंका पर आक्रमण करने के पूर्व शमी वृक्ष के सामने शीश नवाकर अपनी विजय हेतु प्रार्थना की थी। बाद में लंका पर विजय पाने के बाद उन्होंने शमी पूजन किया था। संभवत: तभी से शमी के वृक्ष की पूजा कर प्रचलन रहा है। यह भी कहा जाता है कि लंका से विजयी होकर जब राम अयोध्या लौटे थे तो उन्होंने लोगों को स्वर्ण दिया था। इसीके प्रतीक रूप में दशहरे पर खास तौर से सोना-चांदी के रूप में शमी की पत्तियां बांटी जाती है। कुछ लोग खेजड़ी के वृक्ष के पत्ते भी बांटते हैं जिन्हें सोना पत्ति कहते हैं।
2.महाभारत अनुसार पांडवों ने देश निकाला के अंतिम वर्ष में अपने हथियार शमी के वृक्ष में ही छिपाए थे। बाद में उन्होंने वहीं से हथियार प्राप्त किए थे तब उन्होंने हथियारों के साथ ही शमी की पूजा भी की थी। इन्हीं हथियारों से पांडवों ने युद्ध जीता था। संभवत: तभी से शमी के वृक्ष की पूजा और हथियारों की पूजा कर प्रचलन प्रारंभ हुआ होगा।
3.एक अन्य कथा के अनुसार महर्षि वर्तन्तु ने अपने शिष्य कौत्स से शिक्षा पूरी होने के बाद गुरू दक्षिणा के रूप में 14 करोड़ स्वर्ण मुद्राएं मांग ली। यह मांग सुनकर कौत्स महाराज रघु के पास गए और उनसे यह रकम मांगी।
महाराज रघु ने कुछ दिन पहले ही एक महायज्ञ करवाया था, जिसके कारण खजाना खाली हो चुका था। तब उन्होंने कौत्स से तीन दिन का समय मांगा। राजा धन जुटाने के लिए उपाय खोजने लग गया। कोई उपाय नहीं सुझा तो उन्होंने स्वर्गलोक पर आक्रमण करने का निश्चय किया। राजा ने सोचा स्वर्गलोक पर आक्रमण करने से उसका शाही खजाना फिर से भर जाएगा।
राजा के इस विचार से देवराज इंद्र घबरा गए और कोषाध्याक्ष कुबेर से रघु के राज्य में स्वर्ण मुद्राओं की वर्षा करने का आदेश दिया। इंद्र के आदेश पर रघु के राज्य में कुबेर ने शमी वृक्ष के माध्यम से स्वर्ण मुद्राओं की वर्षा करा दी। माना जाता है कि जिस तिथि को स्वर्ण की वर्षा हुई थी उस दिन विजयादशमी थी। इस घटना के बाद से ही विजयादशमी के दिन शमी के वृक्ष की पूजा और उसकी पत्तियां एक दूसरे को बांटने की परंपरा प्रारंभ हुई।
शमी व मदार वृक्ष की पौराणिक
कथा और महत्व (Shami or Madar vriksh ki pouranik katha, mahtw in hindi)
तब शाप से मुक्त करने में असमर्थ ऋषि
भृसंदी श्री गणेश के पास पहुंचे व मदार व
शमी को शाप से मुक्त करने हेतु गणेश जी से प्रार्थना करने लगे। तब अपने भक्तों के शाप की लाज रखने व क्षमी व मदार के उद्धार के लिए श्री गणेश ने उन्हें वरदान दिया कि यह दोनों वृक्ष (शमी व मदार) तीनों लोकों में पूजनीय होगे व भगवान शिव की पूजा इन दोनों वृक्षों के बिना अपूर्ण होगी। यह दोनों पति-पत्नी अर्थात मंदार व शमी जहां साथ में होंगे वहां में स्वयं रिद्धि-सिद्धि के साथ निवास करूंगा।
शमी व मदार वृक्ष का महत्व (Shami or Madar vriksh ka mahtw) •शमी व मदार वृक्ष के बिना गणपति जी व
शिवजी की पूजा अधूरी मानी जाती है।
• आज भी सफेद मदार या सफेद अकाव के वृक्ष की जड़ में 21 वर्ष के बाद जड़ का आकार गणेश जी का स्वरूप ले लेती है।
जिस घर में मदार की जड़ के गणेश जी की पूजा होती है वहां गणेश जी रिद्धि-सिद्धि के साथ स्वयं निवास करते हैं उस घर में कभी श्री अकाल मृत्यु नहीं होती है।
भगवान राम के द्वाटा अश्विन मास की दशमी तिथि अर्थात दशहरे के दिन शमी वृक्ष की पूजा के पश्चात ही लंका पर विजय प्राप्त की थी। इसलिए दशहरे के दिन शमी वृक्ष का बहुत महत्व है। महाभारत काल में वर्ष के अज्ञातवास जाने से पूर्व पांडवों ने भी अपने शस्त्रों की शमी वृक्ष के ऊपर ही छुपाया था।
खाटू श्याम बाबा अर्थात महात्मा चर्वीक के कटे हुए सर को भी ऊंची पहाड़ी पर स्थित शमी वृक्ष पर ही रखा गया था।
शमी का वृक्ष अपने आर्थिक व पौराणिक मूल्यों के कारण राजस्थान का राजकीय वृक्ष भी है जिसे लोग वहां की स्थानीय भाषा में खेजड़ी का वृक्ष के नाम से भी जानते हैं।
शमी वृक्ष की पूजा हेतु जल का कलश लेकर
नियमित रूप से इसका पूजन करें साथ ही
संध्या के समय में शमी के वृक्ष के नीचे
सरसों का तेल का दीपक जलाएं। शमी वृक्ष
के पास सरसों की तेल का दिया लगाने पर
न्याय के देवता शनि देव की कृपा परिवार
पट बनी रहती है।
शमी वृक्ष की पहचान (Shami vriksh ki pahchan in hindi)
जैसा कि हमने लेख के शुरू में भी बताया है कि शमी वृक्ष एक कांटेदार वृक्ष है जिसमें पीले व गुलाबी कलर के फूल लगते हैं यह मुख्य रूप से रेगिस्तान या सूखे प्रदेशों में पाया जाता है। इसलिए शमी वृक्ष राजस्थान का राजकीय वृक्ष भी है। आशा करती हूं शमी व मदार वृक्ष की पौराणिक कथा और महत्व (Shami or Madar vriksh ki pouranik katha, mahtw in hindi) पर आपको हमारी यह जानकारी पसंद आई होगी हमारे साथ अंत तक बने रहने के लिए ।
धन्यवादा
Shami Patra Kya Hota Hai | Sawan 2022 Shami Patra | Shami Patra In Hindi | Shami Patra Image | शमी पत्र चढ़ाने का तरीका | शमी पत्र क्या होता है | शमी पत्र चढ़ाने का मंत्र | शमी पत्र के फायदे
हमारे देश में लोगो का पूजा पाठ में, आस्था बहुत ही ज्यादा है। सावन में हर साल भगवान शिव की पूजा आराधना की जाती है। इसके लिए पूरे विधि विधान से शिवलिंग का अभिषेक भी होता है। अभिषेक के दौर मदार के फूल, बिल्व पत्र, शमी पत्र आदि कई चीजों को मिला कर भगवान शिव जी का अभिषेक किया जाता है और साथ में कई मंत्रों का उच्चारण भी किया जाता है।
लेकिन बहुत लोगो को शमी पत्र के बारे में ठीक से ज्ञात नही होता है कि आखिर ये Shami Patra Kya Hota Hai, शमी पत्र का शिवलिंग अभिषेक क्यों किया जाता है, शमी पत्र की पौराणिक मान्यता क्या है, शिव जी को शमी पत्र चढ़ना क्यों जरूरी है इत्यादि चीजों के बारे में आज हम इस लेख में चर्चा करेगे। अतः इस लेख को अंतिम तक पूरा अवश्य पढ़े।

शमी पत्र क्या होता है – Shami Patra Kya Hota Hai
शमी के पौधे के पत्ते को Shami Patra कहा जाता है। अगर शमी के पौधे की बात करे तो हर पौधे के अंदर एक खास गुण होता है या कोई खास बात जरूर होती है। ऐसा ही यह एक पौधा है, जिसको पूजा अर्चना के लिए इसके पत्ते का खास इस्तेमाल किया जाता है। जिसे Shami Patra कहते है। शमी के वृक्ष का धार्मिक रूप से बहुत महत्व होता है। शमी का पौधा जीवन की परेशानियों और तमाम पीड़ाओ से भी मुक्ति प्रदान करने का कार्य करता है।
शिवपुराण के अनुसार अगर भगवान शिव जी की पूजा में शमी के पौधों के पत्तों को भी साथ में अर्पित किया जाए तो ऐसे में भगवान बहुत ही खुश होते है और भक्तों की मनोकामनाएं जल्द ही पूर्ण करते है। साथ ही Shami Patra अर्पित करने वाले भक्तों को मोक्ष की प्राप्ति भी होती है।
Shami Patra की पौराणिक मान्यता क्या है
पौराणिक मान्यताओं की बात करे तो शमी के वृक्ष के पत्ते यानी Shami Patra को भगवान शिव को अर्पित करना बहुत ही शुभ माना जाता है। ग्रंथों के अनुसार शमी के पेड़ो को बहुत ही शुभ माना जाता है। Shami Patra को भगवान शिव के अलावा अन्य भगवान जैसे गणेश जी और शनिदेव को भी चढ़ाया जाता है। Shami Patra गणेश जी और शनिदेव को भी बहुत प्रिय है। नवरात्रि में भी मां दुर्गा की पूजा शमी वृक्ष के पत्तों यानी शमी पत्र से करने की पौराणिक मान्यता है।
मान्यता है कि भगवान श्री राम ने जब रावण का संहार किया था तो संहार के बाद जब वह अयोध्या लौटे थे तो भगवान श्री राम ने शमी के वृक्ष की पूजा की थी। वही दूसरी कथा में मान्यता है कि महाभारत में कौरवों से जुएं में हारने के बाद पांडवों को 12 वर्ष का वनवास और 1 साल का अज्ञातवास मिला था। तब पांडवों ने अपने अपने अस्त्र शस्त्र को शमी के वृक्ष में छिपा दिया था। इसलिए Shami Patra का महत्व धार्मिक रूप में अधिक है।
सावन का महीना भगवान शिव का बहुत ही खास और प्रिय महीना माना जाता है। क्योंकि सावन का महीना भगवान शिव का बहुत ही प्रिय है। इस दिन भगवान शिव जी को खुश करने के लिए भक्त कई तरह के पूजा पाठ करते है। पूरी श्रद्धा और आस्था से भगवान शिव की पूजा करने से भगवान जल्दी ही खुश हो जाते है और भक्तों को मनचाहे इच्छाओ को जल्दी पूर्ण करते है।
सावन के महीने में शिवलिंग की पूजा का विशेष महत्व है। इस दिन शिवलिंग पर भगवान शिव के प्रिय भांग, धतूरा, मदार के फूल, बिल्व पत्र के साथ साथ यदि Shami Patra भी चढ़ाया जाए तो बहुत ही शुभ माना जाता है। ग्रंथों के अनुसार भगवान शिव को Shami Patra पूरे विधि विधान के साथ अर्पित किया जाए तो इससे भक्तों को इसका फल और भी ज्यादा मिलता है। इसके साथ साथ भक्तों को मोक्ष की प्राप्ति भी होती है।
Shami Patra चढ़ाने का सही तरीका
शिवपुराण के अनुसार सावन का महीना भगवान शिव की पूजा के लिए सबसे उत्तम माना गया है। इस दिन भगवान शिव की पूजा करने से मनोकामनाएं की शीघ्र पूर्ति और भक्ति का फल ज्यादा मिलता है। शिव भक्त पूरे साल इस खास महीने का बेसब्री से इंतजार करते है। ऐसे देखे तो सावन में किसी भी दिन भगवान शिव को Shami Patra चढ़ाया जा सकता है लेकिन अगर सावन के सोमवार के दिन Shami Patra चढ़ाया जाए तो इससे पूजा का फल और अधिक प्राप्त होता है।
Shami Patra चढ़ाने का सही तरीका यह है कि सावन के सोमवार के दिन नहाने के बाद शिव मंदिर जाकर अपना मुख उत्तर या पूर्व दिशा की ओर करके बैठ जाए। अब इसके बाद कांसे या तांबे या पीतल के लोटे में सफेद चंदन, चावल, गंगाजल आदि मिलाकर शिवलिंग पर अभिषेक करें। शिवलिंग पर अभिषेक के दौरान ओम नमः शिवाय का मंत्र उच्चारण करें। इसके पश्चात भगवान शिव जी को धूप, दीप और कर्पूर से आरती करें। आरती के बाद अब शिवलिंग पर बिल्व पत्र, सफेद वस्त्र, जनेऊ, चावल, प्रसाद के साथ Shami Patra भी चढ़ाएं। Shami Patra चढ़ाने के दौरान इस मंत्र का उच्चारण करना बहुत शुभ रहेगा जो कि अगले हेडिंग में नीचे दी गई है।
Shami Patra चढ़ाने समय इस मंत्र का उच्चारण
Shami Patra अर्पित करने के समय इस मंत्र का अगर उच्चारण करे तो और भी शुभ होगा जो निम्न है:–
अमंगलानां च शमनीं शमनीं दुष्कृतस्य च।
दु:स्वप्रनाशिनीं धन्यां प्रपद्येहं शमीं शुभाम्।।
Shami का पौधा लगाने की सही दिशा और लाभ
मान्यता है कि यदि घर पर शमी का वृक्ष लगाया जाए तो इससे देवी-देवताओं की कृपा हमेशा बनी रहती है और घर सुख-समृद्धि से संपन्न रहता है। शमी का पौधा घर में लगाने से शनि के प्रकोप से बचा जा सकता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार अगर शमी के पेड़ की पूजा नियमित रूप से की जाए और साथ ही अगर शमी के पेड़ के नीचे एक सरसो के तेल का दिया जलाया जाए तो इससे घर पर महादेव की कृपा हमेशा बनी रहती है और महादेव आने वाले दुखों से रक्षा भी करते है। इसके अलावा शनिजन्य दोष से मुक्ति भी प्रदान करते है।
यदि आप शमी के पौधे को गमले में लगाते है तो ऐसे में घर के उत्तर दिशा या ईशान कोण में शमी का पौधा लगाना लाभकारी होता है। अगर आप शमी के पेड़ को जमीन में लगा रहे है तो दक्षिण दिशा में लगाना सही माना जाता है।
आज हमने इस आर्टिकल में Shami Patra Kya Hota Hai तथा इससे जुड़े सभी खबरों के बारे में समस्त जानकारी आपके समक्ष रखी। हम आशा करते है कि आपको यह आर्टिकल बहुत पसंद आई होगी। अगर आपको यह जानकारी अच्छी लगी तो कृपया इसे जरूर शेयर करे और अगर आपके मन में इस आर्टिकल से संबंधित कोई सवाल या विचार है तो हमे नीचे comment करके आसानी से बता सकते है।
FAQs
प्रश्न: शमी पत्र क्या होता है?
उत्तर: अगर भगवान शिव जी की पूजा में शमी के पौधों के पत्तों यानी शमी पत्र को भी साथ में अर्पित किया जाए तो ऐसे में भगवान बहुत ही खुश होते है और भक्तों की मनोकामनाएं जल्द ही पूर्ण करते है। साथ ही शमी पत्र अर्पित करने वाले भक्तों को मोक्ष की प्राप्ति भी होती है।
प्रश्न: शमी पत्र का दूसरा नाम क्या है?
उत्तर: राजस्थान में शमी वृक्ष को खेजड़ी के नाम से जाना जाता है।
प्रश्न: शमी पत्र कौन से भगवान को चढ़ाए जाते हैं?
उत्तर: शमी पत्र को भगवान शिव के अलावा अन्य भगवान जैसे गणेश जी और शनिदेव को भी चढ़ाया जाता है। नवरात्रि में भी मां दुर्गा की पूजा शमी वृक्ष के पत्तों यानी शमी पत्र से करने की पौराणिक मान्यता है।
प्रश्न: शमी पत्र चढ़ाने से क्या होता है?
उत्तर: अगर सावन के सोमवार के दिन शमी पत्र चढ़ाया जाए तो इससे पूजा का फल और अधिक प्राप्त होता है।
प्रश्न: शमी का पौधा छत पर लगा सकते हैं क्या?
उत्तर: यदि आप शमी के पौधे को गमले में लगाते है तो ऐसे में घर के उत्तर दिशा या ईशान कोण में शमी का पौधा लगाना लाभकारी होता है।
प्रश्न: शमी पत्र चढ़ाने का मंत्र क्या है?
उत्तर: अमंगलानां च शमनीं शमनीं दुष्कृतस्य च।दु:स्वप्रनाशिनीं धन्यां प्रपद्येहं शमीं शुभाम्।।
क्या है पौराणिक मान्यता
पौराणिक मान्यताओं में शमी का वृक्ष बड़ा ही मंगलकारी माना गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जब भगवान श्री राम लंका से विजय प्राप्त करके आए थे तो उन्होंने भी शमी के वृक्ष का पूजन किया था। मान्यता यह भी है कि महाभारत के समय में जब पांडवों को अज्ञातवास दिया गया, तब उन्होंने अपने अस्त्र-शस्त्र शमी के वृक्ष में ही छिपाए थे। नवरात्रि में भी मां दुर्गा का पूजन शमी वृक्ष के पत्तों से करने का विधान है। भोलेनाथ के साथ-साथ गणेश जी और शनिदेव, दोनों को ही शमी बहुत प्रिय है।
ऐसे चढ़ाएं शमीपत्र
सोमवार को स्न्नान करके शिव मंदिर में जाकर पूर्व या उत्तर दिशा की और मुख करके तांबे के पात्र में गंगाजल सफेद चंदन,चावल आदि मिलाकर शिवलिंग पर अभिषेक करें। अभिषेक करते समय 'ऊं नमः शिवाय' मंत्र का उच्चारण करें। जब अभिषेक कर लें, तब शिव जी को बिल्व पत्र, सफेद वस्त्र, जनेऊ, चावल, प्रसाद के साथ शमी के पत्ते भी अर्पित करें। शमी के पत्ते अर्पित करते समय हो सके तो इस मंत्र का उच्चारण करें।
अमंगलानां च शमनीं शमनीं दुष्कृतस्य च।
दु:स्वप्रनाशिनीं धन्यां प्रपद्येहं शमीं शुभाम्।।
शमी पत्र अर्पित करने के उपरांत शिवजी की धूप, दीप और कर्पूर से आरती करें।
इस दिशा में लगाएं शमी का पौधा
ऐसी मान्यता है कि घर में शमी का पेड़ लगाने से देवी-देवताओं की कृपा प्राप्त होती है और घर में सुख-समृद्धि आती है, साथ ही यह वृक्ष शनि के कोप से भी बचाता है। शमी का वृक्ष घर की उत्तर दिशा या ईशान कोण में लगाना लाभकारी माना गया है,लेकिन इस दिशा में इसे गमले में लगाना चाहिए।जमीन में लगा रहे हैं तो दक्षिण दिशा में लगा सकते हैं। ज्योतिष मान्यता के अनुसार यदि नियमित रूप से शमी वृक्ष की पूजा की जाए और इसके नीचे सरसों तेल का दीपक जलाया जाए, तो घर पर भोलेनाथ की कृपा बनी रहती है और शनिजन्य दोष से मुक्ति मिलती है।
सावन के पवित्र माह में भगवान शिव की पूजा करने का विशेष महत्व है। इस पूरे माह भगवान शिव की विभिन्न तरह के पूजा अर्चना की जाती है। इसके साथ ही शिवलिंग में बिल्व पत्र, धतूरा, मदार के फूल के साथ शमी पत्र चढ़ाना शुभ माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार, भगवान शिव को शमी का पत्र विधिवत तरीके से चढ़ाया जाए तो उसका फल और भी अधिक मिलता है। जानिए किस विधि से भगवान शिव को चढ़ाएं शमी पत्र।
शिवपुराण के अनुसार शिव पूजा में फूल-पत्तियां चढ़ाने का विशेष महत्व है। शिवलिंग पर बिल्व पत्र तो सभी चढ़ाते हैं, लेकिन इसके साथ ही शमी के पत्ते भी शिवलिंग पर अर्पित करना चाहिए। शमी वृक्ष पूजनीय और पवित्र है। घर में शमी का वृक्ष लगाने से कुंडली के और वास्तु के कई दोष दूर हो सकते हैं। उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. मनीष शर्मा के अनुसार जानें शिवजी को कैसे चढ़ाएं शमी के पत्ते....
- रोज सुबह शिव मंदिर जाएं और तांबे के लोटे में गंगाजल या पवित्र जल में गंगाजल, चावल, सफेद चंदन मिलाकर शिवलिंग पर ऊँ नम: शिवाय मंत्र बोलते हुए अर्पित करें।
- तांबे के लोटे से जल चढ़ाने के बाद शिवलिंग पर चावल, बिल्वपत्र, सफेद वस्त्र, जनेऊ और मिठाई के साथ ही शमी के पत्ते भी चढ़ाएं।
शमी पत्ते चढ़ाते समय ये मंत्र बोलें
अमंगलानां च शमनीं शमनीं दुष्कृतस्य च।
दु:स्वप्रनाशिनीं धन्यां प्रपद्येहं शमीं शुभाम्।।
- शमी पत्र चढ़ाने के बाद शिवजी की धूप, दीप और कर्पूर से आरती कर प्रसाद ग्रहण करें।
पेड़-पौधे लगाना और इसकी हिफाजत करना हमारी गौरवशाली परंपरा का हिस्सा रहा है. कुछ पेड़ धार्मिक नजरिए से भी बहुत महत्वपूर्ण होते हैं. शमी भी ऐसे ही वृक्षों में शामिल है.
ऐसी मान्यता है कि घर में शमी का पेड़ लगाने से देवी- देवताओं की कृपा प्राप्त होती है और घर में सुख- समृद्धि आती है. साथ ही यह वृक्ष शनि के कोप से भी बचाता है.
किस ओर लगाएं शमी का वृक्ष शमी का वृक्ष घर के ईशान कोण (पूर्वोत्तर) में लगाना
लाभकारी माना गया है. इसमें प्राकृतिक तौर पर अग्नि तत्व पाया जाता है..
शनि के कोप से बचाता है शमी
न्याय के देवता शनि को खुश करने के लिए शास्त्रों में कई उपाय बताए गए हैं, जिनमें से एक है शमी के पेड़ की पूजा. शनिदेव की टेढ़ी नजर से रक्षा करने के लिए शमी के पौधे को घर में लगाकर उसकी पूजा करनी चाहिए.
नवग्रहों में शनि महाराज को न्यायाधीश का स्थान प्राप्त है, इसलिए जब शनि की दशा आती है, तब जातक को अच्छे-बुरे कर्मों का पूरा फल प्राप्त होता है. यही कारण है कि शनि के कोप से लोग भयभीत रहते हैं.
पीपल के विकल्प के तौर पर शमी
पीपल और शमी दो ऐसे वृक्ष हैं, जिन पर शनि का प्रभाव होता है. पीपल का वृक्ष बहुत बड़ा होता है, इसलिए इसे घर में लगाना संभव नहीं होता. वास्तु शास्त्र के मुताबिक, नियमित रूप से शमी वृक्ष की पूजा की जाए और इसके नीचे सरसों तेल का दीपक ज जाए, तो शनि दोष से कुप्रभाव से बचाव होता है.
कई दोषों का होता है निवारण
शमी के वृक्ष पर कई देवताओं का वास होता है. सभी यज्ञों में शमी वृक्ष की समिधाओं का प्रयोग शुभ माना गया है. शमी के कांटों का प्रयोग तंत्र-मंत्र बाधा और नकारात्मक शक्तियों के नाश के लिए होता है. शमी के पंचांग, यानी फूल, पत्ते, जड़ें, टहनियां और रस का इस्तेमाल कर शनि संबंधी दोषों से जल्द मुक्ति पाई जा सकती है.
आयुर्वेद के नजरिए से भी गुणकारी शमी को वह्निवृक्ष भी कहा जाता है. आयुर्वेद की दृष्टि में तो शमी अत्यंत गुणकारी औषधि मानी गई है. कही में इस वृक्ष के अंग काम आते हैं.
क्या है पौराणिक मान्यता
पौराणिक मान्यताओं में शमी का वृक्ष बड़ा ही मंगलकारी माना गया है. लंका पर विजयी पाने के बाद श्रीराम ने शमी पूजन किया था. नवरात्र में भी मां दुर्गा का पूजन शमी वृक्ष के पत्तों से करने का विधान है. गणेश जी और शनिदेव, दोनों को ही शमी बहुत प्रिय है.
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शमी वृक्ष
शास्त्रों में कहा गया है कि एक पेड़ दस पुत्रों के समान होता है। पेड़-पौधे घर की सुंदरता के साथ-साथ घर की सुख-शांति के द्योतक भी माने जाते हैं। हिंदू सभ्यता में मान्यता है कि कुछ पेड़-पौधों को घर में लगाने या उनकी उपासना करने से घर में सदा खुशहाली रहती है और घर में सदैव लक्ष्मी का वास रहता है। पीपल, केला और शमी का वृक्ष आदि ऐसे पेड़ हैं जो घर मंद समृद्धि प्रदान करते हैं। मान्यता है कि शमी का पेड़ घर में लगाने से देवी-देवताओं की कृपा बनी रहती है। पीपल और शमी दो ऐसे वृक्ष हैं जिन पर शनि का प्रभाव होता है। इसलिए लोग इन्हे घर में लगाने से भी डरते है पीपल का वृक्ष बहुत बड़ा होता है इसलिए इसे घर में लगाना संभव नहीं हो पाता। लेकिन शम्मी का पौधा आप गमले में भी लगा सकते है बिहार और झारखंड में यह वृक्ष अधिकतर घरों के दरवाजे के बाहर लगा हुआ मिलता है। 'खेजड़ी' या 'शमी' वृक्ष थार के मरुस्थल एवं अन्य स्थानों में ज्यादातर पाया जाता है। यह वहां के लोगों के लिए बहुत उपयोगी है। यह वृक्ष दुनिया के विभिन्न देशों में पाया जाता है जहाँ इसके अलग अलग नाम हैं। इसके अन्य नामों में घफ़ (संयुक्त अरब अमीरात), खेजड़ी, जांट/ जांटी, सांगरी (राजस्थान), जंड (पंजाबी), कांडी सिंध), वण्णि (तमिल), शमी, सुमरी (गुजराती) आते हैं। इसका व्यापारिक नाम 'कांडी' है। अंग्रेजी में यह प्रोसोपिस 'सिनेरेरिया 'नाम से जाना जाता है। खेजड़ी का वृक्ष जेठ के महीने में भी हरा रहता है। कई जगह शम्मी को 'सफ़ेद कीकर' के नाम से भी जाना जाता है दिखने में ये बबूल के वृक्ष जैसा होता है और ज्यादातर शुष्क और रेतीली भूमि पर उगता है इस पर पीले और गुलाबी पुष्प मार्च से मई के बीच उगते है ये मर प्रजाति का पेड़ है जिस पर फलियां आती है जिसे खाया भी जाता है शमी की सबसे बड़ी विशेषता है की पानी की बेहद कमी हो जाने पर भी इस की पत्तियां हरी ही रहती है और जानवरो को अकाल में भी भरपूर चारा मिलता रहता है
शमी वृक्ष को सही दिशा ज्ञान से लगाना अत्यंत महत्वपूर्ण क्यों है ?
शमी की के पूजा साथ ही एक सवाल यह भी है कि इस पेड़ को घर में किस तरफ लगाना चाहिए ? वास्तु शास्त्र में शमी का वृक्ष घर के ईशान कोण (पूर्वोत्तर) में लगाना लाभकारी माना गया है क्योंकि शमी वृक्ष तेजस्विता एवं दृढता का प्रतीक है। पूजा आदि के लिए तो इसे मंदिरो के आस पास कही भी लगाया जा सकता है शमी का वृक्ष आप अपने बगीचे में या गमले में लगा सकते हैं इसे सदैव आप अपने घर से निकलते समय ऐसी दिशा में लगाएं की जब भी घर से बाहर निकले तो यह आपके दाहिने हाथ की तरफ पड़े उत्तर भारत के बिहार राजस्थान, पंजाब और झारखंड में सुबह के समय उठने के बाद शमी के वृक्ष के दर्शन को शुभ माना जाता है। लोग किसी भी काम पर जाने से पहले इसके दर्शन करते है और इसे माथे से लगाते हैं उन्हें विश्वास है की ऐसे करने से उन्हें उस काम में कामयाबी मिलती है। अगर आपके घर में कच्ची जगह नहीं है तो आप अपने छत पर भी यह पौधा रख सकते हैं छत पर इस पौधे को आप दक्षिण दिशा में रखने की कोशिश करें।
शमी वृक्ष की पवित्रता का ध्यान रखते हुए कैसे लगाए ? शमी के पौधे को लगाने के साथ-साथ इसकी देखरेख भी काफी जरूरी है इस पौधे को ज्यादा पानी की जरूरत नहीं होती लेकिन धूप बहुत चाहिए तो आप कोशिश करें कैसे सनलाइट में ही रखें साथ ही साथ ज्यादा पानी ना दें इस पौधे को पवित्र गमले में या साफ जगह में लगाएं इस पौधे के आसपास आप नाली का पानी या फिर कूड़ा वगैरा फेंकने की जगह नहीं होनी चाहिए इसका गमला ऐसी जगह रखें जहां पर कोई व्यक्ति ना थूके इसके अलावा शमी के पवित्र पौधे को लगाने के लिए जो भी मिट्टी आप प्रयोग में लाएं उसे साफ जगह से लाये नाली की गन्दी या राख वाली मिट्टी प्रयोग ना करें गमले में गोबर खाद या फिर कंपोस्ट ही लगाएं केमिकल फर्टिलाइजर का प्रयोग ना करें जल देने वाले पात्र झूठा नहीं होना चाहिए
शमी वृक्ष की धार्मिक महत्त्व और पौराणिक मान्यताये शमी शमयते पापम् शभी शत्रुविनाशिनी ।
अर्जुनस्य धनुर्धारी रामस्य प्रियदर्शिनी ॥
करिष्यमाणयात्राया यथाकालम् सुखम् मया ।
तंत्रनिर्विघ्नकर्त्रीत्वं भव श्रीरामपूजिता ॥
धार्मिक मान्यताओं में शमी का वृक्ष बड़ा ही मंगलकारी माना गया है शमी के वृक्ष पर कई देवताओं का वास माना गया है दशहरे पर शमी के वृक्ष के पूजन का विशेष महत्व है ऐसी मान्यता है कि मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने लंका पर आक्रमण करने से पहले शमी के वृक्ष के सम्मुख अपनी विजय के लिए प्रार्थना की थी रावण दहन के बाद घर लौटते समय शमी के पत्ते लूट कर लाने की प्रथा आज भी है इसकी पत्तियां 'स्वर्ण का प्रतीक मानी जाती है नवरात्र के दिनों में मां दुर्गा का पूजन शमी वृक्ष के पत्तों से करने का शास्त्रों में विधान है नवरात्र के नौ दिनों में प्रतिदिन शाम के समय वृक्ष का पूजन करने से धन की प्राप्ति होती है महाभारत में पांडवों द्वारा अज्ञातवास के अंतिम वर्ष में गांडीव धनुष इसी पेड़ में छुपाए जाने के उल्लेख मिलते हैं गणेश जी और शनिदेव दोनों को ही शमी बहुत प्रिय है। शमी के पेड़ की पूजा करने से शनि देव और भगवान गणेश दोनों की ही कृपा प्राप्त की जा सकती है एक मान्यता के अनुसार कवि कालिदास को शमी के वृक्ष के नीचे बैठकर तपस्या करने से ही ज्ञान की प्राप्ति हुई थी इस पौधे में भगवान शिव स्वयं वास करते हैं जो गणेश जी के पिता और शनिदेव के गुरू हैं इसलिए भगवान गणेश की आराधना में शमी के वृक्ष की पत्तियों को अर्पित किया जाता है शमी पत्र के उपाय करने से घर-परिवार से अशांति को दूर भगाया जा सकता है ऋग्वेद के अनुसार शमी के पेड़ में आग पैदा करने कि क्षमता होती है ऋग्वेद की ही एक कथा के अनुसार आदिम काल में सबसे पहली बार मनुष्य ने शमी और पीपल की टहनियों को रगड़ कर ही आग पैदा की थी क्योंकि शमी में प्राकृतिक तौर पर अग्नि तत्व की प्रचुरता होती है। इसलिए यज्ञ में अग्नि को प्रज्जवलित करने हेतु शमी की लकड़ी के विभिन्न उपकरणों का निर्माण किया जाता है शमी वृक्ष की लकड़ी को यज्ञ की वेदी के लिए पवित्र माना जाता है शनिवार को करने वाले यज्ञ में शमी की लकड़ी से बनी वेदी का विशेष महत्व है शमी या खेजड़ी के वृक्ष की लकड़ी यज्ञ की समिधा के लिए पवित्र मानी जाती है वसन्त ऋतु में समिधा के लिए शमी की लकड़ी का प्रावधान किया गया है शमी के पेड़ को शास्त्रों में 'वह्निवृक्ष' भी कहा जाता है।
शमी (खेजड़ी) वृक्ष का महत्त्व एवं पूजन विधि
स्नानोपरांत साफ कपड़े धारण करें। फिर प्रदोषकाल में शमी के पेड़ के पास जाकर सच्चे मन से प्रमाण कर उसकी जड़ को गंगा जल, नर्मदा का जल या शुद्ध जल चढ़ाएं। उसके बाद तेल या घी का दीपक जलाकर उसके नीचे अपने शस्त्र रख दें।
फिर पेड़ के साथ शस्त्रों को धूप, दीप, मिठाई चढ़ाकर आरती कर पंचोपचार अथवा षोडषोपचार पूजन करें। साथ ही हाथ जोड़ कर सच्चे मन से यह प्रार्थना करें।
'शमी शम्यते पापम् शमी शत्रुविनाशिनी ।
अर्जुनस्य धनुर्धारी रामस्य प्रियदर्शिनी ।।
करिष्यमाणयात्राया यथाकालम् सुखम् मया । तत्रनिर्विघ्नकर्त्रीत्वं भव श्रीरामपूजिता ।।'
इसका अर्थ है। हे शमी वृक्ष आप पापों को नाश और दुश्मनों को हराने वाले है। आपने ही शक्तिशाली अर्जुन का धनुश धारण किया था। साथ ही आप प्रभु श्रीराम के अतिप्रिय है। ऐसे में आज हम भी आपकी पूजा कर रहे हैं। हम पर कृपा कर हमें सच्च व जीत के रास्ते पर चलने की प्रेरणा दें। साथ ही हमारी जीत के रास्ते पर आने वाली सभी बांधाओं को दूर कर हमें जीत दिलाए ।
यह प्रार्थना करने के बाद अगर आपको पेड़ के पास कुछ पत्तियां गिरी मिलें तो उसे प्रसाद के तौर पर ग्रहण करें। साथ ही बाकी की पत्तियों को लाल रंग के कपड़े में बांधकर हमेशा के लिए अपने पास रखें। इससे आपके जीवन की परेशानियां दूर होने के साथ दुश्मनों से छुटकारा मिलेगा। इस बात का खास ध्यान रखें कि आपकी पेड़ से अपने आप गिरी पत्तियां उठानी है। खुद पेड़ से पत्तों को तोड़ने की गलती न करें।
4- यह वृक्ष जेठ के महीने में भी हरा रहता है। ऐसी गर्मी में जब रेगिस्तान में जानवरों के लिए धूप से बचने का कोई सहारा नहीं होता तब यह पेड़ छाया देता है। जब खाने को कुछ नहीं होता है तब यह चारा देता है, जो लूंग कहलाता है।
- इसका फूल मींझर कहलाता है। इसका फल सांगरी कहलाता है, जिसकी सब्जी बनाई जाती है। यह फल सूखने पर खोखा कहलाता है जो सूखा मेवा है। इसकी लकडी मजबूत होती है जो किसान के लिए जलाने और फर्नीचर बनाने के काम आती है। इसकी जड़ से हल बनता है।
★ वराहमिहिर के अनुसार जिस साल शमीवृक्ष ज्यादा फूलता फलता है उस साल सूखे की स्थिति का निर्माण होता है। विजयादशमी के दिन इसकी पूजा करने का एक तात्पर्य यह भी है कि यह वृक्ष आने वाली कृषि विपत्ती का पहले से संकेत दे देता है जिससे किसान पहले से भी ज्यादा पुरुषार्थ करके आनेवाली विपत्ती से निजात पा सकता है।
अकाल के समय रेगिस्तान के आदमी और जानवरों का यही एक मात्र
सहारा है। सन १८९९ में दुर्भिक्ष अकाल पड़ा था जिसको छपनिया अकाल
कहते हैं, उस समय रेगिस्तान के लोग इस पेड़ के तनों के छिलके खाकर जिन्दा
रहे थे।
इस पेड़ के नीचे अनाज की पैदावार ज्यादा होती है। पांडवों द्वारा अज्ञातवास के अंतिम वर्ष में गांडीव धनुष इसी पेड़ में छुपाए जाने के उल्लेख मिलते हैं।
शमी या खेजड़ी के वृक्ष की लकड़ी यज्ञ की समिधा के लिए पवित्र मानी जाती है। वसन्त ऋतु में समिधा के लिए शमी की लकड़ी का प्रावधान किया गया है। इसी प्रकार वारों में शनिवार को शमी की समिधा का विशेष महत्त्व है। शमी शनि ग्रह का पेड़ है. राजस्थान में सबसे अधिक होता है. छोटे तथा मोटे काँटों वाला भारी पेड़ होता है.
कृष्ण जन्मअष्टमी को इसकी पूजा की जाती है. बिस्नोई समाज ने इस पेड़
के काटे जाने पर कई लोगों ने अपनी जान दे दी थी। 4 कहा जाता है कि इसके लकड़ी के भीतर विशेष आग होती है जो रगड़ने
पर निकलती है. इसे शिंबा, सफेद कीकर भी कहते हैं। घर के ईशान में आंवला वृक्ष, उत्तर में शमी (खेजड़ी), वायव्य
वृक्ष) तथा दक्षिण में गूलर वृक्ष लगाने को शुभ माना गया है।
में बेल (बिल्व
कवि कालिदास ने शमी के वृक्ष के नीचे बैठ कर तपस्या कर के ही ज्ञान की
प्राप्ति की थी। ऋग्वेद के अनुसार आदिम काल में सबसे पहली बार पुरुओं ने शमी और
पीपल की टहनियों को रगड़ कर ही आग पैदा की थी। ★ कवियों और लेखकों के लिये शमी बड़ा महत्व रखता है। भगवान चित्रगुप्त को शब्दों और लेखनी का देवता
माना जाता है और शब्द-साधक यम-द्वितीया को यथा संभव शमी के पेड़ के नीचे उसकी पत्तियों से उनकी पूजा करते हैं। 4 नवरात्र में मां दुर्गा की पूजा भी शमी वृक्ष के पत्तों से करने का शास्त्र में विधान है। इस दिन शाम को वृक्ष का पूजन करने से आरोग्य व धन की प्राप्ति होती है।
2- कहते हैं एक आक के फूल को शिवजी पर चढ़ाना से सोने के दान के
बराबर फल देता है, हज़ार आक के फूलों कि अपेक्षा एक कनेर का फूल, हज़ार
कनेर के फूलों के चढ़ाने कि अपेक्षा एक बिल्व पत्र से मिल जाता है। हजार बिल्वपत्रों के बराबर एक द्रोण या गूमा फूल फलदायी हजार गूमा के बराबर एक चिचिड़ा, हजार चिचिड़ा के बराबर एक कुश का फूल, हजार कुश फूलों के बराबर एक शमी का पत्ता, हजार शमी के पत्तो के बराबर एक नीलकमल, हजार नीलकमल से ज्यादा एक धतूरा और हजार धतूरों से भी ज्यादा एक शमी का फूल शुभ और पुण्य देने वाला होता है इसलिए भगवान भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए एक शमी का पुष्प चढ़ाएं क्योंकि यह फूल शुभ और देने वाला होता है। पुण्य ★ इसमें औषधीय गुण भी है. यह कफनाशक, मासिक धर्म की समस्याओं को दूर करने वाला और प्रसव पीड़ा का निवारण करने वाला पौधा है..
शन्नोदेवीरभीष्टय आपो भवन्तु पीतये शन्नोदेवीरभीष्टय
शमी पोधे की पूजा करने से आपको क्या क्या लाभ मिलता है।
शमी शनिदेव को प्रिय है इसलिए शमी की पूजा सेवा करने से शनि की कृपा प्राप्त होती है और समस्त संकटों का नाश होता है। आइये जानते हैं शमी के पौधे के क्या-क्या उपाय किए जा सकते हैं:
- इसके जड़ को शनि रत्न के स्थान पर धारण कर सकते हैं। पुष्प का अ
महात्म्य है।
- यदि परिवार में धन का अभाव बना हुआ है। खूब मेहनत करने के बाद भी धन की कमी है और खर्च अधिक है तो किसी शुभ दिन शमी का पौधा खरीदकर घर ले आएं। शनिवार के दिन प्रातः स्नानादि से निवृत्त होकर नए गमले में शुद्ध मिट्टी भरकर शमी का पौधा लगा दें। इसके बाद शमी पौधे की में जड़ में एक पूजा की सुपारी, अक्षत पौधे पर गंगाजल अर्पित करें और पूजन करें। पौधे में रोज पानी डालें और शाम के समय उसके समीप एक दीपक लगाएं। आप स्वयं देखेंगे धीरे-धीरे आपके खर्च में कमी आने लगेगी और धन संचय होने लगेगा।
शनिवार को शाम के समय शमी के पौधे के गमले में पत्थर या किसी भी धातु का एक छोटा सा शिवलिंग स्थापित करें। शिवलिंग पर दूध अर्पित करें और विधि-विधान से पूजन करने के बाद महामृत्युंजय मंत्र की एक माला जाप करें। इससे स्वयं या परिवार में किसी को भी कोई रोग होगा तो वह जल्दी ही दूर हो जाएगा।
- कई सारे युवक-युवतियों के विवाह में बाधा आती है। विवाह में बाधा आने का एक कारण जन्मकुंडली में शनि का दूषित होना भी है किसी भी शनिवार से प्रारंभ करते हुए लगातार 45 दिनों तक शाम के समय शमी के पौधे में घी का दीपक लगाएं और सिंदूर से पूजन करें। इस दौरान अपने शीघ्र विवाह की कामना व्यक्त करें। इससे शनि दोष समाप्त होगा और विवाह में आ रही बाधाएं समाप्त होंगी।
- जन्मकुंडली में यदि शनि से संबंधित कोई भी दोष है तो शमी के पौधे को घर में लगाना और प्रतिदिन उसकी सेवा-पूजा करने से शनि की पीड़ा समाप्त होती है।
जिन लोगों को शनि की साढ़े साती या ढैया चल रहा हो उन्हें नियमित रूप से शमी के पौधे की देखभाल करना चाहिए। उसमें रोज पानी डालें, उसके समीप शाम के समय दीपक लगाएं। शनिवार को पौधे में थोड़े से काले तिल और काले उड़द अर्पित करें। इससे शनि की साढ़ेसाती का दुष्प्रभाव कम होता ।
यदि आप बार-बार दुर्घटनाग्रस्त हो रहे हों तो शमी के पौधे के नियमित दर्शन से दुर्घटनाएं रुकती हैं।
जानें क्या है शमी वृक्ष (Shami tree) का धार्मिक महत्व

भारत एक ऐसा राष्ट्र है जहां ब्रह्मांड में जीवित और निर्जीव सभी चीजों का सम्मान किया जाता है। यह तत्व हर त्योहार या उत्सव में किसी न किसी रूप में मौजूद होता है।
विजयादशमी नवरात्रि की पवित्र नौ रातों के बाद बुराई पर अच्छाई की जीत का जश्न मनाने का दिन है। हालांकि इस दिन को कई क्षेत्रों में और भी महत्वों के साथ मनाया जाता है। यह एक कर्मकांड गतिविधि का एक टुकड़ा है, जिसे शमी वृक्ष पूजा और शमी पत्र के वितरण के रूप में जाना जाता है।
इस पेड़ के बारे में पढ़ना कितना दिलचस्प है, यह आपको आगे समझ आ जाएगा। हम आपको शमी के पौधे के लाभ या शमी के पेड़ के लाभों के बारे में बताने के लिए इंतजार नहीं करा सकते। तो बिना देर किए चलिए शुरू करते हैं।
वैज्ञानिक दृष्टि से शमी ट्री
शमी ट्री का वनस्पति शास्त्र का नाम प्रोसोपिस सिनेरिया ट्री है, जो फैबेसी परिवार में एक फूल वाला पेड़ है। अफगानिस्तान, ईरान, भारत, ओमान, पाकिस्तान, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और यमन पश्चिमी एशिया और भारतीय उपमहाद्वीप के शुष्क क्षेत्रों में पाया जाता है। भारत में, यह राजस्थान और तेलंगाना का राज्य वृक्ष है। बहरीन में जीवन के वृक्ष के नाम से जाना जाता है, यह वृक्ष प्रजातियों का एक बड़ा और प्रसिद्ध उदाहरण है। यह लगभग 400 साल पुराना है और रेगिस्तान में उगता है, जहां पानी के कोई दृश्य स्रोत नहीं होते हैं। यह संयुक्त अरब अमीरात का राष्ट्रीय वृक्ष भी है।
धार्मिक महत्व
शमी एक हिंदू देवी हैं, जिनकी पूजा दशहरा उत्सव के दौरान की जाती है। यह पेड़ दशहरा महोत्सव के दसवें दिन विशेष रूप से पूजनीय होता है, जब पूरे भारत में इसकी पूजा की जाती है। राणा, जो राजपूतों में महायाजक और राजा दोनों थे, इस पेड़ की पूजा करते थे और नीलकंठ पक्षी को छोड़ते थे, जिसे भगवान राम का पवित्र पक्षी माना जाता था।
दक्षिण में दशहरा के दसवें दिन अभ्यास के रूप में मराठा पेड़ के पत्ते पर तीर चलाते थे और गिरते पत्ते को अपनी पगड़ी में इकट्ठा करते थे। कर्नाटक में इसे बन्नी मारा के नाम से जाना जाता है। यहां भी इसे विजय दशमी के दिन पूजा जाता है। यहां पांडव अपने निर्वासन के दौरान हथियर छुपाते थे।
शम्मी वृक्ष, जिसे बन्नी मारा के नाम से भी जाना जाता है, इसका मैसूर में एक विशेष स्थान है। यहां विजय-दशमी के दिन इसकी पूजा की जाती है।
कहा जाता है कि महाभारत काल में पांडवों ने अपने वनवास का तेरहवां वर्ष बिताया था।
साथ ही माना जाता है अपने निर्वासन के दौरान पांडवों ने अपने हथियारों को इस पेड़ से लटका कर रखा था। एक साल बाद जब वह वापस लौटे तो उन्हें अपने हथियार सुरक्षित मिले। उन्होंने पेड़ की पूजा की और अपने हथियार को सुरक्षित संभालने के लिए शमी पेड़ का धन्यवाद भी दिया।
कर्नाटक में पौराणिक कथाओं के अनुसार
प्राचीन मान्यताओं के अनुसार शमी वृत एक गरीब, बेसहारा बालक था, जिसने अनाथ होते हुए भी सभी गुणों को धारण किया। गुरु महाना ने उसी स्थान पर सिसु नाम से एक गुरुकुल (भारतीय पारंपरिक विद्यालय) चलाया। एक मेहनती और समर्पित छात्र शमीवृत ने गुरुकुल में दाखिला लिया और पूरी ईमानदारी और समर्पण के साथ अपनी पढ़ाई शुरू की। एक सहपाठी के रूप में, उनके पास उस राज्य के महाराजा के पुत्र राजकुमार वृक्षित थे।
जैसा कि गुरु महाना सुझाव देते थे, अच्छी शिक्षा के लिए बहुत विनम्रता की आवश्यकता होती है, और ज्ञान प्राप्त करने के लिए कई बार भूखे रहना भी आवश्यक हो सकता है। लेकिन राजकुमार ने शनिवृत से बेईमानी कर ली। क्योंकि उनके दोस्त राजकुमार वृक्षित का मानना था कि “उत्साह और ज्ञान केवल तभी प्राप्त किया जा सकता है जब पेट भूखा नहीं है। ” नहीं तो विद्यार्थी जीवित लाश के समान होता है।”
वर्षों बीत गए, और गुरुकुल सिसु में उनकी शिक्षा समाप्त हो गई। यह हर किसी के लिए वास्तविक दुनिया का सामना करने और अपने अनुभव को व्यावहारिक उपयोग करने का समय था। गुरु महाना ने उन्हे वचन दिया था कि वे उनके घर जाने से पहले उनकी गुरु दक्षिणा प्राप्त करने के लिए नियत समय पर उनमें से प्रत्येक के पास आएंगे।
एक दिन गुरु महाना वृक्षित के महल में आते हैं। वृक्षित इस समय तक राजकुमार से राजा बन चुके हैं। गुरु के आगनम से खुश होकर राजा वृक्षित उनका अच्छे से स्वागत करते हैं। वह अपने गुरु को वह सब कुछ देना चाहता था, जो उसे पहले कभी किसी ने नहीं दिया था और फिर कोई उसे कभी नहीं दे सकता था। वह यह भी चाहता था कि गुरु यह देखे कि यह शाही शिष्य, जो अब राजा है, उसके लिए कितना मूल्यवान था। फिर उसने महल के हाथी को सोने के सिक्कों, रत्नों और गहनों से लाद दिया और उसे गुरु के पास भेज दिया। फिर उन्होंने शमीवृत की पीड़ा को देखने के लिए गुप्त रूप से गुरु का पीछा किया। जो निस्संदेह अपने गुरु को कुछ भी देने में विफलता के कारण पश्चाताप कर रहे होंगे।
जब गुरु महाना शामिवृत की झोपड़ी में पहुंचते हैं, तो वे श्रद्धा से उनका स्वागत करते हैं और उन्हें दूध और फल देते हैं। उन्होंने गुरु का हालचाल पूछा। इस तथ्य के बावजूद कि उसके पास देने के लिए कुछ नहीं है, शमीवृत ने अपने गुरु को आश्वासन दिया कि वह कुछ मांग सकते है, जो वह उसे उपलब्ध करा देगा। तभी गुरु ने शमि वृत्त से कुछ ऐसा मांगा कि सभी आश्चर्यचकित रह गए। गुरु ने शमि वृत्त से मांग की कि शमीवृत उन्हें अपने बगीचे से ताज़ी हरी पत्तियों वाला एक पूर्ण विकसित शमी वृक्ष भेजे। शमीवृत, जो मानता है कि गुरु से बड़ा कुछ नहीं है और मृत्यु से बड़ा कुछ भी नहीं है, वह तुरंत गुरु को अर्पित करता है और शमी वृक्ष अपने गुरु को भेंट कर देता है।
जब शमि वृत अपने को गुरु को उस पेड़ को भेंट करता है, तो उस पेड़ को गुरु महाना जैसे ही छूते हैं, पेड़ के सभी पत्ते सोने के सिक्कों में बदल जाते हैं। और वह एक-एक करके पेड़ से गिरने लगते हैं, अंत में एक बड़ा ढेर बन गया। हैरानी की बात यह है कि पेड़ पर पहले से ही पत्ते थे।
तब गुरु महाना कहते हैं, “प्रेम से दिया गया पत्ता भी गर्व से दिए गए किसी भी उपहार की तुलना में सोने के बराबर है।” फिर वह राजा वृक्षित को बुलाता है और उसे सूचित करता है कि जबकि सोना प्रचुर मात्रा में है, यह प्यार या एक अच्छा रिश्ता नहीं खरीद सकता है। फिर वह वृक्षित से अपने मित्र शमीवृत से क्षमा मांगने के लिए कहता है। इस वृक्ष की महानता के कारण वे एक और घनिष्ठ मित्र बन गए और इन दोनों के नाम पर इसे शमीवृक्ष कहा गया।
विजयादशमी पर शमी पत्री या बन्नी और (पत्ते) सोने के समान उपहार के संकेत के रूप में प्रसिद्ध हो गए, लेकिन प्यार से भर गए। जब हम पत्ते सौंपते हैं, तो हम कहते हैं “बन्नी बंगारावागोना,” जिसके दो अर्थ हैं। आओ, हम सोना बनें, शाब्दिक रूप से, लेकिन प्रतीकात्मक रूप से, इसका अर्थ है, हम बन्नी / शमी सोने के रिश्ते की तरह बनें।
दशहरा का महत्व
- दशहरा बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है और इसे पूरे देश में व्यापक रूप से मनाया जाता है।
- भारत में, दशहरा फसल की कटाई के मौसम की शुरुआत का प्रतीक है। इस समय खरीफ (मानसून) की अधिकांश फसलें, जैसे दलहन और अनाज, कटाई के लिए तैयार रहती हैं।
- अच्छी और उत्पादक कृषि उपज सुनिश्चित करने के लिए विजयदशमी अनुष्ठान, उत्सव और बलिदान किए जाते हैं, ताकि दीवाली, रोशनी का त्योहार, बीस दिन बाद मनाया जा सके।
- विजयादशमी, जिसे दशहरा के नाम से भी जाना जाता है, भारत के सबसे लोकप्रिय त्योहारों में से एक है। दशहरे की पूर्व संध्या पर कई प्राचीन ऐतिहासिक घटनाएं घटीं, जिन्होंने बुराई पर वास्तविकता की जीत को चिह्नित किया।
- इस दिन, दुर्गा ने राक्षस महिषासुर को हराया, राम ने रावण को हराया, पांडवों का वनवास समाप्त हुआ, और कई अन्य महत्वपूर्ण सकारात्मक घटनाएं हुईं। ऐसी कई कहानियां हैं, जो प्रत्येक घटना का विवरण देती हैं।
- भारत के अलग-अलग हिस्सों में विजयादशमी को अलग-अलग तरीकों से मनाया जाता है, लेकिन उनमें से ज्यादातर में एक चीज जो खास होती है, वह है कुछ पौधों को महत्व।
- वास्तव में, इनमें से कुछ पौधे त्योहार के परिणामस्वरूप भारत में लोकप्रिय हो गए हैं। इसका श्रेय शमी पौधे के जाता है। आइए इन पौधों के बारे में जानिए।
आपटा ट्री एक ऐसा पेड़ है जो भारत में उगता है
- इस देशी भारतीय पेड़ का वैज्ञानिक नाम बौहिनिया रेसमोसा है।
- पेड़ को इसकी विशिष्ट खुरदरी बनावट वाली जुड़वां पत्तियों से आसानी से पहचाना जा सकता है।
- महाराष्ट्र में दशहरा के दिन इसके पत्तों को पेड़ से तोड़ा जाता है, सोने के रूप में कारोबार किया जाता है, और एक दूसरे से लाक्षणिक रूप से चुराया जाता है।
- पेड़ में औषधीय गुण होते हैं और आयुर्वेदिक चिकित्सा में अत्यधिक महत्वपूर्ण है।
- औषधीय पौधों के लाभों के बारे में जानिए।
आपटा वृक्ष का महत्व
किंवदंती के अनुसार इस दिन धन के देवता ‘कुबेर’ ने ‘गुरु-दक्षिणा’ का भुगतान करने में ‘कौत्स्य’ नामक एक सम्मानित विद्वान की सहायता के लिए लाखों आपटा के पत्तों को सोने में परिवर्तित कर दिया था। कौत्स्य ने केवल एक ही स्वीकार कर बाकी को ‘अयोध्या’ के लोगों के बीच बांट दिया गया था।
शमी ट्री एक प्रकार का पेड़ है जो भारत में उगता है
प्रोसोपिस सिनेरिया इस फलीदार पेड़ का वैज्ञानिक नाम है, जो भारतीय उपमहाद्वीप का मूल निवासी है।
बबूल की तरह यह पेड़ भारत के शुष्क, शुष्क क्षेत्रों में उगता है। इसके औषधीय महत्व के कारण, इसे रेगिस्तान में “जीवन के वृक्ष” के रूप में जाना जाता है।
शमी वृक्ष का महत्व
महाभारत में कौरवों से पासे का खेल हारने के बाद पांडवों को बारह साल के लिए जंगल में निर्वासित कर दिया गया था। अपने निर्वासन के अंतिम वर्ष को पूरा करने के लिए विराट के राज्य में शामिल होने से पहले, पांडव अपने हथियारों को एक शमी के पेड़ के एक छेद में छिपा गए थे। उन्होंने अगले वर्ष विजयदशमी पर पेड़ से हथियार वापस लिए, और अपनी असली पहचान की घोषणा की। इसके बाद कौरवों को हराया, जिन्होंने राजा विराट पर अपने मवेशियों को चुराने के लिए आक्रमण किया था।
उस समय से शमी वृक्षों और हथियारों का सम्मान किया जाता रहा है और विजयदशमी पर शमी के पत्तों का आदान-प्रदान सद्भावना का प्रतीक बन गया है।
गेंदे का पौधा
ये केसरिया रंग के फूल होते हैं। जिन्हें महाराष्ट्र में ‘ज़ेंदु’ के नाम से भी जाना जाता है। यह आसानी से मिल जाता है। फूलों का उपयोग पूजा और सजावट के लिए माला के रूप में किया जाता है।
गेंदा मौसमी फूल वाले पौधे हैं, जो दुर्गा पूजा और दशहरा के दौरान खिलते हैं, जब मानसून की शुरुआत में बीज बोए जाते हैं।
जौ का पौधा
नवरात्रि के पहले दिन, उत्तर भारतीय राज्यों में मिट्टी के बर्तनों में जौ के बीज बोने की प्रथा है।
जौ का महत्व
नवरात्रों के नाम से जाने जाने वाले नौ दिन पुराने अंकुरित दशहरे पर भाग्य के लिए उपयोग किए जाते हैं। पुरुष उन्हें अपनी टोपी में या अपने कानों के पीछे पहनते हैं
यह नवरात्रि के पहले दिन से शुरू होकर नौ दिनों तक चलता है। दसवें दिन, विजयदशमी, या दशहरा मनाया जाता है। इस दिन भगवान राम ने राक्षस राजा लंकापति रावण का वध किया था। ऐसे में दशहरे के पावन पर्व को बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। साथ ही उसी दिन इसे मनाने का रिवाज भी उसी दिन शुरू हुआ। ऐसे में, दुनिया भर के विभिन्न शहरों में दशहरा उत्सव मनाया जाता है, प्रत्येक के अपने रीति-रिवाज हैं। दशहरे के दिन कई लोग शस्त्र और शमी वृक्ष की पूजा करते हैं। तो, आइए इसे करीब से देखें।
शमी के पेड़ का महाभारत में महत्व
पौराणिक कथा के अनुसार महाभारत काल में पांडवों ने शमी के पेड़ पर अपने हथियार छुपाए थे। इन हथियारों इस्तेमाल तब कौरवों को हराने के लिए किया गया था। दशहरे के दिन प्रदोष काल के दौरान शमी वृक्ष की पूजा करना ऐसी स्थिति में बहुत शुभ माना जाता है। साथ ही नियमित रूप से इसकी पूजा करने से जीवन की समस्याओं से मुक्ति के साथ-साथ सुख, समृद्धि और शांति भी मिलती है।
तो आइए जानते हैं शमी उपासना के नियमों के बारे में
सबसे पहले स्नान से स्नान करें।
फिर सच्चे मन से प्रदोष काल में शमी वृक्ष के पास जाकर उसकी जड़ में गंगाजल, नर्मदा जल या शुद्ध जल अर्पित करें।
इसके बाद तेल या घी का दीपक जलाकर उसके नीचे हथियार रखें।
वृक्षों सहित हथियारों पर धूप, मोमबत्ती और मिठाई चढ़ाकर आरती करें और पंचोपचार या षोडशोपचार की पूजा करें।
इस प्रार्थना को हाथ जोड़कर और सच्चे मन से उच्चारण करें..
शमी शम्यते पापम् शमी शत्रुविनाशिनी।
अर्जुनस्य धनुर्धारी रामस्य प्रियदर्शिनी।।
करिष्यमाणयात्राया यथाकालम् सुखम् मया।
तत्रनिर्विघ्नकर्त्रीत्वं भव श्रीरामपूजिता।।
इसका अर्थ है कि हे शमी वृक्ष, आप पापों को मार सकते हैं और शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर सकते हैं। आप शक्तिशाली अर्जुन के धनुर्धर थे। साथ ही प्रभु श्रीराम आपका बहुत सम्मान करते हैं। ऐसे में हम आज भी आपकी पूजा कर रहे हैं। हम पर आपका आशीर्वाद रहे, और आप हमें ईमानदारी और जीत के अपने पदचिन्हों पर चलने के लिए प्रोत्साहित करें। इसके अलावा, उन सभी बाधाओं को दूर करें जो हमारी जीत के रास्ते में आती हैं और हमें जीत की ओर ले जाती हैं।
यदि पूजा करने के बाद पेड़ के पास कोई पत्ते मिले तो उन्हें प्रसाद के रूप में लें। साथ ही बचे हुए पत्तों को लाल कपड़े में लपेटकर हमेशा अपने पास रखें। इससे आपके शत्रुओं से छुटकारा तो मिलेगा ही साथ ही आपकी परेशानियों से भी छुटकारा मिलेगा। ध्यान रखें कि आपको अपने पेड़ से स्वचालित रूप से पत्तियों का चयन करना होगा। पेड़ से पत्ते तोड़ने के जाल में मत पड़ो।
आशा है कि आप लोगों को शमी वृक्ष, दशहरा और इसके अंतिम महत्व के बारे में स्पष्ट तस्वीर मिल गई होगी। इधर या उधर, बस पेड़ों को बचाना याद रखें, और अपने सीखने के पेड़ को बढ़ने दें।
मिलता है सुख और धन
शास्त्रों के बताए अनुसार सावन के महीने में अगर प्रतिदिन भगवान भोलेनाथ की पूजा के दौरान शमी पत्र चढ़ाया जाए तो वह बहुत प्रसन्न होते हैं। आमतौर पर शिवजी का गाय के कच्चे दूध से अभिषेक कराना, धतूर पुष्प, मदार पुष्प, बेलपत्र, शमी पत्र तथा सुगंधित पुष्प अर्पित करने से भोलेनाथ प्रसन्न होते हैं। पूजन पश्चात भगवान की आरती करनी चाहिए। ऐसा करने से सुख और धन की प्राप्ति होती है। जीवन के कष्ट दूर हो जाते हैं।
इस तरह चढ़ाएं शमी पत्र
शमी पत्र चढ़ाने के लिए भगवान भोलेनाथ के मंदिर में जाकर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुह कर बैठ जाएं। भगवान भोलेनाथ को जल, दूध से स्नान करवाएं। इसके पश्चात शमी पत्र अर्पित करें अवश्य ही भगवान भोलेनाथ का आशीर्वाद प्राप्त होगा।
छोंकरा (उत्तर प्रदेश), जंड (पंजाबी), कांडी (सिंध), वण्णि (तमिल), शमी, सुमरी (गुजराती) आते हैं। इसका व्यापारिक नाम कांडी है। यह वृक्ष विभिन्न देशों में पाया जाता है जहाँ इसके अलग अलग नाम हैं। अंग्रेजी में यह प्रोसोपिस सिनेरेरिया नाम से जाना जाता है। खेजड़ी का वृक्ष जेठ के महीने में भी हरा रहता है। ऐसी गर्मी में जब रेगिस्तान में जानवरों के लिए धूप से बचने का कोई सहारा नहीं होता तब यह पेड़ छाया देता है। जब खाने को कुछ नहीं होता है तब यह चारा देता है, जो लूंग कहलाता है। इसका फूल मींझर कहलाता है। इसका फल सांगरी कहलाता है, जिसकी सब्जी बनाई जाती है। यह फल सूखने पर खोखा कहलाता है जो सूखा मेवा है। इसकी लकड़ी मजबूत होती है जो किसान के लिए जलाने और फर्नीचर बनाने के काम आती है। इसकी जड़ से हल बनता है। अकाल के समय रेगिस्तान के आदमी और जानवरों का यही एक मात्र सहारा है। सन १८९९ में दुर्भिक्ष अकाल पड़ा था जिसको छपनिया अकाल कहते हैं, उस समय रेगिस्तान के लोग इस पेड़ के तनों के छिलके खाकर जिन्दा रहे थे। इस पेड़ के नीचे अनाज की पैदावार ज्यादा होती है।
साहित्यिक एवं सांस्कृतिक महत्त्व
खेजड़ी का वृक्ष
राजस्थानी भाषा में कन्हैयालाल सेठिया की कविता 'मींझर' बहुत प्रसिद्द है। यह थार के रेगिस्तान में पाए जाने वाले वृक्ष खेजड़ी के सम्बन्ध में है। इस कविता में खेजड़ी की उपयोगिता और महत्व का सुन्दर चित्रण किया गया है।[1] दशहरे के दिन शमी के वृक्ष की पूजा करने की परंपरा भी है। [2] रावण दहन के बाद घर लौटते समय शमी के पत्ते लूट कर लाने की प्रथा है जो स्वर्ण का प्रतीक मानी जाती है। इसके अनेक औषधीय गुण भी है। पांडवों द्वारा अज्ञातवास के अंतिम वर्ष में गांडीव धनुष इसी पेड़ में छुपाए जाने के उल्लेख मिलते हैं। इसी प्रकार लंका विजय से पूर्व भगवान राम द्वारा शमी के वृक्ष की पूजा का उल्लेख मिलता है।[3] शमी या खेजड़ी के वृक्ष की लकड़ी यज्ञ की समिधा के लिए पवित्र मानी जाती है। वसन्त ऋतु में समिधा के लिए शमी की लकड़ी का प्रावधान किया गया है। इसी प्रकार वारों में शनिवार को शमी की समिधा का विशेष महत्त्व है।[4]
१९८३ में इसे राजस्थान राज्य का राज्य वृक्ष घोषित कर दिया था।
जी हां दोस्तों में बात कर रही हूँ शमी वृक्ष
जिससे खेजड़ी के नाम से भी जाना जाता है,
जो कि एक काटे वाला वृक्ष है। दूसटा वृक्ष
जिसके बारे में हम बात करेंगे वह है, मदार
अर्थात सफेद अकाव का वृक्ष जिसमें से दूध
निकलता है।
(और पढ़े :- हनुमान बाहुक की संपूर्ण
जानकारी)
आइये जानते हैं शमी व मदार वृक्ष की
पौराणिक कथा के बारे में इनका महत्व क्या
है? क्यों यह इतने पूजनीय हैं? इत्यादि के बारे
में तो चलिए शुरू करते है। शमी व मदार वृक्ष की पोराणिक कथा (Shami or Madar vriksh ki
pouranik katha in hindi)
पौराणिक कथा के अनुसार शमी, ऋषि ओटा
की पुत्री थी। ऋषि अपनी पुत्री से अत्यंत प्रेम
करते थे। ऋषि ने अपनी पुत्री शमी का विवाह
धौम्य ऋषि के पुत्र मदार के साथ किया था।
क्योंकि मदार उस समय ऋषि सोनक से शिक्षा प्राप्त कर रहे थे। इसलिए विवाह के पश्चात अपनी पत्नी शमी को अपने घट छोड़कर पुनः अपनी शिक्षा पूरी करने के लिए ऋषि सोनक के आश्रम चले गये। जब मदार युवावस्था में पहुंचे तब वे अपनी पत्नी शमी को लेकर ऋषि सोनक का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए आश्रम की और निकल पड़े।
(और पढ़े:- कुवरेश्वर धाम मंदिर सीहोर व पंडित प्रदीप जी मिश्रा की संपूर्ण जानकारी) रास्ते में विघ्नहर्ता गणेश जी के अनन्य भक्त ऋषि भृमंदी का आश्रम में पड़ता था। तब मदार व शमी ने उनके दर्शन व आशीर्वाद की
प्राप्ति के लिए ऋषि भृसदी के आश्रम जाने
का विचार किया।
शमी वृक्ष
ऋषि भूसदी जी ने गणेश जी को प्रसन्न कर
उन्हीं के जैसे गजमुख होने का आशीर्वादि
प्राप्त किया था। जिसके कारण उनका मुख
गणेश जी के समान ही था। मदार को ऋषि
के गजमुख होने का ज्ञान नहीं था। जब मदार व समी ऋषि भृमंदी के आश्रम पहुंचे तो उन्हें उनके गजमुख को देखकर हंसी आ गई और वे ऋषि का उपहास करने लगे। तब ऋषि भृसंदी ने उन्हें श्राप दे दिया कि तुम दोनों वृक्ष वन जाओ और ऐसे वृक्ष बनो जिसे कोई पशु-पक्षी भी ना खाए और ना ही उसके पास आए। (और पढ़े :- हनुमान अष्टक पाठ की महिला, फायदे
और पूजन विधि)
बहुत दिनों तक मदार सोनक ऋषि के आश्रम
नहीं पहुंचे तो सोनक ऋषि उनकी खोज
करते हुए ऋषि सदी के आश्रम पहुंचे जहां
उन्हें इस घटना के बारे में पता चला। तब
सोनके ऋषि ने मदार व शमी को शाप मुक्त
करने का अनुरोध किया।
तब शाप से मुक्त करने में असमर्थ ऋषि
भृसंदी श्री गणेश के पास पहुंचे व मदार व
शमी को शाप से मुक्त करने हेतु गणेश जी से
प्रार्थना करने लगे।
तब अपने भक्तों के शाप की लाज रखने व
शमी व मदार के उद्धार के लिए श्री गणेश ने
उन्हें वरदान दिया कि यह दोनों वृक्ष (क्षमी व
•मदार) तीनो लोको में पूजनीय होगे व
भगवान शिव की पूजा इन दोनों वृक्षों के
विना अपूर्ण होगी। यह दोनों पति-पत्नी
अर्थात मंदार व शमी जहां साथ में होंगे वहां में
स्वयं रिद्धि-सिद्धि के साथ निवास करूंगा।
शमी व मदार वृक्ष का महत्व (Shami or Madar vriksh ka mahtw)
•शमी व मदार वृक्ष के बिना गणपति जी व
शिवजी की पूजा अधूरी मानी जाती है। • आज भी सफेद मदार या सफेद अकाव के वृक्ष की जड़ में 21 वर्ष के बाद जड़ का आकार
गणेश जी का स्वरूप ले लेती है।
(और पढ़ें:- हनुमान चालीसा लिखने के पीछे
का रहस्य)
• जिस घर में मदार की जड़ के गणेश जी की पूजा होती है वहां गणेश जी रिद्धि-सिद्धि के साथ स्वयं निवास करते हैं। उस घर में कभी श्री अकाल मृत्यु नहीं होती है। • अगवान राम के द्वारा अश्विन मास की दशमी तिथि अर्थात दशहरे के दिन शमी वृक्ष की पूजा के पश्चात ही लंका पर विजय प्राप्त की थी। इसलिए दशहरे के दिन शमी वृक्ष का बहुत महत्व है। • महाभारत काल में वर्ष के अज्ञातवास जाने से पूर्व पांडवो ने भी अपने शस्त्रों को
शमी वृक्ष के ऊपर ही छुपाया था।
(और पढ़े :- शिव तांडव स्त्रोत (Shiva Tandava Stotra) की उत्पत्ति, पढ़ने से होने वाले लाभ व हिंदी में अर्थ)
खाटू श्याम बाबा अर्थात महात्मा वर्बटीक के कटे हुए सर को भी ऊंची पहाड़ी पर स्थित शमी वृक्ष पर ही रखा गया था। शमी का वृक्ष अपने आर्थिक व पौराणिक: मूल्यों के कारण राजस्थान का राजकीय वृक्ष श्री है। जिसे लोग वहां की स्थानीय भाषा में खेजड़ी का वृक्ष के नाम से भी जानते हैं। शमी वृक्ष की पूजा विधि (Shami vriksh ki pooja vidhi in hindi)
शमी वृक्ष की पूजा हेतु जल का कलश लेकर नियमित रूप से इसका पूजन करें साथ ही संध्या के समय में शमी के वृक्ष के नीचे सरसों का तेल का दीपक जलाएं। शमी वृक्ष के पास सरसों की तेल का दिया लगाने पट न्याय के देवता शनि देव की कृपा परिवार पर बनी रहती है। शमी वृक्ष की पहचान (Shami vriksh ki pahchan in
(hindi)
जैसा कि हमने लेख के शुरू में भी बताया है कि शमी वृक्ष एक कांटेदार वृक्ष है जिसमें पीले व गुलाबी कलर के फूल लगते है यह मुख्य रूप से रेगिस्तान या सूखे प्रदेशों में पाया जाता है। इसलिए शमी वृक्ष राजस्थान का राजकीय वृक्ष भी है।
आक्षा करती हूँ सभी व मदार वृक्ष की पौराणिक कथा और महत्व (Shami or Madar vriksh ki pouranik katha, mahtw in hindi) पर आपको हमारी यह जानकारी पसंद आई होगी हमा साथ अंत तक बने रहने के लिए धन्यवाद।
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