समस्त जगत लिंगमय है, दृश्य अदृश्य सब कुछ लिंग रूप में ही प्रतिष्ठित है, अतः सभी देवता, दैत्य, सिद्धगण, पितर, मुनि, किन्नर आदि लिंगमूर्ति का अर्चन करके सिद्धि को प्राप्त हुए हैं।
शिवलिंग को लिंगम्, पार्थिव-लिंग, लिंग या शिवा लिंगम् भी कहते हैं। यह हिंदू भगवान शिव का प्रतिमाविहीन अर्थात निराकार स्वरूप है।
शिव लिंगम दो रूपों में हो सकता है अपार्थिव रूप और पार्थिव रूप।
जिस शिवलिंगम प्रकृति द्वारा स्वयं बना और स्थापित हुआ है उसे हम अपार्थिव शिवलिंगम कहते हैं। यह प्राकृतिक रूप से स्वयम्भू या स्वयं प्रकट रूप होता है। अधिकतर प्राचीन शिव मंदिरों में शिव लिंगम का अपार्थिव या स्वयम्भू लिंगम् रूप ही स्थापित है। अधिकतर प्राचीन शिव मंदिरों में शिव लिंगम का अपार्थिव या स्वयम्भू लिंगम् रूप ही स्थापित है।
जिस शिवलिंगम को कृत्रिम रूप से बनाया और स्थापित किया जाता है उसे हम पार्थिव शिवलिंगम कहते हैं। यह अनेक रूपों में हो सकता है। विश्वकर्मा जी ने अलग-अलग पदार्थो, धातु व रत्नों आदि से विभिन्न प्रकार के शिवलिंग बनाए। जैसे पारद, मिश्री, जौं, चावल, भस्म, गुड़, फल, फूल, स्वर्ण, रजत, बिबर, मिट्टी, दही, मक्खन, हीरे, मोती, मणि, मूंगा, नाग, पार्थिव, तांबा, इंद्रनील, पुखराज, पद्मराग, पीतल, लहसुनिया, रत्न, चंदन, स्फटिक आदि से शिवलिंग बनाए गए।
अब आप समझ गए होंगे कि पार्थिव शिवलिंग कौन सा शिवलिंग होता है। पंडित प्रदीप मिश्रा जी महाशिवरात्रि को इसी पार्थिव शिवलिंग का पूजन कर आएंगे आइए जानते हैं कि पार्थिव शिवलिंग किस प्रकार बनाए और इसके पूजन में किस-किस सामग्री का उपयोग होगा।
दूसरा भाग
पार्थिव शिवलिंग का निर्माण
इसके लिए निम्न चीजों को हम सिलसिलेवार आपको बताने का प्रयास करते हैं।
मिट्टी का लाना और उसका सिंचन करना
★ 1. ध्यान देने योग्य बात यह है कि इस शिवलिंग को बनाते समय व्यक्ति का मुंह हमेशा पूर्व या उत्तर दिशा की ओर ही रहना चाहिए।
★ 2. शिव महापुराण के अनुसार ऐसे स्थान की मिट्टी लेकर के आए जिस स्थान पर कोई गंदगी न हो। मुख्य रूप से यह खेतों की मिट्टी हो तो ज्यादा अच्छी है। धर्म शास्त्रों के अनुसार पार्थिव शिवलिंग बनाने के लिए किसी पवित्र नदी या तालाब की मिट्टी का इस्तेमाल करना चाहिए।
★ 3. विदेशवर संहिता कहती है कि ब्राह्मण को श्वेत मिट्टी का क्षत्रिय लाल मिट्टी का वैश्य पीली मिट्टी का तथा शूद्र काली मिट्टी से पार्थिव शिवलिंग का निर्माण करना चाहिए।
★ 4. जब मिट्टी को घर ले आए तो उसे बरीक करके उसका गंगाजल आदि से सिंचन कर लेना चाहिए अथवा शुद्ध कर लेना चाहिए। यहां यह ध्यान रहे कि जब भी हम घर में मिट्टी लेकर आएं 2 दिन पहले 4 दिन पहले या हफ्ते भर पहले, हमें उसी दिन इस मिट्टी का सिंचन करना है अर्थात इसे पवित्र करना है। बिना सिंचन किए पार्थिव शिवलिंग के निर्माण का कहीं प्रमाण नहीं मिलता।
★ 5. अब हम बताते हैं कि मिट्टी का शिंचन या पवित्रीकरण कैसे करें, गंगाजल या तीर्थ जल आदि से मिट्टी का सिंचन अर्थात पवित्रीकरण करना है। अब यदि घर में पवित्र जल नहीं है तो घर में प्रयुक्त होने वाले जल में थोड़ा सा इत्र मिला ले, यदि इत्र भी नहीं है तो, जल में दूध मिला लें , यदि दूध भी नहीं है तो एक बेलपत्र को जल के अंदर डालकर उस जल से सिंचन करें, यदि बेलपत्र भी नहीं है तो जल में पीपल का पत्ता डालकर उस जल से मिट्टी का सिंचन करें।
★ 6. इसके बाद मिट्टी की चंदन और फूलों से पूजा करके इसमें दूध मिलाकर शिव मंत्र बोलते हुए शिवलिंग बनाने की प्रक्रिया शुरू करनी चाहिए।
यदि आपको प्रातः काल में शिवलिंग बनाना है तो ब्रह्म मुहूर्त में इस शिवलिंग की मिट्टी को गलाना चाहिए। इस मिट्टी को गलाने के लिए किस जल का उपयोग करना चाहिए। इसका वर्णन भी मिलता है कि जिस कलश के पानी को आप पीने के उपयोग में लाते हैं। उस कलश के पास एक दूसरा कलश को शुद्ध पानी से भर कर तथा एक प्लेट से ढंक कर रख दीजिए और इसके ऊपर चावल का एक दाना रख दीजिए। यह पानी यहां कुछ मिनट से लेकर घंटो तक अपनी सुविधा के अनुसार रखा जा सकता है।
आशा है कि आप पीने का पानी रसोई घर में रखते होंगे रसोई घर में मां अन्नपूर्णा का निवास होता है तथा पीने के पानी के बर्तन अर्थात परिंदे में अर्थात घड़े में पितरों का वास होता है। शास्त्रों में ऐसा भी वर्णन मिलता है कि 33 करोड़ देवता दिन में एक बार एक क्षण के लिए ही सही, हमारी रसोई में अवश्य आते हैं। अतः शास्त्र हमें बताते हैं कि घर स्वच्छ हो या ना हो परंतु हमारा रसोईघर स्वच्छ अवश्य होना चाहिए।
इसी जल का उपयोग हम मिट्टी को ढीला करने में करते हैं क्योंकि इस जल में मां अन्नपूर्णा पितृ और 33 कोटि देवी देवताओं का भाव आ जाता है। जब इस जल को मिट्टी में मिल आते हैं तो यह मिट्टी स्वयं भगवान शिव के पार्थिव शिवलिंग के निर्माण के लिए उपयुक्त हो जाती है।
तीसरे भाग में आप देखेंगे पार्थिव शिवलिंग का निर्माण करना
पार्थिव शिवलिंग का निर्माण
★ 1. सबसे पहले क्यारे से मिट्टी लेकर आएं और उसका पवित्र जल से सिंचन करें और कुछ समय के लिए छोड़ दें।
★ 2. अब रसोई घर में रखे हुए घड़े के जल से इस मिट्टी को गीला करें।
★ 3. जिस पात्र में शिवलिंग बना रहे हैं सबसे पहले उसमें एक बेलपत्र को रखिए। कोई साधारण बर्तन शिवलिंग को धारण नहीं कर सकता क्योंकि एक तो स्वयं भगवान भोलेनाथ दूसरे उनकी जटाओं में गंगा तीसरे उनके शीश पर चंद्रमा विराजमान है और साथ ही उनका पूरा परिवार बैठा है। तो उसे केवल बेलपत्र ही धारण कर सकता है ।
★ 4. बेलपत्र रखने का नियम है कि इसे सीधा रखते हैं तथा इसकी डंडी को उत्तर दिशा की ओर सकते हैं।
★ 5. पूरी की पूरी मिट्टी एक साथ बर्तन में डालो और इसके दो इसे बना ले। इसके एक हिस्से को शिवलिंग के रूप में ढाल दो या बना लो। दूसरे हिस्से की मिट्टी से इसके चारों ओर जलाधारी बना लो। पर ध्यान रहे कि पहले शिवलिंग का निर्माण करना है फिर उसके चारों तरफ जलाधारी का निर्माण करना है। जलाधारी अलग से नहीं बनानी है।
गुरु जी हमें पहले भी कई बार बता चुके हैं कि जलाधारी में भगवान शिव का संपूर्ण परिवार विराजमान रहता है।
जैसे शिवलिंग की जो गोल जलाधारी है और उस पर भगवान शिव का शिवलिंग रखा हुआ है। यह जलाधारी माता पार्वती का हस्त कमल है। जलहरी के जिस भाग से पानी गिर रहा होता है उसके सीधे (दाएं) भाग में गणेश जी का तथा उल्टे या वाम भाग में कार्तिकेय जी का स्थान होता है। और इन दोनों के मध्य में सर्प रूप में उनकी पुत्री अशोक सुंदरी का स्थान है। इसके ऊपर त्रिभुजाकार आधार पर रखे कलश में उनकी पांच पुत्रियां जया, विषहरा, शामलीबारी, दोतली और देव विराजमान है।
★ 6. इस प्रकार जब आप शिवलिंग की पूजा करते हैं तो आपको उनके परिवार के व्यक्तियों जैसे गणेश जी पार्वती जी या फिर कार्तिकेय जी की अलग से पूजा करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी फिर उसी शिवलिंग में विराजमान है।
चौथा भाग
अभिषेक के लिए आवश्यक सामग्री
बाबा जी ने जो पूजन की सामग्री बताई है (ब्रैकेट में हम जो जानकारी दे रहे हैं उतना रखें तो ज्यादा अच्छा रहेगा)
★ दो फूल माला ( व कुछ खुले हुए फूल)
★ तीन लोटा जल (1 पूजन के लिए, 1 कलश स्थापना के लिए व 1 जलाभिषेक के लिए इसके लिए आप फिरंगी का उपयोग भी कर सकते हैं।)
★ गेहूं के 21 दाने (वंश वृद्धि के लिए)
★ कमलगट्टे 5 (कमल पुष्प की पूर्ति के लिए भोलेनाथ में चढ़ाने के लिए)
★ चावल के 108 साबुत दाने
★ 21 काली मिर्च (घर में आने वाली बीमारियों को दूर करने के लिए)
★ काले तिल एक चुटकी
★ एक धतूरा
★ सात बेलपत्र
★ सात शमी पत्र
★ दूब घास
★ सात लाल गुलाब (यदि ना मिले तो कोई सी भी साथ पूछो चलेंगे केतकी को छोड़कर)
★ तीन सुपारी (एक गोरा की एक गणेश जी बनेंगे और एक का संकल्प होगा।)
★ जनेऊ का जोड़ा दो (चार)
★ दो देसी घी के दीपक (एक पूजा के प्रारंभ से अंत तक चलेगा अर्थात अखंड जलेगा दूसरा आरती में चलेगा)
★ पांच फल
★ मिठाई प्रसाद (बाजार से खरीद कर लाए या गुड़ शक्कर चीनी आदि जो भी आप चढ़ाना चाहिए)
★ इत्र
★ पीला चंदन (थोड़ी मात्रा में)
★ मौली या कलावा
★ कपूर (आरती के लिए)
★ लोंग इलाइची (भोग देने के लिए)
★ अलग-अलग दूध, दही, घी, शक्कर, शहद
★ पंचामृत (एक कटोरी में अलग से)
★ रोली या मोली, चंदन, अबीर गुलाल जो भी हो पूजा के लिए रखें।
★ लगा हुआ पान (भोले बाबा का भोग)
पांचवा भाग
शिव अभिषेक
इस भाग में हम आपको कुछ भी नहीं बता रहे हैं क्योंकि यह पूजन कार्य हमें गुरुदेव पंडित प्रदीप मिश्रा जी के निर्देशानुसार करना है।
छठवां भाग
विसर्जन किस प्रकार करें?
यदि आपने किसी विशेष दिन (जैसे शिवरात्रि हरितालिका तीज आदि) को छोड़कर अन्य दिन में पार्थिव शिवलिंग का पूजन किया है तो आपको सूरज छिपने से पहले उसका विसर्जन करना है। यदि आप शिवरात्रि हरितालिका तीज या विशेष पर्व पर आप इसे सारी रात रख सकते हैं अन्यथा इसका विसर्जन सूरज छिपने से पहले ही करना अनिवार्य है।
विसर्जन करने के लिए नदी, सरोवर, तालाब, बावड़ी, कुएं आदि कहीं जाने की आवश्यकता नहीं है। जबकि यदि आपके आसपास कोई वृक्ष लगा है या कोई मिट्टी का बर्तन आपके पास है या गमला है आप उसमें इसका विसर्जन करें ताकि हमारी नदी, सरोवर, तालाब, बावड़ी, कुएं आदि दूषित न हों।
जब पूजा के उपरांत हम विसर्जन करें तो एक चीज का ध्यान रखें कि उत्तर की तरफ का भाग अर्थात जिस पर अशोक सुंदरी विराजमान होती है हमें दिखाई देता रहना चाहिए जब वह दिखाई दे रहा है उसी समय उसे देखते देखते हमें अपने मन की कामना जिस कामना से हमने यह पार्थिव पूजन किया है उसे भगवान भोलेनाथ से बोल देना चाहिए। ऐसी हमारी कामना पूर्ण होती है।
शिवलिंग बनाकर तैयार रखें और रात्रि को 9:00 बजे पूजन होगा। खूब उत्साह के साथ हमें बाबा का अभिषेक करना है।
शिवलिंग को सामान्यतः गोलाकार मूर्तितल पर खड़ा दिखाया जाता है, जिसे पीठम् या पीठ कहते हैं। लिंगायत मत के अनुयायी 'इष्टलिंग' नामक शिवलिंग पहनते हैं।
शिवलिंग की यह व्याख्या शैव सम्प्रदाय की प्रमुख परम्परा - शैव सिद्धांत के अनुसार है। शिवलिंग का ऊपरला हिस्सा पराशिव और निचला हिस्सा यानी पीठम् पराशक्ति को दर्शाता है। पराशक्ति एवं परशिव भगवान शिव की दो परिपूर्णताएँ हैं।
शिव पुराण में शिवलिंग की उत्पत्ति का वर्णन अग्नि स्तंभ के रूप में किया गया है जो अनादि व अनंत है और जो समस्त कारणों का कारण है। लिंगोद्भव कथा में परमेश्वर शिव ने स्वयं को अनादि व अनंत अग्नि स्तंभ के रूप में ला कर भगवान ब्रह्मा और भगवान विष्णु को अपना ऊपरी व निचला भाग ढूंढने के लिए कहा और उनकी श्रेष्ठता तब साबित हुई जब वे दोनों अग्नि स्तंभ का ऊपरला व निचला भाग ढूंढ नहीं सके।
शिवलिंग के ब्रह्मांडीय स्तंभ की व्याख्या का समर्थन लिङ्ग पुराण भी करता है। लिङ्ग पुराण के अनुसार शिवलिंग निराकार ब्रह्मांड वाहक है - अंडाकार पत्थर ब्रह्मांड का प्रतीक है और पीठम् ब्रह्मांड को पोषण व सहारा देने वाली सर्वोच्च शक्ति है।इसी तरह की व्याख्या स्कन्द पुराण में भी है, इसमें यह कहा गया है "अनंत आकाश (वह महान शून्य जिसमें समस्त ब्रह्मांड वसा है) शिवलिंग है और पृथ्वी उसका आधार है। समय के अंत में, समस्त ब्रह्मांड और समस्त देवता व इश्वर शिवलिंग में विलीन हो जाएँगें।" [27] महाभारत में द्वापर युग के अंत में भगवान शिव ने अपने भक्तों से कहा कि आने वाले कलियुग में वह किसी विशेष रूप में प्रकट नहीं होगें परन्तु इसके बजाय वह निराकार और सर्वव्यापी रहेंगे।[कृपया उद्धरण जोड़ें]
शिवलिंग संस्कृत के दो शब्दों शिव और लिंग से बना है। शिव यानी स्थिर, शाश्वत और लिंग यानी प्रतीक या चिह्न। यहां शिव भगवान शंकर को संबोधित है। इसलिए इसका पूरा अर्थ होगा शिव का प्रतीक या शिव का अंश। इसे ही शिवलिंग कहते हैं। शिवलिंग का एक अर्थ अनंत से भी है। यानी जिसका कोई अंत नहीं है वही शिवलिंग है। खुद ब्रह्मांड की भी उत्पत्ति लिंग से ही होती है।
अथर्ववेद के इन निम्न श्लोकों में स्तंभ का उल्लेख हुआ है:
यस्य त्रयसि्ंत्रशद् देवा अग्डे. सर्वे समाहिताः ।
स्कम्भं तं ब्रूहि कतमः सि्वदेव सः ।।
अथर्ववेद कांड 10 सूक्त 7 श्लोक 13
अर्थार्त: कौन मुझे स्तम्भ के बारे में बता सकता है। जिसके देह में सभी तैंतीस इश्वर विराजमान हैं?[28][29]
स्कम्भो दाधार द्यावापृथिवी उभे इमे स्कम्भो दाधारोर्वन्तरिक्षम् । स्कम्भो दाधार प्रदिशः षडुर्वीः स्कम्भ इदं विश्वं भुवनमा विवेश ।।
अथर्ववेद कांड 10 सूक्त 7 श्लोक 35
अर्थार्त: स्तंभ ने स्वर्ग, धरती और धरती के वातावरण को थाम रखा है। स्तंभ ने 6 दिशाओं को थाम रखा है और यह स्तंभ संपूर्ण ब्रह्मांड में फैला हुआ है।[30]
जलहरी क्या है?
शिवलिङ्ग की मूर्ति के चारों ओर एक नाली सी बनी होती हैं, इसे जलहरी कहते हैं। यह जलहरी वास्तव में क्या है, यह बहुत कम लोग जानते हैं।
पार्थिव पूजन से जुड़ी पौराणिक कथा
मान्यता है कि भगवान शिव का पार्थिव पूजन सबसे पहले भगवान राम ने किया था. मान्यता है कि भगवान श्री राम ने लंका पर कूच करने से पहले भगवान शिव की पार्थिव पूजा की थी. मान्यता है कि कलयुग में भगवान शिव का पार्थिव पूजन कूष्माण्ड ऋषि के पुत्र मंडप ने किया था. जिसके बाद से अभी तक शिव कृपा बरसाने वाली पार्थिव पूजन की परंपरा चली आ रही है. मान्यता यह भी है कि शनिदेव ने अपने पिता सूर्यदेव से ज्यादा शक्ति पाने के लिए काशी में पार्थिव शिवलिंग बनाकर पूजा की थी
पार्थिव शिवलिंग
पृथ्वी तत्व, मृदा (मिट्टी) या अन्य पदार्थ गाय के गोबर, गुड़, मक्खन, भस्म, मिट्टी और गंगा जल मिलाकर जो भी पदार्थ उपस्थित हो उससे बनाया जाता है। इसलिए इस शिवलिंग को पार्थिव शिवलिंग कहा जाता है ।
नदी या तालाब की मिट्टी से बनाएं शिवलिंग
धर्म शास्त्रों के अनुसार पार्थिव शिवलिंग बनाने के लिए किसी पवित्र नदी या तालाब की मिट्टी का इस्तेमाल करना चाहिए. इस मिट्टी को चंदन और फूलों से पूजा करके इसमें दूध मिलाकर शिव मंत्र बोलते हुए शिवलिंग बनाने की प्रक्रिया शुरू करनी चाहिए. ध्यान देने योग्य बात यह है कि इस शिवलिंग को बनाते समय व्यक्ति का मुंह हमेशा पूर्व या उत्तर दिशा की ओर ही रहना चाहिए.
शिवलिंग की ऊंचाई
ध्यान रहे कि कलयुग में मिट्टी के शिवलिंग के पूजन का है विशेष महत्व परंतु शिवलिंग की ऊंचाई 12 अंगुल से अधिक नहीं होनी चाहिए तथा अंगुष्ट से छोटा भी नहीं होना चाहिए। इससे आप विशष्ट रुद्राभिषेक भी करा सकते हैं।
पार्थिव शिवलिंग की पूजा के लाभ
मान्यता है कि सावन के महीने में पार्थिव शिवलिंग की पूजा करने पर व्यक्ति के जीवन से जुड़ी बड़ी से बड़ी बाधाएं दूर और कामनाएं पूरी होती हैं. पार्थिव शिवलिंग की पूजा करने वाले शिव साधक के जीवन से अकाल मृत्यु का भय दूर हो जाता है. शिवपुराण के अनुसार पार्थिव पूजा करने वाले साधक को भगवान शिव के आशीर्वाद से धन-धान्य, सुख-समृद्धि और सौभाग्य की प्राप्ति होती है और वह सभी सुखों को भोगता हुआ अंत में मोक्ष को प्राप्त होता है.
शिव मंत्र बोलते हुए उस मिट्टी से शिवलिंग बनाने की क्रिया शुरू करें। पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुंह रखकर शिवलिंग बनाना चाहिए। मनोकामना पूर्ति के लिए शिवलिंग पर प्रसाद चढ़ाना चाहिए। इस बात का ध्यान रहे कि जो प्रसाद शिवलिंग से स्पर्श कर जाए, उसे ग्रहण नहीं करें।
पूजन से पहले करें देवों की पूजा
शिवलिंग बनाने के बाद गणेश जी, विष्णु भगवान, नवग्रह और माता पार्वती आदि का आह्वान करना चाहिए। फिर विधिवत तरीके से षोडशोपचार करना चाहिए। पार्थिव बनाने के बाद उसे परम ब्रम्ह मानकर पूजा और ध्यान करें। पार्थिव शिवलिंग समस्त मनोकामनाओं को पूर्ण करता है। सपरिवार पार्थिव बनाकर शास्त्रवत विधि से पूजन करने से परिवार सुखी रहता है।
तत्र द्वादशादित्या एकादश रुद्रा अष्टौ वसवः सप्त मुनयो ब्रह्मा नारदश्च पञ्च विनायका वीरेश्वरो रुद्रेश्वरोऽम्बिकेश्वरो गणेश्वरो नीलकण्ठेश्वरो विश्वेश्वरो गोपालेश्वरो भद्रेश्वर इत्यष्टावन्यानि लिङ्गानि चतुर्विंशतिर्भवन्ति ॥
गोपाला तापानी उपनिषद् श्लोक 41
अर्थ: बारह आदित्य , ग्यारह रुद्र, आठ वसु, सात ऋषि, ब्रह्मा, नारद, पांच विनायक, वीरेश्वर, रुद्रेश्वर, अंबिकेश्वर, गणेश्वर, नीलकण्ठेश्वर, विश्वेश्वर, गोपालेश्वर, भद्रेश्वर और 24 अन्य शिवलिंगों का यहाँ पर बास है। [44][45][46]
तन्मध्ये प्रोच्यते योनिः कामाख्या सिद्धवन्दिता ।
योनिमध्ये स्थितं लिङ्गं पश्चिमाभिमुखं तथा ॥
ध्यानबिन्दु उपनिषद् श्लोक 45
अर्थ: चेतना जो प्रकृति (उदाहरण: शरीर, कार, भोजन...) में होकर भी जो उससे निर्लिप्त नहीं है वह आत्मा या शिव है। वह यह जानने वाला वेदों का ज्ञाता है। [47][48][49]
मात्रालिङ्गपदं त्यक्त्वा शब्दव्यञ्जनवर्जितम् ।
अस्वरेण मकारेण पदं सूक्ष्मं च गच्छति ॥अमृतबिन्दु उपनिषद् श्लोक 4
अर्थ: मंत्र, लिंग और पाद को छोड़कर, वह स्वाद (उच्चारण) के बिना पाद 'म' के माध्यम से स्वर या व्यंजनों के बिना सूक्ष्म पाद (सीट या शब्द) प्राप्त करता है।.[50][51][52]
तिरुमंत्रम् (तमिल हिंदू शास्त्र) में शिवलिंग का उल्लेख कई बार हुआ है जैसे कि: [53]
जीव शिवलिंग है; यह प्रकाश देने वाली रोशनी है न कि इंद्रियों को भ्रमित करने वाली। तिरुमंत्रम् 1823
उसका रूप अरचित शिवलिंग और दिव्य सदाशिव है। तिरुमंत्रम् 1750
लिङ्गाष्टकं स्तोत्रम्,[54] ज्योतिर्लिंग स्तोत्रम्[55][56][57] और मार्ग सहाय लिङ्ग स्थुथि[58][59] में शिवलिंग की प्रशंसा की गई है और इनमें भगवान शिव से शिवलिंग के रूप में आशीर्वाद माँगा गया है।
शिवलिंग की पूजा से उत्पन्ना हुआ पुण्य त्याग, तपस्या, चढ़ावे व तीर्थ यात्रा से उत्पन्ना हुए पुण्य से हजार गुणा अधिक है। कारणा आगम 9. MT, 66[60]
रचना
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शैव आगम में कहा गया है कि "कोई भी इस महान परमेश्वर शिव की पूजा मिट्टी, रेत, गाय के गोबर, लकड़ी, पीतल या काले ग्रेनाइट पत्थर से बने शिवलिंग द्वारा सकता है। लेकिन शुद्धतम शिवलिंग स्फटिक (स्फटिक शिवलिंग) से बना होता है, यह पत्थर मनुष्य द्वारा तराशा नहीं जाता है परन्तु प्राकृति द्वारा बनाया गया है। स्फटिक सैकड़ों, हजारों या लाखों वर्षों में अणुओं के इकट्ठा होने पर बनता है। इसका बनना असीम रूप से धीरे धीरे विकसित होने वाले जीवित शरीर की तरह है। प्रकृति की इस तरह की सृष्टि स्वयं ही पूजने योग्य चमत्कार है।"[61][62] हिंदू ग्रंथ स्फटिक को शिवलिंग के लिए उच्चतम प्रदार्थ मानते हैं। [63]
शैव सम्प्रदाय के कारणा आगम के छठवें श्लोक में कहा गया है कि "एक अस्थायी शिवलिंग 12 अलग-अलग सामग्री: रेत, चावल, पकाए भोजन, नदी की मिट्टी, गाय के गोबर, मक्खन, रूद्राक्ष बीज, राख, चंदन, दूब घास, फूलों की माला या शीरा द्वारा बनाया जा सकता है।"[64][65]
मानव निर्मित शिवलिंग
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पन्ना शिवलिंग; पन्ने नामक हरे रंग के कीमती रत्न से बनाया जाता है।
पारद शिवलिंग; जमे हुए ठोस पारे द्वारा बनाया जाता है।[66]
स्फटिक शिवलिंग; रंगहीन या सफेद खनिज (स्फटिक) से बनाया जाता है।
अमरनाथ गुफा में शिवलिंग।
प्राकृतिक रूप से मिलने वाले शिवलिंग
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पश्चिमी हिमालय में अमरनाथ नामक गुफा में प्रत्येक शीत ऋतु में गुफा के तल पर पानी टपकाने से बर्फ का शिवलिंग सृजित होता है। यह तीर्थयात्रियों में बहुत लोकप्रिय है।
कदावुल मंदिर में 320 किलोग्राम, 3 फुट उच्चा स्वयंभू स्फटिक शिवलिंग स्थापित है। भविष्य में इस स्फटिक शिवलिंग को ईराइवन मंदिर में स्थापित किया जाएगा। यह सबसे बड़ा ज्ञात स्वयंभू स्फटिक शिवलिंग है।[67][68] हिंदू ग्रंथ स्फटिक को शिवलिंग के लिए उच्चतम प्रदार्थ मानता है। [69]
शिवलिंग 6,543 मीटर (21,467 फीट) उच्चा, उत्तराखंड (हिमालय के गढ़वाल क्षेत्र) में स्थित पहाड़ है। यह गंगोत्री हिमानी के पास पिरामिड के रूप में उभरता दिखता है। गंगोत्री हिमानी से गोमुख की हिंदू तीर्थयात्रा करते समय यह विशेष कोणों से शिवलिंग जैसा दिखता है।
आंध्र प्रदेश की बोरा गुफाओं में भी प्राकृतिक स्वयंभू शिवलिंग मौजूद हैं। [70]
बाणलिंग नर्मदा नदी के बिस्तर पर पाए जाते हैं।[71][72]
छत्तीसगढ़ का भूतेश्वर शिवलिंग एक प्राकृतिक चट्टान है जिसकी प्रत्येक बीतते वर्ष के साथ ऊंचाई बढ़ रही है।[73][74] अरुणाचल प्रदेश का सिद्धेश्वर नाथ मंदिर का शिवलिंग सबसे उच्चा प्राकृतिक शिवलिंग माना जाता है।[75][76][77]
नक्काशी किए हुए शिवलिंग
मुखलिंगा पर भगवान शिव के एक या अधिक चेहरों की नक्काशी की गई हुई होती है। इन पर आम तौर से एक, चार या पांच चेहरों की नक्काशी की गई होती है।[78][79]
लिंगोद्भव शिवलिंग पर लिंगोद्भव कथा की नक्काशी गई है। इस कथा में विष्णु और ब्रह्मा अग्नि-स्तम्भ रूपी भगवान शिव का छोर खोजने की चेष्टा करते हैं।[80][81]
शिव महापुराण में दिए गए श्लोक
"अप मृत्युहरं कालमृत्योश्चापि विनाशनम।
सध:कलत्र-पुत्रादि-धन-धान्य प्रदं द्विजा:।"
इसके अनुसार पार्थिव शिवलिंग की पूजा से तत्क्षण (तुरंत ही) जो कलत्र पुत्रादि यानी कि घर की पुत्रवधु होती है वो शिवशंभू की कृपा से घर में धन धान्य लेकर आती है। इनकी पूजा इस लोक में सभी मनोरथ को भी पूर्ण करती है। जो दम्पति संतान प्राप्ति के लिए कई वर्षों से तड़प रहे हैं,उन्हें पार्थिव लिंग का पूजन अवश्य करना चाहिए।
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