शिवलिंग
शिव पुराण में शिवलिंग की उत्पत्ति का वर्णन अग्नि स्तंभ के रूप में किया गया है जो अनादि व अनंत है और जो समस्त कारणों का कारण है।[23] लिंगोद्भव कथा में परमेश्वर शिव ने स्वयं को अनादि व अनंत अग्नि स्तंभ के रूप में ला कर भगवान ब्रह्मा और भगवान विष्णु को अपना ऊपरला व निचला भाग ढूंढने के लिए कहा और उनकी श्रेष्ठता तब साबित हुई जब वे दोनों अग्नि स्तंभ का ऊपरला व निचला भाग ढूंढ नहीं सके।[24] शिवलिंग के ब्रह्मांडीय स्तंभ की व्याख्या का समर्थन लिङ्ग पुराण भी करता है।[25] लिङ्ग पुराण के अनुसार शिवलिंग निराकार ब्रह्मांड वाहक है - अंडाकार पत्थर ब्रह्मांड का प्रतीक है और पीठम् ब्रह्मांड को पोषण व सहारा देने वाली सर्वोच्च शक्ति है।[26] इसी तरह की व्याख्या स्कन्द पुराण में भी है, इसमें यह कहा गया है "अनंत आकाश (वह महान शून्य जिसमें समस्त ब्रह्मांड वसा है) शिवलिंग है और पृथ्वी उसका आधार है। समय के अंत में, समस्त ब्रह्मांड और समस्त देवता व इश्वर शिवलिंग में विलीन हो जाएँगें।" [27] महाभारत में द्वापर युग के अंत में भगवान शिव ने अपने भक्तों से कहा कि आने वाले कलियुग में वह किसी विशेष रूप में प्रकट नहीं होगें परन्तु इसके बजाय वह निराकार और सर्वव्यापी रहेंगे।[कृपया उद्धरण जोड़ें]
शिवलिंग संस्कृत के दो शब्दों शिव और लिंग से बना है। शिव यानी स्थिर, शाश्वत और लिंग यानी प्रतीक या चिह्न। यहां शिव भगवान शंकर को संबोधित है। इसलिए इसका पूरा अर्थ होगा शिव का प्रतीक या शिव का अंश। इसे ही शिवलिंग कहते हैं। शिवलिंग का एक अर्थ अनंत से भी है। यानी जिसका कोई अंत नहीं है वही शिवलिंग है। खुद ब्रह्मांड की भी उत्पत्ति लिंग से ही होती है।
अथर्ववेद के इन निम्न श्लोकों में स्तंभ का उल्लेख हुआ है:
यस्य त्रयसि्ंत्रशद् देवा अग्डे. सर्वे समाहिताः । स्कम्भं तं ब्रूहि कतमः सि्वदेव सः ।। अथर्ववेद कांड 10 सूक्त 7 श्लोक 13
अर्थार्त: कौन मुझे स्तम्भ के बारे में बता सकता है। जिसके देह में सभी तैंतीस इश्वर विराजमान हैं?[28][29]
स्कम्भो दाधार द्यावापृथिवी उभे इमे स्कम्भो दाधारोर्वन्तरिक्षम् । स्कम्भो दाधार प्रदिशः षडुर्वीः स्कम्भ इदं विश्वं भुवनमा विवेश ।। अथर्ववेद कांड 10 सूक्त 7 श्लोक 35
अर्थार्त: स्तंभ ने स्वर्ग, धरती और धरती के वातावरण को थाम रखा है। स्तंभ ने 6 दिशाओं को थाम रखा है और यह स्तंभ संपूर्ण ब्रह्मांड में फैला हुआ है।[30]
जलहरी क्या है?
शिवलिङ्ग की मूर्ति के चारों ओर एक नाली सी बनी होती हैं, इसे जलहरी कहते हैं। यह जलहरी वास्तव में क्या है, यह बहुत कम लोग जानते हैं।
नदी या तालाब की मिट्टी से बनाएं शिवलिंग
धर्म शास्त्रों के अनुसार पार्थिव शिवलिंग बनाने के लिए किसी पवित्र नदी या तालाब की मिट्टी का इस्तेमाल करना चाहिए. इस मिट्टी को चंदन और फूलों से पूजा करके इसमें दूध मिलाकर शिव मंत्र बोलते हुए शिवलिंग बनाने की प्रक्रिया शुरू करनी चाहिए. ध्यान देने योग्य बात यह है कि इस शिवलिंग को बनाते समय व्यक्ति का मुंह हमेशा पूर्व या उत्तर दिशा की ओर ही रहना चाहिए.
शिवलिंग की ऊंचाई
ध्यान रहे कि कलयुग में मिट्टी के शिवलिंग के पूजन का है विशेष महत्व परंतु शिवलिंग की ऊंचाई 12 अंगुल से अधिक नहीं होनी चाहिए तथा अंगुष्ट से छोटा भी नहीं होना चाहिए। इससे आप विशष्ट रुद्राभिषेक भी करा सकते हैं।
पार्थिव शिवलिंग की पूजा के लाभ
मान्यता है कि सावन के महीने में पार्थिव शिवलिंग की पूजा करने पर व्यक्ति के जीवन से जुड़ी बड़ी से बड़ी बाधाएं दूर और कामनाएं पूरी होती हैं. पार्थिव शिवलिंग की पूजा करने वाले शिव साधक के जीवन से अकाल मृत्यु का भय दूर हो जाता है. शिवपुराण के अनुसार पार्थिव पूजा करने वाले साधक को भगवान शिव के आशीर्वाद से धन-धान्य, सुख-समृद्धि और सौभाग्य की प्राप्ति होती है और वह सभी सुखों को भोगता हुआ अंत में मोक्ष को प्राप्त होता है.
शिव मंत्र बोलते हुए उस मिट्टी से शिवलिंग बनाने की क्रिया शुरू करें। पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुंह रखकर शिवलिंग बनाना चाहिए। मनोकामना पूर्ति के लिए शिवलिंग पर प्रसाद चढ़ाना चाहिए। इस बात का ध्यान रहे कि जो प्रसाद शिवलिंग से स्पर्श कर जाए, उसे ग्रहण नहीं करें।
पूजन से पहले करें देवों की पूजा
शिवलिंग बनाने के बाद गणेश जी, विष्णु भगवान, नवग्रह और माता पार्वती आदि का आह्वान करना चाहिए। फिर विधिवत तरीके से षोडशोपचार करना चाहिए। पार्थिव बनाने के बाद उसे परम ब्रम्ह मानकर पूजा और ध्यान करें। पार्थिव शिवलिंग समस्त मनोकामनाओं को पूर्ण करता है। सपरिवार पार्थिव बनाकर शास्त्रवत विधि से पूजन करने से परिवार सुखी रहता है।
तत्र द्वादशादित्या एकादश रुद्रा अष्टौ वसवः सप्त मुनयो ब्रह्मा नारदश्च पञ्च विनायका वीरेश्वरो रुद्रेश्वरोऽम्बिकेश्वरो गणेश्वरो नीलकण्ठेश्वरो विश्वेश्वरो गोपालेश्वरो भद्रेश्वर इत्यष्टावन्यानि लिङ्गानि चतुर्विंशतिर्भवन्ति ॥ गोपाला तापानी उपनिषद् श्लोक 41
अर्थ: बारह आदित्य , ग्यारह रुद्र, आठ वसु, सात ऋषि, ब्रह्मा, नारद, पांच विनायक, वीरेश्वर, रुद्रेश्वर, अंबिकेश्वर, गणेश्वर, नीलकण्ठेश्वर, विश्वेश्वर, गोपालेश्वर, भद्रेश्वर और 24 अन्य शिवलिंगों का यहाँ पर बास है। [44][45][46]
तन्मध्ये प्रोच्यते योनिः कामाख्या सिद्धवन्दिता । योनिमध्ये स्थितं लिङ्गं पश्चिमाभिमुखं तथा ॥ ध्यानबिन्दु उपनिषद् श्लोक 45
अर्थ: चेतना जो प्रकृति (उदाहरण: शरीर, कार, भोजन...) में होकर भी जो उससे निर्लिप्त नहीं है वह आत्मा या शिव है। वह यह जानने वाला वेदों का ज्ञाता है। [47][48][49]
मात्रालिङ्गपदं त्यक्त्वा शब्दव्यञ्जनवर्जितम् । अस्वरेण मकारेण पदं सूक्ष्मं च गच्छति ॥अमृतबिन्दु उपनिषद् श्लोक 4
अर्थ: मंत्र, लिंग और पाद को छोड़कर, वह स्वाद (उच्चारण) के बिना पाद 'म' के माध्यम से स्वर या व्यंजनों के बिना सूक्ष्म पाद (सीट या शब्द) प्राप्त करता है।.[50][51][52]
तिरुमंत्रम् (तमिल हिंदू शास्त्र) में शिवलिंग का उल्लेख कई बार हुआ है जैसे कि: [53]
जीव शिवलिंग है; यह प्रकाश देने वाली रोशनी है न कि इंद्रियों को भ्रमित करने वाली। तिरुमंत्रम् 1823
उसका रूप अरचित शिवलिंग और दिव्य सदाशिव है। तिरुमंत्रम् 1750
लिङ्गाष्टकं स्तोत्रम्,[54] ज्योतिर्लिंग स्तोत्रम्[55][56][57] और मार्ग सहाय लिङ्ग स्थुथि[58][59] में शिवलिंग की प्रशंसा की गई है और इनमें भगवान शिव से शिवलिंग के रूप में आशीर्वाद माँगा गया है।
शिवलिंग की पूजा से उत्पन्ना हुआ पुण्य त्याग, तपस्या, चढ़ावे व तीर्थ यात्रा से उत्पन्ना हुए पुण्य से हजार गुणा अधिक है। कारणा आगम 9. MT, 66[60]
रचना
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शैव आगम में कहा गया है कि "कोई भी इस महान परमेश्वर शिव की पूजा मिट्टी, रेत, गाय के गोबर, लकड़ी, पीतल या काले ग्रेनाइट पत्थर से बने शिवलिंग द्वारा सकता है। लेकिन शुद्धतम शिवलिंग स्फटिक (स्फटिक शिवलिंग) से बना होता है, यह पत्थर मनुष्य द्वारा तराशा नहीं जाता है परन्तु प्राकृति द्वारा बनाया गया है। स्फटिक सैकड़ों, हजारों या लाखों वर्षों में अणुओं के इकट्ठा होने पर बनता है। इसका बनना असीम रूप से धीरे धीरे विकसित होने वाले जीवित शरीर की तरह है। प्रकृति की इस तरह की सृष्टि स्वयं ही पूजने योग्य चमत्कार है।"[61][62] हिंदू ग्रंथ स्फटिक को शिवलिंग के लिए उच्चतम प्रदार्थ मानते हैं। [63]
शैव सम्प्रदाय के कारणा आगम के छठवें श्लोक में कहा गया है कि "एक अस्थायी शिवलिंग 12 अलग-अलग सामग्री: रेत, चावल, पकाए भोजन, नदी की मिट्टी, गाय के गोबर, मक्खन, रूद्राक्ष बीज, राख, चंदन, दूब घास, फूलों की माला या शीरा द्वारा बनाया जा सकता है।"[64][65]
मानव निर्मित शिवलिंग
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पन्ना शिवलिंग; पन्ने नामक हरे रंग के कीमती रत्न से बनाया जाता है।
पारद शिवलिंग; जमे हुए ठोस पारे द्वारा बनाया जाता है।[66]
स्फटिक शिवलिंग; रंगहीन या सफेद खनिज (स्फटिक) से बनाया जाता है।
अमरनाथ गुफा में शिवलिंग।
प्राकृतिक रूप से मिलने वाले शिवलिंग
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पश्चिमी हिमालय में अमरनाथ नामक गुफा में प्रत्येक शीत ऋतु में गुफा के तल पर पानी टपकाने से बर्फ का शिवलिंग सृजित होता है। यह तीर्थयात्रियों में बहुत लोकप्रिय है।
कदावुल मंदिर में 320 किलोग्राम, 3 फुट उच्चा स्वयंभू स्फटिक शिवलिंग स्थापित है। भविष्य में इस स्फटिक शिवलिंग को ईराइवन मंदिर में स्थापित किया जाएगा। यह सबसे बड़ा ज्ञात स्वयंभू स्फटिक शिवलिंग है।[67][68] हिंदू ग्रंथ स्फटिक को शिवलिंग के लिए उच्चतम प्रदार्थ मानता है। [69]
शिवलिंग 6,543 मीटर (21,467 फीट) उच्चा, उत्तराखंड (हिमालय के गढ़वाल क्षेत्र) में स्थित पहाड़ है। यह गंगोत्री हिमानी के पास पिरामिड के रूप में उभरता दिखता है। गंगोत्री हिमानी से गोमुख की हिंदू तीर्थयात्रा करते समय यह विशेष कोणों से शिवलिंग जैसा दिखता है।
आंध्र प्रदेश की बोरा गुफाओं में भी प्राकृतिक स्वयंभू शिवलिंग मौजूद हैं। [70]
बाणलिंग नर्मदा नदी के बिस्तर पर पाए जाते हैं।[71][72]
छत्तीसगढ़ का भूतेश्वर शिवलिंग एक प्राकृतिक चट्टान है जिसकी प्रत्येक बीतते वर्ष के साथ ऊंचाई बढ़ रही है।[73][74] अरुणाचल प्रदेश का सिद्धेश्वर नाथ मंदिर का शिवलिंग सबसे उच्चा प्राकृतिक शिवलिंग माना जाता है।[75][76][77]
नक्काशी किए हुए शिवलिंग
मुखलिंगा पर भगवान शिव के एक या अधिक चेहरों की नक्काशी की गई हुई होती है। इन पर आम तौर से एक, चार या पांच चेहरों की नक्काशी की गई होती है।[78][79]
लिंगोद्भव शिवलिंग पर लिंगोद्भव कथा की नक्काशी गई है। इस कथा में विष्णु और ब्रह्मा अग्नि-स्तम्भ रूपी भगवान शिव का छोर खोजने की चेष्टा करते हैं।[80][81]
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