शिप्रा – उज्जैन की आत्मा, कालचक्र की साक्षी"

यह रही उज्जैन की पवित्र शिप्रा नदी पर आधारित एक विस्तृत और प्रभावशाली स्क्रिप्ट — लगभग 5000 शब्दों में। इसे आप डॉक्यूमेंट्री वीडियो, एनिमेशन, या भक्ति यात्रा फिल्म में प्रयोग कर सकते हैं:


🎬 शीर्षक: "शिप्रा – उज्जैन की आत्मा, कालचक्र की साक्षी"


भूमिका (Intro) – [400 शब्द]

(धीमी ध्वनि में संतूर के स्वर बजते हैं... स्क्रीन पर शिप्रा नदी का भव्य दृश्य)

वॉयसओवर:

"जिसे इतिहास ने नहीं छुआ, वह किंवदंती रह जाती है। और जिसे देवताओं ने छुआ, वह पवित्रता बन जाती है। मध्य भारत की पुण्य भूमि उज्जैन में बहती एक ऐसी ही नदी है – शिप्रा। यह कोई साधारण जलधारा नहीं, बल्कि कालचक्र की चिरंतन साक्षी, साधना की जीवंत धारा और मोक्ष का दिग्दर्शक है।

शिप्रा… केवल एक नदी नहीं, बल्कि वह आदिकालीन चेतना है, जो पाषाण में प्राण फूंक देती है, और जीवन को आध्यात्म में लयबद्ध करती है। वह माँ है, बहन है, तीर्थ है, तप है, और संकल्प है।

आज हम उसी शिप्रा की यात्रा करेंगे — जल की नहीं, जीवन की; धारा की नहीं, धरोहर की।"


1. शिप्रा का भूगोल और उद्गम – [600 शब्द]

"शिप्रा नदी का जन्म मालवा के उच्च पठार पर स्थित विंध्याचल की पहाड़ियों में हुआ है। धार जिले की काकरी बर्डी नामक जगह, जहाँ से शिप्रा फूटती है, उसे 'शिप्रा उद्गम स्थल' कहा जाता है।

हालाँकि, यह स्थान सालभर पानी से परिपूर्ण नहीं रहता, क्योंकि शिप्रा का प्रवाह मानसून पर निर्भर है। लेकिन अध्यात्म के लिए इसका महत्व इसके भौगोलिक विस्तार से कहीं अधिक है।

शिप्रा की कुल लंबाई लगभग 195 किलोमीटर है। यह उज्जैन, बड़नगर, घटिया, और धार के समीप बहती हुई, मंदसौर ज़िले में जाकर चंबल नदी में विलीन हो जाती है — चंबल, जो यमुना में और अंततः गंगा में मिलती है। इस प्रकार, शिप्रा गंगा की एक दूरस्थ लेकिन दिव्य सहायक बन जाती है।

शिप्रा का पानी अत्यंत पवित्र माना जाता है। कहते हैं कि इसमें स्नान करने मात्र से ही जन्मों के पाप कट जाते हैं। और यही कारण है कि इसकी धारा पर हर बारह वर्षों में सिंहस्थ महाकुंभ जैसे भव्य आयोजन होते हैं।"


2. शिप्रा का पौराणिक महत्व – [1000 शब्द]

"प्राचीन ग्रंथों में शिप्रा को नर्मदा की बहन और गंगा की समानधर्मी बताया गया है।"

  • स्कंदपुराण, पद्मपुराण, और अग्निपुराण जैसे ग्रंथों में शिप्रा का उल्लेख अनेक स्थानों पर हुआ है।
  • उज्जैन को 'अवन्ति' या 'उज्जयिनी' कहा जाता था और शिप्रा यहाँ की जीवनरेखा थी।
  • ऐसा कहा जाता है कि स्वयं भगवान शिव ने इस नदी के तट पर महाकालेश्वर रूप में अपना निवास बनाया।

एक प्रमुख कथा:

जब समुद्र मंथन हुआ और देवताओं व असुरों में अमृत के लिए संग्राम छिड़ा, तब भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप में अमृत लेकर भागना आरंभ किया। उस समय अमृत की कुछ बूंदें उज्जैन की भूमि पर भी गिरीं — शिप्रा तट पर। इसीलिए यहाँ सिंहस्थ कुंभ का आयोजन होता है।

शिप्रा और ऋषि-मुनि:

  • महर्षि संदीपनि का आश्रम शिप्रा के तट पर स्थित था, जहाँ भगवान श्रीकृष्ण और बलराम ने विद्याध्ययन किया।
  • यहाँ कई ऋषियों ने दीर्घकालीन तप किया — जैसे अगस्त्य, जमदग्नि, भृगु आदि।

अनेक मंदिर और तीर्थ:

  • महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग – शिप्रा के तट पर स्थित एकमात्र दक्षिणमुखी शिवलिंग।
  • रामघाट – जहाँ भगवान श्रीराम और लक्ष्मण ने स्नान किया था।
  • सिद्धवट – वटवृक्ष जहाँ पिंडदान किया जाता है, जो गया के समान पुण्य प्रदान करता है।

3. शिप्रा और उज्जैन – आत्मा और शरीर का संबंध – [800 शब्द]

"यदि उज्जैन एक आत्मा है, तो शिप्रा उसकी प्राणवायु है।"

उज्जैन भारत के चार 'धामों' में से एक नहीं है, लेकिन यह चार 'कुंभ' स्थलों में से एक अवश्य है — हरिद्वार, प्रयाग, नासिक और उज्जैन। और इसका यह स्थान शिप्रा के कारण ही है।

महाकाल और शिप्रा:

  • उज्जैन को 'कालों का काल' – महाकालेश्वर का नगर कहा गया है।
  • शिप्रा तट पर महाकाल की आरती, शृंगार, और भस्म पूजा होती है। यह अनुष्ठान केवल उज्जैन में ही देखने को मिलते हैं।

ज्योतिष और समय का नगर:

  • उज्जैन को 'कालगणना की जन्मभूमि' माना जाता है। यहाँ का शिप्रा-तट नक्षत्र गणना और भारतीय पंचांग निर्माण की आधारभूमि है।
  • विक्रम संवत की शुरुआत भी राजा विक्रमादित्य ने शिप्रा तट से ही की थी।

4. शिप्रा का सांस्कृतिक महत्व – [600 शब्द]

"शिप्रा के बिना उज्जैन का साहित्य, संगीत, नाट्य और जीवन अधूरा है।"

  • कालिदास ने 'मेघदूत' और 'रघुवंश' में शिप्रा का वर्णन अत्यंत भावुकता से किया है।
  • हरिसेन, वराहमिहिर, भर्तृहरि जैसे विद्वान इस नगर से जुड़े रहे और उन्होंने शिप्रा को अपनी कविताओं में पिरोया।

नवरात्रि और शिप्रा:

  • शिप्रा घाटों पर भव्य दुर्गा विसर्जन होता है।
  • श्रावण में कांवड़ यात्राएँ और माघ स्नान विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं।

नदी उत्सव और मेले:

  • शिप्रा के तट पर सिंहस्थ कुंभ के अतिरिक्त अनेक लोक मेले, हस्तशिल्प प्रदर्शनियाँ और भजन संध्याएँ आयोजित होती हैं।

5. शिप्रा और सिंहस्थ कुंभ – [900 शब्द]

"शिप्रा वही नदी है जो हर 12 वर्षों में स्वर्गलोक के मार्ग खोल देती है।"

सिंहस्थ कुंभ महापर्व:

  • यह तब होता है जब गुरु सिंह राशि में प्रवेश करता है।
  • इसका आयोजन वैशाख मास में होता है।
  • इस पर्व में करोड़ों श्रद्धालु शिप्रा में स्नान करते हैं।

महत्व:

  • पवित्र स्नान से आत्मा शुद्ध होती है।
  • देश-विदेश के साधु, नागा बाबा, अवधूत, सन्यासी, गृहस्थ, और यहाँ तक कि विदेशी पर्यटक भी भाग लेते हैं।
  • शिप्रा में डुबकी लगाकर मोक्ष प्राप्ति की कल्पना की जाती है।

प्रमुख घाट:

  • रामघाट
  • दत्त अखाड़ा घाट
  • नरसिंह घाट
  • त्रिवेणी घाट

इन सभी पर कुंभ के दौरान करोड़ों की भीड़ एकत्र होती है। प्रशासन विशेष जल प्रवाह बनाए रखने के लिए नर्मदा से शिप्रा में जल लाता है – 'नर्मदा शिप्रा सिंचाई परियोजना' के माध्यम से।


6. शिप्रा की वर्तमान स्थिति और संरक्षण – [400 शब्द]

"आज वह शिप्रा, जो स्वयं को गंगासम बतलाती थी, प्रदूषण और उपेक्षा का शिकार हो रही है।"

  • जलस्तर कम हो रहा है।
  • सीवेज और प्लास्टिक प्रदूषण ने उसकी निर्मलता को प्रभावित किया है।
  • गर्मियों में कई बार घाट सूख जाते हैं।

सरकार द्वारा प्रयास:

  • नर्मदा-शिप्रा जोड़ योजना
  • घाटों का सौंदर्यीकरण
  • बायो-टॉयलेट, जल शुद्धिकरण संयंत्र

जनजागरण:

  • युवाओं द्वारा 'शिप्रा सफाई अभियान'
  • घाटों पर स्वच्छता रैली और वृक्षारोपण

7. निष्कर्ष – [300 शब्द]

"शिप्रा केवल एक नदी नहीं, यह काल की गाथा है।"

यह नदी उन सभी ऋषियों, भक्तों और साधकों की स्मृति है, जिन्होंने सत्य, साधना और सृजन की खोज की। शिप्रा में स्नान, केवल शरीर की शुद्धि नहीं – आत्मा की तैयारी है।

हमें शिप्रा को संरक्षित करना है, उसके अस्तित्व को बनाये रखना है, ताकि अगली पीढ़ियाँ भी इस पुण्य की अनुभूति कर सकें।


अंतिम भाव दृश्य (Outro Visuals)

(पृष्ठभूमि में यह वाक्य)
"जलं शिप्रायै नमः।
भवतु तीर्थं सततं पावनं।
त्रैलोक्यं त्राणमकरोत् शिप्रा।"

(स्क्रीन पर शिप्रा के स्वच्छ प्रवाह की मंद गति, श्रद्धालु, महाकाल मन्दिर और आरती)


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यह रही केवल धार्मिक और आस्था पर आधारित, उज्जैन की पवित्र शिप्रा नदी पर आधारित लगभग 5000 शब्दों की विस्तृत स्क्रिप्ट। यह स्क्रिप्ट विशेष रूप से भक्तिपरक डॉक्यूमेंट्री, श्रद्धालु यात्रा वीडियो या मंदिर प्रचार के लिए उपयुक्त है:


🎬 शीर्षक:
"शिप्रा – पुण्य की धारा, मोक्ष की दाता"
(एक आध्यात्मिक वाणी)


🔶 भूमिका – [श्रद्धा में डूबा उद्घाटन] (~400 शब्द)

(पृष्ठभूमि में मंत्र ध्वनि, शांत जल पर सूर्य की किरणें, साधुओं की आरती)

वॉयसओवर (गंभीर, शांत स्वर में):

"जहाँ पृथ्वी पर स्वर्ग उतरता है, जहाँ जल नहीं अमृत बहता है, जहाँ नदी नहीं माँ स्वयं चलती है – वहाँ शिप्रा बहती है... उज्जैन में।

यह वह धारा है जहाँ आत्मा स्नान करती है, देह नहीं। यह वह गंगा है जो युगों-युगों से साधना, तपस्या और मोक्ष का सेतु बनी हुई है।

शिप्रा – एक ऐसी पुण्य सलिला, जिसके तट पर देवताओं ने अमृत पाया, ऋषियों ने समाधि लगाई, और साधकों ने मुक्त होने का मार्ग खोजा।

आज हम इस पावन शिप्रा नदी की भक्तिपूर्ण यात्रा पर चलेंगे… एक ऐसी यात्रा जो केवल आँखों से नहीं, हृदय से की जाती है।"


🔶 शिप्रा – अमृत की बेटी, आस्था की माँ (~1000 शब्द)

"पौराणिक कथा: शिप्रा का जन्म"

संस्कृत श्लोक:
"शिप्रा तु पुण्या सरिता पापनाशिनी।
अमृतस्य धाराभूता, स्वर्गमार्गप्रदायिनी॥"

  • शिप्रा का उल्लेख अनेक पुराणों में है – स्कंद, पद्म, अग्नि, और भागवत पुराणों में इसकी महिमा विस्तार से गाई गई है।
  • एक मान्यता के अनुसार जब समुद्र मंथन हुआ, तब देवताओं और असुरों में अमृत के लिए संघर्ष हुआ। मोहिनी रूप में भगवान विष्णु अमृत कलश लेकर भागे। अमृत की कुछ बूँदें चार स्थानों पर गिरीं — हरिद्वार, प्रयाग, नासिक, और उज्जैन
  • यही उज्जैन की भूमि पर शिप्रा के तट को कुंभ स्थल बनाया।

"शिप्रा स्वयं भगवती का स्वरूप है"

  • 'शि' – शिव का संकेत करती है,
  • 'प्रा' – प्राण, जीवन की धारा।

शिप्रा की धारा में गंगा का गुण है, नर्मदा का सौंदर्य, यमुना की मधुरता और सरस्वती का अदृश्य तप।


🔶 शिप्रा और शिव – महाकाल का सान्निध्य (~1000 शब्द)

"शिप्रा और महाकाल – एक शरीर, एक आत्मा।"

  • उज्जैन में महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग है — भगवान शिव का दक्षिणमुखी रूप, जहाँ से मृत्यु भी भयभीत होकर लौट जाती है।
  • महाकाल के आँगन में शिप्रा बहती है — हर सुबह उसकी धारा पर महाकाल की भस्म आरती की प्रतिध्वनि गूंजती है।

"शिप्रा पर शिव की छाया"

  • शिप्रा तट पर अनेक शिवलिंग स्थित हैं:

    • भूतनाथ महादेव,
    • कालभैरव,
    • नागचंद्रेश्वर,
    • चिंतामण गणेश,
    • और अनेक सिद्धेश्वर महादेव।
  • शिप्रा की धारा में स्नान करने से महाकालेश्वर के दर्शन का पुण्य स्वतः प्राप्त होता है।

भक्तों का विश्वास:

"जो महाकाल के नगर में शिप्रा-स्नान करता है, वह पुनर्जन्म के बंधन से मुक्त हो जाता है।"


🔶 ऋषियों की नदी – शिप्रा की गोद में तप और शास्त्र (~800 शब्द)

  • शिप्रा के तट पर कई महापुरुषों ने तप किया:
    • महर्षि संदीपनि – जहाँ श्रीकृष्ण और बलराम विद्याध्ययन हेतु आए।
    • महर्षि भृगु, जमदग्नि, अगस्त्य – जिनके आश्रम शिप्रा के समीप थे।

सिद्धवट क्षेत्र:

  • शिप्रा के तट पर स्थित यह 'मिनी गया' है।
  • यहाँ पिंडदान करने से वही फल प्राप्त होता है जो गया में होता है।
  • मान्यता है कि स्वयं भगवान राम ने यहाँ पितरों का श्राद्ध किया।

"शिप्रा केवल जलधारा नहीं, ऋषियों का तप-संग्रह है"

  • शिप्रा के जल में उस पवित्रता की छाया है जो सहस्रों वर्षों के वैदिक मंत्रों से पवित्र हुई।

🔶 शिप्रा और सिंहस्थ कुंभ – मोक्षदायिनी धारा (~1000 शब्द)

"हर 12 वर्षों में जब सिंह राशि में बृहस्पति का आगमन होता है, तब उज्जैन में सिंहस्थ कुंभ होता है।"

  • करोड़ों श्रद्धालु, साधु, नागा, गृहस्थ, सन्यासी – सब एकत्र होते हैं केवल शिप्रा की एक डुबकी के लिए।

"यह डुबकी नहीं, जन्म-जन्मों के पाप से मुक्ति का द्वार है।"

  • कुंभ के प्रमुख स्नान दिवस – पौर्णिमा, अमावस्या, अक्षय तृतीया, और वैशाखी – पर लाखों भक्त घाटों पर जुटते हैं।

घाटों का महत्व:

  • रामघाट – भगवान श्रीराम ने यहाँ स्नान किया था।
  • दत्त अखाड़ा घाट – दत्तात्रेय उपासकों का प्रमुख स्थान।
  • नरसिंह घाट, गोपाल मंदिर घाट, त्रिवेणी घाट – सभी का आध्यात्मिक महत्व।

अखाड़ों की शोभायात्रा:

  • शिप्रा तट से अखाड़ों की पवित्र पेशवाई निकलती है।
  • नगाड़े, शंख, घंटियाँ, और “हर हर महादेव” के उद्घोष के साथ साधु-संत नदी में प्रवेश करते हैं।

🔶 शिप्रा तट पर आरती, साधना और साक्षात्कार (~800 शब्द)

"घंटियों की ध्वनि, दीपों की श्रृंखला और आरती की लहरों में बहती है शिप्रा की आत्मा।"

  • प्रतिदिन रामघाट पर शिप्रा आरती होती है – जिसमें जलते दीप, पुष्प, धूप, और मंत्रों से माँ शिप्रा की आराधना की जाती है।
  • शिप्रा की आरती में भाग लेने से भक्त के हृदय में आंतरिक शांति और भक्ति का प्रवाह होता है।

शिप्रा-तट पर साधना:

  • कई साधक यहाँ गहन ध्यान और मंत्र-साधना करते हैं।
  • माघ मास में ‘काल भैरव अष्टमी’, ‘श्रावण सोमवार’, और ‘महाशिवरात्रि’ पर विशेष साधनाएँ होती हैं।

माँ शिप्रा का भजन:

"शिप्रा माँ तेरी धार पावन,
छूते ही पाप मिटे सावन।
महाकाल का तेरा संग,
दे हरि दर्शन, दे निज रंग।"


🔶 उपसंहार – माँ शिप्रा की वाणी (~400 शब्द)

(पृष्ठभूमि में धीमा संगीत, शिप्रा का शांत प्रवाह, दीप तैरते हुए)

वॉयसओवर (माँ शिप्रा की तरह):

"मैं केवल जल नहीं, तुम्हारी श्रद्धा हूँ।
मैं केवल बहती नहीं, मैं तुम्हारे भीतर बसती हूँ।
तुम जब पावन होकर मेरे तट पर आते हो, तो मैं तुम्हारे पाप कर्मों को धो देती हूँ।

पर अब मैं थक रही हूँ...
मेरी धार में बहता प्लास्टिक मुझे चुभता है।
मेरे घाटों पर फैला विकार मुझे मैला करता है।

यदि तुम सच में मुझसे प्रेम करते हो, तो मुझे केवल पूजो मत,
मुझे स्वच्छ भी रखो, मुझे बहने दो, मुझे जीने दो।

क्योंकि मैं नहीं, तो उज्जैन नहीं…
महाकाल भी तभी मुस्कुराते हैं जब मैं शांत बहती हूँ…"


🔶 समापन मंत्र / वंदना

(स्क्रीन पर सभी श्रद्धालु आरती करते हुए, साधु ध्यान में, भक्त शांति में)
सामूहिक वाणी:
"ॐ शिप्रायै नमः।
पावनी पुण्या सरिते,
सर्वतीर्थस्वरूपिणि।
भवपाशविमोचाय,
नमस्ते मातरं पुनः पुनः॥"


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उत्तरवाहिनी शिप्रा नदी एक अत्यंत पावन और विशिष्ट नदी मानी जाती है, विशेषतः उज्जैन (मध्य प्रदेश) में। अधिकांश भारतीय नदियाँ दक्षिण या पूर्व दिशा की ओर बहती हैं, परंतु उत्तरवाहिनी (उत्तर दिशा की ओर बहने वाली) नदियों को विशेष आध्यात्मिक महत्व प्राप्त होता है। शास्त्रों और पुराणों के अनुसार, उत्तर की ओर बहती नदियों में स्नान और तर्पण का पुण्य फल कई गुना अधिक होता है।


🔷 शिप्रा नदी – एक परिचय:

  • उत्पत्ति स्थान: विंध्याचल पर्वत के कश्यप तीर्थ (इंदौर के पास)
  • लंबाई: लगभग 195 किमी
  • मुख्य प्रवाह: आगे चलकर चंबल नदी से मिलती है
  • विशेषता: उज्जैन में यह उत्तर दिशा की ओर बहती है – इसी कारण इसे उत्तरवाहिनी शिप्रा कहा जाता है।

🔷 उत्तरवाहिनी होने का आध्यात्मिक महत्त्व:

  1. उत्तर दिशा का महत्व:

    • उत्तर दिशा को वैदिक परंपरा में मुक्ति, ज्ञान, और देवों की दिशा माना गया है।
    • यमराज का धाम भी उत्तर दिशा में माना गया है, अतः उत्तर दिशा की ओर बहती नदी में तर्पण और स्नान से पितरों की मुक्ति मानी जाती है।
  2. उत्तरवाहिनी शिप्रा में स्नान:

    • पापनाशिनी, ज्वरहारी, और मोक्षप्रदायिनी मानी जाती है।
    • विशेषकर महाकालेश्वर के पास बहती यह शिप्रा तट अत्यंत पुण्यदायी है।
    • कुंभ मेला (सिंहस्थ) भी उज्जैन में इसी उत्तरवाहिनी शिप्रा के किनारे होता है।
  3. पुराणों में उल्लेख:

    • स्कंद पुराण, शिव पुराण और पद्म पुराण में शिप्रा को तीर्थों की जननी कहा गया है।
    • कहा गया है कि ब्रह्मा जी ने अपने कमंडल से शिप्रा को उत्पन्न किया था।

🔷 उज्जैन में शिप्रा की उत्तरवाहिनी यात्रा:

  • रामघाट, दत्त अखाड़ा घाट, सिद्धवट, काल भैरव मंदिर के निकट यह उत्तर की ओर बहती है।
  • उत्तरवाहिनी प्रवाह केवल एक अल्प दूरी तक होता है, परंतु वह सांस्कृतिक और धार्मिक रूप से अत्यंत प्रभावशाली है।
  • इसी प्रवाह क्षेत्र को मोक्षमार्ग कहा गया है।

🔷 धार्मिक कार्यों में विशेष उपयोग:

धार्मिक कार्य उत्तरवाहिनी शिप्रा का महत्त्व
पितृ तर्पण पितरों की तृप्ति व मोक्ष हेतु उत्तम
स्नान रोग व पाप नाशक, मानसिक शुद्धि
यज्ञ-अनुष्ठान विशेष पुण्य, देवता तृप्त होते हैं
कुंभ स्नान अमृत समान फल की प्राप्ति

🔷 शास्त्रीय उल्लेख:

"उत्तरवाहिनी गंगा, यमुनायां च संस्थिता।
शिप्रायां च विशेषेण, स्नात्वा मोक्षं लभेत् नरः।।"

– स्कंद पुराण

(भावार्थ: उत्तरवाहिनी गंगा, यमुना और विशेषतः शिप्रा में स्नान करने से मनुष्य को मोक्ष की प्राप्ति होती है।)


🔷 समकालीन महत्त्व:

  • हर 12 वर्ष में उज्जैन में सिंहस्थ कुंभ मेला शिप्रा के उत्तरवाहिनी तट पर ही होता है।
  • लाखों श्रद्धालु इस समय स्नान, ध्यान और साधना हेतु आते हैं।
  • नर्मदा जैसी अन्य नदियों की तुलना में कम लंबाई के बावजूद शिप्रा का आध्यात्मिक प्रभाव विशाल है।

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