स्वप्नेश्वर महादेव की कथा प्रारम्भ (स्थान: महाकाल मंदिर प्रांगण में)
80/84 स्वप्नेश्वर महादेव की कथा प्रारम्भ (स्थान: महाकाल मंदिर प्रांगण में)
(1) ईश्वरजी ने कहा-हे देवि ! अस्सी संख्या के स्वप्नेश्वर महादेव है ! जिनके दर्शन मात्र से दुस्वप्न का फल सुख देने वाला होता है : (2) पहिले प्रसिद्ध कल्माषपाद नाम के राजा इक्ष्वाकु कुल में हुए थे ! वे सूर्य के समान तेजस्वी थे (3) उन्होंने एक तमय वन्न में वशिष्ठमुनी के पुत्र को व उनकीं बहु को देखा ! वो मुनी धर्मज्ञ एवम जितेन्द्रिय थे तथा मार्ग में बैठे हुए तपश्चर्या कर. रह थे ! राजा ने मुनि से कहा मार्ग (रास्ते) से हट जाओं (4) परन्तु मुनि मार्ग से नहीं हटे, इसलिये राजा नेक्रोध में आकार अपने चाबुक से उन्हें पीटा (5) राक्षस की तरह कर्म करते देख वशिष्ठ मुनि के पुत्र ने राजा को शाप दे दिया और कहा (6) हे राजा तूं राक्षस हो जावेगा !! पुरूषों को खाने वाला होगा (7) तब राजा ने उसी समय मुनि को प्रणाम किया ! उपराध की क्षमा माँगी, परन्तु मुनि ने क्षमा नहीं किया ! मुनि की स्त्री से क्षमा मांगी ! उसने भी क्षमा नहीं किया (३) और अधिक कोध करने लगी ! तब तो राजा वशिष्ठ मुनि की स्त्री से क्षमा माँगी ! उसने भी क्षमा नहीं किया !! (9) और अधिक क्रोध करने लगी ! तब तो राजा वशिष्ठ मुनि के पुत्र को वैखेसकी स्त्री को खा गद्मा (10) और भी भी वशिष्ठके पुत्रों को खा गया ! जैसे सिंह मृगों को खा जाता है उसी प्रकार राजा ने भी काम किया !! 1 !! उस दिन से राजा पुरुषों को भक्षण करने वाला हो गया (10) रात्री को राजा ने बहुत से दुःस्वप्न देखे और जगने के बाद उन स्वप्नों से भयभीत होता हुआ जोर-जोर से रोने लगा (11) तब तो अमात्य (मंत्री) ने कहा हे राजा यह क्या कर रहे हो ! तुम्हारी कांति कैसे नष्ट हो गई, शरीर काला पड़ गया (12) तब राजा ने कहा मुझे बहुत बुरे-बुरे स्वप्न आये है ! (13) मैंने स्वप्न में सागर को सूखा देखा चन्द्र को पृथ्वी पर गिरा हुआ देखा (14) सारे शरीर पर तेल लगा हुआ देखा! तेल में स्नान देखा (15) मुझे चाबुक से पीट रहे है मुझे उल्टा टांग दिया है तथा मुझे घिसकर नरकों में बड़ी-बड़ी यातनाएँ दी है तथा अनेक आयुधों से मुझे पीटा है (16) मैं सब स्वप्न कहने में समर्थ नहीं हूँ (17) ऐसा कहकर राजा अनाथ की तरह विलाप करने लगा ! राजा के वचन सुनकर मंत्री बड़ा दुःखी हुआ (18) और मंत्री ने राजा को समझा कर कहा स्वप्न के फल को दूर करने के लिएपित्रादि देवता का पूजन करो तथा ब्राह्मणों की श्रद्धा से पूजा करो (19) ये सब तुम्हारे स्वप्नों को नष्ट करेंगे ! तब तो राजा नें मंत्री से कहा मैंने वशिष्ठ मुनि के पुत्रों को भक्षण किया है ! उनकी सत्री शक्ति को भी भक्षण किया है (20) उस प्राप से में जल रहा हूँ, कैसे शांति मिलेगी ! एक ब्रह्मा हत्या भी दुःखों का करंण होती है! फिर मैंने तो असंख्यक हत्या की है ! मैं नक में दुःख भोगूँगा (21) ऐसा कहकर कहने लगा अग्नि प्रज्जवलित करके मैं अपने प्राणों को नाश करूँगा (22) ऐसे उस सौदास राजा के वचन. सुनकर आमात्य मंत्री शास्त्र को जानने वाला, वेदों का जानने वाला मन में निश्चय करके विचार किया कि आज हा महात्मा वशिष्ठमुनि के पास चलना चाहिये (24) ऐसा विचार करके राजा को साथ में लेकर वशिष्ठमुनि के आश्रम पर पहुँचा! तब तो उनकी कन्या भयभीत होकर मुनि से बोली यह आश्रम पर लकड़ी लिये हुए काल के सामन राक्षस आ रहर है! हे मिता इससे आप मेरा राक्षण करो (25) वशिष्ठमुनी ने कहा-हे कन्या डरो मत यह राक्षस नहीं है ! यह कलमाषपाद राजा मंत्री के सहित आया है !! 25 वशिष्ठमुनि ने राजा से हुंकार शब्द करते हुए कहा-ठहर जाओं 26 ऐसा कहकर मंत्र से जल को अभिमंत्रित करके राजा पर छिड़क दिया ! तब तो राजा राक्षस भाव से शुद्ध हो गया 27 और
Comments
Post a Comment