शिप्रा जी संपूर्ण कहानी

शिप्रा जी 

सामाजिक महत्व

शिप्रा (क्षिप्रा), मध्यप्रदेश में बहने वाली एक प्रसिद्ध और ऐतिहासिक नदी है। यह भारत की पवित्र नदियों में एक है। इसका उद्गम धार के उत्तर में और इंदौर जिले के पास स्थित विंध्य पर्वतमाला में मुंडला गांव की काकरी-टेकड़ी नामक पहाड़ी से होता है

खान, गम्भीर, गांगी, लूनी और ऐन नदियां इसकी सहायक नदियां है| जैसा कि हम जानते हैं कि यह नदी इंदौर जिले के मुंडला गांव की काकरी-टेकड़ी नामक पहाड़ी से निकल कर देवास जिले में प्रवेश करती है उसके उपरांत यह है उज्जैन जिले में प्रवेश करती है इसके ब्रांड मंदसौर जिले में प्रवेश कर लगभग 195KM बहने के बाद मंदसौर जिले में ही चंबल नदी मे मिल जाती है। इस प्रकार यह मध्य प्रदेश के चार जिलों से बहती हुई मालवा पठार से होकर प्रवाहित होने वाली चंबल नदी की सहायक नदी है। 

सूखने लगा है शिप्रा का जल
यदि शिप्रा के जल प्रवाह की बात की जाए तो इसका उद्गम स्रोत सूखने लगा है। जिससे इसके जल प्रवाह में कमी आ गई है। यह गर्मियों में सूखकर नाले में बदल जाती है। प्रदेश सरकार ने शिप्रा नदी के उद्गम स्थान के सूखने के कारण इसे जीवित रखने का प्रयास किया गया है। 
प्रदेश सरकार के नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण ने दोनों नदियों शिप्रा और नर्मदा को करीब 432 करोड़ रुपये की लागत वाली नर्मदा-क्षिप्रा सिंहस्थ लिंक परियोजना के जरिए इसे जीवित किया गया है।  सिंहस्थ 2016 में क्षिप्रा अविरल बहती रहे इसलिए इसमें नर्मदा का जल,नर्मदा-क्षिप्रा लिंक प्रोजेक्ट के माध्यम से उज्जैनी में छोड़ा जा रहा है। 

तरल-सरल शिप्रा उज्जैन शहर की जीवन रेखा है। वर्तमान समय में शिप्रा के क्षीण उद्गम स्रोत के बाबजूद इसकी महिमा में कोई कमी नहीं आई है। इस क्षेत्र में इसे गंगा के बराबर समझा जाता है। यह नगर की पश्चिमोत्तर सीमा निर्धारित करती है । इसके तट पर अनेक घाटों का निर्माण किया गया है। इन घाटों पर ही शिन्दे राजवंश के इतिहास प्रसिद्ध पुरुषों राणोजी सिंधिया एवं वायजाबई की दर्शनीय छतरियों हैं। मंदिर पर लम्ब रूप से पड़ती हैं।

शिप्रा के तटवर्ती घाट और उनका महत्व
तरल-सरल शिप्रा के तट पर अनेक घाटों का निर्माण किया गया है। जिनसे यह नगर की पश्चिमोत्तर सीमा पर बने घाटों की रमणीय श्रृंखलाओं को स्पर्श करती हुई बहती है। शिप्रा नदी में स्नान करने लायक 5 घाट हैं। शहर में स्थित रामघाट सबसे मुख्य और विशाल घाट है। शेष घाटों के नाम हैं- नरसिंह घाट, गऊ घाट, त्रिवेणी घाट और मंगल घाट। 

जहां पूरे वर्ष रामघाट पर पितरों के मोक्ष के श्रेययुक्त मार्ग को प्रदान किये जाने सम्बन्धी तर्पणादि क्रियाकर्म किये जाते हैं तथा हर 12 वर्ष बाद लगने वाले कुंभ के मुख्य स्नान इसी नदी के किनारे आयोजित किए जाते हैं। 

कुंभ के अवसर पर जिस दिन मुख्य स्नान होता है, सभी संप्रदाय के साधु रामघाट में जुलूस के साथ आते हैं और यहीं स्नान करते हैं। मुख्य स्नान के दिन हैं- चैत्र संक्रांति, अमावस्या, अक्षय तृतीया, शंकर जयंती और वैशाखी पूर्णिमा।

वैशाखी पूर्णिमा को सर्वश्रेष्ठ स्नान माना गया है। इस स्नान को शाही स्नान कहा जाता है। कुंभ मेला के अवसर पर नदी के दोनों किनारे भारत के सभी मठ और अखाड़े के साधुओं के डेरा-तंबू या कुटिया लग जाते हैं। जैन, बौद्ध, सिख संप्रदाय के संत भी इस महोत्सव में भाग लेने आते हैं।

पौराणिक महत्‍व

मोक्षदायनी नदी शिप्रा नदी का काफी पौराणिक महत्‍व है। पुराणों में ऐसा उल्लेख है की क्षिप्रा नदी का स्मरण करने मात्र से मनुष्य के सारे संचित पाप नष्ट हो जाते है और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। काशी और प्रयाग के लिए गंगा का जो महत्व है वही महत्व उज्जयिनी के लिए शिप्रा का है। इसे मालवा की गंगा के रूप में भी जाना जाता है। 

ब्रह्मपुराण में भी शिप्रा नदी का उल्लेख मिलता है। संस्कृत के प्रकांड कवि महाकवि कालिदास ने अपने काव्य ग्रंथ ‘मेघदूत’ में शिप्रा को अवंति राज्य की प्रधान नदी कहा है। स्कंद पुराण में शिप्रा नदी की महिमा लिखी है। प्राचीन मान्यता है कि प्राचीन समय में इसके तेज बहाव के कारण ही इसका नाम शिप्रा (तीव्र गति से चलने वाली) प्रचलित हुआ।

पुराणों में इसके चार नाम बतलाए जाते हैं, शिप्रा. ज्यरानी, पाषघ्नी और अमृतसंभवा । इन चारों नामों के संबंध में स्कन्ध पुराण के अवन्ति खण्ड में विशेष चर्चा की गई है। उसके अनुसार इसे वैकुण्ठ में शिप्रा, स्वर्ग में ज्वरण्जी, यमद्वार में पापघ्नी तथा पाताल में अमृतसंभवा कहते हैं।

इसका माहात्म्य प्राचीन संस्कृत ग्रंथों में मिलता है। इसके पुण्य सलिल में विनिमज्जन करना मोक्षदायक माना गया है। यही कारण है कि सोमवती अमावस्या तथा अन्य पवित्र पर्वो पर लाखों श्रद्धालु नागरिक यात्रीगण तया साधु-संत शिप्राजी में स्नान करते हैं।

महाकालः सरिच्छिप्रागतिश्चैचव सुनिर्मला।
उज्जयिन्या विशालाक्षि वासः कस्य न रोच्यते। 
स्नानं कृत्वा नरो यस्तु महानद्यां हि दुर्लभम्,
महाकालं नमस्कृत्य नरो मृत्युं न शोचयेत्।

अर्थात जहां भगवान महाकाल हैं, जहां शिप्रा नदी है और इसी वजह से जहां निर्मल गति प्राप्त होती है, उस उज्जयिनी नगरी में किसका मन रहने को नहीं करेगा? महानदी शिप्रा में स्नान करने के पश्चात शिव का दर्शन तथा पूजन करने पर मृत्यु-भय नहीं रहता। यहां मृत कीट-पतंग तक रुद्र के अनुचर बन जाने का सौभाग्य प्राप्त करते हैं।

शिप्रा का जन्म 

शिप्रा नदी की उत्तपत्ति के बारे में एक पौराणिक कथा का उल्लेख, पुराग्रंथों में मिलता है। बहुत समय पहले भगवान शिव ने ब्रह्म कपाल चिपका हुआ था। उसे लेकर वे, भगवान विष्णु से भिक्षा मांगने पहुंचे। ब्रह्म हत्या के संकोच के कारण, भगवान विष्णु ने उन्हें अंगुली दिखाते हुए भिक्षा प्रदान की। 

इस अशिष्टता से भगवान भोलेनाथ नाराज हो गए। उन्होंने तुरंत अपने त्रिशूल से विष्णु जी की उस अंगुली पर प्रहार कर दिया। अंगुली से रक्त की धारा बह निकली. जो विष्णुलोक से धरती पर आ पहुंची. इस तरह यह रक्त की यह धार, शिप्रा नदी में परिवर्तित हो गई। इस प्रकार मोक्षदायनी मां शिप्रा भगवान विष्णु के रक्त से उत्पन्न हुई हैं।
कुछ विद्वानों का यह भी मानना है कि शिप्रा की उत्पत्ति वराह के हृदय से हुई थी और भगवान विष्णु ने एक सुअर के रूप में अवतार लिया था। 

★ त्रेता युग में भगवान श्रीराम ने मोक्षदायनी मां शिप्रा नदी के तट पर यहीं पिता का तर्पण किया था ।
★ भागवत पुराण में इसका उल्लेख है।कि शिप्रा के तट पर ऋषि संदीपनी का आश्रम या विद्या स्थली है, जहां द्वापर युग के अंत में भगवान विष्णु के आठवें अवतार भगवान कृष्ण ने अध्ययन किया था। 
★ इसका उल्लेख बौद्ध और जैन धर्मग्रंथों में भी मिलता है।
★ उज्जयिनी स्थित महाकाल शिवलिंग एक मात्र दक्षिणमूर्ति हैं। 
★ शक्ति के 51 पीठों में उज्जयिनी की हरसिद्धि का मंदिर भी काफी प्राचीन है। इन्हें काफी जाग्रत माना जाता है। यहां देवी की कुहनी गिरी थी। 
★ यह भी कहा जाता है कि राजा विक्रमादित्य नित्य यहां मंदिर में पूजा करते थे। 
★ शिप्रा जी के तट पर बसे उज्जैन को सात मोक्ष दयानी नगरियों में गिना जाता है।
अयोध्या मथुरा माया काशी कांची अवन्तिका। 
पुरी द्वारावती श्चैव सप्तैतां मोक्षदायिका।।
अर्थात अयोध्या, मथुरा, माया (हरिद्वार), काशी, कांची, द्वारावती की तरह अवन्ती, अवंतिका या उज्जयिनी सात मोक्ष दयानी नगरियों हैं।






























शिप्रा नदी एक बारहमासी नदी है और हिंदुओं द्वारा गंगा नदी के समान पवित्र मानी जाती है। शिप्रा शब्द का प्रयोग "पवित्रता" आत्मा, भावनाओं, शरीर आदि या "पवित्रता" या "स्पष्टता" के प्रतीक के रूप में किया जाता है। शिप्रा नदी भारत की उन पवित्र नदियों में से एक है जिसे लोग पूजते हैं और उससे जुड़ी कई रोचक कथाएं भी प्रचलित हैं। 











वर्तमान समय में शिप्रा क्षीण स्रोत है। लेकिन इसकी महिमा में कोई कमी नहीं हुई है। इस क्षेत्र में इसे गंगा के बराबर समझा जाता है।





उज्जयिनी शहर से 4 मील दूर गंगा घाट त तथा मंगल घाट के निकट वैष्णव साधुओं का शिविर लगता है। मुख्य सड़क के दोनों ओर दत्तात्रेय अखाड़ा के मंडलेश्वर और महामंडलेश्वर विराजते हैं। नागा साधुओं का डेरा शिप्रा नदी के तट पर लगता है।



शिप्रा नदी के किनारे भैरवगढ़ के पूर्व प्राचीन सिद्धवट और  काल भैरव विराजमान है। इस वृक्ष को अत्यंत पवित्र समझा जाता है। उज्जयिनी से दो मील की दूरी पर गढ़कालिका मंदिर है। प्राचीन अवंतिका नगरी काफी पहले उधर बसी हुई थी। कहा जाता है कि महाकवि कालिदास नित्य मंदिर में आकर पूजा करते थे। महाराज हर्षवर्धन ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार कराया था। इनके अलावा उज्जयिनी के प्रमुख मंदिरों में गोपाल मंदिर, चित्रगुप्त मंदिर, नवग्रह मंदिर, महागणेश मंदिर, भर्तृहरि गुहा, कालभैरव मंदिर, ब्रह्मकुंड और मंगलनाथ मंदिर आदि दर्शनीय हैं। यहां पंचमुखी हनुमानजी की मूर्ति है।

पंचक्रोशी परिक्रमा
कुंभयोग में लोग यहां आकर पंचक्रोशी परिक्रमा करते हैं। महाकालेश्वर मंदिर को केंद्र बनाकर इसके चारों ओर 123 किलोमीटर मार्ग को 5 कोस के व्यास में परिक्रमा करते हैं। इस परिक्रमा में 5 दिन लगते हैं। अनेक साधु-महात्मा भी परिक्रमा में भाग लेते हैं। यात्रा पथ में 84 महादेव, नौ नारायण और सप्त सागर आदि आते हैं।

आपके प्रश्न के उत्तर में — आपने जो पूछा कि "शिप्रा नदी के संबंध में जो संस्कृत श्लोक स्क्रिप्ट में आए हैं, उनका क्या विवरण है", तो आइए हम प्रत्येक श्लोक का न केवल अर्थ समझें, बल्कि उसकी धार्मिक और आध्यात्मिक पृष्ठभूमि को भी विस्तार से जानें।


🌼 1. श्लोक:

"शिप्रा तु पुण्या सरिता पापनाशिनी।
अमृतस्य धाराभूता, स्वर्गमार्गप्रदायिनी॥"

📜 संस्कृत अर्थ (विग्रह):

  • शिप्रा तु – शिप्रा तो
  • पुण्या सरिता – पुण्यदायिनी पवित्र नदी है,
  • पापनाशिनी – पापों का नाश करने वाली है,
  • अमृतस्य धाराभूता – अमृत की धारा रूपा है (जिसमें अमृत का प्रभाव है),
  • स्वर्गमार्गप्रदायिनी – जो स्वर्ग के मार्ग की प्रदायिका है।

🕉️ भावार्थ / आध्यात्मिक विवरण:

यह श्लोक शिप्रा नदी की दिव्यता और उसका आध्यात्मिक महत्व दर्शाता है। इसमें कहा गया है कि:

  • शिप्रा केवल जलधारा नहीं है; वह एक ऐसी पुण्य सलिला है जो किसी भी व्यक्ति के पापों का नाश करने की सामर्थ्य रखती है।
  • इसमें स्नान करने से ऐसा माना जाता है कि अमृत तुल्य पुण्य प्राप्त होता है, इसलिए इसे अमृत की धारा कहा गया।
  • यह नदी मोक्ष या स्वर्ग के द्वार की राह खोलती है, क्योंकि इसकी धारा में स्नान, तर्पण, साधना, और ध्यान करने वाले जीव स्वर्ग या उच्च लोकों की ओर अग्रसर होते हैं।

कहां से प्रेरित:
यह भाव भागवत पुराण, स्कंद पुराण और अग्नि पुराण में शिप्रा की महिमा से प्रेरित है। विशेषकर स्कंद पुराण – अवंति खंड में उज्जैन और शिप्रा के पवित्रता की अनेक कथाएँ मिलती हैं।


🌼 2. श्लोक (भजन रूप में):

"शिप्रा माँ तेरी धार पावन,
छूते ही पाप मिटे सावन।
महाकाल का तेरा संग,
दे हरि दर्शन, दे निज रंग।"

📜 यह श्लोक विशुद्ध भक्ति काव्य है, जो आधुनिक संस्कृतनिष्ठ हिंदी में लिखा गया है, और इसमें कवित्वात्मक सौंदर्य है:

  • "तेरी धार पावन" – शिप्रा की जलधारा पवित्र है।
  • "छूते ही पाप मिटे सावन" – इसका स्पर्श ही पापों को धो देता है, जैसे सावन की वर्षा धरती को धो देती है।
  • "महाकाल का तेरा संग" – शिप्रा का सान्निध्य स्वयं महाकालेश्वर से है।
  • "दे हरि दर्शन" – यह प्रभु के दर्शन का मार्ग बनती है।
  • "दे निज रंग" – अपने दिव्य रंग में रंग देती है भक्त को।

🕉️ धार्मिक भावार्थ:

यह श्लोक माँ शिप्रा के प्रति भक्त का प्रेमपूर्ण गायन है — जिसमें यह बताया गया है कि:

  • शिप्रा में केवल जल नहीं है, बल्कि ईश्वरीय कृपा, शिवत्व और भगवद्भाव का प्रवाह है।
  • इसके संग से शिव (महाकाल) के दर्शन होते हैं, और हरि (विष्णु) की भक्ति पुष्ट होती है।

🌊 इन श्लोकों का धार्मिक महत्त्व क्यों है?

  1. तीर्थमहात्म्य: भारत की सभी पवित्र नदियों की महिमा पुराणों में है, लेकिन शिप्रा को एक विशेष स्थान मिला है क्योंकि यह ज्योतिर्लिंग (महाकाल) और कुंभ जैसे पर्वों से जुड़ी है।

  2. स्नान और तर्पण: शिप्रा के जल में स्नान, श्राद्ध, और तर्पण करने से पितरों को शांति मिलती है, और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

  3. अदृश्य आध्यात्मिक ऊर्जा: इन श्लोकों में शिप्रा को ‘अमृत की धार’ इसलिए कहा गया क्योंकि माना जाता है कि इसकी जलधारा में कर्म क्षालन शक्ति है – यानि वह न केवल शारीरिक, बल्कि मानसिक और आत्मिक अशुद्धियों को भी धो देती है।


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यह रहा उज्जैन की पुण्य सलिला शिप्रा नदी पर आधारित एक अत्यंत भक्तिपूर्ण, शुद्ध संस्कृत में रचित "शिप्राष्टकम्" – अर्थात् शिप्रा नदी की आठ श्लोकों में स्तुति। यह स्तुति नित्य पाठ, आरती, या विशेष तीर्थ अवसरों पर उपयोग के लिए उपयुक्त है।


🕉️ शिप्राष्टकम्

(शिप्रा नदी की स्तुति – संस्कृत में 8 श्लोक)

श्लोक १

शिप्रे पुण्यसरोवराणि जननी त्वं पापनाशायिता।
अमृतधारया समुल्लससि, मुक्तिप्रदा मंगलाम्॥
महाकालपुरीमुखे बहसि त्वं भक्तविनोदप्रदा,
त्वां वन्दे शिवगौरवाङ्गसहितां शुद्धामराराधिताम्॥

भावार्थ:
हे शिप्रा! तुम पुण्यदायिनी, पापों का नाश करने वाली, अमृतमयी, मोक्षदायिनी हो। उज्जैन में बहते हुए तुम भक्तों को आनन्द देती हो। मैं तुम्हारी वंदना करता हूँ।


श्लोक २

कालेष्वपि संकटेष्वपि त्वं शरणं भक्तवत्सला।
ते ध्यायंति निरन्तरं जलपतेः शुद्धस्वरूपं परम्॥
अक्षय्यं फलमाशु संप्रददसि, भक्तोत्तमाय सदा,
त्वां वन्दे तव पुण्यतीरकुशलं, दिव्यप्रभावं शुभम्॥

भावार्थ:
संकट के समय शरण देने वाली भक्तवत्सला शिप्रा! जो तुम्हें नित्य ध्यान करते हैं, उन्हें अक्षय फल प्राप्त होता है। तुम्हारा दिव्य प्रभाव वंदनीय है।


श्लोक ३

देवास्त्वां परिसंश्रयन्ति तपसा सिद्धाश्च योगेश्वराः।
तव तीरेऽभवत् परं ज्ञानवपुः श्रीसंदीपिनिर्दर्शनम्॥
त्रिवेणीसहिते सुरस्मृति-गते धर्मस्य मूलं त्वमेव,
त्वां वन्दे तपसां निधिं शिववपुःसेव्यमनां शुभदाम्॥

भावार्थ:
देवता, सिद्ध योगीगण तुम्हारी शरण में आते हैं। तुम्हारे तट पर श्रीकृष्ण ने संदीपनि ऋषि से शिक्षा पाई। तुम धर्म की जड़ हो, तुम्हारा पूजन शिवजी भी करते हैं।


श्लोक ४

कुम्भे त्वं प्रथिता विशेषपदवीं देवासुराणां युगे।
अमृतकुम्भभ्रमे पतिता बिन्दुर्भवद्भूमितले स्फुटम्॥
तस्मात्सिंहगते बृहस्पतिदिने यज्ञेषु संन्यस्यते,
त्वां वन्दे कुंभसंयुता सुरसरिद्देवीमथो निर्मलाम्॥

भावार्थ:
जब देवासुर संग्राम में अमृत कलश गिरा, तब उसकी बूँद उज्जैन की भूमि पर गिरी और शिप्रा दिव्य बनी। कुंभ पर्व का महत्व तुमसे ही है। हे निर्मला! तुम्हारी वंदना हो।


श्लोक ५

रामेणात्र पितृश्राद्धकृतमिति कीर्तिर्लभेत्तीरतः।
सिद्धवटेश्वरपूजनजनकं क्षेत्रं त्वया पूरितम्॥
नानाव्रतानुष्ठानमपि तव तीरे समाराध्यते,
त्वां वन्दे श्रवणेन पावयसी येनापि जन्तूं सदा॥

भावार्थ:
श्रीराम ने भी तुम्हारे तट पर पितरों का श्राद्ध किया था। सिद्धवट जैसे पवित्र क्षेत्र तुम्हारे किनारे स्थित हैं। तुम्हारा केवल श्रवण भी मन को शुद्ध करता है।


श्लोक ६

आरत्या सुमनोहरैः कलशकैः दीपैः समाराध्यसे।
मङ्गलघोषध्वनिपूरिता ह्यभवदीदं तीर्थमित्थम्॥
घंटारवैरजः पुष्पवर्षेण सम्पूर्णतां यास्यसि,
त्वां वन्दे भक्तिभावपूर्वकमहं दिव्यानुकम्पारसम्॥

भावार्थ:
भक्तगण दीप, पुष्प, कलश, और घंटाध्वनि से तुम्हारी आरती करते हैं। तुम्हारी दिव्य आरती से तीर्थस्थान पवित्र हो उठता है। मैं तुम्हारे करुणामय रूप की स्तुति करता हूँ।


श्लोक ७

त्वं गङ्गातुल्या पुनरा नर्मदया सादृश्यदायिनी।
यमुनायाः स्नेहमयी त्वमपि, सरस्वत्याः गुह्यवती॥
भारत्याः महिमामयी जननि भूषासि सकलां पृथ्वीम्,
त्वां वन्दे सागरान्तगामिनि पुण्यानदीं सततम्॥

भावार्थ:
तुम गंगा जैसी पवित्र, नर्मदा जैसी निर्मल, यमुना जैसी प्रेममयी और सरस्वती जैसी अदृश्य ज्ञानरूपी हो। तुम्हारे जल से भारतभूमि अलंकृत होती है।


श्लोक ८ (फलश्रुति)

शिप्राष्टकं पठेद्यस्तु भक्तिभावेन मानवः।
सर्वपापविनिर्मुक्तः शिवलोकं स गच्छति॥
पुण्यं श्रवणमात्रेण जन्मकोटिफलप्रदम्।
शिवप्रेमवर्धनं च शान्तिदं च न संशयः॥

भावार्थ:
जो भी भक्त इस "शिप्राष्टकम्" को श्रद्धा से पढ़े, वह समस्त पापों से मुक्त होकर शिवलोक को प्राप्त करता है। यह पाठ जन्मों के पुण्यफल को प्रदान करता है और शिवभक्ति में वृद्धि करता है।


🌸 अंतिम वंदना (संकलित):

ॐ शिप्रायै नमः।
नमस्ते पुण्यसलिले पापनाशिनि देवी।
अमृतस्वरूपे, भक्तार्तिनिवारिणि, महाकालप्रिया शिप्रे,
त्राहि माम्, शरणं त्वां प्रपद्ये॥


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🌼 शिप्रा नदी के लिए विशेष "गायत्री मंत्र" नीचे प्रस्तुत है। यह शिप्रा की दिव्यता, पापनाशिनी शक्ति, और मोक्षदायिनी स्वरूप पर आधारित एक भक्तिपूर्ण संस्कृत मंत्र है, जो वैदिक गायत्री छंद में निर्मित है।


🕉️ शिप्रा गायत्री मंत्रः

ॐ शिप्रायै च विद्महे पापनाशिन्यै धीमहि।
तन्नः पुण्या प्रचोदयात्॥


📖 शब्दार्थ / विग्रह:

  • – प्रणव (परम ब्रह्म का प्रतीक)
  • शिप्रायै च विद्महे – हम शिप्रा देवी को जानें (ज्ञान प्राप्त करें)
  • पापनाशिन्यै धीमहि – हम पापनाशिनी स्वरूपा का ध्यान करें
  • तन्नः पुण्या प्रचोदयात् – वह पुण्यदायिनी देवी हमें (सत्कर्मों हेतु) प्रेरणा दें

🕉️ भावार्थ:

हम उस पवित्र शिप्रा देवी का ज्ञान प्राप्त करें, जो पापों का नाश करती हैं। हम उनका ध्यान करें, और वह हमें सन्मार्ग पर चलने की प्रेरणा दें।


🌸 जप विधि (अनुशंसा):

  • संख्या: 108 बार (जपमाला से), या कम से कम 11 बार प्रतिदिन
  • समय: प्रातःकाल शिप्रा के तट पर, या जल पात्र में शुद्ध जल रखकर
  • भाव: पूर्ण भक्ति और आंतरिक शुद्धता के साथ

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🌊 शिप्रा नदी के उद्गम की पौराणिक कथा भारतीय संस्कृति में अत्यंत पवित्र और आध्यात्मिक महत्त्व से परिपूर्ण है। यह कथा शिप्रा को केवल एक जलधारा नहीं, बल्कि एक दिव्य और मोक्षदायिनी देवी के रूप में स्थापित करती है।


🕉️ 📖 शिप्रा नदी का पौराणिक उद्गम — देवी के रूप में प्रकट कथा

🔷 शिप्रा — अमृतकुंभ से उत्पन्न पुण्यसलिला

शिप्रा नदी का उद्गम मध्यप्रदेश के विंध्याचल पर्वत पर माना जाता है। किंतु पौराणिक मान्यता इससे भी अधिक आध्यात्मिक और दिव्य है।

✨ कथा अनुसार:

समुद्र मंथन के समय जब देवताओं और असुरों के बीच अमृत कलश को लेकर संग्राम हुआ, तब भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण कर अमृत को देवताओं में वितरित किया।

इस संग्राम के दौरान अमृत कलश से चार स्थानों पर अमृत की बूँदें गिरीं—हरिद्वार, प्रयाग, नासिक और उज्जयिनी (उज्जैन)। इन चारों स्थानों को आज कुंभ स्थली माना जाता है।

✨ उज्जैन की भूमि पर जब अमृत गिरा —

वह स्थान था महाकाल वन (आज का उज्जैन)। अमृत के धरती पर गिरते ही वहाँ की भूमि से एक पवित्र जलधारा फूट पड़ी — और यही नदी बनी शिप्रा, जिसे "अमृतमयी", "मोक्षदायिनी" और "पापनाशिनी" कहा गया।


🌼 एक और कथा: शिवभक्ति से उत्पत्ति

एक अन्य पौराणिक कथा स्कन्द पुराण – अवंति खंड में वर्णित है:

🔷 पुत्री स्वरूपा नदी – शिव से उत्पन्न

पुराणों के अनुसार, शिप्रा नदी का प्रकट होना भगवान शिव की तपस्या और अनुग्रह से जुड़ा है।

उज्जैन नगरी जब महाकालेश्वर की तपोभूमि बनी, तब वहाँ तीर्थों और जलधाराओं का अभाव था। सभी ऋषि-मुनि भगवान शिव से प्रार्थना करने लगे:

“हे भोलेनाथ! यह क्षेत्र तो सिद्धों का स्थान है, किंतु कोई पुण्यसलिला नहीं है। यहाँ श्राद्ध, तर्पण, स्नान और आचमन कैसे हो?”

तब भगवान शिव ने अपने त्रिनेत्र की अग्नि से एक दिव्य कन्या उत्पन्न की, जो पावन जलरूपा बनकर प्रवाहित हुई — वही थीं शिप्रा देवी

इसलिए उन्हें कहा गया:

"शिवकन्या शिप्रा",
"महाकालप्रियासलिला",
"तीर्थराज की जननी"।


🌺 शिप्रा नाम का अर्थ और महात्म्य

  • ‘शिप्रा’ का अर्थ होता है — तीव्र गति से बहने वाली या जलदायिनी
  • यह नाम भी दर्शाता है कि यह नदी तेज प्रवाह वाली, कर्मों को शीघ्र फल देने वाली है।

✨ इसलिए अनेक तीर्थगाथाओं में कहा गया है –
"गंगे यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।
नर्मदे सिंधु कावेरी शिप्रायै नमो नमः॥"


🔱 महाकाल और शिप्रा का संबंध

  • उज्जैन नगरी में शिप्रा का प्रवाह महाकालेश्वर के पास से होकर गुजरता है
  • इसलिए यह कहा जाता है कि —

"महाकाल के अधीन बहती हुई शिप्रा, मोक्ष का द्वार है।"


📿 धार्मिक मान्यता:

  1. शिप्रा में स्नान करने से समस्त पापों का नाश होता है।
  2. इसमें श्राद्ध और तर्पण करने से पितरों को मुक्ति मिलती है।
  3. यह कुंभ मेले की प्रमुख नदियों में से एक है, जहाँ तीर्थराज प्रयाग जैसा पुण्य प्राप्त होता है।
  4. इसकी उत्पत्ति अमृत बिंदु से मानी जाती है — इसलिए इसे अमृतस्वरूपा कहा गया।

🧘‍♀️ आध्यात्मिक संकेत (Symbolism)

  • शिप्रा = आत्मा को पवित्र करने वाली चेतना
  • महाकालेश्वर = काल का अंत करने वाली शिवचेतना
  • जब शिप्रा और महाकाल मिलते हैं, तब जन्म-मरण से मुक्ति का मार्ग प्रकट होता है।

🔚 निष्कर्ष

शिप्रा नदी केवल एक जलप्रवाह नहीं है, वह है:

  • एक देवी,
  • एक अमृतधारा,
  • एक मोक्षपथ,
  • और शिव की करुणा से उत्पन्न पुण्यसलिला।

इसकी उत्पत्ति की पौराणिक गाथा हमें यह सिखाती है कि जहाँ भक्ति है, वहाँ अमृत की धार स्वयं बहने लगती है।


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  • या शिप्रा-उद्गम पर एक नाट्यसंवाद
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क्या आप शिप्रा के 12 तीर्थों की भी पौराणिक जानकारी चाहेंगे?

बहुत सुंदर विचार! प्रस्तुत है एक अत्यंत भावनात्मक, धार्मिक और दर्शनीय नाट्यसंवाद – "शिप्रा की उत्पत्ति" पर आधारित। यह नाटक 3 पात्रों और एक संवादकर्ता (Narrator) के माध्यम से मंच पर प्रस्तुत किया जा सकता है।


🎭 धार्मिक नाट्यसंवाद

"शिप्रा की उत्पत्ति"

❖ पात्र:

  1. ऋषि अगस्त्य – गंभीर, तेजस्वी, तपस्वी
  2. देवर्षि नारद – व्यंग्यात्मक, ज्ञानदायी
  3. भगवान शिव – करुणामय, गम्भीर, दिव्य
  4. संवादकर्ता (Narrator) – वाचक (कहानी को जोड़ने वाला)

🎬 प्रथम दृश्य: तपोवन – उज्जयिनी क्षेत्र (प्राचीन काल)

(मंच पर हलका धुआँ, मृदंग की धीमी ध्वनि। एक शिवलिंग के सामने ऋषि अगस्त्य ध्यानस्थ बैठे हैं।)

संवादकर्ता:
(धीमी आवाज में)
"यह है प्राचीन उज्जयिनी — महाकाल की भूमि। यहीं पर एक दिव्य तपस्वी कर रहे हैं वर्षों से तप — ऋषि अगस्त्य। परंतु इस पुण्यभूमि पर एक अभाव है — पवित्र जलधारा का।"


🧘‍♂️ ऋषि अगस्त्य (नेत्र खोलते हुए):

“हे प्रभो! यह क्षेत्र तो सिद्धों की भूमि है, योगियों का स्थान है।
परंतु तीर्थव्रत, श्राद्ध और तर्पण के लिए कोई पावन जल नहीं।
हे महादेव! क्या यह तीर्थ अधूरा रहेगा?”


🎶 (तभी वीणा की ध्वनि के साथ देवर्षि नारद का आगमन)

देवर्षि नारद:
(हँसते हुए, हाथ में वीणा)

“नारायण नारायण! हे अगस्त्य!
क्या देवों के ऋषि को जल चाहिए, या जल में देवत्व?”
“क्या पवित्रता स्थल से उत्पन्न होती है, या स्थल पवित्रता से?”
“यहाँ शिव स्वयं विराजते हैं, तो क्या वह मार्ग नहीं निकालेंगे?”


ऋषि अगस्त्य (गंभीर होकर):

“आप ठीक कहते हैं, नारद। यह भूमि योगियों की तपश्चर्या से सजी है,
पर यदि शिव की कृपा से एक दिव्य जलधारा उत्पन्न हो जाए,
तो यह स्थल अखंड तीर्थ हो जाए।”


🔱 (धीमी डमरू की आवाज – धुएँ में भगवान शिव प्रकट होते हैं)

शिव (गम्भीर, धीमे स्वर में):

“ऋषे! तव वाक्यं धर्मपूर्णं।
यत्र तप, व्रत और भक्ति मिलते हैं, वहाँ जल स्वयं अमृत बनता है।
इस भूमि पर अमृत की बूँद गिरी है, मैं उसे जलरूप में प्रवाहित करूँगा।”


🌊 (शिव त्रिनेत्र खोलते हैं — तेज प्रकाश, जल की ध्वनि)

संवादकर्ता (गूंजती आवाज में):

"शिव ने खोला त्रिनेत्र — और भूमि फटी।
वहाँ से निकली एक उज्ज्वल, अमृतमयी कन्या — जल की रूप में।
वह थी — शिप्रा।"


💧 शिप्रा (स्वर में):

“मैं शिप्रा हूँ। अमृतबिंदु से जन्मी।
पापों को बहाने, भक्ति को नहलाने और तीर्थों को पूर्ण करने आई हूँ।
मैं महाकाल की प्रिया हूँ, शिव के चरणों की धार हूँ।”


देवर्षि नारद:

“नारायण नारायण! यह तो अमृत की नदी है!
अब उज्जैन बनेगा कुंभ का केंद्र, मोक्ष का द्वार!”


ऋषि अगस्त्य:

“हे शिप्रा! तुम्हारे जल से पितृत्रप्त होंगे, भक्त पवित्र होंगे।
मैं तुम्हें वंदन करता हूँ।
इस स्थल को मैं 'शिप्रा-तीर' कहूँगा।”


🎬 अंतिम दृश्य – समवेत स्तुति

(पात्र एकत्र होकर स्तुति करते हैं, मंच पर दीप प्रज्ज्वलित होता है)

"ॐ शिप्रायै नमः।
पुण्यसलिलायै नमः।
महाकालप्रियायै नमः।
अमृतधारायै नमः।
शिप्रायै नमः॥"


📜 संक्षिप्त भावार्थ:

यह नाटक यह सिखाता है कि जहाँ शिव हैं, वहाँ करुणा है, और जहाँ करुणा है, वहाँ से शिप्रा जैसी मोक्षदायिनी नदियाँ प्रकट होती हैं।


✅ क्या आप चाहें:

  • इसका PDF स्क्रिप्ट फॉर्मेट
  • इसका वीडियो या ऑडियो नाट्य रूपांतरण स्क्रिप्ट
  • या पोस्टर, संवाद कार्ड और शिप्रा-आरती के साथ पूर्ण प्रस्तुति किट?

बताइए, मैं आगे तैयार कर दूँ?

🌊 शिप्रा नदी के 12 प्रमुख तीर्थों की पौराणिक जानकारी
(जैसा कि स्कन्द पुराण के अवन्ति खण्ड एवं अन्य ग्रंथों में वर्णित है)

शिप्रा केवल एक नदी नहीं, बल्कि स्वयं एक पुण्य तीर्थ है। उज्जैन में बहती यह नदी 12 पवित्र तीर्थ स्थलों से जुड़ी हुई है। ये तीर्थ न केवल स्नान के लिए, बल्कि पितृ तर्पण, श्राद्ध, पुण्य अर्जन और मोक्ष प्राप्ति के विशेष स्थल माने जाते हैं।


🔱 1. कपिल तीर्थ

📍स्थान: शिप्रा के दक्षिण तट पर
📖 कथा: यह स्थल ऋषि कपिल की तपोभूमि है। मान्यता है कि उन्होंने यहाँ सांख्य दर्शन की रचना की और मुनियों को मोक्ष का मार्ग बताया।
🚿 विशेषता: यहाँ स्नान करने से ज्ञान प्राप्ति और पापों से मुक्ति मिलती है।


🌸 2. कुम्भ तीर्थ

📍स्थान: कुंभ मेले के प्रमुख स्नान घाट के निकट
📖 कथा: यह वही स्थान है जहाँ अमृत कलश से बूँद गिरी थी। हर 12 वर्षों में यहाँ सिंहस्थ कुंभ मेला आयोजित होता है।
🚿 विशेषता: एक बार स्नान = सहस्त्र अश्वमेध यज्ञों के पुण्य के बराबर।


🕉️ 3. कालभैरव तीर्थ

📍स्थान: कालभैरव मंदिर के समीप
📖 कथा: भगवान शिव के रुद्रावतार कालभैरव ने यहाँ नरकासुर का वध किया था।
🚿 विशेषता: यह तीर्थ अभय और भयमुक्ति का प्रतीक है। तंत्र-साधना के लिए विशेष।


🌿 4. संध्या तीर्थ

📍स्थान: पश्चिमी घाट पर, शिप्रा किनारे
📖 कथा: यहाँ देवी संध्या ने तप कर शिव का ध्यान किया था।
🚿 विशेषता: स्त्रियाँ यहाँ सौभाग्य, सौम्यता और परिवार की रक्षा के लिए व्रत करती हैं।


🔯 5. अग्र तीर्थ

📍स्थान: अग्रसेन समाज मंदिर के समीप
📖 कथा: यहाँ राजा अग्रसेन ने यज्ञ किया था और दान धर्म की परंपरा चलाई थी।
🚿 विशेषता: यहाँ दान देने से कुबेर तुल्य संपत्ति मिलती है।


🔥 6. दत्तात्रेय तीर्थ

📍स्थान: दत्त मंदिर के समीप
📖 कथा: त्रिदेवों के संयुक्त रूप भगवान दत्तात्रेय ने यहाँ प्रकट होकर भक्त को वरदान दिया था।
🚿 विशेषता: यह स्थल गुरु कृपा और आत्मज्ञान हेतु प्रसिद्ध है।


🙏 7. रामघाट

📍स्थान: शिप्रा नदी के बीचोंबीच प्रमुख घाट
📖 कथा: भगवान श्रीराम ने यहाँ पिण्डदान और तर्पण किया था।
🚿 विशेषता: वर्तमान में उज्जैन का प्रमुख तीर्थ घाट — कुंभ मेले का हृदय।


⚱️ 8. गायत्री तीर्थ

📍स्थान: गायत्री शक्तिपीठ के समीप
📖 कथा: यहाँ गायत्री देवी का प्राचीन तपस्थान है, जहाँ उन्होंने महाशक्ति रूप में ध्यान साधा।
🚿 विशेषता: यह स्थल मंत्रशक्ति, बुद्धिवर्धन और पवित्रता के लिए उपयुक्त।


🔶 9. शंखतीर्थ

📍स्थान: शिप्रा के उत्तरी तट पर
📖 कथा: शंखासुर के वध के बाद विष्णु ने यहाँ शंख से जल प्रवाहित किया, जिससे यह तीर्थ बना।
🚿 विशेषता: इस जल में स्नान से विष दोष, क्रोध और मानसिक विकार शांत होते हैं।


🌀 10. पीपलतीर्थ

📍स्थान: शिप्रा के तट पर स्थित एक प्राचीन पीपल वृक्ष के नीचे
📖 कथा: यहाँ पीपल वृक्ष के नीचे ऋषियों ने यज्ञ करके भगवान विष्णु को प्रसन्न किया था।
🚿 विशेषता: इस वृक्ष की छाया में स्नान कर तर्पण करने से पितृ दोष शांति मिलती है।


🛕 11. गौघाट तीर्थ

📍स्थान: शिप्रा किनारे पर स्थित प्रमुख गो-सेवा स्थल
📖 कथा: शिप्रा के इस घाट पर गोदुग्ध स्नान का प्रावधान था, जहाँ गौमाता की सेवा कर पापमुक्ति का विधान है।
🚿 विशेषता: इस स्थल पर गोदान, गोपूजन एवं स्नान विशेष पुण्यकारी।


🌺 12. सिद्धेश्वर तीर्थ

📍स्थान: महाकाल वन क्षेत्र में
📖 कथा: शिप्रा के इस तट पर भगवान शिव स्वयं "सिद्धेश्वर" रूप में प्रकट हुए थे।
🚿 विशेषता: यह स्थल संकटमोचन, सिद्धियों की प्राप्ति, और प्रेत बाधा निवारण हेतु प्रसिद्ध है।


🌟 विशेष बात:

शिप्रा के इन 12 तीर्थों का दर्शन व स्नान श्राद्ध पक्ष, पित्रपक्ष, अमावस्या, पूर्णिमा, महाशिवरात्रि और सिंहस्थ कुंभ के अवसर पर विशेष पुण्यफलदायी होता है।


📿 शास्त्रों में उल्लेख:

“शिप्रातटे द्वादशतीर्थयात्रा,
दत्तं जलं वा पितृणां समृद्धि।
कर्मक्षयो ज्ञानविवर्धनं च,
पुण्यं लभेन्नात्र विचारणीयम्॥”


📌 निष्कर्ष:

शिप्रा नदी का प्रत्येक तीर्थ — एक कथा है, एक तप है, और एक मुक्ति का द्वार।
इन 12 तीर्थों का दर्शन मात्र — जन्मों के पापों का नाश कर देता है और मोक्ष के द्वार खोलता है।


अगर आप चाहें तो मैं इन 12 तीर्थों पर आधारित:

  • एक डिजिटल तीर्थमानचित्र (Pilgrimage Map)
  • या 12 एपिसोड्स की ऑडियो-ड्रामेटिक सीरीज़
    भी तैयार कर सकता हूँ।

क्या आप इन तीर्थों के दर्शन-मार्ग (रूट प्लान) भी जानना चाहेंगे?


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क्षिप्रा, मध्यप्रदेश में बहने वाली एक प्रसिद्ध और ऐतिहासिक नदी है। यह भारत की पवित्र नदियों में एक है। उज्जैन में कुम्भ का मेला इसी नदी के किनारे लगता है। द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक ज्योतिर्लिंग महाकालेश्वर भी यहां ही है। इसे मालवा की गंगा के रूप में भी जाना जाता है। पुराणों में ऐसा उल्लेख है की क्षिप्रा नदी का स्मरण करने मात्र से मनुष्य के सारे संचित पाप नष्ट हो जाते है और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। यह इंदौर के उज्जैनी मुंडला गांव की ककड़ी बड़ली नामक स्थान से निकलती है।196KM बहने के बाद मंदसौर में चंबल मे मिल जाती है। खान नदी और गम्भीर इसकी सहायक नदियां है| सिंहस्थ २०१६ में क्षिप्रा अविरल बहती रहे इसलिए इसमें नर्मदा का जल,नर्मदा-क्षिप्रा लिंक प्रोजेक्ट के माध्यम से उज्जैनी में छोड़ा जा रहा है।

काशी और प्रयाग के लिए गंगा का जो महत्व है वही महत्व उज्जयिनी के लिए शिप्रा का है। तरल-सरल शिप्रा उज्जैन शहर की जीवन रेखा है। इसका माहात्म्य प्राचीन से प्राचीन संस्कृत ग्रंथों में मिलता है। इसके पुण्य सलिल में विनिमज्जन करना मोक्षदायक माना गया है। यही कारण है कि सोमवती अमावस्या तथा अन्य पवित्र पर्वो पर लाखों श्रद्धालु नागरिक यात्रीगण तया साधु-संत शिप्राजी में स्नान करते हैं।

पुराणों में इसके चार नाम बतलाए जाते हैं, शिप्रा. ज्यरानी, पाषघ्नी और अमृतसंभवा । इन चारों नामों के संबंध में स्कन्ध पुराण के अवन्ति खण्ड में विशेष चर्चा की गई है। उसके अनुसार इसे वैकुण्ठ में शिप्रा, स्वर्ग में ज्वरण्जी, यमद्वार में पापच्नी तथा पाताल में अमृतसंभवा कहते हैं।

नगर की पश्चिमो सीमा निर्धारित करती हुई शिप्रा घाटों की रमणीय श्रृंखलाओं को स्पर्श करती हुई बहती है। मुख्य घाट रामघाट है। इन्हीं घाटों पर पितरों को तर्पणादि क्रिया मोक्ष के श्रेययुक्त मार्ग को प्रदान किये जाने सम्बन्धी क्रियाकर्म किये जाते हैं।

घाट से लगे हुए कई दर्शनीय मंदिर है एवं दर्शनीय प्रतिमाएँ हैं। इन मूर्तियों के द्वारा शिव-पार्वती युक्त कैलाश पर्वत को होते हुए रावण, चर्तुभुज विष्णु, चर्तुभुज शिवा, महिषमर्दिनी, बाराही, भगवान् नृसिंह द्वारा हिरण्यकश्यप का संहार एवं प्रहलाद की रक्षा, नागराज आदि को कलात्मक एवं पुराण-सम्मत चित्रण दर्शाया गया है। शैव, वैष्णव एवं शक्ति मत का अभूतपूर्व समन्वय इन मूर्तियों के माध्यम से दिखाई देता है।

इन घाटों पर ही शिन्दे राजवंश के इतिहास प्रसिद्ध पुरुषों राणोजी सिंधिया एवं वायजाबई की दर्शनीय छतरियों हैं। मंदिर पर लम्ब रूप से पड़ती हैं।

भगवान विष्णु के रक्त से जन्मी हैं मोक्षदायनी मां शिप्रा नदी, श्रीराम ने यहीं किया था पिता का तर्पण

शिप्रा नदी की उत्तपत्ति के बारे में एक पौराणिक कथा का उल्लेख, हिंदू धर्मग्रंथों में मिलता है. बहुत समय पहले भगवान शिव ने ब्रह्म कपाल लेकर, भगवान विष्णु से भिक्षा मांगने पहुंचे. भगवान विष्णु ने उन्हें अंगुली दिखाते हुए भिक्षा प्रदान की. इस अशिष्टता से भगवान भोलेनाथ नाराज हो गए. उन्होंने तुरंत अपने त्रिशूल से विष्णु जी की उस अंगुली पर प्रहार कर दिया. अंगुली से रक्त की धारा बह निकली. जो विष्णुलोक से धरती पर आ पहुंची. इस तरह यह रक्त की यह धार, शिप्रा नदी में परिवर्तित हो गई.

मोक्षदायनी नदी शिप्रा नदी का काफी पौराणिक महत्‍व है. यह मध्य प्रदेश की धार्मिक और ऐतिहासिक नगरी उज्जैन से होकर गुजरती है. उज्जैन की शिप्रा नदी, जहां हर 12 वर्ष बाद सिंहस्थ कुंभ का आयोजन किया जाता है. कुंभ विश्व का सबसे बड़ा मेला है. एक किंवदंती के अनुसार शिप्रा नदी विष्णु जी के रक्त से उत्पन्न हुई थी.

ब्रह्मपुराण में भी शिप्रा नदी का उल्लेख मिलता है.संस्कृत के महाकवि कालिदास ने अपने काव्य ग्रंथ ‘मेघदूत’ में शिप्रा का प्रयोग किया है, जिसमें इसे अवंति राज्य की प्रधान नदी कहा गया है. महाकाल की नगरी उज्जैन, शिप्रा के तट पर बसी है. स्कंद पुराण में शिप्रा नदी की महिमा लिखी है. पुराण के अनुसार यह नदी अपने उद्गम स्थल बहते हुए चंबल नदी से मिल जाती है.प्राचीन मान्यता है कि प्राचीन समय में इसके तेज बहाव के कारण ही इसका नाम शिप्रा प्रचलित हुआ.

रक्त की धार हो गई शिप्रा नदी में परिवर्तित
शिप्रा नदी की उत्तपत्ति के बारे में एक पौराणिक कथा का उल्लेख, हिंदू धर्मग्रंथों में मिलता है. बहुत समय पहले भगवान शिव ने ब्रह्म कपाल लेकर, भगवान विष्णु से भिक्षा मांगने पहुंचे. भगवान विष्णु ने उन्हें अंगुली दिखाते हुए भिक्षा प्रदान की. इस अशिष्टता से भगवान भोलेनाथ नाराज हो गए. उन्होंने तुरंत अपने त्रिशूल से विष्णु जी की उस अंगुली पर प्रहार कर दिया. अंगुली से रक्त की धारा बह निकली. जो विष्णुलोक से धरती पर आ पहुंची. इस तरह यह रक्त की यह धार, शिप्रा नदी में परिवर्तित हो गई. शिप्रा नदी के किनारे स्थित घाटों का भी पौराणिक महत्व है. जिनमें रामघाट मुख्य घाट माना जाता है.

शिप्रा, जिसे क्षिप्रा के नाम से भी जाना जाता है यह मध्य भारत के मध्य प्रदेश राज्य की एक नदी है। नदी धार जिले के उत्तर में निकलती है और मंदसौर जिले में मध्यप्रदेश के राजस्थान सीमा पर चंबल नदी में शामिल होने के लिए मालवा पठार के उत्तर में बहती है। यह हिंदू धर्म की सबसे पवित्र नदियों में से एक है। जब बात आती है इसकी पवित्रता की तब उज्जैन का पवित्र शहर इसके पूर्वी तट पर स्थित है। इस स्थान पर हर 12 साल में सिंहस्थ मेला भी लगता है जिसे कुंभ मेला भी कहा जाता है। यह नदी 195 किमी लंबी है. इसे हिंदुओं द्वारा गंगा नदी के रूप में पवित्र माना जाता है। शिप्रा की प्रमुख सहायक नदियां खान और गंभीर हैं।

शिप्रा नदी के किनारे सैकड़ों हिंदू मंदिर हैं। यह एक बारहमासी नदी है और हिंदुओं द्वारा गंगा नदी के समान पवित्र मानी जाती है। शिप्रा शब्द का प्रयोग "पवित्रता" आत्मा, भावनाओं, शरीर आदि या "पवित्रता" या "स्पष्टता" के प्रतीक के रूप में किया जाता है। शिप्रा नदी भारत की उन पवित्र नदियों में से एक है जिसे लोग पूजते हैं और उससे जुड़ी कई रोचक कथाएं भी प्रचलित हैं। कुछ लोगों का यह भी मानना है कि शिप्रा की उत्पत्ति वराह के हृदय से हुई थी और भगवान विष्णु ने एक सुअर के रूप में अवतार लिया था। इसके अलावा शिप्रा के तट पर ऋषि संदीपनी का आश्रम या आश्रम है जहां भगवान विष्णु के आठवें अवतार नीले भगवान कृष्ण ने अध्ययन किया था। (जानें ब्रह्मपुत्र नदी का इतिहास)

सूखने लगा है शिप्रा का जल

यदि शिप्रा के जल की बात की जाए तो इसका जल अपने उद्गम स्थान से सूखने लगा है जिसे पुनः जीवित करने के लिए सरकार ने कई कदम उठाने शुरू किये हैं। अपने उद्गम स्थान से सूखने वाली शिप्रा नदी को करीब 432 करोड़ रुपये की लागत वाली परियोजना के जरिये नर्मदा के सहयोग से जीवित किया गया है। प्रदेश सरकार के नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण ने दोनों नदियों यानी कि शिप्रा और नर्मदा को नर्मदा-क्षिप्रा सिंहस्थ लिंक परियोजना के जरिए जोड़ा गया है। दरअसल नदी में आमतौर पर गर्मियों में सूखकर नाले में तब्दील हो जाती है और इसका पानी इतना कम होने लगता है कि उससे जल की प्राप्ति संभव ही नहीं होती है।

शिप्रा नदी:

  • उद्गम: शिप्रा (क्षिप्रा), मध्य प्रदेश में चंबल नदी की सहायक नदी है जो मालवा पठार से होकर प्रवाहित होती है।
    • इसका उद्गम विंध्य पर्वतमाला में काकरी-टेकड़ी नामक पहाड़ी से होता है, जो धार के उत्तर में और उज्जैन के पास स्थित है।
    • प्रमुख सहायक नदियाँ: खान और गंभीर।
  • सांस्कृतिक महत्त्व:
    • उज्जैन एक नदी के पूर्वी तट पर स्थित पवित्र शहर है। यहाँ प्रत्येक 12 वर्ष में सिंहस्थ मेला (कुंभ मेला) और नदी की देवी क्षिप्रा के लिये वार्षिक उत्सव का आयोजन किया जाता है।
    • हिंदू ग्रंथों के अनुसार शिप्रा नदी का संबंध भगवान विष्णु के अवतार वराह से है। इसके अतिरिक्त विष्णु के एक अन्य अवतार भगवान कृष्ण ने नदी के किनारे ऋषि संदीपनी के आश्रम में अध्ययन किया था।
    • इसका उल्लेख बौद्ध और जैन धर्मग्रंथों में भी मिलता है।
उज्जयिनी, प्राचीनकाल में यह नगर ग्वालियर राज्य के अधिकार में ही नहीं, बल्कि मालव-प्रदेश की राजधानी था। इन दिनों मध्यप्रदेश के अंतर्गत है। इस नगर के भिन्न-भिन्न नाम हैं- विशाला, अवन्ती, अवन्तिका आदि। अयोध्या, मथुरा, माया (हरिद्वार), काशी, कांची, द्वारावती की तरह अवन्ती, अवंतिका या उज्जयिनी तीर्थ भी हिन्दुओं के निकट पवित्र तीर्थ हैं-

अयोध्या मथुरा माया काशी कांची अवन्तिका। 
पुरी द्वारावती श्चैव सप्तैतां मोक्षदायिका।।

यह नगरी धार्मिक दृष्टि से प्रतिद्ध और अत्यंत प्राचीन है। महाभारत में इस नगर का उल्लेख है। यह नगरी महाराजा विक्रमादित्य की राजधानी थी। प्रसिद्ध संस्कृत कवि कालिदास उनकी सभा के नवरत्नों में सप्तम थे। कुमार सम्भव, ऋतुसंहार, रघुवंश, मेघदूत, नलोदय आदि काव्य, अभिज्ञान शाकुन्तलम्, विक्रमोर्वशीयम्, मालविकाग्निमित्रम् आदि नाटक, द्वात्रिंशत्पुत्तलिका आदि उपाख्यान कविवर कालिदास की काव्य प्रतिभा और साहित्यिक कृतियों के अमर दृष्टांत हैं।

उज्जैन केवल आध्यात्मिक तीर्थ ही नहीं, बल्कि काव्य तथा साहित्य के क्षेत्र में उज्ज्वल पीठ स्थान है। यह नगर कई बार हिन्दू राजाओं, मुसलमानों के अधिकार में आया था।

उज्जयिनी में अनेक हिन्दू मंदिर हैं। कालीदह महल से कुछ दूर स्थित प्राचीन तोरण द्वार के बारे में कहा जाता है कि यहीं सम्राट विक्रमादित्य का महल था, जो खंडहर के रूप में मौजूद है। शहर के दक्षिण दिशा में एक मान-मंदिर है जिसका निर्माण जयपुर नरेश जयसिंह ने करवाया था। यह नगर शिप्रा नदी के किनारे बसा हुआ है। शिप्रा नदी विंध्य पर्वत से निकलकर चम्बल नदी से जा मिली है और चम्बल आगे जाकर यमुना से मिल गई है। वर्तमान समय में शिप्रा क्षीण स्रोत है। लेकिन इसकी महिमा में कोई कमी नहीं हुई है। इस क्षेत्र में इसे गंगा के बराबर समझा जाता है।

महाकालः सरिच्छिप्रागतिश्चैचव सुनिर्मला।
उज्जयिन्या विशालाक्षि वासः कस्य न रोच्यते। 
स्नानं कृत्वा नरो यस्तु महानद्यां हि दुर्लभम्,
महाकालं नमस्कृत्य नरो मृत्युं न शोचयेत्।

अर्थात जहां भगवान महाकाल हैं, जहां शिप्रा नदी है और इसी वजह से जहां निर्मल गति प्राप्त होती है, उस उज्जयिनी नगरी में किसका मन रहने को नहीं करेगा? महानदी शिप्रा में स्नान करने के पश्चात शिव का दर्शन तथा पूजन करने पर मृत्यु-भय नहीं रहता। यहां मृत कीट-पतंग तक रुद्र के अनुचर बन जाने का सौभाग्य प्राप्त करते हैं।

शिप्रा नदी में स्नान करने लायक 5 घाट हैं। शहर में स्थित रामघाट सबसे विशाल घाट है। शेष घाटों के नाम हैं- नरसिंह घाट, गऊ घाट, त्रिवेणी घाट और मंगल घाट। कुंभ के अवसर पर जिस दिन मुख्य स्नान होता है, सभी संप्रदाय के साधु रामघाट में जुलूस के साथ आते हैं और यहीं स्नान करते हैं। मुख्य स्नान के दिन हैं- चैत्र संक्रांति, अमावस्या, अक्षय तृतीया, शंकर जयंती और वैशाखी पूर्णिमा।

वैशाखी पूर्णिमा को सर्वश्रेष्ठ स्नान माना गया है। इस स्नान को शाही स्नान कहा जाता है। कुंभ मेला के अवसर पर नदी के दोनों किनारे भारत के सभी मठ और अखाड़े के साधुओं के डेरा-तंबू या कुटिया लग जाते हैं। जैन, बौद्ध, सिख संप्रदाय के संत भी इस महोत्सव में भाग लेने आते हैं।

उज्जयिनी शहर से 4 मील दूर गंगा घाट त तथा मंगल घाट के निकट वैष्णव साधुओं का शिविर लगता है। मुख्य सड़क के दोनों ओर दत्तात्रेय अखाड़ा के मंडलेश्वर और महामंडलेश्वर विराजते हैं। नागा साधुओं का डेरा शिप्रा नदी के तट पर लगता है।

उज्जयिनी स्थित महाकाल शिव द्वादश ज्योतिर्लिंगों में अन्यतम हैं। यहां वे दक्षिणमूर्ति हैं। दक्षिणमूर्ति शिव का महत्व केवल यहीं दिखाई देता है। मंदिर शहर के भीतर है। उज्जयिनी की हरसिद्धि का मंदिर भी काफी प्राचीन है। इन्हें काफी जाग्रत माना जाता है। शक्ति के 51 पीठों में यह अन्यतम है। यहां देवी की कुहनी) गिरी थी। यह भी कहा जाता है कि राजा विक्रमादित्य नित्य यहां मंदिर में पूजा करते थे। यहां का सांदीपनि आश्रम दर्शनीय है। द्वापर युग में इसी आश्रम में श्रीकृष्ण और बलराम पढ़ने के लिए आए थे। भागवत पुराण में इसका उल्लेख है।

शिप्रा नदी के किनारे भैरवगढ़ के पूर्व प्राचीन सिद्धवट है। इस वृक्ष को अत्यंत पवित्र समझा जाता है। उज्जयिनी से दो मील की दूरी पर गढ़कालिका मंदिर है। प्राचीन अवंतिका नगरी काफी पहले उधर बसी हुई थी। कहा जाता है कि महाकवि कालिदास नित्य मंदिर में आकर पूजा करते थे। महाराज हर्षवर्धन ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार कराया था। इनके अलावा उज्जयिनी के प्रमुख मंदिरों में गोपाल मंदिर, चित्रगुप्त मंदिर, नवग्रह मंदिर, महागणेश मंदिर, भर्तृहरि गुहा, कालभैरव मंदिर, ब्रह्मकुंड और मंगलनाथ मंदिर आदि दर्शनीय हैं। यहां पंचमुखी हनुमानजी की मूर्ति है।

कुंभयोग में लोग यहां आकर पंचक्रोशी परिक्रमा करते हैं। महाकालेश्वर मंदिर को केंद्र बनाकर इसके चारों ओर 123 किलोमीटर मार्ग को 5 कोस के व्यास में परिक्रमा करते हैं। इस परिक्रमा में 5 दिन लगते हैं। अनेक साधु-महात्मा भी परिक्रमा में भाग लेते हैं। यात्रा पथ में 84 महादेव, नौ नारायण और सप्त सागर आदि आते हैं।

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