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कामाख्या और दशमहाविद्या सभा का दिव्य वृत्तांत

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कामाख्या और दशमहाविद्या सभा का दिव्य वृत्तांत ॐ ऐं ह्रीं श्रीं कामाख्यायै नमः। दशमहाविद्या सभा का दिव्य वृत्तांत नीलाचल पर्वत के गर्भगृह में धूप-दीप, शंख-ध्वनि और कमल पुष्पों की सुगंध के बीच माँ कामाख्या रत्नजड़ित सिंहासन पर विराजमान हैं। उनके चारों ओर दसों महाविद्याएं अर्धचंद्राकार में बैठी हैं, जैसे दस दिशाएं स्वयं सभा कर रही हों। यह कोई साधारण सभा नहीं, यह सृष्टि के संचालन की मंत्रणा है। माँ कामाख्या ने कहा - "हे मेरी ही दश रूपा शक्तियों! कालचक्र तेज़ हो रहा है। मनुष्य भौतिकता में भटक रहा है, भय, दरिद्रता और अहंकार में डूब रहा है। बताओ, इस कलियुग के जीव का कल्याण कैसे हो?" तब एक-एक कर सभी देवियों ने उत्तर दिया - 1. माँ काली बोलीं - "हे जननी! मैं काल हूँ, मैं ही काल से मुक्ति भी हूँ। जो जीव 'मैं' के अहंकार को मेरे खड्ग से काट देगा, मैं उसके भय को खा जाऊंगी। मेरे भक्त को कोई शत्रु छू नहीं सकता।" 2. माँ तारा बोलीं - "मैं तारिणी हूँ। जब प्राणी संसार-सागर में डूबता है, मैं उसे नीलवर्ण आकाश की तरह अपनी गोद में ले लेती हूँ। जो शरणागत होकर 'ॐ...