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शिवजी की आरती (खाटू श्याम जी से)

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शिवजी की आरती शीश गंग अर्द्धाङ्ग पार्वती, सदा विराजत कैलाशी। नंदी भृंगी नृत्य करत हैं, धरत ध्यान सुर सुख रासी ।।  शीतल मंद सुगंद पवन बहे, वहां बैठे शिव अविनाशी।  करत गान गंधर्व सप्त स्वर, राग रागनी सब गासी ।। यक्ष रक्ष भैरव जंह डोलत, बोलत है बन के वासी। कोयल शब्द सुनावत सुन्दर, भंवर करत हैं गुजांसी।। कल्पद्रुम अरू पारिजात, तरू लाग रहे हैं लक्षासी। कामधेनु कोटिक जंह डोलत, करत फिरत है भिक्षासी ।।   सूर्यकांत सम पर्वत शोभित, चन्द्रकांत अवनी वासी।  छहों ऋतु नित फलत रहत है, पुष्प चढ़त हैं वर्षासी ।। देव मुनी जन की भीड पड़त है, निगम रहत जो नित गासी। ब्रह्मा विष्णु जाको ध्यान धरत है, कछु शिव हमको फरमासी ।। ऋद्धि सिद्धि के दाता शंकर, सदा आनंदित सुखरासी।  जिनको सुमरिन सेवा करते, टुट जाय यम की फांसी ।। त्रिशुलघर को ध्यान निरन्तर, मन लगाय कर जो गासी।  दुर करे विपता शिव तन की, जन्म-जन्म शिवपद पासी ।।  कैलाशी काशी के वासी, अविनाशी मेरी सुध लीज्यो। सेवक जान सदा चरनन को, आपन जान दरश दीज्यो॥ तुम तो प्रभुजी सदा सयाने, अवगुण मेरे सब ककियो। सब अपराध क्षमाकर शंकर, किंकर क...

मासिक शिवरात्रि 30 सितम्बर विशेष

मासिक शिवरात्रि 30 सितम्बर विशेष 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ शिवरात्रि शिव और शक्ति के अभिसरण का विशेष पर्व है। हर माह की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मासिक शिवरात्रि के नाम से जाना जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार एक बार भगवान शिव अत्यंत क्रोधित हो गए। उनके क्रोध की ज्वाला से समस्त संसार जलकर भस्म होने वाला था किन्तु माता पार्वती ने महादेव का क्रोध शांत कर उन्हें प्रसन्न किया इसलिए हर माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को भोलेनाथ ही उपासना की जाती है और इस दिन को मासिक शिवरात्रि कहा जाता है। माना जाता है कि महाशिवरात्रि के बाद अगर प्रत्येक माह शिवरात्रि पर भी मोक्ष प्राप्ति के चार संकल्पों भगवान शिव की पूजा, रुद्रमंत्र का जप, शिवमंदिर में उपवास तथा काशी में देहत्याग का नियम से पालन किया जाए तो मोक्ष अवश्य ही प्राप्त होता है। इस पावन अवसर पर शिवलिंग की विधि पूर्वक पूजा और अभिषेक करने से मनवांछित फल प्राप्त होता है। अन्य भारतीय पौराणिक कथाओं के अनुसार महाशिवरात्रि के दिन मध्य रात्रि में भगवान शिव लिङ्ग के रूप में प्रकट हुए थे। पहली बार शिव लिङ्ग की पूजा भगवान विष्णु और ब्रह्माजी द्वारा की गयी थी।...

05. कोटिरुद्रसंहिता | 17. शंकरजीकी आराधनासे भगवान् विष्णुको सुदर्शन चक्रकी प्राप्ति तथा उसके द्वारा दैत्योंका संहार

05. कोटिरुद्रसंहिता | 17. शंकरजीकी आराधनासे भगवान् विष्णुको सुदर्शन चक्रकी प्राप्ति तथा उसके द्वारा दैत्योंका संहार व्यासजी कहते है- सूतका यह वचन सुनकर उन मुनीश्वरोंने उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा करके लोकहितकी कामनासे इस प्रकार कहा। ऋषि बोले- सूतजी ! आप सब जानते हैं। इसलिये हम आपसे पूछते हैं। प्रभो ! हरीश्वर-लिङ्गकी महिमाका वर्णन कीजिये। तात ! हमने पहलेसे सुन रखा है कि भगवान् विष्णुने शिवकी आराधनासे सुदर्शन चक्र प्राप्त किया था। अतः उस कथापर भी विशेषरूपसे प्रकाश डालिये । सूतजीने कहा- मुनिवरो । हरीश्वर- लिङ्गकी शुभ कथा सुनो ! भगवान् विष्णुने पूर्वकालमें हरीश्वर शिवसे ही सुदर्शन चक्र प्राप्त किया था। एक समयकी बात है, दैत्य अत्यन्त प्रबल होकर लोगोंको पीड़ा देने और धर्मका लोप करने लगे। उन महाबली और पराक्रमी दैत्योंसे पीड़ित हो देवताओंने देवरक्षक भगवान् विष्णुसे अपना सारा दुःख कहा। तब श्रीहरि कैलासपर जाकर भगवान् शिवकी विधिपूर्वक आराधना करने लगे। वे हजार नामोंसे शिवकी स्तुति करते तथा प्रत्येक नामपर एक कमल चढ़ाते थे। तब भगवान् शंकरने विष्णुके भक्तिभावकी परीक्षा करनेके लिये उनके लाये हुए एक हजार कम...

शतरुद्रसंहिता | शिवजीके द्वादश ज्योतिर्लिङ्गावतारोंका सविस्तर वर्णन

शिवजीके द्वादश ज्योतिर्लिङ्गावतारोंका सविस्तर वर्णन नन्दीश्वरजी कहते है- मुने ! अब तुम सर्वव्यापी भगवान् शंकरके बारह अन्य ज्योतिर्लिङ्गस्वरूपी अवतारोंका वर्णन श्रवण करो, जो अनेक प्रकारके मङ्गल करनेवाले हैं। (उनके नाम ये हैं-) सौराष्ट्रमें सोमनाथ, श्रीशैलपर मल्लिकार्जुन, उज्जयिनीमें महाकाल, ओंकारमें अमरेश्वर, हिमालयपर केदार, डाकिनीमें भीमशंकर, काशीमें विश्वनाथ, गौतमीके तटपर त्र्यम्बकेश्वर, चिताभूमिमें वैद्यनाथ, दारुकवनमें नागेश्वर, सेतुबन्धपर रामेश्वर और शिवालयमें घुश्मेश्वर । मुने ! परमात्मा शम्भुके ये ही वे बारह अवतार हैं। ये दर्शन और स्पर्श करनेसे मनुष्योंको सब प्रकारका आनन्द प्रदान करते है।  मुने ! उनमें पहला अवतार सोमनाथका है। यह चन्द्रमाके दुःखका विनाश करनेवाला है। इनका पूजन करनेसे क्षय और कुष्ठ आदि रोगोंका नाश हो जाता है। यह सोमेश्वर नामक शिवावतार सौराष्ट्र नामक पावन प्रदेशमें लिङ्गरूपसे स्थित है। पूर्वकालमें चन्द्रमाने इनकी पूजा की थी। वहीं सम्पूर्ण पापोंका विनाश करनेवाला एक चन्द्रकुण्ड है, जिसमें स्त्रान करनेसे बुद्धिमान् मनुष्य सम्पूर्ण रोगोंसे मुक्त हो जाता है। परमात्मा श...

05. कोटिरुद्रसंहिता | 16. घुश्माकी शिवभक्तिसे उसके मरे हुए पुत्रका जीवित होना, घुश्मेश्वर शिवका प्रादुर्भाव तथा उनकी महिमाका वर्णन

05. कोटिरुद्रसंहिता | 16. घुश्माकी शिवभक्तिसे उसके मरे हुए पुत्रका जीवित होना, घुश्मेश्वर शिवका प्रादुर्भाव तथा उनकी महिमाका वर्णन सूतजी कहते हैं- अब मैं घुश्मेश नामक ज्योतिर्लिङ्गके प्रादुर्भावका और उसके माहात्म्यका वर्णन करूँगा। मुनिवरो ! ध्यान देकर सुनो। दक्षिण दिशामें एक श्रेष्ठ पर्वत है, जिसका नाम देवगिरि है। वह देखनेमें अद्भुत तथा नित्य परम शोभासे सम्पन्न है। उसीके निकट कोई भरद्वाज कुलमें उत्पन्न सुधर्मा नामक ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मण रहते थे। उनकी प्रिय पत्नीका नाम सुदेहा था, वह सदा शिवधर्मके पालनमें तत्पर रहती थी, घरके काम-काजमें कुशल थी और सदा पतिकी सेवामें लगी रहती थी। द्विजश्रेष्ठ सुधर्मा भी देवताओं और अतिथियोंके पूजक थे। वे वेदवर्णित मार्गपर चलते और नित्य अग्निहोत्र किया करते थे। तीनों कालकी संध्या करनेसे उनकी कान्ति सूर्यके समान उद्दीप्त थी। वे वेद-शास्त्रके मर्मज्ञ थे और शिष्योंको पढ़ाया करते थे। धनवान् होनेके साथ ही बड़े दाता थे। सौजन्य आदि सद्‌गुणोंके भाजन थे। शिवसम्बन्धी पूजनादि कार्यमें ही सदा लगे रहते थे। वे स्वयं तो शिवभक्त थे ही, शिवभक्तोंसे बड़ा प्रेम रखते थे। शिवभक्त...

05. कोटिरुद्रसंहिता | 15. रामेश्वर नामक ज्योतिर्लिङ्गके आविर्भाव तथा माहात्म्यका वर्णन

05. कोटिरुद्रसंहिता | 15. रामेश्वर नामक ज्योतिर्लिङ्गके आविर्भाव तथा माहात्म्यका वर्णन सूतजी कहते हैं-ऋषियो ! अब मैं यह बता रहा हूँ कि रामेश्वर नामक ज्योतिर्लिङ्ग पहले किस प्रकार प्रकट हुआ। इस प्रसङ्गको तुम आदरपूर्वक सुनो। भगवान् विष्णुके रामावतारमें जब रावण सीताजीको हरकर लङ्कामें ले गया, तब सुग्रीवके साथ अठारह पद्म वानरसेना लेकर श्रीराम समुद्रतटपर आये। वहाँ वे विचार करने लगे कि कैसे हम समुद्रको पार करेंगे और किस प्रकार रावणको जीतेंगे। इतनेमें ही श्रीरामको प्यास लगी। उन्होंने जल माँगा और वानर मीठा जल ले आये। श्रीरामने प्रसन्न होकर वह जल ले लिया। तबतक उन्हें स्मरण हो आया कि 'मैंने अपने स्वामी भगवान् शंकरका दर्शन तो किया ही नहीं। फिर यह जल कैसे ग्रहण कर सकता हूँ?' ऐप्सा कहकर उन्होंने उस जलको नहीं पिया। जल रख देनेके पश्चात् रघुनन्दनने पार्थिव पूजन किया। आवाहन आदि सोलह उपचारोंको प्रस्तुत करके विधिपूर्वक बड़े प्रेमसे शंकरजीकी अर्चना की। प्रणाम तथा दिव्य स्तोत्रोंद्वारा यत्नपूर्वक शंकरजीको संतुष्ट करके श्रीरामने भक्तिभावसे उनसे प्रार्थना की। श्रीराम बोले- उत्तम व्रतका पालन करनेवाले म...

05. कोटिरुद्रसंहिता | 14. नागेश्वर नामक ज्योतिर्लिङ्गका प्रादुर्भाव और उसकी महिमा

05. कोटिरुद्रसंहिता | 14. नागेश्वर नामक ज्योतिर्लिङ्गका प्रादुर्भाव और उसकी महिमा सूतजी कहते हैं- ब्राह्मणो ! अब मैं परमात्मा शिवके नागेश नामक परम उत्तम ज्योतिर्लिङ्गके आविर्भावका प्रसङ्ग सुनाऊँगा। दारुका नामसे प्रसिद्ध कोई राक्षसी थी, जो पार्वतीके वरदानसे सदा घमंडमें भरी रहती थी। अत्यन्त बलवान् राक्षस दारुक उसका पति था। उसने बहुत से राक्षसोंको साथ लेकर वहाँ सत्पुरुषोंका संहार मचा रखा था। वह लोगोंके यज्ञ और धर्मका नाश करता फिरता था। पश्चिम समुद्रके तटपर उसका एक वन था, जो सम्पूर्ण समृद्धियोंसे भरा रहता था। उस वनका विस्तार सब ओरसे सोलह योजन था। दारुका अपने विलासके लिये जहाँ जाती थी, वहीं भूमि, वृक्ष तथा अन्य सब उपकरणोंसे युक्त वह वन भी चला जाता था। देवी पार्वतीने उस वनकी देख-रेखका भार दारुकाको सौंप दिया था। दारुका अपने पतिके साथ इच्छानुसार उसमें विचरण करती थी। राक्षस दारुक अपनी पत्नी दारुकाके साथ वहाँ रहकर सबको भय देता था। उससे पीड़ित हुई प्रजाने महर्षि और्वकी शरणमें जाकर उनको अपना दुःख सुनाया। और्वने शरणागतोंकी रक्षाके लिये राक्षसोंको यह शाप दे दिया कि 'ये राक्षस यदि पृथ्वीपर प्राणि...