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कर्मफल सभी को भुगतना पड़ता है, इंसान क्या और भगवान क्या? चाहे वह आपके कारण से जना है या किसी के श्राप से।

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कर्मफल सभी को भुगतना पड़ता है, इंसान क्या और भगवान क्या? चाहे वह आपके कारण से जना है या किसी के श्राप से। 1. गांधारी पूर्व जन्म में राजकुमारी थी उसने अपना सुंदरता को बरकरार रखने के लिए वैध को बुलाया वह दिन शौक है चूहा मांगे और उनका फेस पैक बना कर दिया जिसका फल उसने अपने सौ पुत्रों को अपने पैरों के नीचे रखकर एक बेर तोड़ने में प्राप्त किया। 2. पूर्व जन्म में धृतराष्ट्र अंधे थे लेकिन उन्होंने अपने एक नागरिक के हंस के 100 बच्चों को सुरक्षित रखने का वचन दिया लेकिन स्वाद में सभी को खा गए। इसी कारण इस के सौ पुत्रों का कारण बने। 3. सीता ने एक चिड़िया को बंदी बनाकर रखा जिसके कारण उसे बंदी होना पड़ा। 4. भगवान राम को भुगतना पड़ा था नारद द्वारा दिया गया श्राप जिसके कारण उन्हें वनवास व स्त्री वियोग भी भुगतना पड़ा। 5. भगवान राम ने बाली को छिप कर मारा तो अगले जन्म में बाली ने छिपकर कृष्ण को मारा। 5. संपूर्ण महाभारत युद्ध बीत गया भीष्म पितामह पीरों की शैया पर पड़े रहे शाम को वासुदेव कृष्ण से मिलने आते वहकहते हैं कि आज मुझे पहले दिन हो गया आज दूसरा दिन इस तरीके से वह उन्हें गिनते रहे इसी प्...

श्री रुद्राष्टक

श्री रुद्राष्टक नमामीशमीशान निर्वाणरूपम् ।  विभुं व्यापकं ब्रह्म वेदस्वरूपम् ।।  निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहम् ।  चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहम् ।।  निराकारमोङ्कारमूलं तुरीयम् ।  गिरा ज्ञान गोतीतमीशं गिरीशम् ।।  करालं महाकाल कालं कृपालं ।  गुणागार संसारपारं नतोऽहम् ।।  तुषाराद्रि संकाश गौरं गभीरम् ।  मनोभूत कोटिप्रभा श्री शरीरम् ।।  स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारु गङ्गा।  लसद्भालबालेंदु कण्ठे भुजङ्गा ।।  चलत्कुंण्डलं भ्रू सुनेत्रं विशालम् ।  प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालम् ।।  मृगाधीशचर्म्माम्बरं मुण्डमालम् ।  प्रियं शंकर सर्वनाथं भजामि ।।  प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशम् ।  अखण्डं अजंभानुकोटिप्रकाशम् ।।  त्रयः शूल निर्मूलनं शूलपाणिम् ।  भजेऽहं भवानीपतिं भावगम्यम् ।।  कलातीत कल्याण कल्पांतकारी ।  सदा सज्जनानंददाता पुरारी ।।  चिदानंद संदोह मोहापहारी ।  प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी ।।  न यावद् उमानाथ पादारविंदम् ।  भजंतीह लोके परे वा नराणाम् ।।  न तावत्सुखं शांति संताप...

देव ऋषि तुम्बरू

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देवताओं के संगीतकार व गायक तुम्बुरु हिन्दू पौराणिक कथाओं में तुम्बुरु गायकों में सर्वश्रेष्ठ और गंधर्वों के महान संगीतकार हैं। उन्होंने दिव्य देवताओं के दरबार के लिए संगीत और गीतों की रचना की थी। पुराणों में तुम्बरू या तुम्बुरु को ऋषि कश्यप और उनकी पत्नी प्रभा के पुत्र के रूप में वर्णित किया गया है।   तुम्बरू को अक्सर घोड़े के मुंह वाले ऋषि के रूप में दर्शाया गया। वे वीणा धारण करते और गाते हैं। अपनी तपस्या से शिव को प्रसन्न करने के बाद, तुम्बुरु ने शिव से कहा कि वे उन्हें एक घोड़ा जैसा चेहरा और अमरता प्रदान करें। शिव ने उसे आशीर्वाद दिया और वह वरदान दिया जो उसने मांगा था।     तिरुमला में तुम्बुरु तीर्थम एक बार ऋषि तुम्बुरु ने अपनी आलसी पत्नी को एक ताड़ बनने और इस झील में रहने के लिए शाप दिया। कुछ समय बाद, ऋषि अगस्त्य इस तीर्थ में पहुंचे और अपने शिष्यों को इस तीर्थ के गुणों का वर्णन किया। उनकी बातें सुनकर उसने फिर से अपने गंधर्व स्वरूप को प्राप्त कर लिया।     निष्कर्ष: तुम्बुरु जो एक दिव्य ऋषि और एक महान संगीतकार हैं और वे भगवान शिव एवं भगवान विष्णु क...

शिव शाबर तंत्र

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शाबर तंत्र शाबर मंत्रों में केवल मंत्र का प्रयोग होता है जबकि शाबर तंत्रों में मंत्र का प्रयोग तो होता ही है साथ में यंत्रों का, विशिष्ट वस्तुओं का, रसायनों आदि का भी प्रयोग होता है। साधक को चाहिए कि शाबर तंत्र को सिद्ध कर अपना कल्याण करें, साथ ही दूसरों का भी कल्याण करें। दीपावली का पर्व हो और शाबर मंत्र तंत्र की चर्चा न हो ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि दीपावली की महानिशा मंत्र तंत्र को सिद्ध करने के लिए सर्वश्रेष्ठ एवं उपयोगी निशा होती है। सारी रात जागकर इस रात सभी तांत्रिक अपनी-अपनी तंत्र साधना करते हैं। अन्य वैदिक पौराणिक तथा तांत्रिक मंत्रों और मांत्रिक तांत्रिक की तुलना में शाबर मंत्र के लिए शाबर तंत्र और शाबर तांत्रिकों के लिए यह रात अत्यंत ही महत्वपूर्ण एवं वर्ष में केवल एक बार मिलनेवाली रात होती है। शाबर तांत्रिक इस महानिशा को अपने शाबर तंत्रों को सिद्ध करने में परम सौभाग्यशाली समझते हैं, क्योंकि शाबर मंत्र, शाबर तंत्र दीपावली की महानिशा में ही सिद्ध किये जाते हैं। वर्ष में कुछ पर्व और भी हैं, जिनमें शाबर तंत्र सिद्ध किये जाते हैं, किंतु शाबर तंत्र को सिद्ध करने के लिए...

02. विद्येश्वरसंहिता || 05 - 08 तक || भगवान् शिव लिङ्ग एवं साकार विग्रहकी पूजाके रहस्य तथा महत्त्वका वर्णन

02. विद्येश्वरसंहिता  || 05 - 08 तक || भगवान् शिव लिङ्ग एवं साकार विग्रहकी पूजाके रहस्य तथा महत्त्वका वर्णन सूतजी कहते हैं  शौनक ! जो श्रवण, कीर्तन और मनन -इन तीनों साधनोंके नित्य अनुष्ठान में समर्थ न हो, वह भगवान् शंकरके लिङ्ग एवं मूर्तिकी स्थापना करके उसकी पूजा करे तो संसार-सागरसे  पार हो सकता है। वञ्चना अथवा छल न करते हुए अपनी शक्तिके अनुसार धनराशि ले जाय और उसे शिवलिङ्ग अथवा Preमूर्ति सेवाके लिये अर्पित कर दे। साथ ही निरन्तर उसलिंग एवं मूर्तिकी पूजा भी करे। उसके लिये भक्तिभावसे मण्डप, गोपुर, तीर्थ, मठ एवं क्षेत्रकी स्थापना करे तथा उत्सव रचाये । वस्त्र, गन्ध, पुष्प, धूप, दीप तथा पूआ और शाक आदि व्यञ्जनोंसे युक्त भाँति-भाँति के भक्ष्य भोजन अन्न नैवेद्यके रूपमें समर्पित करे। छञ, ध्वजा, व्यजन, वामर तथा अन्य अङ्गसहित राजोपचारकी भाँति सब सामान भगवान् शिवके लिङ्ग एवं मूर्तिको चढ़ाये प्रदक्षिणा, नमस्कार तथा यथाशक्ति जप करे। आवाहनसे लेकर विसर्जनतक सारा कार्य प्रतिदिन भक्तिभावसे सम्पन्न करे। इस प्रकार शिवलिङ्ग अथवा शिवमूर्ति भगवान् शंकरकी पूजा करनेवाला पुरुष श्रवणादि स...

02. विद्येश्वरसंहिता || 03 - 04 साध्य साधन आदिका विचार तथा श्रवण, कीर्तन और मनन - इन तीन साधनोंकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन

02. विद्येश्वरसंहिता  || 03 - 04  साध्य साधन आदिका विचार तथा श्रवण, कीर्तन और मनन - इन तीन साधनोंकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन व्यासजी कहते हैं सूतजीका यह वचन सुनकर वे सब महर्षि बोले- 'अब आप हमें वेदान्तसार- सर्वस्वरूप अद्भुत शिवपुराणकी कथा सुनाइये।' सूतजीने कहा आप सब महर्षिगण रोग-शोकसे रहित कल्याणमय भगवान् शिवका स्मरण करके पुराणप्रवर शिवपुराणकी, जो वेदके सार तत्त्वसे प्रकट हुआ है, कथा सुनिये शिवपुराणमें भक्ति, ज्ञान और वैराग्य- इन तीनोंका प्रीतिपूर्वक गान किया गया है और वेदान्तवेद्य सहस्तुका विशेषरूपसे वर्णन है। इस वर्तमान कल्पमें जब सृष्टिकर्म आरम्भ हुआ था, उन दिनों छः कुलोंके महर्षि परस्पर वाद-विवाद करते हुए कहने लगे- 'अमुक वस्तु सबसे उत्कृष्ट है और अमुक नहीं है।' उनके इस विवादने अत्यन्त महान् रूप धारण कर लिया। तब वे सब-के-सब अपनी शङ्काके समाधानके लिये सृष्टिकर्ता अविनाशी ब्रह्माजीके पास गये और हाथ जोड़कर विनयभरी वाणीमें बोले- 'प्रभो! आप सम्पूर्ण जगत्‌को धारण-पोषण करनेवाले तथा समस्त कारणोंके भी कारण हैं। हम यह जानना चाहते हैं कि सम्पूर्ण तत्वोंसे परे परात्पर पुराणपुरु...

02. विद्येश्वरसंहिता || 02. शिवपुराणका परिचय

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02. विद्येश्वरसंहिता  || 02. शिवपुराणका परिचय सूतजी कहते हैं साधु महात्माओ ! आपने बहुत अच्छी बात पूछी है आपका यह प्रश्न तीनों लोकोंका हित करनेवाला है। मैं गुरुदेव व्यासका स्मरण करके आपलोगोके वश इस विषयका वर्णन करूँगा। आप आदरपूर्वक सुनें। सबसे उत्तम जो शिवपुराण है, वह वेदान्तका सारसर्वस्व है तथा वक्ता और श्रोताका समस्त पापराशियोंसे उद्धार करनेवाला है। इतना ही नहीं, वह परलोकमें परमार्थ वस्तुको देनेवाला है, कलिकी कल्मषराशि का विनाश करने वाला है। उसमें भगवान् शिवके उत्तम यशका वर्णन है। ब्राह्मणो ! धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष - इन चारों पुरुषार्थोको देनेवाला वह पुराण सदा ही अपने प्रभावकी दृष्टिसे वृद्धि या विस्तारको प्राप्त हो रहा है।  विप्रवरो ! उस सर्वोत्तम शिवपुराणके अध्ययनमात्रसे वे कलियुगके पापासक्त जीव श्रेष्ठतम गतिको प्राप्त हो जायेंगे। कलियुगके महान् उत्पात तभीतक जगत में निर्भय होकर विचरेंगे, जबतक यहाँ शिवपुराणका उदय नहीं होगा। इसे वेदके तुल्य माना गया है। इस वेदकल्प पुराणका सबसे पहले भगवान् शिवने ही प्रणयन किया था। विद्येश्वरसंहिता, रुद्रसंहिता, विनायकसंहिता, उमा...